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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

३०६ रंगनाथ रामायण

ओर से उसके घर आते थे । यह देखकर इन्द्रजीत ने उन दोनों सूर्यवंशियों को नागपाश
से ऐसे बाँध दिया, मानो कह रहा हो कि सर्प के साथ रहना तुम्हारे लिए पहले से ही
सहज रहा है, अब भी उनके साथ ही रहो । राम-लक्ष्मण ने भी (इन्द्रजीत को प्राप्त)
ब्रह्मा के वर का सम्मान करने का निश्चय किया और वे आदिनारायण के वंशज, उस
राक्षस-राजकुमार के द्वारा प्रयुक्त नाग-पाश से बँध गये । 'ये आज राम का रूप धारण
किये हुए हैं, किन्तु विचार कर देखा जाय, तो इन्हीं ने वामन का रूप धारण करके तीन
पग भूमि माँगी थी और कृतघ्न हो बलि को बाँधा था । भला उसका फल, मनुष्य का जन्म
लेने के पश्चात् मिले बिना कैसे रहेगा'—इस प्रकार के लोक-कथन के अनुकूल ही रामचन्द्र
अपने द्वारा उत्पन्न माया से आप बँध गये ।
माया के बंधनों में बँधे हुए राम सुध-बुध सोये-से पड़े रहे । यह देखकर देवता
दिग्भ्रांत हुए और वानर खिन्न हुए । तब दुःखी सुग्रीव को देखकर विभीषण ने कहा—
'हे सुग्रीव, ऐसे क्यों दुःखी हो रहे हो ? चाहे कैसा भी व्यक्ति क्यों न हो, उसके जीवन में
विपत्तियाँ तो आती ही हैं । यदि सूर्यवंशज नाग-पाश से बँधे हुए हैं, तो क्या हुआ ?' यों
कहकर उसने अपनी माया की दृष्टि से रावण के पुत्र को आकाश-वीथी में देखा और जल
को अभिमंत्रित करके उससे राम-लक्ष्मण की आँखों को पोंछकर, उन्हें मेघनाद को दिखाया ।
उसके बाद सुग्रीव ने तुरन्त एक विशाल पर्वत को उखाड़कर इंद्रजीत पर फेंका, किन्तु उसने उसे बीच
में ही खंड-खंड कर दिया और तीव्र शर-वृष्टि से सुग्रीव को ऐसे त्रस्त एवं व्याकुल कर
दिया कि सुग्रीव को समर में पीठ दिखानी पड़ी । जो राक्षस सुग्रीव के प्रताप से भयभीत थे,
वे इसे देखकर बहुत हर्षित हुए । इंद्रजीत इस विजय से अत्यधिक मोद-मग्न हो, अपने
सैनिकों के साथ लंका में वापस चला गया और रावण से कहने लगा—'मैंने सर्प-बाणों से
कपियों का नाश किया और इक्ष्वाकु-वंशजों को व्याकुल कर दिया है ।'
अपने पुत्र की वीरता पर मन-ही-मन हर्षित होते हुए रावण ने शीघ्र ही त्रिजटा
को बुलाकर कहा—'राम को प्राप्त करने का दृढ़ विश्वास अपने मन में धारण किये रहने
में भूमिसुता मेरा तिरस्कार कर रही है । आज इन्द्रजीत के हाथों में राम की जो दुर्गति
हुई है, उसे सीता को दिखाओ । सीता को शीघ्र पुष्पक-विमान पर बैठाकर ले जाओ और
राम की दशा दिखा लाओ, जिससे वह राम की आशा छोड़कर मुझे स्वीकार करे ।'
४७. नाग-पाशबद्ध दाशरथियों को देख सीता का दुःखी होना
रावण की आज्ञा मानकर त्रिजटा दानवियों के साथ सीता को पुष्पक-विमान पर
बैठाकर ले आई और युद्ध-क्षेत्र में गिरे हुए वानरों तथा राम-लक्ष्मणों को दिखाया । वह
कमल-लोचनी उनकी दशा देखकर अत्यंत दुःखी होकर अविरत अश्रुधारा बहाती हुई विलाप
करने लगी। वे कहने लगी—"हाय राम, आपकी धनुर्विद्या कहाँ लुप्त हो गई ? आपमें ही स्थित हरि
तथा हर आदि देवों को भी भयभीत करनेवाली आपकी बाण-शक्ति आज कैसे नष्ट
हो गई ? इस संसार में आप ही अकेले परशुराम की भी उपेक्षा करने की शक्ति रखते हैं।
सभी मुनि तथा नाग, आपकी सहायता के लिए सतत तत्पर रहते हैं । हाय, ऐसे
नाग आज आपको बाँधनेवाले पाश बन गये हैं ! सामुद्रिकों ने मुझे देखकर कहा था कि

युद्धकांड ३०७
तुम्हारे शरीर में सब प्रकार के शुभ चिह्न हैं, तुम्हारे चरणतलो में रेखाएँ तथा कमल हैं;
इसलिए पति के साथ तुम्हारा राजतिलक होगा, तुम्हें योग्य पुत्र उत्पन्न होंगे और तुम
चिरसुहागिन रहोगी। हे सूर्यवंशतिलक, उनकी सभी बातें आज मिथ्या हो गईं ।
उन्होने मुझे देखकर यह भी कहा था कि 'तुम्हारे (सीता के) चिकुर भ्रमर-समूह के
समान नीले तथा सुदर हैं, कटि क्षीण है, एक दूसरे से मिलनेवाली टेढ़ी भौहें हैं, बिजली
की-सी कांति से युक्त दाँत हैं, विकृतिहीन स्थूल तथा वर्तुलाकार जाँघें हैं, हाथ, ललाट,
नेत्र, मुँह तथा चरण सुंदर लक्षणो से समन्वित हैं, कांतियुक्त तथा स्निग्ध नखो से युक्त
सुदर अगुलियाँ हैं, वर्तुलाकार, विवर्द्धित तथा सूक्ष्म अग्रभाग से युक्त दो कुच हैं, स्निग्ध
एव विशाल वक्ष तथा पार्श्वभाग हैं, नाभि गंभीर तथा सुदर है तथा तुम्हारा शरीर दिव्य
तथा कमनीय काति से समन्वित है, अत तुम्हारे समान भाग्यशालिनी कोई नही है।' हे राजन्,
मेरा वह भाग्य आज ऐसा फूट गया है ? आर्यो की यह उक्ति कि ऐसे षोडश लक्षणो से
सम्पन्न रमणी अत्यत भाग्यशालिनी होगी, आज मिथ्या सावित हुई । हे राजन्, यह सब
मेरे दुर्भाग्य का फल है। आर्यों का कथन है कि जिस कन्या के, लाल कमल की-सी सुंदर
हथेलियाँ हो, पल्लव के समान अरुण कान्तिवाले चरण हो, क्षीण कटि हो, मदहास से
युक्त मुख-कमल हो, वह चिर सौभाग्यवती होती है। यह कथन भी झूठ ही साबित हुआ ।
हे राजन्, मेरी साधना का यही परिणाम हुआ । मुझे चुराकर ले आनेवाले भयकर राक्षस
की खोज करके मेरा पता आपने जान लिया, समुद्र को बाँधकर कपि-सेना के साथ इस
पार चले भी आये, पर हाय, एक 'गोपद' में आप डूब गये ! हे राजन्, भयंकर याम्य शर,
वरुणास्त्र, आग्नेयास्त्र तथा ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना आप भूल तो नही गये ? कोई भी
शत्रु, आपके दृष्टि-पथ में पड़ जाने मात्र से वह प्राणो से हाथ धो बैठता था, अब आपकी
ऐसी दशा हो गई है ! दैव-योग से ही ऐसा हुआ है, अन्यथा किसकी शक्ति है कि आपका
सामना करे । यदि मेघनाद अपनी माया के बल से युद्ध में आपको ऐसे भयकर पाशो से
बाँध सका, तो स्पष्ट है कि विधि-विधान का अतिक्रमण करना किसी के लिए संभव नही है।
हे नाथ, हे वीर, हे रामचन्द्र, मै अपने लिए नही रोती, आपके लिए नही रोती, आपके
लिए अपने प्राण त्यागनेवाले काकुत्स्थ-वशज लक्ष्मण के लिए भी मै दुःखी नहीं होती, मेरे
दुःख को देख द्रवीभूत हृदय से शोक करनेवाली अपनी माँ के लिए भी दुःखी नही होती,
किन्तु सतत केवल आपका ही ध्यान अपने मन में धारण किये रहनेवाली माता कौसल्या
के लिए विलाप करती हूँ । कब चौदह वर्ष समाप्त होगे, कब राम अयोध्या में आयेंगे-
ऐसी प्रतीक्षा करनेवाली आपकी माता की आशाएँ आज मिट्टी में मिल गईं ।"
इस प्रकार, विलाप करनेवाली जानकी को सांत्वना देते हुए अत्यन्त दयार्द्र चित्त से
त्रिजटा सीता से बोली- 'हे कमल-लोचनी, राम पर कोई विपत्ति आ नहीं सकती । आप
क्यो इस प्रकार शोक कर रही है ? यदि वानर-सेना ऐसी निर्वल है, तो ये इतना बड़ा
कार्य-भार उठाते ही कैसे ? वहाँ देखिए, वानर, बड़ी सावधानी से आपके प्रभु की रक्षा
वंगे कर रहे हैं ? हे भूपुत्री, आप निश्चित रहिए । यदि ऐसा नही होता (यदि राम पर
कोई विपत्ति आनेवाली है), तो वह पुष्पक-विमान पृथ्वी पर गिरे बिना कैसे रहता ?

