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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 302, कुल 508 में से

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पृष्ठ 302

के साथ कैलास पर्वत को उठानेवाले रावण क्या, कोई साधारण व्यक्ति हैं ? हे वानरेन्द्र,
क्या देवेन्द्र आदि समस्त देवताओ को रावण ने नहीं जीता ? क्या उन्होंने हवन-कुंड में
अपने सिर की आहुति देकर ब्रह्मा को प्रसन्न करके त्रिलोक-विजय का वरदान नहीं प्राप्त
किया है ? एक शक्ति-हीन मानव (राम) से तुम्हारी मित्रता क्यो हुई ? तुम्हारे लिए
उचित यही है कि तुम दानवेश्वर से मित्रता करो ।'
उसकी बातें सुनकर सभी वानर बड़े क्रुद्ध हुए । वे आकाश की ओर उडे, बलात्
उसे पकड़ा और अपनी मुष्टि के आघातो से उसको चूर चूर-कर दिया । फिर उसके
पंखो को तोडकर, उसके नाक-कान काट लिये । तब राघव ने कहा—'दूत को इतना त्रास
क्यो देते हो ? अब इसे-दुख न देकर, जाने दो ।' रघुराम की आज्ञा से प्रभावित होकर
वानरो ने उसे छोड़ दिया । उसने आकाश में उड़कर सूर्य-पुत्र से कहा—'हे कपिराज, तुम
रावण को क्या संदेश देते हो ?' तब सुग्रीव ने क्रोध से कहा—'तुम जाकर उससे कहो कि
उसने रघुराम के साथ दुर्व्यवहार किया है । ऐसे नीच को मैं सहन नहीं कर सकता ।
वह चाहे किसी भी लोक में छिपकर अपने प्राण बचाने की चेष्टा करे, मैं अवश्य उसका
वध करूँगा, उसे कदापि नहीं छोडूंगा । सोमयाजी राघव देवताओ को प्रसन्न करने के
लिए अवश्य समर-भूमि-रूपी यज्ञ-वेदी में संग्राम-रूपी महायज्ञ संपन्न करेंगे । उसमें श्रेष्ठ
धनुष, यूप-काष्ठ होगा, चटुल अस्त्र परिस्तरण (हवन-कुंड के चारो ओर के कुश) होंगे,
लाल धूलि (अग्नि की) प्रभा होगी, वानर-सेना स्त्रुक वा स्त्रुवा (यज्ञपात्र विशेष) होंगे,
वीरो के अंगो से बहनेवाला रक्त ही घृत होगा, धनुष का टंकार मंत्रघोष होगा,
असंख्य राक्षस, यज्ञ-पशु होंगे; वानर-वीरो का सिंहनाद देवताओ को आमंत्रित करनेवाली
ध्वनि होगी; युद्ध-वाद्यों का सतत निनाद ही साम-गान होगा, राम-लक्ष्मण का भयंकर क्रोध
तथा मेरा क्रोध त्रेताग्नियो का रूप धारण करेगा; रावण के प्राण ही आहुति होंगे, उस
रावण का दर्प-दलन ही सोम-पान होगा और राक्षसवीर-रूपी पशुओ का मास ही समस्त
भूत-समूह की संतुष्टि का साधन बनेगा । रावण से कहना कि ऐसे संग्राम-यज्ञ के संपन्न
होने के पहले ही सीताजी को राम के पास पहुँचाकर प्राण बचा लेना उसके लिए शुभप्रद
होगा ।' इन बातो को सुनकर शुक वहाँ से शीघ्र रावण के पास चला गया और उसे सारा
वृत्तांत कह सुनाया ।
२२. राम का दर्भ-शयन
उस समुद्र के तट पर प्रभु राम अपनी दक्षिण भुजा को तकिया बनाकर, दर्भ-शय्या
पर ऐसे लेटे हुए थे, जैसे आदिदेव अमृत-सागर में, शेष-शय्या पर आनंद से पूर्ण हो विमल-
चित्त से लेटे हुए हों । उन्होंने निश्चय किया कि मैं समुद्र से प्रार्थना करूँगा कि वह मुझे
समुद्र पार करके जाने के लिए मार्ग दे । इस प्रकार का निश्चय करके वे तीन दिन तक
निर्जल उपवास करते हुए वहीं लेटे रहे और बड़ी निष्ठा के साथ अपने मन में वरुण
देवता से प्रार्थना करने लगे—'हे समुद्र, तुम्हारे विशाल तथा दुर्गम हृदय के पार जाने के
लिए मैं यहाँ पड़ा हुआ हूँ । तुम्हारे लिए मैं मान्य हूँ । स्वर्ग-विरोधी रावण का संहार
करने के निमित्त तुम मुझे मार्ग दो ।'