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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

युद्धकांड २७५
ऐसा करेंगे, तो आपको भी (मेरे समान) कलंक लग जायगा । चन्द्रिका समस्त दिशाओ
में ऐसे व्याप्त हो गई, मानो चन्द्र विकट अट्टहास कर रहा हो कि हे राजा राम, जिस
शिव ने मुझे अपने सिर पर धारण करके मेरा सम्मान किया है, ऐसे शिवजी के धनुष
को तोडने के कारण ही आपको विरह-दुख हुआ है। उज्ज्वल चाँदनी चारो दिशाओ में
ऐसे व्याप्त हो गई, मानो चन्द्रमा ने समुद्र के फेन-रूपी चदन को अपनी किरणो के द्वारा
लहरो से आकृष्ट करके, दिग्वधुओ के शरीर पर मल दिया हो । तब चकोर-चकोरी
अत्यधिक आनद से एक दूसरे का आलिंगन करते बार-बार अपनी चोचो को पसारकर
छककर चंद्रिका-रस का पान करते, बडे अनुराग से अपनी प्रियाओ को पिलाते, उनके पीने
पर स्वय पीते और इसी प्रकार बडे मोद-मग्न हो चन्द्रिका में खेलते-कूदते । इस प्रकार,
जब वे अपनी प्रियाओ से अलग होते, फिर उनको ढूँढकर उनके साथ बडे आनंद से रहने
लगते थे । इन पक्षियो को देखकर वियोग-दुःख से पीडित राम, सीताजी का स्मरण करके
मन-ही-मन अत्यधिक व्यथा का अनुभव करने लगते ।
अपने अग्रज को इस प्रकार सतप्त होते देख लक्ष्मण उन्हें शांति पहुँचाने
के उद्देश्य से बोले--'हे देव, आप अनुपम वीर हैं, उदात्त चित्तवाले हैं । आप इसके लिए क्यो
दुखी हैं । अभी हम समुद्र को पार करके लका पहुँचेंगे, युद्ध में दशकंठ का सहार करेंगे,
और मिथिलेश की प्रिय पुत्री, कमलवदनी सीता को मुक्त करेंगे । आप खिन्न न होइए ।'
अनुज के इन नम्र वचनो को सुनकर राम प्रसन्नचित्त हुए ।
सैनिक-शिविरो में, वानर उस आनंदप्रद चाँदनी में मुदित मन से रामचन्द्र के गुणो
का गान करते, खेलते तथा कूदते रहे । कुछ लोग समुद्र के किनारे बडे आह्लाद से विचरण
कर रहे थे । कुछ लोग विष्णु के सभी अवतारो की कथाएँ दूसरो को सुना रहे थे, तो कुछ
वानर पिघलनेवाली उन चन्द्रकांत शिलाओ पर बडे आनंद से सोने का यत्न कर रहे थे ।
इस प्रकार, वे बडी देर तक विविध क्रीडाओ में मग्न रहे ।
शीघ्र ही पूर्व दिशा में अरुणिमा का ऐसा आभास हुआ, मानो वडवानल ही इस
भय से कपित होते हुए कि, जब राघव समुद्र पर अपने पैने बाणो का प्रयोग करेंगे, तब
उनका लक्ष्य बन जाऊँगा, उदयाचल पर चढ गया हो । सभी नक्षत्र इस भय से व्याकुल
हो छिपने लगे कि समुद्र का दहन करने के लिए राम के बाणो से उत्पन्न अग्नि की शिखाएँ
कही आकाश तक न व्याप्त हो जायें । धीरे-धीरे सूर्य का उदय होने लगा, मानो वे अपने
पौत्र (राम) को सचेत करने के लिए आ रहे हो कि हे राघव, अभी विलंब क्यो करते हो,
समुद्र को पार करके शीघ्र ही रावण का सहार करो । सभी कमल एक साथ ऐसे
विकसित हुए, मानो कमलाप्त-वशज (सूर्यवंशी) राघव का विजय-कमल, साम्राज्य-कमल, तथा
कीर्ति-कमल एक साथ ही विकसित हो रहे हो । तब दाशरथि जगकर प्रात कालीन मध्या-
वदन आदि नित्यकर्मो से निवृत्त हुए ।
६ मंत्रियों के साथ रावण की मंत्रणा
लका में रावण ने अपने मंत्रियो की सभा बुलाई और उनसे कहा--"हे मंत्रिवरों,
तुम जानते ही हो कि एक वानर ने, एक यत्र-सचालित चित्रो की भाँति, मेरे नगर में

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२५६ | रंगनाथ रामायण

प्रवेश किया, लकिनी का वध किया, सीता के लिए लका को शोध डाला, मेरे पुत्र का वध
किया, मेरी शक्ति का तिरस्कार करते हुए मेरी नगरी को जलाकर भस्म किया और
बहुत-से राक्षसो का वध किया । वह हमारे हाथ में फँसकर भी हमारे हाथ से वचकर
चला गया । वही राघवो को समुद्र के किनारे ले आया है । यदि सूर्यवशतिलक
समुद्र को सुखाकर या समुद्र पर पुल वाँधकर इस पार चला आया, तो हमारा सब किया-
कराया मिट्टी में मिल जायगा । उसके समुद्र पार करने के पहले हम क्या उपाय करें,
जिससे वह लका में नही आ सके । तुम अच्छी तरह सोच-विचारकर कहो कि हमारा
अब क्या कर्त्तव्य है । यदि तुम्हारा बताया हुआ उपाय उपयोगी होगा, तो वैसा ही करेंगे ।”
तब उन मूर्ख मत्रियो ने राक्षसेश्वर से कहा—“हे देव, आपके वश में बहुत-से ऐसे
दिव्यास्त्र हे, जो देवताओ के लिए भी अजेय है । आप ने सर्पराज को वाँधा, उसका विष
उगलवाकर गर्व-भग किया । रुद्र के मित्र कुवेर का गर्व चूर करके आपने उसका
पुष्पक विमान ले लिया । मय की ख्याति को नष्ट करके उसकी प्रिय पुत्री से विवाह कर
लिया । मृत्यु-देवता अंतक (यम) को वदी बनाकर उस अंतक के लिए आप अंतक वन गये ।
अनुपम वलगाली वरुण को कँपा दिया और उसे अपने वश में कर लिया । हे सम्राट्,
आपने सभी चक्रवर्त्तियो के राज्य बात-की-बात में हस्तगत कर लिये । क्या आपने शूलपाणि
(शिव) के निकट अपने वाहुवल का प्रदर्शन करके उनको नीचा नही दिखाया ? क्या,
स्वर्ग के देवताओ के साथ उस इन्द्र का गर्व आपने नही तोड़ा ? क्या, आपने अग्नि को अपनी
प्रतापाग्नि का ताप दिखाकर उसका ताप नष्ट नही किया ? क्या, दैत्यनाथ नैऋत पर क्रुद्ध
होकर अपने पराक्रम से उसका गर्व-भग नही किया ? आपने पवन को एक स्थान पर स्थिर
रहने नही दिया और अपने वाहुवल से उसे विचलित कर दिया । राम तो एक मानवमात्र है
और आप मनुष्य-भक्षी है । यह कैसे सभव है कि वह आपके हाथो से वचकर जीवित रहे ?
आपके पुत्र ने ईश्वर की प्रीति के लिए महेश्वर-यज्ञ करके शाश्वत कीर्त्ति तथा पूर्ण
सफलता प्राप्त की, इन्द्र को जीतकर उसने इंद्रजीत का नाम प्राप्त किया । उसने इद्र
को भी वदी वनाया था, किन्तु ब्रह्मा के प्रार्थना करने पर उन्होने उसे ब्रह्मा को दे दिया ।
क्या, युद्ध में विजय पाने के लिए वह अकेला ही पर्याप्त नही है ? हे दैत्यराज, आपको
चिता करने की कोई आवश्यकता नही है ।”

७. दानव-वीरों के दर्पपूर्ण वचन

इस प्रकार, जब मत्री रावण को समझा रहे थे, तब महान् वलशाली एव प्रलय-काल
के रुद्र को भी परास्त करनेवाले शूर, ब्रह्मास्त, इंद्रजीत, शतमाय, दुर्मुख, अतिकाय, मकराक्ष,
खड्गरोम, वृश्चिकरोम, सर्परोम, अग्निवर्ण, विरूपाक्ष, अक्षीणवल धूम्राक्ष, अक्षतविजयी
उपाक्ष, अनुपम बली रश्मिकेतन, अमित पराक्रमी अग्निकेतन, वज्रदंष्ट्र, सप्तघ्न, शोणिताक्ष,
प्रवलशूर महापार्श्व, कुभ, निकुंभ, सूर्यशत्रु, अग्निकोपन, महोदर, देवताओ को जीतनेवाला
देवांतक, अद्वितीय पराक्रमी तथा नरो का नाश करनेवाला एव भयंकर आकारवाला महाकाय,
विद्युज्जिह्व, कंपन तथा अकपन आदि अभेद्य विक्रमी एव श्रेष्ठ दैत्यवीर, राक्षस राजा
रावण के सामने क्रोधाभिभूत होकर खड़े रहे । उनकी लाल-लाल आँखो मे क्रोध की भयकर