३०८ रंगनाथ रामायण
(क्योकि, इसका गुण है कि यह विधवाओ का वाहन नही बनता), इसलिए आप राम के
लिए विलाप मत कीजिए । मेरी बात का विश्वास कीजिए । हे कमलमुखी, सूर्य-वंश-तिलक
राम अवश्य ही लंकेश्वर का वध करके लंका पर विजय प्राप्त करेंगे और आपको ग्रहण
करेंगे । हे कल्याणी, अब दुख मत कीजिए । मेरी बातो का विश्वास कीजिए ।' तब
सीता ने सोचा कि कदाचित् माया-सिर के समान यह भी कोई माया होगी और त्रिजटा
की बातो पर विश्वास करके शांत हुई । इसके पश्चात् त्रिजटा ने उन्हें अशोक-वन में पहुँचा
दिया ।
४८. लक्ष्मण के लिए राम का विलाप करना
यहाँ मनुवंशतिलक राम की चेतना लौट आई । पार्श्व में पड़े हुए अपने अनुज को
देखकर उमड़ते हुए शोक से वे कहने लगे—“हे सुग्रीव, मेरे अनुज की ओर देखो, उसकी
कैसी दुर्गति हुई है । हम सीता को खो बैठे । उसे रावण के कारागार से मुक्त नही कर
सके । अब मुझे इसे भी खोना पड रहा है । सौमित्र को खोने के पश्चात् अब मुझे सीता
की ही क्या आवश्यकता है ? अब मेरा जीवित रहना भी किस काम का ? यत्न करूँ,
तो सीता के समान दूसरी पत्नी को मै कदाचित् प्राप्त कर सकूँगा । पृथ्वी पर पत्नियां
मिल सकती हैं, पुत्र प्राप्त हो सकते है, बंधु-बांधव मिल सकते है; किन्तु सहोदर भाई
नही मिल सकता । मै इसे केवल भाई समझकर दुःखी नही होता । यह महाबली सतत
मेरी सेवा में तत्पर रहता है । यह कौसल्या तथा सुमित्रा, इन दोनो की एक समान भक्ति
करता है । सुमित्रा, इससे भी बढकर मुझसे स्नेह करती हैं । ऐसी पुत्र-वत्सला, माता
सुमित्रा को आज मेरे कारण दुख भोगना पड़ रहा है । यदि मै अयोध्या जाऊँ, तो भ्रातृ-
वत्सल भरत तथा शत्रुघ्न पूछेंगे कि लक्ष्मण कहाँ हैं ? वे क्यो नही आये ? तो मै अपने
भाइयो से क्या कहूँगा ? मुझे वन से अकेले आते हुए देखकर माताएँ पूछेंगी कि, हे पुत्र,
सौमित्र क्यो नही आया है ? हमारा मन व्याकुल हो रहा है । तो मै उनका क्या प्रत्युत्तर
दे सकूँगा ? मैं कौन-सा मुँह लेकर उनको आश्वासन दूँगा । इस शरीर के साथ मै वहाँ
जाऊँगा भी कैसे ? भले ही हिमाचल फट जाय, सूर्य पृथ्वी पर गिर पडे, पानी स्थिर रह
जाय, समुद्र सूख जाय, हवा की गति बंद हो जाय, अग्नि शीतल हो जाय, लक्ष्मण कभी
मेरी आज्ञा का उल्लघन नही करता । कभी इसने मुझसे अप्रिय बातें नही की । इसका
चित्त मुझ पर एक निष्ठा से केन्द्रित है । इसकी समता करनेवाला भाई और कहाँ मिल
सकता है । यही मेरा प्राण है, और यही मेरा बंधु है । इसे छोड़कर मै अकेले नही रह
सकता । यह जहाँ जायगा, मै भी वही जाऊँगा । यही मेरा संसार है । मै अन्य कोई
संसार नही चाहता । उस दिन सौमित्र मेरे साथ आया था, आज मै सौमित्र के साथ
जाऊँगा । हे पराक्रमी सुग्रीव, तुमने मेरे हित के लिए बहुत-से कार्य किये हैं । अब तुम वालि-
पुत्र को लेकर वानर-सेना के साथ किष्किंधा को लौट जाओ । लक्ष्मण के साथ मेरे चले
जाने के पश्चात्, रावण तुम्हें तंग करेगा । जयशील सौमित्र के बिना, मेरी विजय का भी
वही मूल्य होगा, जो अंधे के लिए चंद्रोदय का मूल्य होता है । मेरे प्रति श्रद्धा रखने के
कारण वायु-पुत्र ने कई अद्भुत कार्य किये हैं, उसने समुद्र लाँघकर जानकी को देखा और

युद्धकांड ३०९
अनेक राक्षसो का संहार किया । यह अगद, यह सुषेण, ये धीमान् द्विविद, मैन्द, ये गवय,
गवाक्ष, गज, ये शक्तिशाली नील, संपाति, केसरी आदि अन्य वानरो ने मेरे लिए महान्
कार्य किये । आज हम पर जो विधि का प्रबल आघात हुआ है, उसे टालना किसी के लिए
संभव नही है । लक्ष्मण ने युद्ध-भूमि में बहुत-से राक्षसो का तृणवत् संहार किया, पर
इस समय शत्रु के तीव्र वाणो से बँधकर, आँखें बंद किये हुए धूलि में लोट रहा है ।
श्रेष्ठ शय्या पर सोनेवाला आज युद्ध-भूमि में, शर-शय्या पर पड़ा हुआ है । विशाल
रविकुल-रूपी समुद्र की ज्वार को शांत करके लक्ष्मण-रूपी कुमुदप्रिय ( चंद्र )
अस्त हो गया है ।"
४९. विभीषण तथा ऋंगद का वानरों को धैर्य देना
इस प्रकार, राम को विलाप करते हुए देखकर सभी वानर शोक-समुद्र में डूब गये
उसी समय मेघनाद फिर से युद्ध करने के लिए आ पहुँचा । अंजन-शैल के सदृश आकार-
वाले उसे देखकर सभी वानर सुध-बुध खोकर संभ्रमित हो रहे । तब विभीषण हाथ में
गदा लिये वानर-सेना के मध्य में घूमते हुए उनको धैर्य देने लगा । फिर उसने रवि-पुत्र
सुग्रीव को देखकर कहा—'हे सुग्रीव, इस प्रकार तुम शोक क्यो कर रहे हो ? यह युद्ध
का समय है । यह समय शोक में डूबे रहने का नही है ? दुर्निवार तरंगो से पूर्ण समुद्र
के मध्य फँसी हुई नाव के समान हमारी सेना कर्णधार-रहित हो गई है । अब हमारा
कर्त्तव्य है कि हम युद्ध के लिए सन्नद्ध हो जायँ ।'
इसे सुनकर अगद ने कहा—'तुम्हारा कथन सर्वथा उत्तम है । नाग-पाशो से बँधे
हुए राजकुमार, पृथ्वी पर गिरे हुए है और क्षतो से अविरत बहनेवाली रक्त-धारा के
कारण मूर्च्छित-से पड़े है । तुम लोग इनकी रक्षा सावधानी से करते रहो । उदयाद्रि पर
सूर्य का आगमन होने से पहले, मैं समस्त राक्षसो को जीतकर जानकी को यहाँ ले आऊँगा।
हनुमान् आदि वानरो के साथ जाकर, लंका के दुर्ग के द्वार, दीवार, तोरण आदि को अपनी
मुष्टियो के प्रहार से चूर-चूर कर दूँगा । बंधु-बांधवो के साथ दशकंधर को भस्म
कर दूँगा । समस्त भूत-समूह आज मेरा पराक्रम, मेरा बाहुबल और राम के प्रति मेरी भक्ति
देखेंगे । रघुनाथ का कार्य करने के लिए, चंदन तथा केयूर से अलंकृत मेरी भुजाएँ बड़े
दर्प के साथ फड़क रही है । रावण को जीतकर विभीषण को इस लंका के सिंहासन पर
प्रतिष्ठित करूँगा, ताकि रघुवीर प्रसन्न हो, अन्यथा मैं युद्ध में उस राक्षस के हाथो से
मरकर लक्ष्मण के चरण-चिह्नों का अनुसरण करूँगा ।'
तब सुग्रीव ने अगद को देखकर कहा—'हे पुत्र, तुम अब इन दाशरथियो को शीघ्र
किष्किंधा ले जाओ । मैं इन्द्रजीत तथा रावण को समस्त राक्षसो के साथ मारकर रघुराम
की पत्नी को शीघ्र वहाँ ले आऊँगा ।' सुग्रीव को तथा रामचन्द्र को देखकर सभी वानर
भयभीत हो शोक-समुद्र में डूब गये । तब सुषेण ने सबको देखकर कहा—'हे वानर-
वीरो, इस नाग-पाश से मुक्त होने का मैं एक उपाय जानता हूँ । पूर्वकाल में देवताओ और
असुरो के बीच भीषण संग्राम में सभी देवता इसी प्रकार नाग-पाशों से बँध गये थे । तब
देवताओ ने दिव्य औषधियो से, इन बंधनो से मुक्ति प्राप्त की । वे सभी औषधियाँ क्षीर-

