रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
२३६ रंगनाथ रामायण
हनुमान् क्रोध से प्रलयकालाग्नि की भाँति भभक उठा और एक ताल-वृक्ष लेकर उससे
उसके रथ के अश्वों को मार डाला । तब वह ( राक्षसकुमार ) पृथ्वी पर खड़े होकर
हनुमान् के भाल पर दस शर ऐसे चलाये कि हनुमान् मूच्छित होकर गिर पड़ा । किंतु वह
शीघ्र ही सँभल गया और अपनी पूँछ से अक्षयकुमार पर ऐसा प्रहार किया कि वह
विचलित हो उठा । तब उसने अपनी गदा को अनिलकुमार के वक्ष पर ऐसा चलाया कि वह
मूच्छित हो गया । किन्तु, शीघ्र ही उसकी चेतना लौट आई और वह अक्षयकुमार पर
झपटकर उसकी गदा छीन ली और उसी को उस पर पूरी शक्ति से चलाया । तब अक्षय-
कुमार ने एक वाण चलाकर उस गदा को रोक लिया और अपने को वचा लिया । फिर,
वह करवाल तथा ढाल लेकर आकाश की ओर उड़ा । वायुपुत्र भी उसके साथ-साथ आकाश
में उड़ा । हनुमान् ने तब अपने शत्रु पर गदा चलाई । लेकिन, अक्षयकुमार ने अपने
खड्ग से उस गदा के दो टुकड़े कर दिये और तुरंत अपने खड्ग से हनुमान् की जाँघों
पर प्रहार किया । उस खड्ग की चोट खाकर वायुनंदन पृथ्वी पर गिर पड़ा । लेकिन,
वह तुरंत ऊपर की ओर उछला और अक्षयकुमार की दोनों टाँगें पकड़कर उसे ऐसे खींच
लिया, जैसे गरुड सर्प को अपने वश में कर लेता है । फिर, उसने अक्षयकुमार को कुम्हार
के चाक के समान बड़े वेग से चारों ओर घुमाकर पृथ्वी पर पटक दिया, तो उसका सारा
प्रताप जाता रहा । उसके सिर का मुकुट छिन्न-भिन्न हो गया और उस मुकुट के सभी
रत्न विखर गये; उसका हृदय-पिंड फट गया, आँतें निकल आईं; मांस-पेशियाँ छिन्न-
भिन्न होकर गिर पड़ीं । आँख की पुतलियाँ कुचल गईं, सारा शरीर विदीर्ण हो गया
और रक्त की धारा उगलते हुए उस राक्षस ने अपने प्राण छोड़ दिये । उसकी वैसी मृत्यु
देखकर इन्द्र आदि देवता आनंद से फूल उठे और वायुपुत्र की प्रशंसा करने लगे । ऐसी
अनुपम विजय को देखकर हनुमान् हर्षध्वनि करने लगा ।
भयभीत होकर भागे हुए राक्षस-सैनिकों ने देवताओं के शत्रु रावण की सभा में
पहुँचकर निवेदन किया—'हे दानवेन्द्र, उस वानराधिप का बाहुबल आश्चर्यजनक है । अशोक-
वन के रक्षक समाप्त हुए, अत्यंत पराक्रमी राक्षस-सैनिक मृत्यु का ग्रास बने, शतजिह्व
नष्ट हो गया, शार्दूलमुख प्राण खो बैठा, पिंगलनेत्र की मृत्यु हुई, स्तनितहास मर गया,
शार्दूलकवल युद्ध में मारा गया, जंबुमाली नष्ट हुआ, वक्रनाम समाप्त हो गया, रक्तरोग
की मृत्यु हो गई, रुधिराक्ष की जीवन-लीला समाप्त हो गई, सेना के साथ शूलदंष्ट्र
कुचल दिया गया, प्रतापी दीर्घजिह्व कट मरा, दुर्मुख का नाम ही शेष रह गया,
दुर्धर मृत्यु को प्राप्त हुआ, प्रघस गिर गया; भासकर्ण चूर-चूर हो गया, उपाक्ष का नाश
हुआ, विरूपाक्ष ने अपने प्राण गँवा दिये, अश्मवक्ष का वध हो गया और अक्षयकुमार
भी मारा गया । हमारी दुर्वार सेना भी नष्ट हो गई । निस्सन्देह उस वानर को इन्द्र
आदि देवता भी युद्ध में परास्त नहीं कर सकेंगे । ऐसा लगता है कि वह प्रलयांतक (रुद्र)
को भी परास्त करने की क्षमता रखता है । सच पूछा जाय, तो वह राक्षसों को निगल
जाने के निमित्त वानर-रूप धारण करके आया हुआ मृत्यु-देवता ही है ।' इन बातों को
सुनकर स्वर्गलोक का शत्रु रावण अक्षयकुमार की मृत्यु के लिए विलाप करने लगा—
'हे कुमार, हे प्रिय अक्ष,, हे वीर, एक कपि के हाथो तुम्हें मरना पडा ! हाय, यह कैसी
विपरीत बात हुई !'
१९. इन्द्रजीत का हनुमान् को वन्दी बनाना
इस प्रकार, शोक-सतप्त होनेवाले पिता को देखकर इन्द्रजीत ने कहा—'हे देव, आप
इस प्रकार धैर्य खोकर दु खी क्यो होते हैं । मै अभी उस नीच वानर पर आक्रमण करता हूँ ।
या तो उसे युद्ध में अवश्य मार ही डालूँगा, या बडे पराक्रम के साथ उसे वदी
बनाकर आपके समक्ष उपस्थित करूँगा । आप शोक मत कीजिए ।'
अपने ज्येष्ठ पुत्र की इन बातो को सुनकर रावण को धीरज हुआ और वह कहने
लगा—'हे पुत्र, तुमने चिरकाल तक इन्द्र को वदी बनाकर रखा था । माया तथा शक्ति
में तुम प्रौढ हो, तुम्हारा पराक्रम मुझसे भी श्रेष्ठ है । इस पृथ्वी पर तुम्हारी समता कौन
कर सकता है ? फिर भी, उस वानरश्रेष्ठ को साधारण वीर मत समझो । सतत सावधान
रहते हुए अपने दिव्य बाणो के प्रभाव से तथा अपनी सहज शक्ति के प्रताप से विजय
प्राप्त करके लौटो ।'
पिता की आज्ञा पाकर मेघनाद अग्नि तथा सूर्य के समान दीप्तिमान् रथ पर आरूढ
२३८ रंगनाथ रामायण
खडा रहा । ब्रह्मास्त्र उसके प्राण नही ले सकता था, इसलिए उसने हनुमान् को बाँध-
कर पृथ्वी पर गिरा दिया । मारुति को गिरा हुआ देखकर समस्त राक्षसो ने, 'मारो,
मारो, पकडो, बाँधो,' कहकर चिल्लाते हुए उसे घेर लिया और उमडते हुए क्रोध से हनुमान्
को मजबूत रस्सियो से बाँध दिया । अवश होकर गिरे हुए हनुमान् के पास पहुँचकर
इन्द्रजीत ने सोचा कि यह महाबली ब्रह्मास्त्र के लगने पर भी प्राण खोये बिना, बँधा हुआ
पड़ा है । न जाने यह वानर कौन है ? इसका वध नही करना चाहिए ।
इस प्रकार निश्चय करके वह शक्तिशाली शीघ्र ही हनुमान् को अपने पिता के
समक्ष उपस्थित किया । रावण तथा उसके मंत्री इंद्रजीत की शक्ति तथा निपुणता को देख-
कर अत्यधिक हर्षित हुए । हनुमान् को देखकर रावण अपनी आँखो से अग्निवर्षा करते
हुए बोला—'हे वानर, तुम मेरे नगर में अकेले कैसे प्रविष्ट हो सके ? तुम कौन हो ?