ज्वालाएँ निकल रही थी । प्रलय-काल के प्रचण्ड प्रभंजन से मुक्त, कुलपर्वतों की भाँति वे
परस्पर देख रहे थे, फुफकारनेवाले सर्पों की भाँति उनकी साँस वेग से चल रही थी ।
वे बड़े गर्व से शूल उठाते, खड्गों को खींचते, करवालों को आकाश में घुमाते, लाठियों
को ऊँचा करते, चक्रों को घुमाते, प्रवल मुद्गरों को सँभालने, दीर्घ खड्गों को दिखाते,
भालों को घुमाते और धनुष का टंकार करते हुए अपने क्रोध को प्रकट कर रहे थे ।
उनके इस क्रोध-प्रदर्शन के समय, उनके करवाल एक दूसरे से टकराकर स्फुलिंग
उगलते थे, परस्पर उनके केयूर तथा मुकुटों के रगड़ खाने से मोती बिखर जाते थे और
आभूषण चूर-चूर हो जाते थे । वे क्रोधोन्मत्त हो आकाश को कँपा देनेवाली गंभीर ध्वनि
से रावण से कहने लगे—'हे देव, देवता गंधर्व, दैत्य तथा किन्नर आपको देखने का भी
साहस नही करते; इन्द्र भी तो आपको देखकर भय से सिकुड़ जाता है । तब नर तथा
वानरों का साहस ही कितना है कि वे आपका सामना कर सकें ? उस दिन हम कुछ
असावधान से रहे, इसलिए उस नीच वानर ने अपनी दुष्टता से आतंक फैला दिया था ।
अब हमारे सामने किसकी शक्ति है कि लंका में प्रवेश करने का साहस करे । हे दानव-
नाथ, इतना क्यो, आप हमें शीघ्र आदेश दीजिए । हम तुरंत जाकर उन वानरों का नामो-
निशान मिटा देंगे और राजकुमारों का संहार करके वापस आयेंगे ।'

८. राक्षसवीरों को विभीषण का उपदेश

इस प्रकार की दुर्वार गर्वोक्तियाँ कहनेवाले राक्षसों को देखकर विभीषण, समस्त
इन्द्रियों को अपने वश में किये हुए योगीन्द्र की भाँति, गरजनेवाले उद्दण्ड मेघों को शांत
रखनेवाले इन्द्र की भाँति उन सब को अपने-अपने आसनों पर बैठ जाने का आदेश देकर
बोला—"हे वीरो, तुम उतावले मत बनो । किंचित् विचार करके देखो । किसी भी कार्य
को साधने के लिए पहले साम, दान, तथा भेद के उपायों का आश्रय लेना चाहिए । यदि
उनसे कार्य सिद्ध न हो, तभी दण्ड-विधान का आश्रय लेना पड़ता है । पहले ही दण्ड-
नीति को अपनाना नीति-विरुद्ध है । शत्रु के असावधान रहते समय ही, उसको जीतना
सुलभ है, या उस समय उसको जीता जा सकता है, जब कोई अन्य शत्रु उस पर आक्रमण
करने आता है और वह भगवान् की कृपा से वंचित रहता है । राम कभी असावधान
नही रहते, उनका पराक्रम दुर्वार है, उन पर कोई आक्रमण करने नहीं आता । और तो
और, वे स्वयं भगवान् है । शिव-धनुष का भंग उन्हों ने तो किया था ? वे परम विवेकी हैं,
अनुपम बाहुबल-संपन्न, तथा विजयी है । तुम चाहे जितना भी डींग हाँको, उस सूर्यकुल-
तिलक को जीतना क्या, तुम्हारे लिए संभव है ? उस वायुपुत्र की शक्ति का किंचित्
विचार करो, जिसने विशाल समुद्र को एक छोटी नहर की भाँति पार कर लिया है ।
तुम नहीं जानते कि उसने तुम्हारे देखते-देखते लंका में कैसा उत्पात मचा दिया ? उस
वानर ने राम की सेना के शौर्य का आभासमात्र दिखाया है । ऐसे अनेक वानर और
उनसे भी अधिक शक्तिशाली असंख्य वानर उनकी (राम की) सेवा में हैं । तुम लोग
राम के पराक्रम के आगे कैसे टिक सकते हो ? हे दानववीरो, क्रोधोन्मत्त हो अपने तथा
दूसरों के बल का अनुमान किये बिना, ऐसे वचन कहना क्या बुद्धिमानी है ? सुंदरियों में
३३

श्रेष्ठ सुंदरी राम की पत्नी सीता जब भयभीत होकर रामचन्द्र को पुकारने लगी, तब
राक्षसेश्वर अत्यंत वेग से उन्हें उठा लाये । हम स्वयं सोचें, उन्होंने हमें कौन-सी हानि पहुँचाई है ?
तुम लोग इस बात का तो विचार करते हो कि उन्होंने खर-दूषण आदि राक्षसों
को खंड-खंड कर दिया, किन्तु तुम यह नहीं सोचते कि पहले उन राक्षसों ने ही उनको
घेरा था । क्या, राम-लक्ष्मण पर आक्रमण करना उनको उचित था ? अपने किये हुए
कर्मों के फल भोगकर वे नष्ट हो गये और अमर-लोक को प्राप्त हो गये । अब उनकी
चिंता क्यों करें ? हमारी भलाई इसी में है कि वीर वानरों के लंका में प्रविष्ट होने के
पहले, हमारे दुर्गों के उनके पदाघात से नष्ट होने के पहले ही, सौमित्र के बाण-रूपी वज्र
के गिरने के पहले, रामचन्द्र के क्रोध से उत्तेजित होने के पहले ही और उनकी क्रोधाग्नि
से लंका के भस्म होने के पहले ही, हम सीता को श्रीरामचन्द्र के पास पहुँचा दें ।
सीता को ले आने के दोष का यही परिहार है । राम-भूपाल धर्मात्मा हैं और धर्म की
सदा विजय होती है ।”
इस प्रकार विभीषण ने कई प्रकार से राक्षसवीरों को समझाया और फिर दशकंठ
को देखकर कहा—‘हे प्रभु, दुर्व्यसन सुख तथा धर्म में बाधा डालनेवाले होते हैं । अतएव
आप उनका त्याग कीजिए । धर्म-पालन सुख तथा कीर्ति प्रदान करनेवाला होता है । इसलिए
आप धर्म के पथ का अनुसरण कीजिए और नीतिज्ञ कहलाइए । हठ छोड़िए, और प्रसन्न-
चित्त होइए । यदि आप अपने समस्त कुल की रक्षा करना चाहते हैं, तो जानकी को मुक्त
कर दीजिए । उस राम से हम शत्रुता क्यों करें ?’ इस प्रकार के नीतियुक्त वचन
सुनना रावण को अप्रिय लगा । इसलिए वह तुरंत सभा-भवन छोड़कर अंतःपुर में चला गया ।
९. रावण को विभीषण का हितोपदेश
दूसरे दिन प्रातःकाल ही विभीषण संध्यावंदन आदि प्रातःकाल के नित्य कर्मों से
निवृत्त होकर अपने रथ पर सवार हो रावण के अंतःपुर को चला । उसके चारों ओर
राक्षस सैनिक उसकी सेवा में चल रहे थे । वह रमणीय तथा चित्र-विचित्र तोरणों से
अलंकृत राज-मार्ग से होकर सुंदर शिल्पों को देखते हुए रावण के उस अंतःपुर के सिंह-
द्वार पर पहुँचा, जहाँ (अश्वों की) हिनहिनाहट, (गजों की) चिंघाड़, पटह तथा शंखों के
निनाद, सेवा-कार्यों में प्रवृत्त परिचारिकाओं की पायलों का झंकार, अंतःपुर के रक्षकों के
हुंकार, सूत-मागध बंदी-जनों की स्तुति, परिवारकों के वार्त्तालाप की ध्वनि, तथा गजों की
निःश्वास-वायु के कारण बड़े वेग से फड़फड़ानेवाली पताकाओं की ध्वनि, समुद्र की तरंगों
के घोष के समान समस्त दिशाओं को वधिर बना रही थी । वह अंतःपुर विश्वस्त राक्षस-
वीरों से ऐसा रक्षित था, मानो नक्षत्रों से परिवृत्त हो । उस सौध के सिंहद्वार पर असंख्य,
गज-रथ तथ अश्वों का समूह था । ऐसे सिंहद्वार के निकट विभीषण अपने रथ से उतरा
और अंतःपुर में प्रवेश किया । वहाँ यज्ञ आदि सत्कर्मों से अनुरक्त पूजनीय ब्राह्मणों को
पुण्याहवाचन तथा शान्ति-पाठ करते हुए देखा । विभीषण उन्हें देखते हुए बड़ी प्रीति से
आगे बढ़ा और सभा-भवन में पहुँचकर अपने अग्रज को अत्यंत भक्ति के साथ प्रणाम किया।
फिर, रावण का आदेश पाकर एक उचित आसन पर बैठा ।

' युद्धकांड २५६
उसके पश्चात् मंत्रणा-कुशल विभीषण सभी मंत्रियो के समक्ष कहने लगा—"हे देव,
हे दैत्यनाथ, आप ध्यान देकर मेरा निवेदन सुनिए । जिस दिन से आप सीता को ले आये हैं,
उसी दिन से दु शकुन दिखाई देने लगे हैं । आजकल होम-कुडो में त्रेताग्नियाँ प्रदीप्त
नही होती । उन कुडो को घेरकर बहुत-से साँप पडे रहते हैं । सतत मदजल वहानेवाले
जिन हाथियो के गडस्थल पर भ्रमरो का गुजार होता रहता था, वे मत्तगज आज शुष्क
शरीरो से, गर्दनो को ऊपर उठाये, चुपचाप खडे रहते हैं । अत्यधिक शक्ति तथा स्फूर्त्ति
से सपन्न उत्तम अश्व, आज आंखो से पानी गिराते हुए चारा-पानी छोडकर, शक्तिहीन
हो पडे हुए हैं । हे असुराधिपति, इन सब के निराकरण का एक ही मार्ग है । आप सीता
को ले जाकर श्रीराम को सौंप दीजिए । वे आपके अपराध पर ध्यान नहीं देंगे (वे आपको
क्षमा कर देंगे) । यही नीतिवान् के लिए 'उचित कार्य है । 'यही कार्य उचित है', इस
बात को सब लोग समझते हैं, किन्तु आपको इस धर्म का उपदेश देने से वे