३१० रंगनाथ रामायण
सागर के उस पार द्रोण पर्वत पर मिलती है। हनुमान् को भेजो, तो वह अवश्य उन
औषधियों को ले आयेगा । तुम लोग दुख मत करो ।
५०. नारद का आगमन
उस समय परम योगीन्द्र, पर-तत्त्व-वेत्ता, परम पावन मूर्त्ति तथा परम-वैष्णव नारद
मुनि वहाँ आये । सहस्र सूर्य-सदृश कांति से युक्त उनकी देह पर कृष्ण-मृग-चर्म था ।
उन पर उनका पिंगल वर्ण जटा-समूह ऐसा शोभायमान था, जैसे काले-काले बादलों पर
बिजली हो । उनके ललाट पर ऊर्ध्व-पुण्ड्र था और वे कौपीन-विलसित दण्ड धारण किये
हुए थे । उनकी वीणा से रमणीय नारायण-मंत्र का अनुरणन हो रहा था । उन्होंने अपने
साथी योगीन्द्र-समूह को आकाश में ठहरा दिया और स्वयं बड़े हर्ष से राम के निकट
पहुँचकर बड़े आदर के साथ हाथ जोड़कर उनकी प्रदक्षिणा की और अत्यंत भक्ति के साथ
निवेदन किया—"हे देव, ब्रह्मादि देवताओ ने, क्षीर-सागर में शयन करनेवाले आपके
समक्ष पहुँचकर रावण आदि राक्षसों के सबंध में निवेदन किया, तो उन पर
कृपा करके, उनकी रक्षा करने के निमित्त आप दशरथ के पुत्र होकर जन्मे । अत, आपका
इस प्रकार दुःखी होना उचित नहीं है । आपके नाम-मात्र का स्मरण करने से अज्ञान दूर
हो जाता है । तब आपको अज्ञान छू भी कैसे सकता है ? आप स्वयं विचार करके देखें।
आप स्वयं नारायण हैं, पूर्णज्ञान-निधि हैं, चारु-कौस्तुभ-रत्न विलसित वक्षवाले हैं, सतत
लक्ष्मी के निवास-योग्य विशाल अंगों से विलसित हैं, आदिदेव हैं, सर्वांतर्यामी हैं, वेद-
वेद्य हैं, विश्व-रूप हैं, स्मरण करनेवाले योगीश्वरों के ध्यान में दिखाई पड़नेवाले
सच्चिदानन्द-रूप हैं । यह पृथ्वी ही आपका चरण है, आकाश ही मस्तक है, ब्रह्मा आपका
ललाट है, सूर्य-चन्द्र नेत्र हैं, पवन ही आपका श्वास है, अग्नि ही आपका मुँह है, सरस्वती
जिह्वा है, वेद-राशि आपका दंत-समूह है, गायत्री ही शिखा है, प्रणव ही हृदय है, दिशाएँ
ही कान हैं, महनीय धर्म ही मन है, असंख्य विजयों से संपन्न देवता ही आपकी बाहुएँ हैं;
ब्राह्मण-समूह ही आपका उदर है, मित्र तथा वरुण आपकी जाँघें हैं, अश्विनी-देवता
आपके जानु हैं, और समस्त विश्व आपका रोम-समूह है । हे पृथ्वी-नाथ, वह देखिए, सभी
देवता, किन्नर, यक्ष, गंधर्व आदि आपकी विजय की अभिलाषा करते हुए आकाश में
खड़े हैं । आप अपना भ्रम छोड़ दीजिए, निष्कंटक धीमान् बन जाइए और शीघ्र राक्षसों
का संहार कीजिए । कदाचित् आप संसार को यह दिखाना चाहते हैं कि मानव मोहवश
इच्छा-रूपी पाश में बँध जाय, तो वह इसी प्रकार संसार-सागर को पार नहीं कर सकता ।
अन्यथा हे श्रीराम, आप कैसे नाग-पाशों से बँधने लगे ? आप आदिदेव हैं । आप अपने
निज रूप का स्मरण कीजिए । आपका वाहन तथा आपके पताके का चिह्न गरुड़ यहाँ
आयेगा । उनके आने ही ये सभी नाग-पाश खुल जायेंगे ।” इतना कहकर नारद आशीर्वाद
देकर क्षीर-सागर को चले गये ।
५१. राघवौं का नाग-पाश से मुक्त होना
नारद के वचनों को सुनकर राघव ने अपने आदिदेव होने की बात का विचार
किया और गरुड का स्मरण किया । उनके स्मरण करते ही गरुड़ क्षीर-सागर के उत्तर

युद्धकांड ३११
तट पर से आकाश की ओर उछला । जिस वेग से वह उछला, उस वेग के कारण पृथ्वी
के नीचे रहनेवाला आदिशेष चौंक पड़ा । उसके पखों से उत्पन्न अत्यधिक वायु मे आकाश
आलोदित-सा हो गया और नक्षत्र गिरने लगे । पखों की फडफडाहट के कारण उत्पन्न
ध्वनि से समस्त लोक भयाक्रात-से हो गये और समस्त आकाश धूलि से व्याप्त हो गया ;
उसकी तीव्र गति के कारण शैल-श्रृंग लुढकने लगे और समुद्र आलोडित होने लगा । वह
दस सहस्र सूर्यों की सयुक्त प्रभा के समान दीप्त हो रहा था और प्रभा-समन्वित पक्षो से
युक्त मेरु पर्वत के समान दीख रहा था । इस प्रकार, आकाश-मार्ग से आनेवाले गरुड
को देखकर राम-लक्ष्मण को आबद्ध किये हुए सभी नाग उन्हें छोड़कर चले गये । यथार्थ
तो यह है कि जो कोई उस गरुड का स्मरण करता है, वह सभी प्रकार के वधनों से
मुक्त हो जाता है । फिर, राम स्वय भी यदि चाहते, तो वे अपने वधनों को काट देने में समर्थ थे ।
सुग्रीव आदि वानर आश्चर्य-चकित हो देखते रहे । गरुड ने राम की परिक्रमा की
और राम-ल

३१२
रंगनाथ रामायण

५२. धूम्राक्ष का युद्ध

इस प्रकार कहने के पश्चात् उसने एक मत्त गज के हुंकार की भाँति लंबी साँस
छोड़ी और धूम्राक्ष को आज्ञा दी कि तुम एक विशाल सेना लेकर शीघ्र राम-लक्ष्मण पर
आक्रमण करो । तब दैत्यपति को प्रणाम करके धूम्राक्ष युद्ध के लिए चल पड़ा । उसकी
सेना भी चारो ओर से चली । भेडियो तथा सिंहो के मुखवाले फुर्तीले घोडो से युक्त
उसका रथ, कर्ण-पुटो को विदीर्ण करनेवाली तथा दिशाओ को कंपित करनेवाली भयंकर
ध्वनि करता हुआ तथा अपनी अनुपम दीप्ति फैलाता हुआ निकल पड़ा । भेरी, शख, डका,
आदि विविध वाद्यो का निनाद करते हुए युद्ध के लिए आनेवाले धूम्राक्ष को कई दुःशकुन
दिखाई दिये । तब रथ के आगे जानेवाले राक्षस भयंकर गर्जन करके भयभीत हो निश्चेष्ट-
से हो गये । इस पर भी बिना रुके बड़ी तत्परता दिखाते हुए धूम्राक्ष ने समुद्र के समान
विशाल वानर-सेना पर आक्रमण किया । असुर तथा वानर आकाश का स्पर्श करनेवाले
निनाद करते हुए आपस में जूझ गये । दानव खड्ग फेंकते थे, तो वानर उन पर वृक्षो का
प्रहार करते थे । राक्षस भाले भोकते थे, तो वानर मुष्टियो से आघात करते थे । राक्षस
हठ करके (वानरो पर) घोड़े दौड़ाते थे, तो वानर उन घोड़ो को अपने नखो से चीर
डालते थे । दानव उन पर रथ चलाते थे, तो वानर उनको चूर-चूर कर देते थे । दानव
मत्त गजो को उनसे टकराते थे, तो वानर क्रोध से उन्हें पृथ्वी पर पटक देते थे ।
इस प्रकार, दोनो पक्षो के योद्धाओ में भयंकर युद्ध होने लगा । वानर-वीर यम के
सदृश भयंकर आकार धारण करके असुरो को पैरो से कुचलकर, हाथियो को पृथ्वी पर
रगड़कर मार डालते थे और उन्ही (मृत) हाथियो को असुरो पर फेंककर उनका दर्प-दलन
कर देते थे । फिर, रथो के कूबर पकड़कर उन्हें (रथो को) आकाश में तेजी से घुमाकर
पृथ्वी पर पटक देते थे और उन्ही टूटे हुए रथो को उठाकर राक्षसो पर फेंककर उनको
पृथ्वी पर गिरा देते थे । फिर, वानर घोड़ो के पैरो को पकड़कर ऊपर उठाते और उन्हें
पृथ्वी पर पटककर मार डालते, और उन्ही मरे हुए घोड़ो को राक्षसो पर फेंककर उन्हें
मार डालते थे । शत्रु के पदचर सैनिको पर पद-प्रहार करके उनकी पसलियो को चूर-चूर
करके मार डालते थे और उनके शवो को राक्षस-सेना पर फेंककर उन्हें नीचे गिरा देते थे ।
वे राक्षस-सेना में घुस जाते और अपने भयंकर दाँतो से राक्षस-समूह को काटकर
उन्हें तितर-बितर कर देते, उनके अस्त्रो को तोड देते, कुहनियो से उनके मुखो पर प्रहार
करते, नीचे गिराते और उनके गले घोट देते । फिर, उनके पैरो को दबाकर अपने टखनो
से ऐसा प्रहार करते कि उनकी पसलियाँ चूर-चूर हो जाती । फिर, वे कुछ राक्षसो के
कंठ में अपनी पूँछो को फंदे की तरह डाल देते और उन्हें इस प्रकार कस देते कि बेचारे
राक्षमो की पुतलियाँ घूम जाती और वे जहाँ के तहाँ ढेर हो जाते । इस प्रकार, सारी
युद्ध-भूमि राक्षसो के शवो से ऐसी पट गई कि पता नहीं लगता था कि यह सिर है, यह
आँख हैं, यह मुँह हैं, यह कान है, यह नाक है, यह क्या है, ये हाथ है, यह शरीर है,
यह कमर है, यह जाँघ हैं, यह घुटना है और यह पैर है । मज्जा, मास, भेजा, रक्त,
आँतें, हड्डियाँ, चर्म तथा खोपड़ियो के तो ढेर ही लग गये थे ।