तुम्हारा नाम क्या है ? तुम किस उपाय से समुद्र पार करके यहाँ आये ? तुम्हें किसने
भेजा ? शिव ने ? हरि ने या ब्रह्मा ने ? सुर, गरुड, उरग, सिद्ध, साध्य, नर तथा खेचर
मेरा नाम सुनते ही भय से काँप उठते है । ऐसी दशा में तुम निर्भय होकर मेरे ऐसे नगर
में कैसे आये, जिसमें आने से इन्द्र भी डरता है ? तुमने धोखे से इस नगर में प्रवेश किया
और मेरे उपवन का सर्वनाश करके अपने पराक्रम का परिचय दिया । बडी वीरता दिखाकर
कुछ बूढे तथा दुर्बल राक्षसो का वध किया । तुम्हारे दीप्तिमान् तेज को देखने से अनुमान
होता है कि तुम साधारण कपि नही हो । यदि तुम अपने आगमन का सही-सही कारण
बताओ, तो मै तुम्हारे सभी अपराध क्षमा कर दूँ ।'
१९. हनुमान् का रावण को अपने आगमन का कारण बताना
तब हनुमान् ने उस दशकंठ को देखकर बड़े क्रोध से कहा—"हे राक्षस, हे नीचात्मा,
हे पापकमीं, हे दुष्ट, मै उस राक्षसकुलांतक, जगदीश्वर राम का दूत हूँ, जिनकी कीर्त्ति
समस्त संसार में व्याप्त है, और जिन्होंने दशरथ के पुत्र के रूप में जन्म लेकर विश्वामित्र
के यज्ञ की रक्षा की, शिव-धनुष को तोडा, अपनी महान् शक्ति से परशुराम का गर्वभंग
किया, खर-दूषण आदि राक्षसो का नाश किया, तुम्हें अपनी पूँछ से बाँधकर समुद्रो
में डुबोनेवाले बालि का एक ही बाण से संहार किया, सुग्रीव का राजतिलक किया, और
जो अपनी अक्षय शक्ति के कारण कोदण्ड-दीक्षा-गुरु के नाम से विख्यात हैं । मेरा नाम
हनुमान् है, मैं सुग्रीव का मंत्री हूँ । सूर्यकुल-निधि राम के भेजने पर मैं बड़े हर्ष से उनकी
अंगूठी लेकर, सीताजी का अन्वेषण करते हुए समुद्र पार करके तुम्हारे नगर में आया ।
सब स्थानो में ढूँढने पर भी सीताजी का पता नही पा सका । इससे मैं अत्यंत दुःखी हुआ,
आखिर उन्हें उस उपवन में देखा और अपने प्रभु की अँगूठी देकर उन्हें राम का कुशल-
समाचार सुना दिया । फिर, उनकी दशा का वृत्तांत राम को सुनाने के लिए मै लौटने लगा ।
जाने से पहले मैं अपने आगमन का समाचार तुम्हें बता देना चाहता था, इसलिए
मैने तुम्हारे वन को उजाडा, उसके रक्षको का वध किया, अस्सी सहस्र राक्षसो का नाश किया,
तुम्हारे मंत्रिकुमारो तथा अक्षयकुमार का सहार किया और तुम्हारा रूप-रंग देखकर
यहाँ से लौटने के विचार से बंदी बना । राम के अनुयायी सुग्रीव की सेना में मुझसे भी
अधिक पराक्रमी तथा बाहु-बल में श्रेष्ठ करोड़ो वीर है । ऐसे बलवान् भी हैं, जो ब्रह्मादि
देवताओ को भी जीत सकते हैं और जो तुम्हारे नाम से ही जलते हैं । ऐसे करोड़ो वीरों
के साथ राम समुद्र को पार करके लका पर आक्रमण करेंगे, हठ तथा क्रोध से राक्षसों
का सहार करने के पश्चात् तुम्हारे सिर काटकर तुम्हारा अंत कर देंगे और सीता को
साथ लेकर वापस जायँगे । यह सत्य हैं । यदि तुम बुद्धिमान् हो और नीति के पथ पर
चलना चाहते हो, तो सुनो । तुम शीघ्र सीताजी को उन्हें सौप दो और उस आश्रित लांक-
रक्षक रघुराम की शरण में जाओ । शत्रुता करने से कोई लाभ नही, इसलिए तुम उसे
(शत्रुता को) तज दो । मृत्यु का शिकार न बनकर अपने प्राणो की रक्षा करो ।”
ऐसे हित वचन कहनेवाले हनुमान् को देखकर क्रोध, गर्व और मात्सर्य से अभिभूत
होकर घनघोर बादलो के समान गरजते हुए दशकंठ ने प्रहस्त को आज्ञा दी—
'यह नीच निर्भय होकर मेरे सामने ऐसे अपशब्द कह रहा है । इस नीच कपि को ले
जाकर, तुरन्त इसका वध कर दो ।' तब विनय-भाषण तथा विवेक-भूषण से संपन्न अनघों
का पोषण करनेवाले, शत्रुओं के लिए भीषण दीखनेवाले विभीषण ने, रावण की आज्ञा
के परिणाम के सबंध में सोच-विचार करके बड़ी नम्रता के साथ रावण से निवेदन किया— 'अपने प्रभु
के द्वारा भेजे गये दूत, सदा कोई-न-कोई ऐसी बात कहते ही है । यह उनका सहज गुण होता है,
इसलिए आप अपना क्रोध शांत कीजिए । इतना ही नही, दूत अवध्य होता है । अत , इस कपिको
मारना उचित नही है । आप अपने हठ और क्रोध राम तथा लक्ष्मण पर दिखाइए । इसे मुक्त कर
दीजिए । यदि आपका क्रोध शांत नही होता हो, तो इसे कोई छोटा दंड देकर भेज दीजिए ।'
२०. लंका-दहन
उसके नीति-वचन सुनकर रावण ने दैत्य-वीरो को देखकर कहा--'कपियो को अपनी
पूँछ बहुत प्रिय होती है, और वह उसका चिह्न भी होता है । इसलिए सब लोगो के
समक्ष तुम इसकी पूँछ जला दो और नगर-मार्ग में घुमाकर इसे छोड़ दो । तब राक्षसो ने
मोटे-मोटे रस्सो से पवनपुत्र के हाथ और पैर बाँध दिये और कहने लगे--'अच्छा हुआ
कि हमारे कितने ही बंधुओ को मारनेवाला यह दुष्ट कीड़ा हमारे हाथो में फँस गया है ।
फिर वे तूर्य-घोष के साथ उसे नगर के मार्ग में घुमाने लगे । तब वायुपुत्र ऐसा बहाना
किये बैठा रहा, मानो वह इन राक्षसो के अत्याचारो से पीड़ित तथा निर्बल बन गया हो
और उन दुष्ट राक्षसो को तथा लका नगर को अपनी कनखियो से देखने लगा । सभी
दानव-वृन्द आबाल-वृद्ध उसके पीछे हँसते हुए और उसका उपहास करते हुए चलने लगे ।