२६० रंगनाथ रामायण
गये और उनसे कहा—'हे देव आज प्रभु, सभा में विराजमान हैं और आपको बुला लाने
के लिए हमें भेजा है।' यह आदेश सुनकर कुंभकर्ण अपने पुत्र कुंभ तथा निकुंभ के साथ
शीघ्र सभा-मंडप में पहुँचा। मणिमय, महिमा-समन्वित तथा नर्त्तकियो के संगीत की मधुर
ध्वनि से संपन्न उस सभा-मंडप में सिंहासनस्थ अपने अग्रज को उसने प्रणाम किया और
बड़ी नम्रता से एक उन्नत आसन पर बैठ गया। अपने भाई के साथ ही विभीषण भी आ
गया और स्वर्ण के आसन पर उपविष्ट हुआ। तब रावण सुरेश (इंद्र) के समान प्रभाव
उत्पन्न करते हुए प्रहस्त को देखकर बोला—'लंका नगर की रक्षा के लिए और भी अधिक
सैनिको को नियुक्त करो; सभी मार्गों में किले के द्वारो पर, भीतर तथा बाहर, राक्षस-
वीरो को सावधान रहने की चेतावनी देकर नियुक्त करो।'
१०. कुंभकर्ण को सीतापहरण का वृत्तांत सुनाना
उसके पश्चात् दानवेश्वर कुंभकर्ण को देखकर अत्यधिक व्यग्रता से कहने लगा—
"हे कुंभकर्ण, मैं तुम्हें एक ऐसी बात सुनाता हूँ जिसे तुमने अबतक नहीं सुना होगा। मैं एक
दिन जनपद में गया और वहाँ राम की पत्नी, भूमि-सुता कमलाक्षी सीता पर मुग्ध होकर
उन्हें यहाँ ले आया। कुछ दिन पहले हनुमान् नामक एक वानर यहाँ आया और सीता
से मिलकर उसे प्रणाम किया और कहा—'हे देवी, आपके पति राम यहाँ अवश्य आयेंगे।'
सीता उन बातो पर विश्वास किये बैठी है। वह मानव (राम) अत्यधिक साहस के साथ
समुद्र के उस पार शिविर डाले पड़ा हुआ है। वह अपने साथ, वनो में पाये जानेवाले
वानरो की एक बड़ी सेना एकत्र करके लाया है। शीघ्र मुझसे युद्ध करके सीता को
ले जाने के निमित्त वह आ रहा है। वह भले ही यहाँ आवे। मैंने इन्द्र आदि देवताओ
को परास्त किया है। जिस कैलास पर्वत पर शिव रहते हैं, उसे मैंने उठाया है। शंभु से
मैंने चंद्रहास (नामक खड्ग) प्राप्त किया है। कमलनभव ब्रह्मा का वर मुझे प्राप्त है।
तिस पर मुझे तुम्हारी शक्ति की सहायता प्राप्त है। तब, क्या एक साधारण मानव मुझे
परास्त कर सकता है ? राम कैसे मुझे युद्ध में जीत सकेगा, और कैसे उस सुंदरी को
यहाँ से ले जा सकेगा ?"
इन बातो को सुनकर कुंभकर्ण ने क्रोध में आकर सब लोगो के समक्ष रावण से
कहा—'हे रावण, राम को धोखा देकर, उनकी पत्नी को इतनी क्रूरता के साथ तुम कैसे
लाये ? क्या इस प्रकार उसे ले आना उचित था ? तुमने अपने मन में नीति का विचार
ही नहीं किया। धर्म-मार्ग का स्मरण ही नहीं किया। काम के पीछे तुमने सारे कुल को
कलंकित किया। जिस दिन तुम सीता को ले आये, उसी दिन लंका का सर्वनाश हो गया ?
इसका नाश तो अब निश्चित ही है, चाहे कैसे भी हो। तुम उस सूर्यवर्चस राम के अप्रति-
हत बाणो का लक्ष्य हुए बिना अपने भाग्य से बचकर चले आये, यही बड़ी गनीमत है।
अब मैं जाता हूँ। हे रावण, इतना बड़ा कार्य सँभालने का भार मुझ पर पड़ा है। अब
तुम वानर तथा राघवो का किंचित् भी भय किये बिना सुख भोगते रहो।'
इन बातो को सुनकर महापार्श्व ने कहा—'हे राक्षसाधीश, आप तो समस्त लोकों
के अधिपति हैं। क्या आप सीता के साथ बलपूर्वक रति-क्रीडा नही कर सकते ?' यह

युद्धकांड २६१
सुनकर मन-ही-मन अत्यत प्रसन्न होते हुए राक्षसराज ने कहा—'हे महापार्श्व, सुनो ।
एक बार मैं ब्रह्मा की सभा में जाते समय पुजिकस्थली नामक एक सुदरी को देखकर उस
पर मुग्ध हुआ और वासना से प्रेरित होकर वलपूर्वक उसके साथ रति-क्रीडा की । यह
बात जानकर ब्रह्मा मुझ पर क्रुद्ध हुए और शाप दिया कि हे राक्षस, स्त्रियो के प्रति आदर
दिखाये विना, अनुचित रीति से यदि तुम भविष्य में किसी भी स्त्री के साथ वलात् रति-
क्रीडा करोगे, तो अवश्य तुम्हारे सिर के सौ टुकड़े हो जायेंगे । यही कारण है कि मैं
किसी भी स्त्री की स्वीकृति प्राप्त किये विना उसके साथ वलात्कार नही करता । मेरी
शक्ति का विचार किये विना वानर-सेना के साथ राम का लंका पर चढ आना उसी
प्रकार है, जैसे भद्रगजो के समूह का सोनेवाले सिंह को जगाना ।'
तब विभीषण ने हँसकर रावण से विनयपूर्वक निवेदन किया—'हे भाई, तुम्हारे
लिए सीता एक भयंकर कालसर्पिणी है । उनकी उसामें ही (नागिन का) फुफकार है
और उनका दुख ही गरल है । वह (काली नागिन) किसी भी

मुँह से ऐसी विचित्र बातें सुन रहे हैं । क्या, तुम समझते हो कि राक्षस उतने शक्ति
हीन हैं ?'
११ इन्द्रजीत का विभीषण को अपने पराक्रम का परिचय देना
रामानुज की बाणाग्नि से दग्ध होना इन्द्रजीत के भाग्य में लिखा हुआ था । इसलिए
वह अत्यधिक मद से उन्मत्त हो, किसी भी प्रकार की नीति का ख्याल किये बिना कहने
लगा- "हे विभीषण सुनो । राक्षसों की शक्ति तथा प्रताप का विचार करके देखो, तो यह
निश्चय है कि हम में से अल्पशक्तिमान् भी राम तथा लक्ष्मण को जीत सकता है । तीनो
लोकों पर बड़े वैभव से राज्य करनेवाले इन्द्र को क्या मैंने पकड़कर बंदी नहीं बनाया ?
उनके ऐरावत को पकड़कर उनके दाँत मैंने नहीं तोड़े ? ये सब मेरे लिए कौन बड़ी बात थी ?
मैंने अग्नि को अपमानित किया; यम को दबा दिया, नैऋत की शक्ति को नष्ट
किया तथा वरुण को परास्त किया । दिक्पालों को इस प्रकार निष्ठुर होकर त्रास देनेवाले
मेरे प्रबल हाथों से क्या, ये मानव नष्ट नहीं होंगे ? तुम तो बहुत बढ़ा-चढ़ाकर उनकी
महिमा का राग अलाप रहे हो । हे विभीषण, सप्त समुद्रों में प्रविष्ट होकर मैं उन्हें
आलोड़ित करूँगा; मेरु तथा मंदर पर्वतों को नचा दूंगा; समस्त पृथ्वी को लाँघ जाऊँगा,
इस पृथ्वी को ऐसे उछालूँगा कि वह जाकर आकाश से टकरा जायगी, मैं समस्त लोकों
को सुखा दूंगा, सारे वनचर समूह को इस प्रकार समुद्र में डुबो दूँगा कि वे थर-थर
काँप उठेंगे; पृथ्वी का भार वहन करनेवाले उस शेष नाग को पकड़कर, उसका विष
निचोड़ दूँगा । अपने भुज-बल से सूर्य तथा चंद्र को पकड़कर उन्हें पृथ्वी पर रगड़ दूँगा ।
वनचर-समूह को पकड़कर उन्हें सूर्य तथा दिशाओं के उस पार फेंक दूँगा; युद्ध में वानरों
का रक्त भूतों को पिलाऊँगा, अपने शर-समूह से आकाश, दिशाएँ तथा पृथ्वी को ढक
दूँगा । सूर्य के रथ का जूआ पकड़कर आकाश में घुमाऊँगा और उसे पृथ्वी में दबा दूँगा।
अपने दायें और बायें हाथों में पृथ्वी तथा आकाश को ग्रहण कर उनको ऐसा मसल दूँगा
कि वे चूर-चूर हो जायँ । हे विभीषण, तुम दनुजेश्वर के भाई हो; इसलिए मैं तुम्हें कुछ
कहे बिना क्षमा करता हूँ । यदि दूसरा कोई होता, तो मैं कदापि ऐसी बातें नहीं सहता ।
ऐसी व्यर्थ की बातें क्यों करते हो ?'
१२. विभीषण द्वारा इन्द्रजीत के दंभ की निंदा
इन दर्पपूर्ण वचनों को सुनकर विभीषण अत्यंत क्रुद्ध हुआ और इंद्रजीत को देखकर
इस प्रकार कहने लगा- "तुमने सूर्यवंशज राम को क्या समझ रखा है कि ऐसे मात्सर्य-
युक्त अनुचित वचन कह रहे हो ? तुम्हारे हाथों से पराजित होने के लिए वे इन्द्र नहीं हैं;
वे तो युद्ध में भयंकर बननेवाले राम हैं । तुम्हारे द्वारा परास्त होने के लिए वे अग्नि-
देव नहीं हैं; वे तो रणनीति-कुशल राम हैं । तुममे हार जाने के लिए वे यम नहीं हैं,
वे तो रण में प्रचण्ड रूप धारण करनेवाले राम हैं । तुमने परास्त होने के लिए, वे नैऋत
नहीं हैं; वे तो युद्ध में व्योत्पादक रूप धारण करनेवाले राम हैं । तुम्हारे द्वारा विजित
होने के लिए वे वरुण नहीं हैं; वे तो रण में अत्यधिक सावधान रहनेवाले राम हैं । वे
तुममे हार जानेवाला पवन नहीं हैं, वे युद्ध-निपुण राम है। तुममे परास्त होने वाले कुबेर नहीं हैं;