युद्धकांड ३१३
तब धूम्राक्ष ने बड़े उपेक्षा-भाव से उस कपि-सेना पर आक्रमण किया और अपने
प्रताप का प्रदर्शन करते हुए मुद्गरो के प्रहारो से वानरो के सिर विदीर्ण करते हुए, क्रोध
से भाले चलाते हुए, विविध अस्त्रो से भयकर युद्ध करने लगा । उसके भयंकर प्रहारो से
कई वानर-सैनिक रक्त उगलते हुए गिर पड़े । कुछ धैर्य खोकर, उसके प्रहारो से अपने को
बचाकर भागने लगे । यह देखकर हनुमान् ने बड़े क्रोध से एक विशाल पर्वत उस राक्षस
पर फेंका, लेकिन उसने अपनी गदा से उस पर्वत को रोककर अपने को बचा लिया,
किन्तु वह पर्वत उसके रथ पर गिरा और रथ चूर-चूर हो गया । तब पवन-कुमार ने
अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए तरु, शैल तथा पाषाणो के प्रहारो से राक्षसो के सिर
ऐसे चूर-चूर करने लगा, जैसे यम समस्त ब्रह्माण्ड को विदीर्ण करके चूर-चूर करता हो ।
फिर, वह सिंह-सदृश पराक्रमी हनुमान् एक पर्वत-शृंग को उठाकर धूम्राक्ष की ओर बढ़ा ।
तब उसने 'लो, अब मरो' कहते हुए अपनी गदा हनुमान् के सिर पर चलाई । किन्तु,
हनुमान् ने उस धूम्राक्ष की शक्ति, शौर्य, क्रोध तथा साहस की उपेक्षा करते हुए, भयंकर
गर्जन करके अपने हाथ के उस शैल-शृंग को धूम्राक्ष पर ऐसा फेंका कि उस राक्षस के सिर
के दो टुकड़े हो गये और वह ढेर होकर वही गिर गया । उस समय चारो ओर ऐसी
ध्वनि फैल गई, मानो वज्रपात होने से कई पहाड़ गिर रहे हो । धूम्राक्ष को इस प्रकार
मरे हुए देखकर हतशेष कुटिल राक्षस पवन-पुत्र के प्रताप से भयभीत हो उठे और शीघ्र
ही लंका की ओर भागने लगे । उनके भागते समय पृथ्वी भी काँपने लगी ।
५३. अकंपन का युद्ध
धूम्राक्ष की मृत्यु का समाचार सुनकर रावण का हृदय क्रोध से जलने लगा । तब
उसने देवताओ को कंपित करने की क्षमता रखनेवाले, दिव्यास्त्र शस्त्रो से संपन्न तथा
दिव्य रथ से विलसित अकंपन नामक राक्षस को, एक बड़ी सेना के साथ वानरो से युद्ध
करने के लिए भेजा । प्रलय-काल के मेघ के समान आकारवाला वह राक्षस अपने आभूषणो
की दीप्ति तथा मणियो की कांति से सूर्य-मंडल के समान देदीप्यमान होते हुए स्वर्ण-रथ
पर चढ़कर युद्ध के लिए चल पड़ा । उसके रथ की पताका ऐसे फहरने लगी, मानो कह
रही हो कि लो, अब अकंपन युद्ध करने आ गया है । राक्षस-वीरो के भयंकर हुकारो तथा
भेरी, पटह आदिके निनादो के मध्य, अपने साथ असंख्य चतुरंगिणी सेना लिये हुए गगन को
भी भेदनेवाले भयंकर गर्जन करते हुए, उसने वानर-सेना पर आक्रमण किया । दोनो पक्षो
की सेनाएँ आपस में भिड़ गईं और बड़ी भयंकर गति से युद्ध करने लगी । उस घोर
संग्राम के कारण उत्पन्न लाल धूलि सभी दिशाओ तथा आकाश में व्याप्त हो गई और
कपि-सेना तथा असुर-सेना के बीच अंधकार-सा छा गया ।
उस समय कुछ सैनिक तो अपने पक्ष के लोगो को पहचान कर युद्ध करते थे ।
कुछ उनकी बोली तथा चेष्टाओ से उन्हें पराया समझकर युद्ध करते थे और कुछ तो
किसी प्रकार का विचार किये बिना, जो कोई भी सामने पड़ जाता, उससे भयंकर गति से
युद्ध करते जाते थे । वानरो के द्वारा फेंके जानेवाले वृक्ष तथा पर्वत एवं दैत्यो के द्वारा
चलाये जानेवाले भयंकर शस्त्र चारो ओर फैलकर धूलि-रूपी तिमिर समुद्र में जलचरो के
४०

३९४ रंगनाथ रामायण
समान दीखते थे । राक्षसो तथा वानरो के बड़े उत्साह से युद्ध करते समय, सैनिको के
शरीरो से उमड़नेवाली रक्त-धाराओ के कारण सारी पृथ्वी की धूलि सिंच गई । युद्ध
में वानरो का युद्ध, दुस्सह होते देखकर अकंपन अग्नि के समान क्रुद्ध हुआ । तब धनुष
पर प्रत्यंचा चढ़ाकर बड़े उत्साह से उस महावली ने अपने सारथी से कहा—'वानर-सेना वृक्षो तथा
पर्वतो की सहायता से राक्षस-समूह को नष्ट कर रही है । शीघ्र ही मेरा रथ उनकी ओर ले चलो ।'
उसका सारथी रथ को उसी ओर ले गया । अकंपन ने उस वानर-सेना पर अपने
तीक्ष्ण बाणो की वृष्टि-सी कर दी, तो सभी वानर धैर्य खोकर निश्चेष्ट-से हो गये । तब
हनुमान् ने बड़े साहस के साथ उस राक्षस का सामना किया । तब उसके साथ वानरो ने
भी दानव-सेना पर आक्रमण किया । अकंपन अपनी अद्वितीय वीरता का परिचय देते हुए,
भयंकर गर्जन-रूपी निर्घोष करते हुए, मेरु पर्वत के समान आकारवाले पवन-पुत्र पर प्रलय-
काल के मेघ की भाँति शर-वृष्टि करने लगा । किन्तु हनुमान् ने उनकी उपेक्षा करके अट्टहास
किया और प्रलय-काल के रुद्र के समान अपनी क्रुद्ध दृष्टियो से रौद्र रस उगलते हुए, निर्भय
हो एक विशाल पर्वत को समूल उखाड़कर उसे अकंपन पर ऐसा फेंका, जैसे इन्द्र ने नमुचि
पर वज्र गिरा दिया था; पर उस दानव ने उस पहाड़ को अर्द्ध-चन्द्रास्त्र से चूर-चूर
कर दिया । तब हनुमान् और भी उद्धत हो, अपनी महनीय शक्ति को प्रकट करते हुए
तथा आँखो से स्फुलिंगो को गिराते हुए शीघ्रता से एक दूसरा पर्वत उखाड़कर ले आया
और भयंकर गर्जन करके उसे बड़ी क्रूरता से उस राक्षस पर फेंका । किन्तु, राक्षस ने शीघ्र
ही उस पर्वत के टुकड़े-टुकड़े कर दिये । इस पर मारुति और भी क्रुद्ध हो उठा और बड़े
वेग से एक पर्वताकार वृक्ष को उखाड़ा और अपने पैरो के आघात से पृथ्वी को कँपाते
हुए स्फुलिंगो से युक्त आँखो से उस वृक्ष को घुमाकर अन्य वृक्षो को तोड़ते हुए दैत्य-समूह
पर पिल पड़ा । उसने रथियो को मार डाला, रथो तथा उसके अश्वो को मिट्टी में मिला
दिया, तथा राक्षसो का संहार कर दिया । फिर हाथियो के समूह पर आक्रमण करके,
उनके दाँतो, हड्डियो, उनके कुंभो पर बैठे महावतो, उनके अंकुशो, उनकी घंटियो तथा आभूषणो
आदि को चूर-चूर करके एक पिंड-जैसा बना दिया और कुछ हाथियो को चूर-चूर
करके मिट्टी में मिला दिया । उसके पश्चात् उसने घुड़सवारो के साथ घोड़ो को मार
डाला और पदचर सेना को दल दिया । यम के समान अत्यधिक भयंकर गति से युद्ध
करनेवाले हनुमान् को देखकर अकंपन मन-ही-मन बहुत क्रुद्ध हुआ । उसने एक साथ
चौदह तीव्र बाणो को चलाकर (हनुमान् के) हाथ में रहनेवाले अश्वकर्ण वृक्ष के टुकड़े-
टुकड़े कर दिये और अत्यंत हर्ष से सिंहनाद किया । हनुमान् के शरीर से रक्त-धाराएँ
छूटने लगी और तब वह पुष्पित अशोक के समान दीखने लगा । फिर, हनुमान् ने सहज ही
एक और वृक्ष को उखाड़ लिया और उससे अकंपन के सिर पर प्रहार किया । उस राक्षस
का सिर विदीर्ण हो गया और उसने एक पर्वत के समान पृथ्वी पर गिरकर अपने प्राण
छोड़ दिये । उसके गिरते ही वानरो के तीक्ष्ण प्रहारो को सहना असंभव जानकर तथा
हनुमान् को समक्ष देखकर सभी राक्षस-वीर भयभीत हो गये और प्राण लेकर लंका की
ओर भाग गये । सभी वानर-वीर हनुमान् के साहस की प्रशंसा करने लगे ।