उन दुश्चर्याओ को देखकर सज्जन पुरुष मन-ही-मन दुःखी होते थे । कुछ दानव जिद करके
असंख्य वस्त्र ले आये, उन्हें कालरूपों के आकार में बँटा और तेल में डुबोकर कहने लगे—
'इसने सारा अशोक-वन नष्ट किया है, कितने ही दानव-वीरों का सहार किया है, दानवेश्वर ने
इसको उचित दंड दिया है । चलो, हम इसे 'जला डालें ।' यों कहते हुए उन्होने तेल
में भीगे हुए कपड़े उसकी पूँछ में लपेट दिये और उसमें आग लगा दी । कपड़े आश्चर्य-
जनक ढंग से जलने लगे । ऐसा लगता था, मानो लका में कोई उत्पात-सूचक चिह्न दिखाई
पड़ रहा हो । राक्षस सिंहनाद करते हुए हनुमान् के पीछे-पीछे जाने लगे ।
": "वडे-वडे सौधो".
Line 31:
फिर क्रम से मडपो को जला डाला, मणिमय चन्द्र-शालाओ को राख कर दिया, प्रशसनीय
Wait:
- "मडपो": no anusvara on म! "मडपो को".
- "चन्द्र-शालाओ" or "चन्द्र-शालाओ"? Look at "चन्द्र": it is "चन्द्र" or "चन्द्र"? Wait, let's look at line 31: "मणिमय चन्द्र-शालाओ" - wait, look at "चन्द्र": no, it is "चन्द्र" with anusvara or without? It's "चन्द्र" or "चन्द्र"? It's "चन्द्र-शालाओ" - wait, there is a dot: "चन्द्र"? Actually, it looks like "चन्द्र-" with a dot: "चन्द्र-शालाओ". Wait, no, look at the dot above च: yes, "चन्द्र-शालाओ".
- "प्रशसनीय": look at line 31: "प्रशसनीय" - wait! Is there an anusvara on 'श'? "प्रशसनीय" or "प्रशंसनीय"? There is NO dot above श! Look at "प्रशसनीय": it says "प्रशसनीय"!
Line 32:
शयनागारो की श्रेणियो का दहन कर डाला, और रमणीय गज, तुरग तथा रथ-शालाओ
Wait:
- "
सुन्दरकाण्ड एवं युद्धकाण्ड (विस्तृत युद्ध प्रसंग)
सुन्दरकांड २४१
रावणासुर के नाश की सूचना देने के निमित्त उल्कापात होने लगा हो । अग्नि अपनी
प्रचण्ड गति से समस्त ब्रह्माण्ड में ऐसे व्याप्त होने लगी, मानो राजाओं में श्रेष्ठ रामचन्द्र
के लंका पर आक्रमण करने का उपक्रम करते ही उनका प्रताप-रूपी अग्नि पहले ही सर्वत्र
व्याप्त हो गई हो । रावण ने इसके पूर्व अपना भयंकर रण-कौशल दिखाकर समस्त दिक्-
पालों को युद्ध में परास्त कर दिया था । उस पराजय को भूले बिना आज अग्नि ने, अपनी
समस्त शक्ति को दिखाते हुए, एक ही क्षण में एक मात्र विभीषण के भवन को छोड़कर,
सारे नगर को जलाकर भस्म कर दिया । उस समय राक्षसों की ऐसी दुर्गति हुई कि कुछ
राक्षस भय से काँपने लगे, वस्त्र तथा केशों में आग लग जाने से कुछ राक्षस हाहाकार
करते हुए चारों ओर भागने लगे, कुछ अपने सगे-सम्बन्धियों को नष्ट होते देख कुछ राक्षस
शोक करने लगे, कुछ हाहाकार करने लगे, कुछ हनुमान् पर क्रोध दिखाने लगे । ऐसे भी
राक्षस थे, जो कह रहे थे कि इस पापी रावण ने उस महाविष्णु के अवतार राम का
अहित किया है, ऐसा अहित करनेवाले रावण के लिए इस प्रकार ही विपत्ति का आना
कोई अनहोनी बात नहीं है ।
तब वानरवीर हनुमान् अत्यन्त भयंकर रूप धारण करके नगर का कोई भी स्थान
बिना छोड़े, समस्त लंका में आग लगा दी । उस कपिश्रेष्ठ की पूँछ के स्पर्श से उत्पन्न
भीषण अग्नि-ज्वालाएँ जहाँ-तहाँ फैलने लगीं । सुरापान से सुप्त कुछ राक्षस बिना जाने ही
जलने लगे । मृदुल शय्याओं पर सोनेवाले राक्षस तीव्र अग्नि-ज्वालाओं के मध्य फँसकर,
छटपटाते हुए मरने लगे । कुछ राक्षस अपने सगे-सम्बन्धियों, स्त्री तथा बच्चों, प्राणाधिक मित्रों
को एकत्र करके भागते समय, बीच ही में अग्नि में फँसकर जलने लगे । अपने घर की
वस्तुओं को बाहर निकालने के लिए गये हुए लोग फिर लौटकर नहीं आ सके और वहीं
जल गये । कुछ राक्षस अपनी-अपनी पत्नियों को छाती से लगाये बाहर आने लगे, तो
देहली के पास आते-आते जल गये । इस प्रकार, वायु-पुत्र की पूँछ से निकली हुई अग्नि
भयंकर गति से समस्त लंका नगर में व्याप्त होने लगी और श्रेष्ठ सिंहों की भाँति उग्र रूप
धारण करके, हाथियों के कुम्भस्थलों को विदीर्ण करने लगी । तेज से युक्त घुड़सवारों
के समान वह अश्वों पर आक्रमण करने लगी, लम्पटों की भाँति, कामिनियों के कुचों पर
हाथ रखने लगी, दूसरों की निन्दा करनेवालों की भाँति अपनी जिह्वा को चारों ओर
फैलाने लगी, अत्यधिक आनंद से फूल उठनेवाले की भाँति आकाश तक बढ़ने लगी और
भयभीत होकर भागनेवाले कायरों की भाँति वह गलियों में प्रवेश करने लगी । इस प्रकार,
वह अग्नि लंका को चारों ओर से घेरकर शीघ्रता से उसका ध्वंस करने लगी । सभी
देवता आनंद से फूल उठे और हनुमान् को अपने आप्त बंधु मानकर उनकी प्रशंसा करने लगे ।
तब हनुमान् मन-ही-मन जानकी की मृत्यु की आशंका से पीड़ित होकर सोचने
लगा-'हाय ! यह मैंने क्या कर डाला ! मदान्ध होकर मैंने लंका के साथ-साथ राम की
पत्नी को भी जला डाला । अब मैं किस मुंह से राम के पास जाऊँगा ? जानकी का कुशल-
समाचार मैं राम को कैसे सुनाऊँगा ? हाय ! मेरे सारे प्रयत्नों पर पानी फिर गया !'