वे तो युद्ध में वज्रसम शत्रुओं का नाश करनेवाले राम हैं । तुम्हारे हाथों से पराजित होने
के लिए वे पशुपति नहीं हैं, वे तो रण में अवश्य विजय प्राप्त करनेवाले रामचंद्र हैं । युद्ध
में उनका सामना करना इतना सहज मत समझो, जितना दिक्पालों का सामना करना है । मदांध
होकर असंभव कार्यों को साधने का विचार करोगे, तो मुँह की खाकर गिरोगे । तुम पुत्र नहीं हो,
कुलनाशक हो । तुम ही रावण के शत्रु हो । रामचन्द्र के अग्निसम बाणों के प्रहार के सामने
क्या रावण टिक सकता है ? उचित यही है कि रावण मणियों, गज-मणियों तथा अश्व-मणियों
साथ उस मानिनी-मणि (सीता) को रामचन्द्र के पास पहुँचा दे ।
१३ रावण का विभीषण को नगर से निर्वासित करना
तब रावण ने विभीषण को रोषपूर्ण दृष्टि से देखते हुए कहा—'शत्रु के साथ भी
सतत (युद्ध करते हुए) रह सकते हैं, विष उगलनेवाले सर्प के साथ भी निर्भय होकर
रह सकते हैं, किन्तु शत्रु से मिले हुए पर अपना बनकर रहनेवाले लोगों के साथ जीवन
बिताना कठिन है । तुम ऐसे ही व्यक्ति हो । इसीलिए मेरे सामने तुम बडे गर्व से शत्रु
की प्रशंसा करते रहते हो । तुम मेरे अनुज हो, इसलिए अवध्य हो ? (क्रोध से) क्या,
तुम सचमुच मेरे अनुज हो ? तुम तो मेरे ज्ञाति (गोतिया) हो ।'
कुंभकर्ण ने देखा कि ब्रह्मा का शाप प्रबल है, (अर्थात्, रावण का अंत निश्चित है),
न तो वह अपने अनुज की बातों को अनुचित कह सका, न अपने अग्रज को अनुचित
कहने से रोक ही सका । इसलिए वह बडे आदर के साथ अपने अग्रज को प्रणाम करके
सोने के लिए अपनी गुफा में चला गया । उसके चले जाने के पश्चात् विभीषण ने रावण
को देखकर कहा—'हे भाई, तुम मेरे अग्रज हो, इसलिए तुम पर आनेवाली विपत्ति की
कल्पना से भयभीत होकर मैंने तुमको उचित परामर्श दिया है । हे असुरेन्द्र, आप्त बंधुओं
के हित-वचन तुमको बुरे लगते हैं । ऐसे मंत्री बहुत कम होंगे, जो अच्छा परामर्श देते हैं
और ऐसे राजा भी बहुत कम होंगे, जो उन वचनों को सुनते हैं । मेरा धर्म है कि मै
आपके हित का विचार करके उचित परामर्श दूँ और आपका धर्म है कि आप उसे स्वीकार
करें । सीता को लौटा देना तुम्हारे लिए नीतिमगत होगा । यदि ईश्वर स्वयं प्रतिकूल हो,
तो शक्ति तथा पराक्रम आदि किस काम आयेंगे ? दशरथ के पुत्र स्वयं ईश्वर हैं, भला
उनके अतिरिक्त और कोई ईश्वर भी है ?'
विभीषण के इन वचनों को सुनकर रावण की भौंहें तन गईं, मुख विकृत हो उठा, क्रोध
के कारण आँखों से अग्नि निकलने लगी और होंठ फड़कने लगे । उसने गरजकर कहा—
'तुम मेरे सम्मुख राम को ईश्वर कहने हो ? एक साधारण मानव कहीं ईश्वर हो सकता है ?
अविवेकी पिता के द्वारा राज से निर्वासित होकर, वनों में भटकते हुए कन्द-मूल तथा
पत्तों पर जीवन व्यतीत करनेवाले को कहीं ईश्वर कहते हैं । यदि वह ईश्वर होता, तो
जब मैं उसकी पत्नी को चुराकर लाया, तभी वह मुझ पर आक्रमण करता । इसके विपरीत,
वह अपने भाई के साथ जंगलों में रोते-कलपते फिरता रहा और भटककर सुग्रीव नामक
एक वानर के आश्रम में रह रहा है । क्या, यह सब ईश्वर के ढंग हैं ? एक कायर
मानव को मेरे समान कहकर, क्यो बार-बार मेरे सामने उसकी प्रशंसा करने हो ?'

२६४ रंगनाथ रामायण
तब विभीषण ने मन-ही-मन हँसते हुए रावण से कहा—"हे राक्षसाधीश, देवताओ
की वृद्धि करने, ऋषियो की रक्षा करने, तथा असुरो को दड देकर पृथ्वी का पालन करने
के लिए आदिनारायण ने सूर्यवश में दशरथ का पुत्र होकर जन्म लिया है । उस महा
महिमा-सपन्न आदि देव की महिमा का वर्णन ब्रह्मा भी नही कर सकता । सनकादि मुनि
भी उसका वखान नही कर सकते । भला, तुम उनकी महिमा कैसे जान सकोगे । राम
साधारण मानव नही हैं । इसलिए यदि तुम जीवित रहना चाहते हो, तो राम के दर्शन
करके कमलमुखी सीता को उन्हें सौंप दो । विचार करके देखो, अर्थ तथा काम मात्र की
प्राप्ति से धर्म की सिद्धि नही हो सकती । तुम तो कभी नीतिमार्ग का अनुसरण करना
नही चाहते । तुमसे भी अधिक तुम्हारे मित्र तथा अनुयायी उसे नही चाहते । हे दानवेन्द्र,
कार्य तथा अकार्य का विवेक नही रखनेवाले तुम्हारे लिए धर्म का क्या मूल्य हो सकता है ?
वानर अवश्य समुद्र पार करके यहाँ आयेंगे । हाथ जोडकर (दया की भिक्षा माँगने-
वाली) राक्षस-स्त्रियो के केश पकडकर उन्हें घसीटेंगे । ऐसा करने के पहले ही तुम सीता
को रामचन्द्र के पास पहुँचा दो । यही मेरा तुम से अनुरोध है । मै तुम्हें राज करते हुए
देखना चाहता हूँ, अग्नि-ज्वालाओ के सदृश राघव के असंख्य शरो को उद्दण्डता से तुम्हारे
वक्ष पर लगते हुए में देखना नही चाहता । प्रलय-काल की अग्नि किस प्रकार कुलपर्वतो
के शिखरो को गिरा देती है, वैसे ही राम युद्ध में तुम्हारे सिर गिराने लगेंगे । उस दृश्य
को मै कैसे देख सकूँगा ?"
विभीषण की इन बातो को सुनते ही रावण के दसो मुख क्रोध से लाल हो गये,
कनपटी की शिराएँ फूल गईं और प्रचड गति से निःश्वास चलने लगा, मानो धूम से युक्त
अनल ही हो । अपने पदाघात से पृथ्वी को चूर-चूर करते हुए, तथा गर्जन से आकाश
को कँपाते हुए, अपने क्रोध का पूर्ण स्वरूप प्रकट करते हुए, तुरत वह सिंहासन से उतरकर
विभीषण की ओर लपका और उस पर प्रहार करने के लिए अपना खड्ग उठाया । फिर,
अपने-आप को रोककर उसने विभीषण पर पदाघात किया । तब वज्रपात से गिरनेवाले पर्वत के
उन्नत शिखर के समान विभीषण पृथ्वी पर गिर पड़ा । गिरे हुए विभीषण पर जब रावण
खड्ग का प्रहार करने का उपक्रम करने लगा, तब प्रहस्त ने उसे रोका । सभा के सभी
लोग कहने लगे—'हाय, यह कैसा अनर्थ है ?'
रावण की आँखो से क्रोध की ज्वालाएँ निकल रही थी । उसने प्रहस्त को देखकर
कहा—'हे प्रहस्त, तुमने इसके दुर्वचन सुने ? इसे अनुज मानकर इस पर कौन विश्वास कर
सकता है । इसको तुरत बाहर निकालो । सौजन्य के कारण विलव करो, तो मेरी सौगध है।'
तब प्रहस्त ने क्रोध प्रकट करते हुए विभीषण को देखकर कहा—'अव तुम यहाँ मत
रहो । यहाँ से तुम अपनी इच्छा से कही भी जाकर रहो।' तब विभीषण अत्यधिक क्रुद्ध
हुआ । उसने अनल, नल, हर, सपाति नामक अपने साथियो को साथ लेकर हाथ में गदा
लिये हुए वहाँ से चल पड़ा और चलने समय उसने रावण को देखकर कहा—'हे राक्षसेन्द्र,
तुम कामातुर हो, समस्त पापो का भाडार हो और क्रूर कर्म करनेवाले हो । मै पहले से
से ही तुम से दूर रहना चाहता था । तुम्हारा यह आचरण मेरे लिए नया नही है ।