युद्धकांड ३१५

५४. महाकाय का युद्ध

शत्रुओ के हाथ में अकंपन को मरा हुआ जानकर दशकंठ बहुत खिन्न हुआ और
उसने महाकाय को बुलाकर कहा- 'अपने शौर्य को प्रकट करते हुए नरो तथा वानरो का
सहार करो।' तब वह पराक्रमी शीघ्र युद्ध की सज्जा से सज्जित हो, रमणीय मयूर-ध्वजा
से अलंकृत, मणियो की प्रभा से विलसित शस्त्रास्त्रो से परिपूर्ण तथा पिशाच-मुखवाले गधे
जुते हुए रथ पर बैठकर, दक्षिण द्वार से बडे वेग के साथ निकला। उसके साथ ही विविध
शस्त्रास्त्रो से युक्त उसकी सेना, भेरी, डका तथा तुरहियो का गभीर शब्द करती हुई चलने लगी।
उस समय उनपर हड्डियो की वर्षा हुई, बिजलियाँ गिरी, छत्र तथा ध्वजाएँ टूटकर
गिर पडी । किन्तु, महाकाय इन अपशकुनो की उपेक्षा करते हुए आगे बढा और बडी क्रूरता
से वानर-सेना पर आक्रमण किया। तब वानर भी उन पर तरु-शैल-समूह की वर्षा करने
हुए उनसे भिड गये ।
दानव उस वानर-सेना पर अपना पराक्रम दिखाने लगे । उन्होने अत्यत चंचल गति
से कपि-सेना के मध्य रथ चलाये, गज-समूह को वानर-सेना से टकरा दिया, अश्वो को
उनके ऊपर चलाया और पदाति-सेना उनपर टूट पडी । फिर, उन्होने वानर-सैनिको को
अपने करवालो से काटते हुए गदा के प्रहारो से उन्हें व्याकुल करते हुए, भालो से बेधते
हुए, शूलो से चीरते हुए, लाठियो से पीटते हुए, वरछियो से भोकते हुए, शरवृष्टि करते
हुए, चक्रो को चलाते हुए, परशुओ से काटते हुए अत्यत क्रोध के साथ अपने मुद्गरो के
प्रहार से वानरो को दण्ड देने लगे । इधर वानर भी उन वीर राक्षसो पर शैल-वृक्षो की
वर्षा करने लगे । उस घोर युद्ध के कारण धूलि उडकर रवि-मडल तक व्याप्त हो गई।
उस धूलि के कारण अविरत युद्ध करनेवाली दोनो पक्षो की सेनाएँ एक दूसरे को नहीं
देख पाती थी । भयकर राक्षस लगातार अपने ऊपर गिरनेवाले तरु-शैलो को लक्ष्य करके
असख्य बाण चलाकर आकाश को ढक देते थे । वानर-वीर राक्षसो के चलाये हुए शस्त्र,
वाण तथा लाठियो को अपनी ओर आते देखकर उनको लक्ष्य करके, पर्वतो तथा वृक्षो को
फेंकते थे । युद्ध-भूमि में उडनेवाली धूलि उनके कर्णपुटो में भी भर गई थी और उनको
इसका पता नहीं चलता था कि कौन राक्षस है, और कौन वानर है । जो कोई उनके
समक्ष पड जाता था, वे उस पर प्रहार करके उसको मार डालते थे । दनुजो के शरीर से
बहनेवाले रक्त, नदियो के समान बहकर धूलि को भिगो देता था । धूलि-जनित अंधकार
को व्याप्त रहने पर भी दानवो को अपने दीप्त तेज से युद्ध करते देखकर, देवता भी आश्चर्य-
चकित हो गये । तब दैत्यो के प्रताप से नष्ट-भ्रष्ट हो वानर भयभीत हो गये और युद्ध-
भूमि से भागने लगे ।
उन्हें भागते हुए देखकर अगद ने कहा- 'हे कपियो, मेरे रहने हुए तुम ऐसे क्यो
भागे जा रहे हो ?' इस प्रकार के उत्साहपूर्ण वचनो से अगद ने उनको धैर्य देकर फिर
उन्हें युद्ध में प्रवृत्त किया । वह स्वय एक महापर्वत को उठाकर राक्षस-सेना पर आक्रमण
करने लगा । उसके पीछे भयंकर गर्जन करते हुए वानर-वीर भी चल पड़े । अगद ने क्रुद्ध
होकर पर्वतो तथा वृक्षो को राक्षसो की सेना पर फेंका । वह बायें हाथ से राक्षसो को

३१६ रंगनाथ रामायण
नीचे गिराकर उन पर मुष्टियों से प्रहार करता, हाथों से पीटता, कुहनियों से उनके मुँह
पर प्रहार करके फोड़ देता और उनके शस्त्रास्त्रों को चूर-चूर कर देता । अंगद के सामने
क्रूर राक्षस टिक न सके । वे विवश हो चारों दिशाओं में भागने लगे ।
५५. अंगद के द्वारा महाकाय का संहार
इस प्रकार, भागनेवाले राक्षसों को मतिमान् रुधिराशन, वज्रनाभ, कालदंष्ट्र, काल-
कल्प, वपाक्ष, शतमाय, धूम्र तथा दुर्धर नामक महाकाय के प्रख्यात मंत्रियों ने रोका, और
अपने समस्त पराक्रम को प्रकट करते हुए वानर-सेना को पीड़ित करने लगे । यह देखकर
पनस, मेघपुष्पक, गवाक्ष, ऋषभ, गज, क्रोधन, शतवली तथा तार नामक श्रेष्ठ वानर उन
राक्षस-वीरों के सम्मुख आकर युद्ध करने लगे । उस समय रुधिराशन ने क्रोधोन्मत्त हो
गवाक्ष पर असंख्य बाण चलाये, तो गवाक्ष ने बड़े वेग से वृक्ष तथा पर्वतों को उस पर
फेंका; पर रुधिराशन ने उन्हें बीच में ही चूर-चूर कर दिया और गवा

युद्धकांड ३९७
उस राक्षस के जबड़े पर ऐसा घूसा मारा कि वह राक्षस छटपटाकर गिर पड़ा, उसके दाँत
टूट गये और रक्त उगलते हुए वह मर गया। सभी राक्षस आश्चर्य-चकित हो गये ।
इसके पश्चात् वपाश नामक राक्षस ने कपियो पर आक्रमण किया और उनको
जर्जरित करने लगा । तब गज ने उस पर ऐसी बाण-वृष्टि की कि सारा आकाश बाणो से
आच्छादित हो गया । किन्तु, वपाश ने उन सब बाणो को बीच में ही काट डाला और
गज का वध करने के लिए अग्नि-सम सात बाण उस पर चलाये और इससे सन्तुष्ट न होकर
फिर उस पर पच्चीस बाण चलाये और उसके पश्चात् एक सौ ऐसे बाण चलाये, जो उसके
शरीर को पार कर गये । उन बाणो से गज अत्यधिक पीडित हुआ और वपाश के रथ
को चूर-चूर करते हुए उस पर आक्रमण किया और गरुड पक्षी जिस प्रकार किसी कंगूरे
को नीचे गिरा देता है, वैसे ही उसका सिर धड से नीचे गिरा दिया । इस पर क्रुद्ध
होकर धूम्र तथा दुर्धर नामक राक्षसो ने भयंकर अस्त्रो के प्रयोग से वानरो को पीडित करते
हुए उनके पैर उखाड दिये। तब क्रोधन तथा मेघपुष्प नामक वीर वानरो ने उनके रथो
पर कूदकर अपने करतलो से उनके मस्तक पर प्रहार किया और युद्ध करके उन्हें मार डाला ।
उनको आहत देखकर सभी राक्षस भयभीत हो तुरत भाग खड़े हुए ।
इस प्रकार राक्षसो को भागते हुए देखकर शतमाय अपनी शक्ति का प्रदर्शन
करते हुए गज से भिड गया । तब गज ने एक लट्ठ लेकर उसका सामना किया । इतने में
बडे वेग से ऋषभ, शतवली, पनस, गवाक्ष तथा अगद एक साथ उस पर वृक्षो तथा पर्वतो
की अविरत वृष्टि करने लगे, किन्तु शतमाय ने शर, तोमर, भाले, चक्र, गदा,
खड्ग आदि श्रेष्ठ शस्त्रो की वर्षा करके वीरो को क्रूर गति से त्रस्त कर दिया । उसके
हाथो से यो पीडित होकर वानर-नायक रोषोद्दीप्त हो शतमाय पर पिल पडे । गवाक्ष ने
उसके रथ के घोड़ो को मार डाला, अगद ने उसका झडा काट डाला, पनस ने उसके
रथ को पैरो तले कुचल डाला, ऋषभ ने सारथी को मार डाला और नल ने उसके शस्त्रास्त्रो
को काट डाला और शतवली ने अपनी मुष्टियो से उस पर प्रहार किया । किन्तु,
शतमाय ने उन मुष्टि के आघातो की उपेक्षा करके तलवार और ढाल लेकर गरुड के
समान बडे लाघव से आकाश की ओर उछला । तब बडी तत्परता के साथ (युद्ध-भूमि में)
पडे हुए खड्ग, ढाल आदि लेकर शतवली भी उसके पीछे आकाश की ओर उछला ।
आकाश में वे दोनो भेरुड पक्षियो (दो सिरवाले पक्षी) के समान एक दूसरे पर वार
करने लगे । वे कभी पैंतरें बदलते, कभी निकट आते, फिर शीघ्र ही दूर हट जाते; कभी
गिरते तो कभी उठते और एक दूसरे को गिराने की चेष्टा करते हुए लडने लगे । तब
शतमाय ने अपने खड्ग को चमकाकर शतवली के विशाल वक्ष पर प्रहार किया, किन्तु
शतवली ने अपनी ढाल को आगे करके उस वार से अपने को बचा लिया और अपने
तीक्ष्ण कृपाण से शतमाय की जाँघो को काट डाला, तो वह राक्षस सिर के बल पृथ्वी पर
गिर पड़ा और उसका सिर पर्वत-शिखर के समान छिन्न-भिन्न होकर छितरा गया ।
शतमाय की मृत्यु को देखकर शतवली के साथ सभी वानरो ने हर्ष का गभीर
निनाद किया ।