इस प्रकार, थोड़ी देर तक चिंतित रहने के पश्चात् उनका विवेक जागा और वह सोचने
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२४२ रंगनाथ रामायण
लगा-‘मै भी कैसा मूर्ख हूँ ? इसी माता के आशीर्वाद का फल था कि यह भयङ्कर अग्नि
मेरी पूँछ को जलाने का साहस नहीं कर सकी । भला, अग्नि साध्वी का क्या बिगाड़
सकती है ?’ यों सोचकर उसने अपनी पूँछ समुद्र में ऐसे बुझा दी, मानो वह सीताजी की
दुःखाग्नि को ही बुझा रहा हो । फिर, वह सीता के दर्शनार्थ अशोक-वन में गया । सीता
पहले ही राक्षस-स्त्रियों के मुँह से हनुमान् के कुशल का समाचार सुनकर आनन्द से
गद्गद होकर बैठी थी । हनुमान् ने उन्हें प्रणाम किया, अपने साहसपूर्ण कृत्यों का सारा
वृत्तांत उन्हें कह सुनाया और फिर कहा—‘हे माता, मैं अभी जाकर रामचंद्रजी को साथ
लेकर आता हूँ, जिससे आपके मन का दुःख दूर हो जाय ।’ इतना कहकर उसने सीता को
भक्ति से प्रणाम किया और उनकी आज्ञा लेकर वहाँ से चल पड़ा । वहाँ से चलकर वह
नगर के पश्चिम द्वार के पास आया और उसके किवाड़ों पर इस जोर से पदाघात किया
कि वे टूटकर पृथ्वी पर गिर गये । यह देखकर सभी राक्षस भय-विह्वल हो गये ।
२१. अंगद आदि वानरों से हनुमान् की भेंट
वहाँ से चलकर, फिर एक बार अपना पराक्रम दिखाते हुए, हनुमान् ने साहस के
साथ परकोटे के ऊपर के महलों को अपने पदाघात से गिरा दिया और सहज ही सुवेलाद्रि
पर चढ़ गया । वह आकाश की ओर ऐसा उछला कि लंकापुरी में रहनेवाले समस्त
दैत्य झोका खाकर भयभीत हो उठे, पहाड़ के शिखर भग्न होकर समुद्र में गिरने लगे;
बड़ी-बड़ी चट्टानें लुढ़कने लगीं, दक्षिण दिशा को वहन करनेवाली अगद नामक हथिनी का
शरीर दब गया, पहाड़ों के शृङ्ग गिर गये और पृथ्वी नीचे को धँस गई । फिर, उसने
अपने अनुपम भुजबल की सहायता से आकाश-मार्ग से जाते हुए समुद्र के मध्य भाग में स्थित
मैनाक पर्वत पर उतरकर अपनी थकावट दूर की । फिर, उस पर्वत की आज्ञा लेकर
अपने असमान वेग तथा प्रताप का प्रदर्शन करते हुए समुद्र के उत्तरी किनारे पर
उतर पड़ा ।
हनुमान् के मुख पर स्पष्ट रूप से दीखनेवाले हर्ष के चिह्नों को देखकर अंगद आदि
श्रेष्ठ वानर उसकी अगवानी करने गये और उसे गले से लगा लिया । फिर, वे सब एक
स्थान पर बैठ गये और हनुमान् से उसके कार्य के परिणाम के संबंध में प्रश्न किये ।
तब हनुमान् ने कहा—‘हे वानरो, आपकी कृपा से मैंने अनुपम समुद्र को पार किया,
अगणित वैभवों से संपन्न लंका में प्रवेश किया, और बहुत समय तक अन्वेषण करने के बाद
सीताजी के दर्शन भी कर लिये । फिर, मैंने राम की आज्ञा के अनुसार जानकी से उनका
सारा वृत्तांत कह सुनाया और उनकी दी हुई अंगूठी भी सीताजी को दे दी । फिर, उनकी
चूड़ामणि लेकर यहाँ लौट आया हूँ ।’
हनुमान् की बातें सुनकर सभी वानर अत्यंत हर्षित हुए और हनुमान् की भूरि-भूरि
प्रशंसा करने लगे । तब अत्यधिक उत्साह से भरे हुए श्रेष्ठ वीर अंगद कहने लगा—‘अब
यही उचित होगा कि किसी भी प्रकार हम जानकी को लंका से जीतकर ले आवें और
उन्हें रघुराम के पास पहुँचा दें । चलो, हम अभी समुद्र पार करें और पुत्र, मित्र तथा
परिवार-सहित दशकंठ का वध करके सीताजी को छुड़ा लायें ।’
तब जाम्बवान् ने वालिपुत्र को देखकर कहा—‘सुग्रीव ने हमें जानकी के अन्वेषणार्थ
भेजा है; उस परम पवित्र सीता की कृपा से हमारा प्रयत्न सफल हुआ । अब हमारे
लिए उचित यही है कि हम जाकर रामचन्द्रजी से यह समाचार कह दें।, तब सबने
परस्पर परामर्श कर, वैसा ही करने का निश्चय किया । उस दिन वायुपुत्र तथा दूसरे
वानर समुद्र के किनारे ही कद-मूल-फलो से अपनी क्षुधा शांत करके रहे । वे परम शक्ति-
शाली वानर दूसरे दिन वहाँ से रवाना हुए और मेरु, मदर-पर्वतो से भी विशाल दर्दुर
नामक पर्वत के निकट पहुँच गये । उस पर्वत की तराइयो में विचरण करते हुए उन्होंने
फल, मूल, आदि खाकर वही रात्रि बिताई ।
२२. वानरों का मधुवन में विचरण करना
प्रातःकाल होते ही उन बाहुबली वानरवीरो ने सोचा—'हमें जब सुग्रीव के मधुवन
में जाकर, वहाँ जी भरकर मधु (शहद) का पान करना चाहिए, अन्यथा हमारी प्यास
शांत नहीं होगी । हमने रामचन्द्र का कार्य सम्पन्न किया है । अत, सुग्रीव क्रुद्ध होकर हमें