युद्धकांड २६५
में उस आर्त-रक्षक, कृपानिधि, दिव्य मूर्ति, जगद्विख्यात, सत्यनिष्ठ, नित्य यशोनिधि और निर्मलात्मा
रामचन्द्र भूपाल की शरण में जाऊँगा । वे सदा शरणागत की रक्षा करते है । में तो जा
ही रहा हूँ । कम-से-कम भविष्य में तुम नीतिसपन्न होकर अपना जीवन व्यतीत करना ।
ऐसा नही करोगे, तो जब सुग्रीव लका पर आक्रमण करेगा, तब तुम्हें मेरे हित-वचन का
स्मरण होगा ; या जब वानर लंका को घेर लेंगे, तब तुम मेरी मन्त्रणा का स्मरण करोगे,
या रघुराम के भयंकर वाण तुम्हारा नाश करने लगेंगे, तब तो अवश्य मेरी वानो को याद
करोगे ।'
१४. विभीषण का अपनी माता के भवन में जाना
ऐसा कहकर विभीषण ने अपने अग्रज को प्रणाम किया और वड़े वेग से अपनी
माता के अत पुर की ओर चला । वह क्रुद्ध सिंह के आक्रमण से आहत होकर, उससे
बचकर जानेवाले मत्त हाथी के समान तथा भयकर रव के साथ गिरनेवाले वज्रपात से
खडित पर्वत के समान दीखते हुए अपनी माता के घर में पहुँचा । वह अत पुर विश्वकर्मा
से निर्मित था और कैलास पर्वत के सदृश शोभायमान था । अत पुर में पहुँचकर विभीषण ने
' अपनी माता को प्रणाम किया, जो अत्यन्त निर्मल प्रभा से दीप्तिमान् थी; पर रावण की
दुष्टता का स्मरण करके अत्यधिक दुखित हो रही थीं । वह श्वेत तथा मोटे वस्त्र धारण
किये हुए थी । उसकी भौंहें तथा केश, चन्द्रिका में घुलकर, आकाश-गंगा के झाग का रोगन
चढ़ाये हुए के समान अत्यधिक धवल दिखाई पडते थे और दर्शको में आदर का भाव
उत्पन्न करते थे । सहारा लेकर चलने के लिए उनके हाथ में एक डडा था । असंख्य वृद्ध
ब्राह्मण, उनके समीप उनकी सेवा में लगे हुए थे । करुणा-रूपी जल-प्रवाह सरस वाग्विलास-
रूपी लहरें, शम तथा दम-रूपी दोनो तट, धवल केश-रूपी झाग, निकटवर्ती ब्राह्मणो के
वेदोच्चारण की ध्वनि-रूपी जल-घोष असंख्य श्रेष्ठ ब्राह्मण-रूपी पक्षियो के साथ विलसित
होती हुई वह वृद्धा जाह्नवी के समान दीख रही थी । उसके निकट (बैठे हुए) कितने
ही ब्रह्मराक्षस वेद-पुराण तथा शास्त्र आदि पढकर उसे सुना रहे थे ।
अपनी वृद्धा माता को प्रणाम करके विभीषण आँखो में आँसू भरकर खडा रहा ।
उसे इस प्रकार दुखी देखकर माता कैकसी सभ्रमित हुईं और वडे स्नेह से उसे अपने क्रोड
में भरकर वार-वार कहने लगी--'हे वत्स, तुम इस प्रकार दुःखी क्यो हो ? क्या अत पुर पर
कोई ऐसी विपत्ति आई है, जिसका निवारण करना कठिन है ? या किमी ब्राह्मण का वध
हो चुका है ? या ब्रह्मा ने क्रोध किया है ? या शिव रुष्ट हो गये हैं ? या विष्णु क्रुद्ध
हो गये हैं ? या गमचन्द्रजी लका पर चढ आये हैं ? शीघ्र बताओ कि तुम्हारे दुख का क्या
कारण है, अन्यथा मेरे प्राण मेरे शरीर में नही रह सकेंगे ।'
तब विभीषण ने हाथ जोडकर कहा--'हे माता, सुनिए । आज आपका ज्येष्ठ पुत्र,
रविकुलाधीश राम के समुद्र-तट पर पहुँचने के सबंध में अपने मन्त्रियों के साथ परामर्श
कर रहे थे । तब मैने उनसे साग्रह निवेदन किया कि किमी भी प्रकार से सोचा जाय, उत्तम यही है
कि सीता को राम की सेवा में पहुँचा दिया जाय । यदि हम ऐसा न करें, तो अवश्य
ही राघव समुद्र पार करके आयेंगे और हमारे कुल का नाश करेंगे । इस पर रावण अग्नि
३४

२६६ रंगनाथ रामायण
समान जल उठे और मुझ पर ऐसा पदाघात किया कि आसन के साथ मै पृथ्वी पर गिर
पड़ा । इतने से सतुष्ट न होकर उन्होंने मुझपर खड्ग चलाना भी चाहा । किन्तु, मै किसी
तरह वहाँ से बचकर यहाँ आ गया हूँ । अब मै उसी राम भूपाल की शरण में जाऊँगा
और उनकी कृपा प्राप्त करके वही रहूँगा । अब यहाँ पर मेरे आप्त बंधु और कौन है
कि मै यहाँ रहूँ ।'
इन बातो को सुनकर कैकसी भय से मूर्च्छित हो गई और थोड़ी देर के बाद सँभल-
कर अपने पुत्र से कहने लगी—"हे वत्स, मै पूर्व से ही यह बात जानती हूँ । जिस समय
देवता, देवेन्द्र तथा ब्रह्मा ने अमृत सागर के निकट पहुँचकर भगवान् विष्णु को अपनी
विपत्तियो का वृत्तांत सुनाया, तब उन्होने कहा 'बड़ी निर्दयता से तुम्हें त्रास देनेवाले
क्रूर रावण तथा कुभकर्ण का वध करने के लिए मै सूर्यवश में जन्म लूँगा ।' तुम्हारे पिता
ने यह वृत्तांत मुझे विस्तार से सुनाया था । तब मैने भयभीत होकर अपने पति से पूछा—
'हे देव, आपके पुत्रो में कौन ऐसा पुण्यवान् है, जो आपके वश का उद्धार करेगा ?' तब
उन्होने कहा—'सत्य, धर्म, तथा पवित्रता से सपन्न, नित्य यशस्वी तुम्हारा कनिष्ठ पुत्र ही
राम की कृपा प्राप्त करके इस लका का पालन करेगा ।' इस प्रकार, कहकर तुम्हारे पिता
तपस्या करने के निमित्त मेरु पर्वत पर चले गये । हे पुत्र, सूर्यवशतिलक राम ही विष्णु है,
मानिनी सीता ही महालक्ष्मी है । क्या, तुम्हारे पिता विश्रवसु की बात मिथ्या हो
सकती है ? तुम अवश्य राम की शरण में रहते हुए सुखी रहो और राक्षस-कुल को
बचाने का प्रयत्न करो ।”
इतना कहकर उसने अपने पुत्र को आशीर्वाद दिया और उसे मंत्राक्षत देकर विदा
किया । विभीषण ने भी अपनी माता को वार-वार प्रणाम किया, और मन-ही-मन प्रसन्न
होते हुए, अपने मत्रियो के साथ आकाश की ओर इस प्रकार उड़ा, मानो यह बता रहा हो
कि रावण के पच-प्राण उसका शरीर छोड़कर इसी प्रकार उड जायेंगे । उस गुणनिधि
विभीषण को देखकर लका के लोग अपने-अपने आँगनौ में तथा गलियो में एकत्र होकर
आपस में कहने लगे—'रावण ने धर्म का त्याग करके, भाई के प्रेम को भी ठुकराकर,
विभीषण को निर्वासित किया है । नीति-रीति तथा कुशलता को उसने तिलाजलि दे दी है।
रावण का नाश तो होगा ही, अब लका की क्या दशा होगी ?' कुछ लोग मन-ही-मन
सोचने लगे कि विभीषण ही अब लका का राजा होगा । कुछ अन्य यह सोचने लगे, क्या
विभीषण के राम से मिल जाने मात्र से रावण का नाश हो सकेगा ? ऐसे भी लोग थे,
जो सोच रहे थे कि भले ही यह (विभीषण) राम के पास जाय, क्या राम इसका विश्वास
करेंगे ?
१५ विभीषण की शरणागति
विभीषण अपने मत्रियो के साथ बडे हर्ष से, आकाश-मार्ग से, रामचन्द्र के निकट
आ रहा था । तब सभी वानरो ने अत्यंत आश्चर्य से उसकी ओर अपने सिर ऐसे उठाये
मानो वे देवताओ को यह बता रहे हो कि हे देवताओ, रामचन्द्र (रावण पर) आक्रमण
करने जा रहे है, परन्तु रावण अब अपने सिर नही उठा सकेगा, उसका कुल नष्ट होगा ।

युद्धकांड २६७
तुम लोग भय को त्यागकर अपने सिर उठाओ । तब सुग्रीव ने उन्हें देखकर कहा—'हे
वानरो, वह देखो, कोई अखड विक्रमी पर्वताकार, दीर्घकाय, शस्त्रो से सुसज्जित होकर
इसी ओर आ रहा है । देखो, वह कौन है ? तब सभी वानर बडे-बडे वृक्षो तथा पर्वतो
को हाथ में उठाकर कहने लगे—'हे सुग्रीव, हे देव, हमें उससे युद्ध करने के लिए भेजिए;
हम युद्ध में उस दैत्य का सहार करेंगे ।'
उनकी बातें सुनकर विभीषण ने कहा—'हे वानरो, मैं तुम्हारे पक्ष का ही व्यक्ति हूँ ।
इस प्रकार उतावले मत बनो । मैं रावण का भाई हूँ, किन्तु मैं उत्तम राक्षस तथा
निष्कलक मन का हूँ । श्रीराम की शरण पाने के निमित्त मैं लका से यहाँ उनकी सेवा
में आया हूँ । मैंने रावण को विविध रीति से समझाया कि तुम सीताजी को राम की
सेवा में पहुँचा दो, किन्तु रावण ने मेरी बातो से क्रुद्ध होकर भरी सभा में मुझ पर पद-
प्रहार किया । उससे सतुष्ट न होकर उसने निर्दय होकर मुझसे कहा कि यदि तुम मेरे
राज्य में रहोगे, तो मैं तुम्हारा वध कर