३९८ रंगनाथ रामायण
तब महानाद ने अपने धनुष के टंकार से पृथ्वी तथा आकाश को कँपाते हुए अपना
रथ अंगद की ओर दौड़ाया और अंगद पर तीन पैने बाण चलाये । तब कपिराज अंगद
बड़े क्रोध से उससे भिड़ गया और एक योजनाकार पर्वत को उसके रथ पर फेंका । किन्तु,
उस राक्षस ने बड़े वेग से अपनी गदा से उस पर्वत को बीच में ही चूर-चूर कर दिया ।
तब वालि-पुत्र क्रुद्ध होकर सहज ही उसके रथ-पर कूद गया और अपनी अनुपम शक्ति से
उसका धनुष तोड़ डाला, उसे रथ पर गिराकर उसके वक्ष को ऐसे दबाया कि उसकी
आँखें निकल आईं और वह हाँफने लगा । फिर, अंगद ने उसके कंठ को मरोड़कर उसे
काट डाला और रक्त-सिक्त मुंड को पृथ्वी पर गिरा दिया ।
अपने अनुज को मृत देखकर महाकाय अपार शोक से पीड़ित हो, भयंकर ध्वनि से
हाहाकार करते हुए, अपनी कांति-किरणों को चारों ओर विकीर्ण करनेवाले अपने महान् रथ
पर बैठे उद्धत सिंह के समान झूमते हुए निकला । उसने क्रूर बाण चलाते हुए वानरों पर आक्रमण
किया और कई वानरों को पृथ्वी पर गिरा दिया । उसके समक्ष खड़े रहने में असमर्थ हो
वानर-सेना हनुमान् की ओट में चली गई । तब महाकाय ने अपने सारथी से कहा—
'अब मेरे समक्ष खड़े होकर युद्ध करने की क्षमता रखनेवाला कोई नहीं है । तुम रथ को
सीधे राम के निकट ले चलो ।' तब उसने घोड़ों के रास ढीले किये और वेग से रथ
को राम की ओर चलाया । रथ की क्रूर गति के समक्ष खड़े होने में असमर्थ हो वानर-
सेना भागने लगी । तब महाकाय ऊँचे स्वर में कहने लगा—'हे वानरो, तुम क्यों भयभीत
हो रहे हो ? मेरा क्रोध केवल उस राजकुमार पर है, जिसने शिव-धनुष का भंग करके
सीता के साथ विवाह किया है । जिसने परशुराम का गर्व-भंग किया है, वही मेरे जोड़
का है, अन्य कोई नहीं । जिसने युद्ध में खर का वध किया था, उसी पर मेरा बाण
चलेगा, दूसरों पर नहीं । जिसने अपने बाण के अग्र भाग के समक्ष समुद्र को आने के
लिए विवश किया था, केवल उसीसे मैं युद्ध करूँगा, दूसरों से नहीं । मैं त्रिभुवन को
अपने शौर्य से दीप्त करनेवाले, कैलास पर्वत को उठानेवाले रावण का पुत्र हूँ, इन्द्रजीत
का भाई हूँ, मेरा नाम महाकाय है । मैं अब युद्ध करने के निमित्त आया हूँ ।'
तब अंगद ने अत्यंत क्रुद्ध होकर कहा—'हे महाकाय, युद्ध-भूमि में ऐसा प्रलाप
क्यों कर रहे हो ? तुम्हारे पिता ने कैलास पर्वत को उठाया था, इसलिए हम दोनों में
युद्ध होना उचित है । इसके लिए न राम की आवश्यकता है, न अन्य कपि-वीरों की ।
इतना कहकर उसने एक विशाल वृक्ष से उस पर प्रहार किया, तो महाकाय ने अपने दारुण
शरों से अंगद का शरीर ढँक-सा दिया । इसके पश्चात् महाकाय ने बड़े क्रोध से अंगद पर
अपनी गदा से प्रहार किया, तो अंगद विवश होकर गिर पड़ा । उनको गिरते हुए देखकर
सभी दैत्यों ने समस्त पृथ्वी को विदीर्ण करते हुए सिंहनाद किया और सभी वानर-वीरों ने
एक साथ महाकाय पर आक्रमण किया और उस पर शिलायो तथा वृक्षों को फेंकने लगे;
किन्तु महाकाय ने अपने बाणों से उन शिलाओं तथा वृक्षों को खंडित कर दिया । फिर,
उसने गवाक्ष पर दस बाण, पृथु पर पाँच बाण, महाबली गज पर नौ बाण, शतबली पर तीन
बाण, ऋषभ पर अस्सी बाण, शोधन और मेघपुष्पक पर साठ बाण चलाकर उनका दर्प-दलन किया ।

इतने में मूर्च्छित अंगद ने आँखें खोलीं । अपने मुँह से बहनेवाले रक्त को वार-
वार पोंछते हुए, एक विशाल गदा लिये हुए वह उस महाकाय के रथ पर कूद पड़ा और
अपनी उद्दण्ड शक्ति को प्रकट करते हुए उसके सारथी को मार डाला । फिर, उसके धनुष
के खण्ड-खण्ड कर दिये, सभी अश्वों को मार गिराया और उसके पश्चात् उस राक्षस-वीर
पर गदा का ऐसा प्रहार किया कि महाकाय का मुकुट पृथ्वी पर लोटने लगा । तब
महाकाय भी रथ से नीचे उतरकर भयंकर गदा से अंगद पर प्रहार किया; किन्तु अंगद ने
प्रतिघात किया । महाकाय ने अंगद का वार बचाकर उद्धत गति से अंगद के सिर पर
गदा-दण्ड से प्रहार किया । उस प्रहार के कारण अंगद के सिर से रक्त फूट निकला ।
किन्तु, अंगद ने बिना धैर्य खोये, अपनी गदा से महाकाय पर ऐसा प्रहार किया कि महाकाय
का सिर फूट गया । तब भी महाकाय ने भयंकर आघात करके उसे रक्त की बाढ में
ऐसा डुबोया, मानो उसने सोच लिया कि इसके पिता ने मेरे पिता को एक सहस्र
वार समुद्र में डुबोया था और उसका प्रतिशोध मुझे लेना चाहिए । इस प्रकार, इन्द्र का
पोता तथा महाकाय दोनों भयंकर युद्ध करते हुए रक्त-सिक्त होकर ऐसे दीखने लगे, मानो
रक्त-वर्ण की नदियों से विलसित दो महापर्वत हों । दोनों की गदाओं के आपस में
टकराकर छिन्न-भिन्न होने से, वे दोनों वीर इस प्रकार मल्लयुद्ध करने लगे, जैसे पूर्वकाल में
इन्द्र तथा बल नामक राक्षस ने आपस में द्वंद्व-युद्ध किया था । उनके पदाघात से धूलि
उड़-उड़कर आकाश में व्याप्त हो गई । वे वालि-सुग्रीव के द्वंद्व-युद्ध का स्मरण दिलाते हुए
परस्पर ऐसे भिट गये थे कि मालूम नहीं होता था कि यह वानर है, और यह राक्षस है ।
तब सभी वानर अंगद को उत्साह देते हुए कहने लगे—'हे वीर, इस दुष्ट राक्षस
की उपेक्षा क्यों करते हो ? तुम वालि के पुत्र हो । वालि के समान तुम्हारा बाहुबल भी
श्रेष्ठ है । जब वालि ने दुन्दुभी से युद्ध किया था, तब उसने दुंदुभी को इतनी देर तक
ठहरने नहीं दिया था । तुम अपने पराक्रम का प्रदर्शन करके इस देवताओं के शत्रु का
संहार शीघ्र कर डालो ।' इस प्रकार, जब वानरों ने उत्साहवर्द्धक जय-निनाद किया, तब
अंगद ने उस राक्षस पर अपनी मुष्टि से तीव्र प्रहार किया । वह उस आघात से चकराकर
पृथ्वी पर गिर पड़ा । पृथ्वी पर गिरे हुए उस राक्षस के वक्ष को पैरों से दबाकर अंगद ने
उसका कंठ मरोड़कर सिर को धड़ से अलग कर दिया और उसे ऊपर उछालकर विजय-
गर्जन किया । अंगद को देखकर सभी वानरों ने विपुल हर्ष-नाद किया । यह देखकर सभी
दानव तितर-बितर हो गये । कुछ समुद्र में कूद पड़े, कुछ लंका में घुस गये और शेष
राक्षस चारों दिशाओं में भाग गये । सभी वानरों ने अंगद की प्रशंसा की और उसे सीता-
पति के समक्ष ले जाकर सारा वृत्तांत उन्हें कह सुनाया । रघुपति यह समाचार सुनकर
अत्यंत प्रसन्न हुए और बड़े हर्ष से हृदय से लगाकर और कृपा-पूर्ण दृष्टि से देखकर मंदहास
करने लगे ।
हतशेष राक्षसों ने जब यह वृत्तांत रावण को सुनाया, तब राक्षस-कुलाधीश ने बड़ी
प्रीति से मृत महाकाय का स्मरण किया । वह दुख से, आँखों में आँसू भरे, सिर झुकाये
खड़ा रहा और फिर संभ्रमचित्त से अंतःपुर में चला गया । रात-भर चिंता में निमग्न

३२० रंगनाथ रामायण
रहने से वह सो भी नही सका । प्रात काल होते ही वह अपने सामंतो के साथ, अपने
उज्ज्वल रथ पर बैठकर अतःपुर से निकला और दुर्ग के स्तूप पर चढकर अपने विशाल
दुर्ग को ध्यान से देखा । फिर, वहाँ के सैनिको के शिविरो का निरीक्षण किया और दुर्ग
की रक्षा के लिए और अधिक सैनिको को नियुक्त किया । उसके पश्चात् रावण ने प्रहस्त
से कहा—'यह प्रसिद्ध दुर्ग अभेद्य है । यह किसी भी पराक्रमी शत्रु के वश में आनेवाला
नही है । आज वानर-समूह ने इसे भेद डाला है, यह देखकर मुझे आश्चर्य हो रहा है ।
इतना ही नही, श्रीराम के बाहुवल का विक्रम दुर्वार प्रतीत हो रहा है । युद्ध करने योग्य
या तो तुम हो, या मै हूँ या मेरा भाई कुभकर्ण है । निद्रा में मग्न हो, मेरा भाई जाग
नही रहा है । इसलिए या तो तुम युद्ध करने के लिए जाओ या मै जाऊँ ।'
तब प्रहस्त ने राक्षसेश्वर से कहा—"हे देव, मै अभी जाता हूँ और उन नरो का
ऐसा सहार करता हूँ कि देवता भी मेरे बाहुवल की प्रशसा करेंगे । मै अपने प्रताप का
ऐसा प्रदर्शन करूँगा कि भूत, प्रेत तथा डाकिनी छककर रक्त-पान करेंगे और मोद-मग्न
होकर कह उठेंगे, 'लो देखो, प्रहस्त उन वन्दरो की कैसी दुर्गति कर रहा है ।' आपने
मुझे युद्ध में जाने का आदेश दिया, तो ऐसे समय में, मेरा आपको हितोपदेश देना उचित
तो नही है । फिर भी, एक बात सुन लीजिए । मेरा विचार है यह कार्य आपके लिए
उचित नही है । अब आप मानें या न मानें । आप स्वयं विचार करके देख लें । मै
आपकी आज्ञा का उल्लघन नही करता । पहले आपने अपने बुद्धिमान् मंत्रियो के हित-वचन
नही सुने । अब तो सुनिए और सीता को भूपाल के पास पहुँचा दीजिए । यह युद्ध
अनावश्यक है ।"
५६. प्रहस्त का युद्ध
इतना कहने के पश्चात् प्रहस्त रावण की आज्ञा लेकर युद्ध के लिए रवाना हुआ ।
उसने अपने वेत्रधरो को भेजकर अपनी चतुरगिणी सेना को एकत्रित किया और मणिमय
किकिणी के रणन से मुखरित होनेवाले ऐसे रथ पर सवार होकर चला, जिसका मेघ-
समान घोष तबतक सुनाई पड़नेवाला था, जबतक वानरो के श्रेष्ठ अगो के पवन उसका
स्पर्श नही करे, और जिसके ऊपर की सर्प-ध्वजा तबतक लहरानेवाली थी, जबतक
वानर-रूपी गरुड उस पर उतर नही आवे । उसके निकलते समय तुरहियो की जो ध्वनि हुई,
उससे दिशाएँ चक्कर काटने लगी, आकाश विचलित हो गया, नक्षत्र टूटकर गिरे और
वसुंधरा विदीर्ण-सी हो गई । इस प्रकार, प्रहस्त पूर्व के द्वार से कालांतक के समान युद्ध
करने के लिए निकला ।
दैत्यो के सिंहगर्जनी के साथ निकलनेवाले प्रहस्त की उग्र मूर्ति को देखकर राम-
चन्द्र आश्चर्य करने लगे और उसे विभीषण को दिखाकर बोले,—'हे विभीषण, तेज, वल,
तथा शौर्य से विस्मित होनेवाले इस राक्षस-नेता का नाम क्या है ? विपुल साहस के
साथ उसका वानरो पर आक्रमण करना देखकर मुझे आश्चर्य होता है ।'
तब विभीषण ने कहा—'हे देव, यह रावण की समस्त सेना का सेनापति है ।
इनकी अपनी सेना रावण की सेना की तीन चौथाई है । अपने साहस के लिए तीनो