दंड नहीं देंगे ।' यो निश्चय करके सभी वानरों ने अगद तथा हनुमान् से प्रार्थना करके
उनकी भी सम्मति प्राप्त कर ली और मधुवन के लिए रवाना हो गये । मध्याह्न होते-
होते वे मधुवन में पहुँच गये । चारो दिशाओ में झरनेवाली मधु-धाराओ को देखकर उनके
मुँह में पानी भर आया । विभिन्न प्रकार के हाव-भाव करते हुए, वे अपने कान खड़े
करके, एक दूसरे को अपने दांत दिखाते हुए, एक दूसरे से तर्क-वितर्क करते हुए, बड़े
कौतुक के साथ अपने इष्टानुसार उस वन के विभिन्न दिशाओं में विचरण करने और
पुष्पो से झरनेवाला मकरद, छत्तो में एकत्रित मधु आदि का पान करने लगे । फिर, उन्होंने
कई प्रकार के फल खाये । कच्चे फलो तथा फूलो को तोड़कर नीचे गिरा दिया । अत्यधिक
उल्लास के आवेश में आकर उन्होंने पेड़ की शाखाओ को तोड़ दिया और पेड़ो को झुका-
कर एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलांग मारकर जाने लगे । फिर, वे पुष्प-लताओ को
झूला बनाकर झूलने लगे तथा सरोवरों में स्नान करते हुए नाना प्रकार की क्रीड़ाएँ
करने लगे ।
जब मधुवन की रक्षा करनेवाले वानर (दधिमुख) ने इन वानरो की करतूत देखी,
तब क्रोध में आकर उसने सभी वानरो को डांटकर उन्हें तुरत वहाँ से निकल जाने का
आदेश दिया । जब उसके अनुचर सभी वानरो को धक्का देकर बाहर निकालने लगे, तब
अंगद तथा हनुमान् ने भागनेवाले अपने साथी वानरो को रोका और वन-रक्षक दधिमुख
को मुँह के बल नीचे गिराकर, उसे पृथ्वी पर घसीटकर, मुष्टियो का प्रहार करके भगा
दिया । बेचारा दधिमुख क्रोध तथा दुख से व्याकुल होकर भगवान् की दुहाई देते हुए
भागा और राजा राम तथा लक्ष्मण के श्रीचरणों में बड़ी भक्ति के साथ प्रणाम करके,
फिर सूर्य-पुत्र के चरणों में सिर झुकाकर कहने लगा—'हे देव, आपका मधुवन देव-दानवों
के लिए भी अभेद्य है । आज वायु-पुत्र तथा वालि-पुत्र, दोनों ने अपने बहुत-से साथियों
को लेकर ऐसे मधुवन में प्रवेश किया है और वृक्षों पर चढ़कर शाखाओं पर विचरण
करते हुए अपने इच्छानुसार फल खाये हैं और जी भरकर मधु पिया है । एवम् किञ्चित्
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भी विचार न करके कि यह उपवन राजा का है, वे मनमानी कर रहे हैं । मैंने उन्हें
डाँट-डपटकर वाहर निकालने का प्रयत्न किया, तो उन्होंने मुझे मुष्टियो मे मारकर भगा
दिया है ।'
दधिमुख का विलाप सुनकर सुग्रीव अत्यत क्रुद्ध हो गया और उन वानरो को उचित
दड देने का विचार करने लगा । तब सारी परिस्थिति समझकर सतत-विजयी लक्ष्मण ने
सुग्रीव से कहा—'यदि अगद आदि महावीर तुम्हारी आज्ञा विना प्राप्त किये ही, निर्भय
होकर तुम्हारे वन में प्रवेश करके शहद पी रहे है, तो कदाचित् उन वाहुवलियो के द्वारा
रामचंद्रजी का कार्य सपन्न हुआ होगा । अन्यथा, वे इस प्रकार तुम्हारी आज्ञा की अवहेलना
करने का माहस कभी नहीं करेंगे । इसलिए तुम उन्हें शीघ्र यहाँ वुलाओ ।'
तब सूर्यपुत्र ने दधिमुख को देखकर कहा—'वे रामचंद्रजी का कार्य सपन्न
करके आये दीखते हैं, इसलिए उनके सभी अपराध क्षम्य हैं । तुम अपना दुख सहन कर
जाओ और उन्हें यहाँ वुला लाओ ।' सुग्रीव का आदेश पाकर वह उन वानरो के समीप
[L14
सुन्दरकाण्ड २४५
तथा दीन दशा का विचार करती हुई अविरल गति से अश्रुधारा बहाने तथा आहें भरने
लगी । मलिन वस्त्र तथा धूलि-धूसरित शरीर से युक्त वे, उमडते हुए शोक से बार-बार
विलाप करने लगी । आपने अपनी पत्नी की जो रूप-रेखा मुझे बताई थी, वह उनकी
रूप-रेखा से सर्वथा मिलती थी, इसलिए मैंने निश्चय किया कि वे ही सीता हैं । फिर,
मैने उनके समीप जाकर प्रणाम किया, उनसे उचित वार्त्तालाप करके आपकी अगूठी उन्हें दी ।
फिर, उनकी चूडामणि लेकर मैं समुद्र लाँघकर यहाँ पहुँच गया हूँ ।" इतना कहकर
हनुमान् ने राम को सीता की चूडामणि दी, जो उनके वियोग की अग्निशिखाओ के प्रतीक
के समान दीप्तिमान् थी ।
राम ने उस शिरोरत्न को बडे अनुराग से लिया और उसे अपने हृदय से लगाकर
थोडी देर तक मूर्च्छित-से हो रहे । फिर, अपने धैर्य को सचित करके वे सँभल गये और
बाष्पपूरित नयनो से वानर-राजा को देखकर बोले—'हे सूर्यनदन, मेरे प्राण-समान देवी