२६८ रंगनाथ रामायण
रक्षस भला है या बुरा । क्षत्रिय का धर्म यही है कि चाहे शत्रु ही क्यो न हो, यदि वह
शरणार्थी होकर आये, तो उसकी रक्षा करनी चाहिए । बाज के द्वारा पीछा किये जाने पर
एक कपोत ने व्याकुल होकर राजा शिवि की शरण ली थी और शिवि ने अपना शरीर
भी त्यागकर कबूतर की रक्षा की थी । जो व्यक्ति आर्त्त व्यक्ति को शरण देता है, वह
अश्वमेध यज्ञ करने से प्राप्त होनेवाले पुण्य का भागी बनता है । हे सुग्रीव, विभीषण
ही क्यो, यदि रावण ही स्वय अपना गर्व तजकर मेरी शरण में आये, तो मैं उसकी भी
रक्षा करूँगा । यही हमारे वंश की रीति है । हे भानुपुत्र, मैं उस विभीषण को शरण
दूँगा । तुम तुरंत जाकर उस भय-विह्वल विभीषण को ले आओ ।'
राम की कृपा-बुद्धि का विचार करके, सुग्रीव आँखें मुकुलित करके तथा सिर कँपाकर
कहने लगा—'हे प्रभु, अपने परम शत्रु के अनुज के शरण माँगते ही, उसे अभयदान देकर
उसकी रक्षा के लिए तत्पर होना इस संसार में आपके सिवा अन्य किस राजा के वश की
बात है !' इतना कहकर सुग्रीव अपनी सेना के साथ आकाश-पथ की ओर उड़ा और
विभीषण को देखकर बोला—'हे विभीषण, श्रीराम ने तुम्हें अभयदान दिया है । यह
सत्य-वचन है । अब तुम उनके पास चलो !' यों कहकर उसने राक्षसराज विभीषण को
अपने हृदय से लगा लिया और बड़े हर्ष से उसे राम के समक्ष ले आया ।
१७ विभीषण की स्तुति
विभीषण ने रामचन्द्र को देखकर उन्हें प्रणाम किया और उनकी स्तुति करने लगा—
“हे नित्य सत्यस्वरूप, हे नित्य कल्याण-रूप, हे नित्य जगद्रक्षक, हे नित्य देव, हे जगत्कारक,
हे जगत् के आदिवीर, हे सृष्टिकर्त्ता, हे सर्वसंगातीत, हे सर्वानुभूत, हे सर्वजगत् में पवित्र,
हे जगद्विधाता, हे गुरु-लघु रूप, हे गुरुज्ञान-रूप, हे मधुरभाषी, हे श्रेष्ठ धनुर्धर, हे पद्म-
सम-नेत्रवाले, पद्माङ्कलित शरीरवाले, हे समस्त जीवाधार, परम पवित्र-स्वरूप, कविजनो
के लिए वेद्य, करुणासिंधु, विविध शास्त्रों के आधार, वेदातवेदी, तुम ही परमात्मा हो, तुम
ही मोक्षहो, तुम ही परमविद्या हो, तुम ही संसारके कर्त्ता हो, तुम ही ससार हो, और तुम ही ससार के
हर्त्ता हो। तुम ही यज्ञ-भोक्ता हो, यज्ञ भी तुम ही हो, और यज्ञ-फल के प्रदाता तुम ही हो;
तुम ही सूर्य-चन्द्र हो, तुम ही जलधि हो, तुम ही इंद्र आदि देवता हो और पृथ्वी भी तुम ही हो ।
तुम ही त्रिमूर्ति हो और त्रिमूर्तियों के परे जो रूप है, वह भी तुम ही हो ।
क्षर तथा अक्षर तुम ही हो, क्षर तथा अक्षर के ज्ञाता भी तुम ही हो । हे शतकोटि
सूर्यसम तेजस्वी, तुम्हारी जय हो ! हे संसार-सर्प-सुपर्ण (संसार-रूपी साँप के लिए गरुड़
पक्षी के समान दीखनेवाले) तुम्हारी जय हो ! हे ललित आगमों से प्रशंसित, हे लक्ष्मीपति,
हे दयासमुद्र, हे विबुध-शत्रुनाशक, श्रेष्ठ मुनिवन्द्य, आद्यन्तरहित, हे शत्रुनाशक, हे दशरथ-
राम, दिनकर-शशि-नेत्रवाले, दिव्य चरित्रवान्, अनुपम शुभ गात्रवाले, अखिलाधार, सहस्र-
मुख आदिशेष भी क्या, तुम्हारी महिमा का वर्णन कर सकेगा ? क्या पद्मसंभव ब्रह्मा
भी तुम्हारी महिमा की स्तुति करने में समर्थ हैं ? फिर मेरी क्या शक्ति है कि मैं तुम्हारी
प्रशंसा करूँ ? तुम्हारी महिमा को जानने की शक्ति मुझमें कहाँ है ? तुम्हारी स्तुति
करने की क्षमता ही मुझमें कहाँ है । मैं दानव हूँ, चंचल चित्तवाला हूँ । हे राजन्,

युद्धकांड २६६
तुम आदि पुरुषोत्तम हो । हे प्रभु, में शरणागत हूँ, तुम मेरी रक्षा करो । उस परम दुष्ट
दैत्यनाथ का सहार करो । तुम्हें अखिल-लोक-शरण्य जानकर, तुम्हारे आश्रय में सुख से
रहने की अभिलाषा से में आया हूँ ।"
तब राम ने उस पर अपनी कृपा-दृष्टि करते हुए उससे कहा- 'हे विभीषण, तुम
मेरी बातो पर विश्वास करो । तुम देव-वैरी रावण के भाई नही हो, बल्कि मेरे भाई हो ।
व्याकुल मत होओ । लक्ष्मण की अपेक्षा अधिक मैं तुम्हें अपना भाई मानता हूँ । इस प्रकार,
आश्वासनपूर्ण वचनो से राम ने विभीषण का भय दूर किया । इसके पश्चात् राम विभीषण
के स्कध पर हाथ टेककर समुद्र के तट पर गये । वहाँ पहुँचकर उन्होने विभीषण से कहा- 'हे
विभीषण, तुम हमें सच-सच बतलाओ कि रावण की तथा उसकी सेना की शक्ति कितनी है ?'
१८ त्रिकूट पर्वत की उत्पत्ति की कथा
तब विभीषण ने रामचन्द्र को प्रणाम करके इस प्रकार निवेदन किया- “हे कमलदल-
लोचन, पूर्वकाल में एक बार नारद ने वायु के समक्ष नागराज की शक्ति की प्रशसा की
और नागराज के समक्ष वायुदेव की शक्ति की प्रशसा की और इस प्रकार उन दोनो में
शत्रुता उत्पन्न कर दी । मात्सर्य से प्रेरित होकर वे दोनो अपनी-अपनी शक्ति का प्रदर्शन
करने की इच्छा करने लगे । वायु ने कहा- 'नागराज उज्ज्वल हेमाद्रि को घेरकर पडा
रहे, तो भी मै उसे उडा दूंगा ।' तब आदिशेष अपनी सारी शक्ति लगाकर उस पर्वत को
घेरकर, अनुपम रीति से, अपने सहस्र फणो से उस पर्वत के सहस्र शिखरो को दृढता के
साथ पकडकर पडा रहा । तब पवन अपने सप्त प्राणो को उद्रिक्त करके प्रचण्ड गति से
चलने लगा । पवन के प्रकोप से सभी पर्वत खड-खड होकर गिर पडे, समस्त भुवन कपित
होने लगे, सभी समुद्र आलोडित हो गये, सभी भूत आक्रन्दन करने लगे । उस पवन ने
सूर्य के रथ को भी विचलित कर दिया और समस्त दिशाओ को चूर-चूर कर दिया ।
लोक में व्याप्त इस सकट को देखकर सब देवताओ ने ब्रह्मा से प्रार्थना की कि आप इस महा विपत्ति
से ससार की रक्षा कीजिए । तब ब्रह्मा आदि देवता हेमाद्रि के पास आये और पवन से
अनुरोध किया कि वह अपनी शक्ति का उपसहार करे । किन्तु जब पवन ने उनकी बात
नही मानी, तब उन्होने नागराज को समझाया कि हे नागेन्द्र, तुमको तो अवश्य ही इस कार्य
से विरत हो जाना चाहिए । तुम दोनो की इस स्पर्धा के कारण सूर्य डिग गया है, पृथ्वी
धँस गई है, समुद्र ने मर्यादा छोड़ दी है । हमारा अनुरोध मानकर तुम पवन की विजय
स्वीकार कर लो और हमारी रक्षा करने की कृपा करो ।
देवताओ की प्रार्थना मान करके नागराज शान्त हुआ और पवन को विजय दिलाने
के निमित्त अपना एक फण ऊपर उठाया । पवन और अधिक वेग से बहने लगा, तो उस
हेमाद्रि का एक-एक शिखर टूटकर बडे वेग से बहुत दूर तक उड गया और समुद्र के
मध्य आ गिरा । हे राघव, वही त्रिकूट पर्वत के नाम से विख्यात है ।"
१९. विभीषण का राम को रावण के वैभव का परिचय देना
"हे देव, उस द्वीप ( त्रिकूट पर्वत ) पर देवेन्द्र की आज्ञा से देवलोक के शिल्पी ने
लकापुर नामक एक नगर का निर्माण किया । उस नगर के सात दुर्ग हैं और प्रत्येक दुर्ग