लोकों में यह प्रख्यात है । यह अत्यधिक बलवान् है तथा रावण का मामा लगता है ।
यह महान् पराक्रमी है और इसका नाम प्रहस्त है । (रावण के द्वारा) चन्द्रशेखर के मित्र
(कुवेर) के सामत को पराजित होते समय इसने मणिभद्र को परास्त किया था। हे रवि-
कुलोत्तम, इसके साथ वानर-नायको को घोर युद्ध करना होगा ।'
इस प्रकार विभीषण के कहते समय ही वानर-वीर पर्वतो तथा वृक्षो को उठाये
सिंहनाद करते हुए दानवो का सामना करने लगे । असुर-सेना ने भी भयकर गर्जन करते
हुए वानरो पर आक्रमण किया । प्रलय-काल की अग्नि तथा वडवानल आपस में कभी
सघर्ष नही करते, पृथ्वी और आकाश का एक दूसरे से टकराकर चूर-चूर होना सभव
नही, भिन्न-भिन्न ब्रह्माण्डो का आपस में टकराना सभव नही । यदि ऐसा कभी हुआ
होता, तो इन राक्षस तथा वानर-सेनाओ के युद्ध की उपमा उनसे दी जा सकती थी ।
राक्षस अग्नि-सम बाण-समूह को वानरो पर चलाते थे । कुछ राक्षस खड्ग, गदा, भाले,
मूसल तथा भयकर चक्र आदि शस्त्रो को भी चलाते थे । तब वानर-सेना राक्षसो
पर बडे वेग से वृक्षो तथा पर्वतो को फेंकती थी । इस घोर युद्ध में पृथ्वी पर लुढकने-
वाले सिर, विदीर्ण होनेवाले वक्ष, चूर-चूर होनेवाले कधे, बाहर निकल पडनेवाली आँतें,
फूटनेवाले सिर, टूटनेवाली पसलियाँ, उमडनेवाला रक्त, छितरानेवाला भेजा, छिन्न-भिन्न
होनेवाले पैर, उछलकर गिरनेवाले हाथ, पिडाकृति धारण कर सडनेवाले शव, आधा
कटकर गिरे हुए शरीर, घूम जानेवाली पुतलियाँ, ये सब अत्यत भयकर दीखने लगे ।
युद्ध-भूमि में राक्षस और वानर निर्भय होकर बडे उत्साह से लडते थे । सहसा कपि-
वीरो ने राक्षसो पर बडा भयकर धावा बोल दिया । द्विविद ने नरातक पर एक पर्वत-
शिखर उठाकर फेंका । तार ने एक वट-वृक्ष को वेग से चलाकर कुभ हनु को गिरा दिया।
जाबवान् ने महानद पर एक विशाल पर्वत को गिरा दिया । दुर्मुख ने समुन्नत को एक
विशाल वृक्ष से मार गिराया ।
इस प्रकार, राक्षसो को वानरो के प्रहारो से बुरी तरह मरते हुए देखकर प्रहस्त ने
अपने प्रमुख साथियो की मृत्यु निश्चित जान और अत्यत क्रुद्ध होकर अपने रथ को विचित्र
वेग से चलाकर एक-एक प्रहार से एक साथ दस, बीस, तीस तथा चालीस वानरो का सहार
किया । तब वानर भी पर्वतो तथा वृक्षो को गिराकर प्रहस्त की सेना का नाश करने लगे।
रक्त की नदियाँ उमड-उडकर आकाश का स्पर्श करती हुई-सी बहने लगी, रक्त की उस
धारा में ही जहाँ-तहाँ वानर तथा असुर घोर गर्जन करते हुए युद्ध करते थे । उनके
पराक्रम को देखकर देवता भी उनकी प्रशसा करने लगे ।
तब प्रहस्त कालातक के समान अपने अद्वितीय प्रताप का प्रदर्शन करते हुए वानरो
के करो तथा चरणो को काटते हुए, उनके वक्ष स्थलो को विदीर्ण करते हुए, सिर तथा
बाहुओ को पृथ्वी पर गिराते हुए, हड्डियो तथा दांतो को चूर-चूर करते हुए, चक्रो से खड-
खड करके, अकुशो से चीरकर, भालो से चुभोकर, विशाल पाशो से बाँधकर, परशु से
काटकर, शूलो को भोककर बरछियो से उछालकर तथा शक्तियो से पीटकर वानरो के मास
तथा भेजा के ढेर-सा लगा दिया और अपनी शर-वृष्टि से वानरो को मारकर सभी भृतों
४१

३२२ रंगनाथ रामायण
को बलि चढ़ाई । इस प्रकार, प्रहस्त ने अपने दुर्वार विक्रम से वानरों का संहार करने में
सफल होकर सभी दिशाओं को विदीर्ण करते हुए भयंकर गर्जन किया ।
५७. नील के द्वारा प्रहस्त का वध
वानर-सेना को इस प्रकार नष्ट होते हुए देखकर, उद्भट-रण-कुशल नील भयंकर
हुंकार करते हुए प्रहस्त पर आक्रमण करने के लिए ऐसी अद्भुत गति से चला कि सारी
पृथ्वी काँप गई । उसने एक विशाल वृक्ष को उखाड़ लिया और सहज ही उस राक्षस
के रथ पर जा चढ़ा । उसने सारथी को मार डाला, अश्वों का नाश कर दिया, और
देखते-देखते प्रहस्त के धनुष को खंडित कर दिया । तब भयंकर गर्जन करते हुए प्रहस्त एक
मूसल लेकर रथ से उतर पड़ा और नील के सामने डट गया । नील ने निर्भीक होकर
उसका सामना किया, मानो वह अपनी विजय में पूरा विश्वास रखता हो । फिर, दोनों
युद्ध करते हुए एक दूसरे को परास्त करने का प्रयत्न करने लगे, जैसे वृत्रासुर तथा कौशिक ने
(पहले) किया था । प्रहस्त ने अच्छी तरह लक्ष्य करके मूसल से नील के ललाट पर
ऐसा तुला हुआ प्रहार किया कि उसका ललाट फूट गया । उससे छूटनेवाली रक्त-धारा
को पोंछते हुए नील ने अत्यधिक क्रोध से उस प्रहस्त पर वृक्षों से प्रबल प्रहार किया ।
किन्तु, उस राक्षस ने फिर से उसी मूसल से नील पर प्रहार किया । इस आघात से नील
लड़खड़ाने लगा, फिर भी उसने वृक्ष को छोड़कर उसी समय भयंकर गर्जन करके एक
विशाल पहाड़ उठाकर लक्ष्य करके उस राक्षस के सिर पर फेंका । नील के उस प्रहार से
प्रहस्त का शरीर, सिर तथा आभूषण छिन्न-भिन्न हो गये और इन्द्र के प्रहार से सिकुड़कर
गिरनेवाले पर्वत के समान वह राक्षस पृथ्वी पर गिर पड़ा । उसके गिरते ही सभी कपियों ने
विजय-घोष किया और राक्षस-सेना लंका की ओर भागने लगी ।
उस समय सारी युद्ध-भूमि, अमृत-सागर-सुता (लक्ष्मी) के समान हरि* (विष्णु अथवा अश्व)
युत अंगों से, दानशील के निवास के समान मार्गणों * (याचक अथवा बाण) के
समूह से, जम्बूद्वीप के समान नवखंडों * (द्वीप अथवा खंड) से, प्रेमी पति के निकट वनिता
की भाँति राग-रस* (प्रेम रस अथवा रक्त) से, दुर्गम वन के सदृश पुंडरीकों * (व्याघ्र अथवा
गज) से, सुंदर मधु-मास की भाँति आरक्त, फुल्ल, पलाशों * (पलाश वृक्ष अथवा राक्षस) से,
शिव के निवास की नाईं भूत-गण * (शिव के सेवक अथवा प्रेत) से, सूर्य-प्रकाश से विलसित
गगन के समान अस्त-व्यस्त तारकों* (नक्षत्र अथवा आँख के तारे) से, तीव्र निदाघ के समान
अंबर-मणियों * (सूर्य अथवा वस्त्राभरण) से, अर्द्ध-नारीश्वर के समान अर्द्ध-शरीरों से युवत
हो, अनेक प्रकार से आश्चर्य उत्पन्न करती थी ।
तब नील शीघ्र ही राघवाधीश के समक्ष गया और उनके चरणों को प्रणाम किया।
वानरों ने बार-बार नील की प्रशंसा की । हतशेष राक्षस भयभीत हो भागकर रावण के
निकट पहुँचे और उसे सारा वृत्तांत कह सुनाया । तब रावण ने शोक-विह्वल हो अपने
मंत्रियों से कहा—'युद्ध करने गये हुए सभी वीर लौटने का नाम तक नहीं ले रहे हैं और
वानरों के हाथों मर रहे हैं। अब वैरियोँ का गर्व चूर करने के लिए मैं स्वयं ही जाऊँगा ।'
*इस प्रसंग में हरि, मार्गण, नवखंड आदि शब्दों में श्लेष है ।—ले०