की शिरोमणि को देखकर मेरा हृदय लाख के समान पिघल रहा है । इन्द्र ने यज्ञ से सतुष्ट
होकर यह रत्न मेरे श्वशुर को दिया था । उस गुणनिधि जनक महाराज ने इसे सीता के
सिर में पहनाकर बडे सम्मान के साथ सीता का विवाह मेरे साथ किया । यह रत्न लतागी
सीता से तथा मुझसे कभी अलग नही रहता । आज मेरी तथा सीता की भेंट कराने के हेतु यह रत्न
आया है ।' इस प्रकार कहते हुए राम उस मणि को बार-बार अपने हृदय से लगाने लगे ।
उसके पश्चात् राम हनुमान् को देखकर बोले—'हे पुण्यात्मा, तुम्हारे लौटते समय
सीता ने तुम से क्या कहा था ? सुनाओ ।' तब शक्तिसपन्न हनुमान् राम को देखकर
कहने लगा—"हे देव, उन्होने कहा, 'सूर्यवशतिलक के वियोग में गत दस महीने मैंने असह्य
दुखो को झेलते हुए बिताये हैं । दो महीने के पश्चात् रावण मुझे मार डालने का निश्चय
कर चुका है । इसलिए तुम राम भूपाल से निवेदन करो कि मेरे प्राण अब नही बचेंगे ।
उन्हें सत्यनिष्ठ मानकर ही मेरे पिता ने मेरा पाणिग्रहण उनसे कराया । विवाह-वेदी पर
उन्होने ( मेरे पति ने ) अग्निदेव के समक्ष सदा मेरी रक्षा करने की प्रतिज्ञा की और
मुझे अपने साथ अपने घर ले आये । आज उन्होने मेरी उपेक्षा कर दी और मुझे अनाथ
बना दिया । इस पर विचार करने के लिए प्रभु राम से निवेदन करो । उनसे यह भी
निवेदन करो कि अपनी धर्मपत्नी को कोई चुराकर ले जाय, तो चुपचाप बैठे रहना वीरो
का धर्म नही हैं । औचित्य का विचार करके मैने इन बातो की चर्चा की है । मेरा शरीर
चाहे जहाँ भी रहे, मेरे मन, वचन और कर्म उन्ही में रमण करते रहेंगे ।' इतना कहने के
पश्चात् उन्होने यह भी बताया कि चित्रकूट पर्वत पर, उन पर कौए ने कैसे आक्रमण किया था,
कैसे आपने गैरिक से उनके कपोलो पर सुदर मकराकृति की रचना की थी । (ये
बातें उन्होने इसलिए बताई थी कि ) मेरे वचनो पर आपका विश्वास हो जाय ।"
रामचन्द्र से इतना कहने के पश्चात् हनुमान् ने लक्ष्मण तथा सुग्रीव को भी सीताजी का संदेश सुना
दिया । सभी वानरवीर मन-ही-मन हर्षित हुए ।
यह सुदरकाड ससार में व्याप्त होकर सभी काव्यो में सुदर सिद्ध हुआ है । इसका
विचार करके आन्ध्र-भाषा का सम्राट्, काव्य-आगम आदि के ज्ञाता, आचारवान्, धीर, भूपोप-
निधि, गोनवुद्ध भूपाल ने सुदर गुणो से सपन्न, धैर्यवान्, शत्रुओ के लिए भयंकर स्वरूप, महात्मा,
अपने पिता विट्ठल-नरेश के नाम पर रसिक जनो के लिए प्रिय, अनुपम तथा ललित शब्द
तथा अर्थों से सपन्न रामायण के इस सुदरकाड की, श्रेष्ठ अलंकार तथा सुंदर भावो से
परिपूर्ण वनाकर इस प्रकार रचना की कि वह आचन्द्रार्क, परमपूज्य हो शोभायमान होता रहे।
प्रसिद्धं, आर्ष, रसिको के लिए सतत आनंददायक इस आदिकाव्य का पठन जो कोई
भी करेगा, या जो इसका श्रवण करेगा, उसे सामवेद आदि विविध वेदो का आधार राम-
नाम-रूपी चिंतामणि के द्वारा नये भोग, परोपकार-वुद्धि, उदात्त विचार, परिपूर्ण शक्ति,
राज्य-सुख, निर्मलकीर्त्ति, नित्य सुख, धर्मनिष्ठा, दान-पुण्य में अनुरक्ति, चिरायु, स्वास्थ्य,
ऐश्वर्य, अक्षय शुभ, पाप-क्षय, श्रेष्ठ पुत्र की प्राप्ति, शत्रुओ का नाश, और धन-धान्य-समृद्धि, आदि
सुलभ होगे । उनका जीवन निर्विघ्न होगा, घरो में लावण्यवती स्त्रियो का अनुराग तथा
पुत्रो के साथ जीवन सिद्ध होगा । सव प्रकार के सकट दूर होगे, सगे-संवधियो से मिलन,
इच्छित कार्यों की सिद्धि, देवताओ की प्रीति, और पितरो की तृप्ति सुलभ होगी । इसके
रचयिता की श्रेष्ठ तथा शुभ उन्नति होगी तथा उसे इन्द्रभोग की प्राप्ति होगी । जवतक
कुलपर्वत, सूर्य, चंद्र, दिशाएँ, वेद, पृथ्वी, तथा सभी भुवन सुशोभित रहेंगे, तवतक यह
कथा अक्षय आनंद-समूह का आगार सिद्ध होगी ।
सुन्दरकांड समाप्त
श्रीरंगनाथ रामायण
(युद्धकांड)
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१. श्रीराम का हनुमान् की प्रशंसा करना
आश्रितो के हिताकाक्षी, सूर्यवश के सवर्द्धक रामचन्द्र ने जब प्राणाधिका प्रिया के इन प्रिय
वचनो को हनुमान् के द्वारा सुना और उनका पता जान लिया, तब उन्होने बडे प्रेम से
कहा—"हनुमान् ने जैसा कार्य किया है, क्या, वैसा कार्य करना देवताओ के लिए भी सभव है ?