के चार द्वार हैं । बाहर का दुर्ग कई कंगूरों से युक्त है और ईंटों का बना हुआ है ।
अस्सी करोड़ सैनिक उसके पश्चिमी द्वार की रक्षा करते रहते हैं । सात सौ सतहत्तर करोड़ सैनिक
उत्तर द्वार की रक्षा करते हैं । पूर्व के द्वार पर सतत एक सौ करोड़ मदमत्त सैनिक
दुर्ग-रक्षण में तत्पर रहते हैं । दक्षिण द्वार पर साठ करोड़ बलवान् सैनिक रहते हैं । उस दुर्ग
के भीतर के छहों दुर्गों के कुल चौबीस द्वार हैं, जिनकी रक्षा भी उतनी ही संख्या के राक्षस-
सैनिक करते रहते हैं । प्रत्येक गुप्त द्वार के पास एक-एक करोड़ शक्तिशाली राक्षस रहते हैं ।
नगर के मध्य में नगर की रक्षा में बीस लाख सात सौ करोड़ राक्षस तत्पर रहते हैं ।
कुंभकर्ण की शयन-गुफा की रक्षा सात करोड़ राक्षस करते रहते हैं । रावण के महल
के आंगन की रक्षा करने में एक लाख करोड़ राक्षस लगे रहते हैं । उसके द्वार पर बीस करोड़
राक्षस रहते हैं । इंद्रजीत के भवन के द्वार पर दस सहस्र करोड़ राक्षसवीर रहते हैं ।
विशालकाय श्रेष्ठ राक्षसवीरों के गृहों के पास दस सहस्र करोड़ सैनिक रहते हैं । हे
सूर्यकुलाधीश, उस सेना की गिनती असंभव है, वह बहुत ही विशाल है । स्वयं रावण
की

'में इतनी शक्ति कहाँ है कि वे उसके सामने टिक सकें ? हे नरनाथ, जिस दिन वानरों की
सेना, लंका के दुर्ग की दीवारों पर चढ़कर अत्यन्त क्रोध से राक्षसों से जूझेगी, उस दिन
आप मेरी शक्ति देखेंगे । (मैं रावण की सेना को) प्रलयकाल के रुद्र के समान भस्म
करूँगा ।'
२०. राम का विभीषण को लंका का राजा बनाना
तब प्रभु राम ने विभीषण को गले से लगा लिया और फिर लक्ष्मण को देखकर
बोले--'हे लक्ष्मण, तुम और सूर्यपुत्र दोनों तुरंत विभीषण को समुद्र-जल से अभिषिक्त
करके रावण के बदले उसे लंका का राजा बनाओ । राम की आज्ञा के अनुसार वानर
समुद्र से जल ले आये और लक्ष्मण ने उस जल से विभीषण का अभिषेक किया और
घोषित किया कि हे विभीषण, आज से तुम सभी दानवों के प्रभु होकर रहोगे और जब-
तक सूर्य और चन्द्र रहेंगे, जबतक श्रीरामचन्द्र की कीर्त्ति इस पृथ्वी पर सुशोभित होती
रहेगी, तबतक तुम राज्य करते रहोगे ।
यह देखकर वानरों की सेना अत्यन्त हर्षित हुई । इसके पश्चात् राघव ने विभीषण
को देखकर कहा--'विभीषण, कहो, हम इस समुद्र को पार करने के लिए क्या उपाय करें ?'
तब विभीषण ने हाथ जोड़कर कहा--'हे देव, सेतु का निर्माण किये बिना इस समुद्र को
पार करना इन्द्रादि देवों के लिए भी दुष्कर है । अतः, इसको वश में लाने के लिए समुद्र
से प्रार्थना करनी चाहिए ।'
इसी समय दशकंठ के आदेश से शार्दूल नामक एक राक्षस गुप्तचर वहाँ आया और
उसने वानर-सेना की संख्या, उनका परस्पर-संभाषण, तथा राम और वानरों का वार्तालाप
आदि को (गुप्त रूप से) जान लिया । वह तुरंत असुरेन्द्र की सेवा में लौटकर, हाथ
जोड़कर कहने लगा--'हे दैत्यनाथ, उत्तुंग गात्र, उत्तुंग बाहु, उत्तुंग शक्ति तथा उत्तुंग मति से
संपन्न राम-लक्ष्मण समुद्र के तट पर श्रेष्ठ वानरों के साथ शिविर डाले हुए हैं । (उनकी
सेना इतनी विशाल है कि) आकाश के नक्षत्र भी गिने जा सकते हैं, समुद्र की लहरों को
भी गिन सकते हैं, किन्तु उस वानर-सेना की गणना करना असंभव है । अब उचित यही है
कि आप साम आदि उपायों से कार्य को सिद्ध करें ।
२१. शुक का संदेश
शार्दूल की बातें सुनकर दैत्यराज ने शुक को देखकर कहा--'तुम शीघ्र वानर-सेना में
जाओ और सूर्य-पुत्र से बड़े स्नेह से मेरा प्रेमपूर्ण संदेश कहो और उसे मेरी मित्रता का
स्मरण दिलाकर युद्ध से विरत करके लौट आओ ।'
रावण की आज्ञा सिर पर धरे, वह सुग्रीव के पास गया और रावण का संदेश
सुनाकर बोला--'हे सूर्यनंदन, तुम मुझसे कहो कि तुम किस कारण से रावण से शत्रुता
ठान रहे हो ? वालि तथा तुम में शत्रुता थी, वालि दानवेन्द्र का शत्रु था, इसलिए
तुम्हारी तो रावण के साथ मित्रता ही उचित है । यदि रावण इस राम की पत्नी को
ले गये हैं, तो क्या तुम्हारा इस प्रकार उनका साथ देना उचित है ? कुबेर को जीतकर
पुष्पक विमान प्राप्त करनेवाले रावण को समझाना क्या अच्छा नहीं है ? यही दूत सिख

के साथ कैलास पर्वत को उठानेवाले रावण क्या, कोई साधारण व्यक्ति हैं ? हे वानरेन्द्र,
क्या देवेन्द्र आदि समस्त देवताओ को रावण ने नहीं जीता ? क्या उन्होंने हवन-कुंड में
अपने सिर की आहुति देकर ब्रह्मा को प्रसन्न करके त्रिलोक-विजय का वरदान नहीं प्राप्त
किया है ? एक शक्ति-हीन मानव (राम) से तुम्हारी मित्रता क्यो हुई ? तुम्हारे लिए
उचित यही है कि तुम दानवेश्वर से मित्रता करो ।'
उसकी बातें सुनकर सभी वानर बड़े क्रुद्ध हुए । वे आकाश की ओर उडे, बलात्
उसे पकड़ा और अपनी मुष्टि के आघातो से उसको चूर चूर-कर दिया । फिर उसके
पंखो को तोडकर, उसके नाक-कान काट लिये । तब राघव ने कहा—'दूत को इतना त्रास
क्यो देते हो ? अब इसे-दुख न देकर, जाने दो ।' रघुराम की आज्ञा से प्रभावित होकर
वानरो ने उसे छोड़ दिया । उसने आकाश में उड़कर सूर्य-पुत्र से कहा—'हे कपिराज, तुम
रावण को क्या संदेश देते हो ?' तब सुग्रीव ने क्रोध से कहा—'तुम जाकर उससे कहो कि
उसने रघुराम के साथ दुर्व्यवहार किया है । ऐसे नीच को मैं सहन नहीं कर सकता ।
वह चाहे किसी भी लोक में छिपकर अपने प्राण बचाने की चेष्टा करे, मैं अवश्य उसका
वध करूँगा, उसे कदापि नहीं छोडूंगा । सोमयाजी राघव देवताओ को प्रसन्न करने के
लिए अवश्य समर-भूमि-रूपी यज्ञ-वेदी में संग्राम-रूपी महायज्ञ संपन्न करेंगे । उसमें श्रेष्ठ
धनुष, यूप-काष्ठ होगा, चटुल अस्त्र परिस्तरण (हवन-कुंड के चारो ओर के कुश) होंगे,
लाल धूलि (अग्नि की) प्रभा होगी, वानर-सेना स्त्रुक वा स्त्रुवा (यज्ञपात्र विशेष) होंगे,
वीरो के अंगो से बहनेवाला रक्त ही घृत होगा, धनुष का टंकार मंत्रघोष होगा,
असंख्य राक्षस, यज्ञ-पशु होंगे; वानर-वीरो का सिंहनाद देवताओ को आमंत्रित करनेवाली
ध्वनि होगी; युद्ध-वाद्यों का सतत निनाद ही साम-गान होगा, राम-लक्ष्मण का भयंकर क्रोध
तथा मेरा क्रोध त्रेताग्नियो का रूप धारण करेगा; रावण के प्राण ही आहुति होंगे, उस
रावण का दर्प-दलन ही सोम-पान होगा और राक्षसवीर-रूपी पशुओ का मास ही समस्त
भूत-समूह की संतुष्टि का साधन बनेगा । रावण से कहना कि ऐसे संग्राम-यज्ञ के संपन्न
होने के पहले ही सीताजी को राम के पास पहुँचाकर प्राण बचा लेना उसके लिए शुभप्रद
होगा ।' इन बातो को सुनकर शुक वहाँ से शीघ्र रावण के पास चला गया और उसे सारा
वृत्तांत कह सुनाया ।
२२. राम का दर्भ-शयन
उस समुद्र के तट पर प्रभु राम अपनी दक्षिण भुजा को तकिया बनाकर, दर्भ-शय्या
पर ऐसे लेटे हुए थे, जैसे आदिदेव अमृत-सागर में, शेष-शय्या पर आनंद से पूर्ण हो विमल-
चित्त से लेटे हुए हों । उन्होंने निश्चय किया कि मैं समुद्र से प्रार्थना करूँगा कि वह मुझे
समुद्र पार करके जाने के लिए मार्ग दे । इस प्रकार का निश्चय करके वे तीन दिन तक
निर्जल उपवास करते हुए वहीं लेटे रहे और बड़ी निष्ठा के साथ अपने मन में वरुण
देवता से प्रार्थना करने लगे—'हे समुद्र, तुम्हारे विशाल तथा दुर्गम हृदय के पार जाने के
लिए मैं यहाँ पड़ा हुआ हूँ । तुम्हारे लिए मैं मान्य हूँ । स्वर्ग-विरोधी रावण का संहार
करने के निमित्त तुम मुझे मार्ग दो ।'