युद्धकांड ३२३
५८ मंदोदरी के हित-वचन.
रावण की सभी बातें सुनकर, मंदोदरी शीघ्र माल्यवान् के पीछे, दैत्य-स्त्रियो के
साथ रावण की सभा की ओर चली। उसके पीछे-पीछे अतिकाय तथा प्रतीहारी चलने लगे ।
आयुधो से अलंकृत अन्य सैनिक भी उनका अनुसरण करने लगे । चामरिक-समूह
चामर डुला रहे थे और सभी मंत्री भी उसके साथ चल रहे थे । अपने समस्त आभूषणो
की शोभा को चारो ओर विकीर्ण करती हुई उसने रावण की सभा में ऐसे प्रवेश किया,
मानो नील-मेघो के मध्य विलसित होनेवाली बिजली हो ।
रावण ने मंदोदरी को अपने सिंहासन के अर्द्ध भाग पर आसीन कराया और प्रिय
वचन कहते हुए बुद्धिमान् मन्त्रियो को उचित आसनों पर बिठाया । प्रणाम करनेवाले
अतिकाय को प्रसन्नता से अपने निकट ही एक आसन पर बिठाया ? उसके पश्चात् दानवेश्वर ने
अपनी स्त्री से कहा--'हे कुवलयनेत्री, तुम तो इस प्रकार कभी सभा में नही
आती । आज तुमको कंपित शरीर से इस प्रकार सभा में आते देखकर मुझे आश्चर्य
हो रहा है ! तुम्हारे आगमन का क्या कारण है ?'
तब मंदोदरी ने अपने पति को देखकर कहा- "हे दनुजेश, आज मुझे यहाँ आने
की आवश्यकता पड़ी, इसलिए मैं आई हूँ । आप मेरे आगमन को बुरा न मानिए ।
हे देव, आपने देखा कि धूम्राक्ष आदि हमारे सेनापति युद्ध में कैसे मारे गये ? राम ने जन्म-स्थान
में चौदह सहस्र राक्षसो का सहार किया था और खर तथा त्रिशिर का वध किया था ।
मैं कहती हूँ कि ऐसा वीर एक साधारण मनुष्य नही हो सकता । इतना ही नही, राम ने
दण्डक-वन में महान् बलशाली कबंध का सहार किया । मारीच की मायाओ की उपेक्षा
करके उन्होने उसका वध किया । एक भयंकर अस्त्र से वालि का सहार किया । राघव ने
देवताओ के हित के लिए इस ससार में जन्म लिया है । वे स्वयं आदिनारायण है अन्यथा
इस पृथ्वी पर ऐसा पराक्रमी नर कहाँ मिलेगा ? उन्होने ही तो नीलकंठ के धनुष को भग्न
किया था ? अपने पिता की आज्ञा से जिस समय वे वन में तपस्वी का जीवन व्यतीत
करते थे, उसी समय आप सीता को हर लाये । रामचन्द्र ने आपका क्या अहित किया था।
राम-लक्ष्मण से युद्ध करने की क्षमता तीनो लोको में कौन रखता है ? यदि साम, दान
तथा भेद से शत्रु वश में आ जाय, तो दण्ड का उपाय अपनाना उचित नही । यदि आप
दण्ड देना भी चाहें, तो क्या राम-लक्ष्मण आपसे दण्ड भोगेंगे ? हे देव, राम परमात्मा हैं,
अत आप उनके समक्ष नतमस्तक हो, तो इसमें कोई दोष नही । यदि आप उनसे शरण
मांगें, तो वे आपको अवश्य अपनायेंगे । शरण माँगने से आपका शुभ ही होगा, हानि नही ।
काकुत्स्थवंशी राम के गुण, रूप, कृपा आदि गुण-गण का वर्णन करना कैसे संभव है ?
यदि वे क्रोध में आ जायें, तो इन्द्रादि देवता भी ठहर नही सकते, तब आपके लिए (उनका
सामना करना) कैसे संभव है ? अब आप इस प्रयत्न को छोड़ दीजिए । व्यर्थ ही दर्प की
अग्नि में नाश मत होइए । हठ छोड़िए और संताप त्यागकर सीता को लौटा दीजिए ।
इसी में आपका हित होगा । हे लंकेश, आप अपने कुल तथा लंका की रक्षा कीजिए ।
ऊँचे वाहनो तथा मणि-भूषणो के साथ आप जानकी को लौटा दीजिए और उपाक्ष, अतिकाय

३२४ रंगनाथ रामायण
तथा माल्यवान् के द्वारा संधि का प्रस्ताव भेजिए। बहुत क्यो ? क्या, आपने कार्त्तवीर्य के
साथ संधि नहीं की थी ? तब उस कार्त्तवीर्य को जीतनेवाले भार्गव राम को परास्त करने-
वाले यशस्वी राम क्या संधि करने के योग्य नही है।"
५९. मंदोदरी की मंत्रणा की उपेक्षा करना
मंदोदरी के इन दीन वचनों को सुनकर रावण क्रोध से दीर्घ श्वास लेने लगा ।
उसकी लाल आँखों से क्रोधाग्नि की चिनगारियाँ छूटने लगीं । उसने मदोदरी को देखकर
कहा—'हे नारी, हित-बुद्धि से तुमने मुझे उपदेश दिया है; किन्तु तुम्हारी बातो में एक
भी मुझे अच्छी नहीं लगतीं। दानव, यक्ष, गंधर्व देव आदि की सेवाएँ प्राप्त करने-
वाले मुझे तुम वानरों के आश्रय में जीनेवाले नर को प्रणाम करने का उपदेश देती हो ।
ऐसी बात तुम इस सभा में कैसे कह सकी ? क्या, तुम्हारे लिए यह उचित है ? उस
इक्ष्वाकुवंशी ने जान-बूझकर पहले हमारा अहित किया था; तभी तो मैं उसकी स्त्री को
ले आया । खर-दूषण आदि के संहार तथा तुम्हारी ननद के अपमान को भुलाकर मूर्ख के
समान मैं कैसे राम से संधि कर लूं ? यह असंभव है । अपने भयंकर बाणो से विभीषण,
सुग्रीव तथा राम-लक्ष्मण के साथ सभी वानरो को मारकर मैं विजय पाऊँगा । यदि विजय नहीं
प्राप्त करूँगा, तो युद्ध-भूमि में ही अपने प्राण दे दूँगा; किन्तु उस राम के साथ न संधि करूँगा,
न जानकी को ही लौटाऊँगा । यही मेरा दृढ़ निश्चय है । तुम्हारे ज्येष्ठ पुत्र, उदात्त
पराक्रमी, इन्द्रजीत के रहते तुम्हें किस बात का भय है ? मेरे पुत्र भयंकर आकारवाले
तथा दुर्वार पराक्रमी हैं; मेरा सामना कौन कर सकता है ?'
इन बातो को सुनकर मंदोदरी चिंताक्रांत मन से सिर झुकाकर सभा से ऐसे चली गई,
मानो रावण की लक्ष्मी ही यों सोचती हुई रावण से अलग हो रही हो कि यह नीच
तथा निकृष्ट नीति का अनुसरण करते हुए अपना बुरा-भला आप ही नही पहचान पा रहा है।
६०. रावण का प्रथम युद्ध
तब रावण ने अपने गुप्तचरों से कहा—'चिर काल से मेरे मन में जो क्रोध था,
उसका आज परिहार करूँगा । मैं उस (राम) के लिए कालरुद्र हूँ और वह मेरे लिए
अंधकासुर है । मेरे तूणीरों से निकलनेवाले अस्त्र, केंचुलों से मुक्त होनेवाले क्रूर सर्पों के
समान राघव को लगेंगे । राम मृत्यु से प्रेरित होकर, कपि-सेना का विश्वास करके यहाँ
आया है । तुम शीघ्र मेरे युद्ध करने के लिए दिव्य शस्त्रास्त्रों से सज्जित करके रथ ले
आओ ।'
उसके आदेशानुसार वे गुप्तचर सूर्य-प्रभा के समान दीप्तिमान् श्रेष्ठ रथ ले आये । फिर,
अपने नीच मनोरथ पर आरूढ होने की भाँति रावण उस रथ पर आरूढ हुआ । अपने
दीप्तिमान् आभूषणों से अलंकृत रावण के उस रथ पर बैठते ही, उसके आभूषणों की प्रभा
दिशाओं तथा आकाश में आश्चर्यजनक ढंग से व्याप्त हो गई, मानो युद्ध में राम के बाणों
की अग्नि-ज्वालाओं में रथ-समेत स्वयं रावण दग्ध हो रहा हो । निशानों का विपुल निनाद,
पटह, भेरी तथा शंख का भयंकर घोष, हाथियों की चिंघाड़, अश्वों की हिनहिनाहट, बन्दी

मागधो के स्तुति-गान की गंभीर ध्वनि, रथो के चलने की ध्वनि, सैनिको के हुकार, तथा
पृथ्वी को विदीर्ण करनेवाले उनके पदाघात की सम्मिलित ध्वनि भयंकर गति से समस्त
ब्रह्माण्ड में ऐसे व्याप्त हो गई, मानो लका के समुद्र के सभी जलचर एक साथ आर्त-ध्वनि कर
रहे हो कि रामचन्द्र जैसे पहले समुद्र पर क्रुद्ध हुए थे, वैसे ही वे आज क्रुद्ध हो गये हैं ।
(राक्षसो के) वृहदाकार रथ, रामचन्द्र के मनोरथो के समान ऐसे चलने लगे, मानो कह
रहे हो कि हे राम, हम दैत्य-समूह को ले आये है, आप इन्हें ग्रहण कीजिए । असख्य
गज-समूह पृथ्वी को कँपाते हुए चलने लगे । उनके कर (सूँड) रामचन्द्र के करो (हाथ)
के लिए दुर्जय न होने पर भी भयंकर दीख रहे थे और उन सूँडो के चारो ओर शिली-
मुख (भ्रमर) ऐसे झकार कर रहे थे, मानो कह रहे हो कि इनमें रामचन्द्र के शिलीमुख
(वाण)-समूह लगकर इनका (गजो का) मद गिराने के पहले हम अब इनकी मद-धाराओ
का पान कर लें । घोडे ऐसे झूमते हुए चल रहे थे,