ऐसा प्रतीत होता है कि शक्ति में या तो हनुमान् ही श्रेष्ठ है, या पवन श्रेष्ठ है या
गरुड ही श्रेष्ठ हैं । समुद्र को पार करना उनके सिवा और किसके लिए सभव है ? देव,
गधर्व, दैत्य तथा किन्नरो के लिए भी दुर्गम, राक्षस-सेना के प्रचड बाहुबल से दिन-रात
सुरक्षित लका में प्रवेश करके वहाँ से जीवित लौट आना क्या शशिधर (शिव) के लिए भी
सभव है ? अपने प्रभु का महान् कार्य बडे आनन्द के साथ जो शीघ्र ही सपन्न करता है,
वही उत्तम पुरुष है । प्रभु के कार्य में विघ्न पडने पर, विलव के साथ उसे पूरा करने-
वाला मध्यम श्रेणी का पुरुष है । प्रभु के बताये हुए कार्य से बचने की चेष्टा करनेवाला
तथा हीला-हवाला करनेवाला व्यक्ति दुस्सेवक है । इन तीनो में हनुमान् निस्सदेह श्रेष्ठ
व्यक्ति ही सिद्ध हुआ है । अनिलकुमार ने एक महान् कार्य को बडे हर्ष तथा तत्परता से
सपन्न किया है । अब उसका प्रत्युपकार, मैं किस प्रकार से कर सकूँगा । अब (प्रेम से)
३२
२५० रंगनाथ रामायण
उसका आलिंगन करना ही इस समय मेरे वश की बात है।" यो कहकर प्रभु ने हनुमान्
को अपने हृदय से लगा लिया ।
इस प्रकार, सुग्रीव के समक्ष राम ने हनुमान् की प्रगसा करके कहा—'हे पवनपुत्र,
मुझे बड़ी प्रसन्नता है कि तुम जानकी का पता लगाकर आये हो। मुझे अत्यन्त आनन्द का अनुभव
हो रहा है । पता नही, इस कार्य की समाप्ति कैसे होगी । मेरा मन यह सोचकर व्याकुल
हो रहा है कि इस विशाल समुद्र को लाँघकर जाने की क्षमता वानर-सेना को कैसे प्राप्त
होगी ।' इतना कहकर राम अपना सिर झुकाकर चुप हो रहे । रविपुत्र, राम के मन की
चिन्ता को दूर करने के उद्देश्य से कहने लगा—'हे देव ! आप साधारण लोगो की भाँति
इस प्रकार क्यो दुःखी हो रहे हैं ? आप क्यो कहते हैं कि हम समुद्र को पार नही कर
सकते ? हम अवश्य समुद्र को पार करेंगे, सुवेलाद्रि को पार करके लका को जीतेंगे और
रावण का सहार करके ससार का दुःख दूर करेंगे । हे राजन्, आप विचार कीजिए । मेरे
सभी वानर परिश्रमशील है ; बाहुबल से सपन्न है, और दुर्जय हैं । हे राघव, इनके
रहते हुए आप इस प्रकार क्यो चितित होते हैं ? आप तैयार हो जाइए । उद्योगी पुरुष
के लिए नभी अर्थ सद्यः फल-प्रद सिद्ध होते हैं । गत्रु सदा उत्साही व्यक्ति से भयभीत
रहते हैं, उत्साहहीन व्यक्ति से नहीं ।'
सुग्रीव के इन वचनो को सुनकर प्रभु ने हनुमान् से कहा—'ठीक है । मैं पहले
समुद्र से (मार्ग देने की) प्रार्थना करूँगा । यदि उसने नही दिया, तो अपने वाणो की अग्नि
से समुद्र को ही सुखा दूंगा, या उस पर पुल बाँधूँगा । हे पवनपुत्र, समुद्र पार करना
मेरे लिए कौन बड़ा कार्य है ? अब तुम यह तो बताओ कि उस दशकंठ के नगर में
किनने किले हैं, उसकी सेना कितनी बडी है ? उसके नगर के कितने द्वार हैं ? कितने राक्षस
उन द्वारो की रक्षा करते हैं ? उस नगर के सौधो की पंक्तियाँ कैसी हैं ? तुम तो इन
सबका पता लगाकर आये हो, इसलिए मैं तुमसे इन सब बातो का विवरण सुनना चाहता हूँ।'
२. लंका के वैभव का वर्णन
तब हनुमान् हाथ जोड़कर बड़े विनय के साथ प्रभु से इस प्रकार निवेदन करने लगा—
"हे दाशरथि, उस नगर में सतत (गण्ड-स्थलों से) मधु-धारा वहानेवाले, मुख से रौद्र भाव
प्रकट करनेवाले, पर्वताकार भद्र गजो के असंख्य समूह हैं । बहुत-से आयुधों से सज्जित,
आश्चर्यजनक तथा भयंकर दीखनेवाले, छत्रो, पताकाओ तथा विविध चिन्हो एव ध्वजाओ
से युक्त सूर्य-बिंव की प्रभा के समान मणियो से दीप्तिमान्, अश्वो एव सारथियो से युक्त
असंख्य रथ हैं । वीर रस के समुद्र की लहरो के समान दिखाई देनेवाले विविध रंगो से
युक्त, (दर्शकों की) दृष्टियो को चौंधिया देनेवाले अपनी हिनहिनाहट से सबको आश्चर्य-
चकित करनेवाले, अपने वेग में पवनदेव के अश्वो को भी मात करने की दिव्य शक्ति
रखनेवाले तथा मनोहर आकारवाले, अश्व अनगिनत सख्या में हैं । हे देव, हे राघव, वहाँ
के राक्षसवीरो की तो गिननी ही नही हो सकती है; वे ऐसे दिखाई देते हैं, मानो
बिजलियो से युक्त काले बादलो ने ही दानवो का रूप ले लिया हो, या काले पर्वत ही
मूर्त्तिमान् रौद्र वा-ना रूप धारण किये हुए हों, या जिस गरल का पान शिव ने किया था,
आप शत्रुओ का नाश कर देते हैं ।
17. अव उन सवका वर्णन ही मैं क्यो करूँ ? महान् वैभव से सपन्न हो रावण, प्रति दिन अपनी
18. सेना के साथ भ्रमण के लिए निकलता है और सवका निरीक्षण करता है । अपने उद्धत
19. गर्व से प्रेरित होकर वह सतत दूसरो को युद्ध के लिए चुनौती देता रहता है । पराक्रम
20. तथा शक्ति से सपन्न शत्रुओ के लिए भी लका को वश में करना दुष्कर है । इसके अलावा
21. समुद्र में जल, वन, (कृत्रिम) स्थल, तथा पर्वत के चार दुर्ग और हैं । वे सतत दिखाई
22. तो देते हैं, किन्तु उनको घेरने का उपक्रम करने जायें, तो उनका पता ही नही लगता ।