युद्धकांड २७३

२३ राम का समुद्र पर ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना
इस प्रकार राम के प्रार्थना करने पर समुद्र, गर्व से फूलकर, उत्तुंग तरंग-रूपी
अपनी बाहुओ को हिलाते हुए, अपने धवल फेन-रूपी हँसी को बिखेरते हुए विशाल मीन-
रूपी जिह्वा को फैलाते हुए, अपने गंभीर घोष से अट्टहास करते हुए, अपने वेला-जल से
दिशाओ को यह वृत्तांत सुनाते हुए तथा अपने मध्य भाग के भँवरो से अपनी वक्रता दिखाते हुए,
राम की बातो की उपेक्षा करने लगा । यह सत्य ही तो है कि मूर्ख, दुर्जन, क्रूर-
कर्मी, तथा कुल-नाशक, कभी प्रार्थना करने से नही झुकते । प्रार्थना सुनकर वे और भी
भडक उठते हैं । प्रेम से उससे मिलने जाइए, तो वे मन को अशान्त बनानेवाली विष-वृष्टि
करने लगते हैं ।
समुद्र को अपनी प्रार्थना अस्वीकार करते हुए देखकर राघव के विशाल नेत्रो से
अग्नि-कण छिटकने लगे और उनकी भौहें तन गई । वे अत्यंत क्रोध से वार-वार समुद्र
और फिर लक्ष्मण की ओर देखकर बोले—'हे लक्ष्मण, इस समुद्र का गर्व तो देखो ।
मैं इससे कितनी बार प्रार्थना करता हूँ । फिर भी, यह मेरी प्रार्थना को स्वीकार नहीं करता ।
स्वीकार कराये बिना में थोडे ही इसे छोड़ दूँगा ? क्या, इसका वडवानल इतना तेजस्वी है
कि मेरी बाणाग्नि उसे निस्तेज न बना सकती । समुद्र भी देख ले कि मेरे बाणो में
कितनी शक्ति है । मैं अपने बाणो की अग्नि-ज्वालाओ से सारे समुद्र के जल को इस
प्रकार ढक दूँगा कि मानो वे उस समुद्र की हड्डियाँ हो । उन बाणो के तीक्ष्ण ताप के
कारण, बडे-बडे मकर, सर्प, मीन, गेंडा, कच्छप, कर्कट, मेंढक, जल-मानुष आदि का समूह
परस्पर एक दूसरे से टकराते हुए प्राण-रक्षा के लिए भाग खड़े होगे और तिमिगिल,
बलवान् जल-राक्षस, जल-ग्रह तथा पर्वत आदि का भी सर्वनाश हो जायगा । मैं उस समुद्र
की ऐसी धूल उड़ाऊँगा कि समस्त जलचरो का सचलन वद हो जायगा और सीप तथा घोंघे
बाहर निकल आयेंगे । मैं इसको लक्ष्मी का पिता, हरि का श्वशुर समझकर ही अबतक
चुप रहा । हे सौमित्र, मैं इसके लिए समुद्र मे प्रार्थना ही क्यो करूँ ? अपने-आपको
मैं इसके सामने शक्तिहीन क्यो समझू ँ ? लाओ मेरे धनुष-बाण और देखो कि यह समुद्र
मेरे बाणो से कैसे सूखता है । मैं अभी समुद्र में रहनेवाले प्राणियो को चूर-चूरकर
देता हूँ ।
इस प्रकार कहते हुए जब राघव ने धनुष हाथ में लिया, तब तुरत इन्द्र कपित
हुआ, आकाश थरथराने लगा, समुद्र आलोड़ित हुए, दिग्गज स्तभित हो रह गये,
पृथ्वी धँस गई, पर्वत-शिखर टूटकर गिरने लगे, ब्रह्मा चकित रह गया, नक्षत्र गिरने
लगे और दिशाएँ चकराने लगी । सूर्यवंशतिलक राम ने अपने शौर्य का प्रदर्शन करते हुए,
प्रलय के समय प्रयुक्त करनेवाले यम के काल-दण्ड के समान, उज्ज्वल तथा प्रलयकाल
की अग्नि के समान दीप्त होनेवाले बाणो का अपने धनुष पर संधान किया और उन्हें
समुद्र पर चलाया । तब समुद्र की लहरें पर्वतो का आकार धारण करके आकाश का अंग
स्पर्श करने लगी, मानो समुद्र यह कहते हुए वाणो से बच रहा हो कि मैने अत्यधिक घमण्ड
दिखाया, मुझ पर कृपा करो । उन उत्तुंग लहरो पर इतना अधिक फेन दिखाई पडने लगा,

३५

२७४ रंगनाथ रामायण
मानो राम के शक्तिशाली बाणो के लग जाने से समुद्र के मुँह से झाग निकल रहा हो ।
सारा समुद्र इस प्रकार आलोडित होने लगा, मानो यह सोचकर वह व्याकुल हो रहा हो,
कि अब मुझे शरण कहाँ मिलेगी ? चारो दिशाओ में धुआँ इस प्रकार छा गया, मानो
मेघ-समूह समुद्र के जल का आस्वादन करने के निमित्त आने के पश्चात्, राम के शस्त्रो
के प्रताप से भीत होकर तुरत लौटे जा रहे हो । जलचर इस प्रकार छटपटाने लगे,
मानो वे दिखा रहे हो कि (भविष्य में) राक्षस इसी प्रकार छटपटायेंगे । सभी दैत्य
पाताल छोड़कर चारो ओर ऐसे भागने लगे, मानो मनुकुल-वल्लभ राम के बाणो की अग्नि
से सभ्रमित समुद्र के चित्त से अहंकार आदि भाव भागे जा रहे हो। उद्धत गति से
प्रज्वलित होनेवाली बाणाग्नि के साथ मिलकर समुद्र का वडवानल भी समुद्र के ऊपर ऐसे
जलने लगा, मानो वडवानल यह सोचकर कि मेरे रहते हुए भी जो समुद्र सूखा नही उसे
सोखने के लिए यह बाणाग्नि आ रही है, उसे बडे प्रेम से आलिंगन कर रहा हो ।
तब लक्ष्मण यम के समान क्रोधाभिभूत अपने अग्रज को देखकर, भयभीत हो,
समुद्र के किनारे आया और हाथ जोडकर बोला—'हे मानवेन्द्र, यह कोई रुद्र का रोष-रूपी
समुद्र नही, जिसका मथन करना असंभव हो । यह कोई यम का क्रोध-रूपी समुद्र नही है,
जिसको मथ देना दुष्कर हो । इस जल को सोखने के लिए ऐसा प्रयत्न क्यो ? आपके
बाणो की अग्नि इस समुद्र को जला देने के पश्चात् बाहर निकलकर समस्त दिशाओ के
साथ सभी लोको को जला दे, तो कोई आश्चर्य नही । अपना चरित्र समस्त जगत् में
विख्यात करते हुए आप अपने क्रोध का उपसहार कर लीजिए । आप के कोध के सामने
यह समुद्र क्या शक्ति रखता है ? इसका नाश मत कीजिए, वह धनुष मेरे हाथ में दीजिए,
यो कहते हुए उन्होने राम के धनुष को पकड़ लिया ।
किन्तु राम ने धनुष लक्ष्मण को नही दिया । उनका क्रोध द्विगुणित हुआ और
सौमित्र को टालते हुए, होठ चबाते हुए क्रोधपूर्ण दृष्टियो से समुद्र की ओर देखकर वे
कहने लगे—'रे समुद्र, तुम मेरे हाथो से परास्त नही होओगे ? तुम्हारे जल को अभी
सोखता हूँ और तुम्हारे जल के अंतर्गत रहनेवाले समस्त प्राणियो का नाश करता हूँ ।
तुम अब मेरा सेवक होकर खडे रहोगे । तुमने मेरा सामना करने की दुष्टता की । लो,
में अभी धनुष की डोरी पर बाण चढाता हूँ ।' इस प्रकार समुद्र को त्रस्त बनाते हुए
उन्होने धनुष पर ब्रह्मास्त्र चढाया ।
यह देखकर इन्द्र तथा ब्रह्मा दिग्भ्रान्त हुए, साग ब्रह्माण्ड विदीर्ण-सा हो गया ।
त्रिभुवनो में रहनेवाले प्राणी आर्तनाद करने लगे । सारा भुवन परितप्त-सा होने लगा ।
दिशाओ में अधकार व्याप्त होने लगा । रवि तथा चन्द्रबिब कांति-रहित हो गये । वज्र-
पात होने लगा । महापवन भयभीत हुआ । आकाशवाणी कंपित होने लगी । मिथ्याग्नियां
प्रज्वलित होने लगी और अविरल गति से एक भयकर निनाद गूँजने लगा ।
तब समुद्र अपने मकर-समूह के साथ विचलित हुआ । उसका सारा उफान जाता
रहा, उसकी उत्तुग लहरें कही दब गई, उसका घोर निनाद जाने कही अतर्धान हो
गया, उसका भयकर विष न जाने कही लुप्त हो गया , उसका गर्व कही चूर-चूर हो गया