23. “हे राजन्, इस लका नगर की रक्षा करनेवाले भयकर राक्षस मृत्यु की जिह्वा की
24. समता करनेवाले, शूल धारण किये हुए सतत रक्षण-कार्य में तत्पर रहते हैं । ऐसे रक्षक
25. पश्चिम द्वार पर दस सहस्र रहते हैं । पूर्व द्वार पर स्वय रावण चतुरगिणी सेना के साथ
26. रहता है । दक्षिण द्वार पर एक लाख राक्षस रक्षा करते रहते हैं । उत्तर द्वार पर अगणित
27. शस्त्रो से सुसज्जित एक लाख राक्षस रहते हैं । नगर के मध्य में एक लाख पच्चीस
28. हजार राक्षस रहते हैं । हे सूर्यवशतिलक, ऐसी लका में, विना अन्य किसी का ध्यान
२७२ रंगनाथ रामायण
के लिए मेरे अस्त्र के सिवाय (मुक्ति का) और कोई उपाय नहीं है । वह छिप कहाँ
सकता है ?' फिर उन्होंने नील को देखकर कहा—'तुम सेना के आगे-आगे ऐसे मार्ग से
चलो जो बहुत ही मनोहर हो तथा जिसमें स्वच्छ एवं मीठा जल, पके हुए फल, तथा
पेड़ों की छाया का प्राचुर्य हो । साथ-ही-साथ शत्रुजनों का भी पूरा ध्यान रखते हुए आगे
बढ़ना ।' नल उनकी आज्ञा का पालन करने के लिए चल पड़ा । सुग्रीव ने सभी वानरों
को युद्ध-यात्रा पर चलने की आज्ञा दी ।
३. कपि-सेनाओं की युद्ध-यात्रा
तब वानर-सेना जहाँ-तहाँ की गुफाओं से बड़े उत्साह के साथ चली । उनके पदाघातों
की घोर ध्वनि से सब गुफाएँ गूंजने लगीं । उनके घोर हुंकार, तथा विकट अट्टहास के निनाद
आकाश तक व्याप्त हो गये । कुछ वानर भयंकर गर्जन करते हुए, अपनी शक्ति के गर्व में
झूमते हुए जा रहे थे । कुछ पके हुए फल-वृक्षों को ही अपने कंधों पर रखे हुए उनके फलों
को चबाते हुए जा रहे थे । कुछ वानर राम के समक्ष खड़े होकर कह रहे थे कि—'हे
राज भूपाल, हम अवश्य युद्ध में राक्षस-समूह के साथ रावण का वध करेंगे ।' इस प्रकार,
सभी वानरवीर अत्यधिक उत्साह से उछलते, हर्ष-निनाद करते, अपनी पूँछों को हिलाते,
पर्वत-शिखरों पर चढ़कर अपनी इच्छा से भयंकर गर्जन करने लगे । उस ध्वनि से आकाश
गूँजने लगा; पृथ्वी डोलने लगी, पहाड़ काँपने लगे, अष्ट दिग्गज धँस-से गये, आदिशेष
अत्यधिक भार का अनुभव करने लगा, कच्छप ने अपना सिर झुका लिया । उस विशाल
सेना के चलने से जो धूलि उठी वह कई रंगों से आकाश में व्याप्त होकर ऐसी दीखने
लगी, मानों उस ध्वनि के आधिक्य के कारण पृथ्वी से निःश्वास का धुआँ इस रूप में निकल
रहा हो ।
वानरों की उस विशाल सेना के अग्र भाग में नील के नेतृत्व में चलनेवाली सेना
(गरुड़ के) भयंकर मुख के समान थी दोनों पार्श्व भागों में चलनेवाली सेनाएँ दो पक्षों
की भाँति थीं; मध्य भाग में आनेवाले रामचंद्र आत्मा के समान थे; पीछे बड़े आटोप के
साथ आनेवाली सेना पूँछ की तरह प्रकट होती थी । इस तरह वह विशाल सेना ऐसी
दीख रही थी, मानो नागपाश से पीड़ित होनेवाले सूर्यवंशी राजकुमारों के संकट दूर करने
के निमित्त, गरुड़ पृथ्वी पर चल रहा हो । प्रजंघ, केशरी तथा दविमुख आदि वानर-वीर
भीड़ को हटाकर मार्ग बनाते हुए जा रहे थे । उनके पीछे अत्यधिक हर्षोल्लास से भरे
हुए हृदयों से गवय, तार, गंधमादन, हनुमान्, अंगद, शरभ, नल, जांबवान्, हर, मैन्द आदि
वानर जा रहे थे । उनके पीछे रामचंद्र, अनुज लक्ष्मण के साथ चल रहे थे । इस प्रकार,
सह्याद्रि पर पहुँचकर वही उन्होंने पड़ाव डाला । सुग्रीव ने वहाँ के विशाल वनों में,
तड़ागों के किनारे, तथा वृक्षों की छाया में सेना को ठहरने का आदेश दिया ।
दूसरे दिन पूर्ववत् सेना को रवाना करके लक्ष्मण स्वयं भी अपने प्रभु राम के साथ
चले । वानरों के चलने से धरती हिलने लगी । उस सेना-समुद्र में वीर रस का उफान-सा
उठ रहा था, उनकी शक्ति चारों ओर व्याप्त हो रही थी; (सैनिकों की) शरीर-
कांति की तरंगें उठ रही थीं; हर्ष-ध्वनियों का घोष आकाश का स्पर्श कर रहा था,
युद्धकांड २५३
मनुवंशचन्द्र, (रामचन्द्र) के सान्निध्य से वह सेना-समुद्र उद्वेलित हो रहा था । इस प्रकार
वह वानर-सेना-समुद्र (दक्षिण के) महासागर के गर्व को चूर करने के लिए निकल पडा।
(उस सेना-समुद्र के बीच में) धीर राम-लक्ष्मण आकाश के मध्य भाग में प्रकाशमान होने-
वाले सूर्य तथा चन्द्र की भाँति सुशोभित थे । जब नदियो में उतरकर सेना चलने लगी, तब
नदी का पानी उमडने लगा । जब वह सेना सह्याद्रि पर्वत तथा मलय पर्वत के मध्य भाग
से होकर जाने लगी, तब मद पवन के चलने से वृक्षो की शाखाएँ आपस में रगड खाकर
उन वानरो पर पुष्प बरसाने लगी । यह उचित ही तो था । वन-लक्ष्मी प्रभु राम के
आगमन से हर्षित होकर पुष्पाञ्जलि दिये बिना कैसे रह सकती थी ?
वानर-वीर उस पर्वत-प्रदेश में स्थित सरोवरों में उतरकर उनका निर्मल जल
पानकर सतुष्ट होते । उन सरोवरों में पाये जानेवाले कमल-समूहो को वे अपने कर-कमल-
युग्मो से इस प्रकार तोडते, मानो कह रहे हो कि हे कमलाकर, (सरोवर) जैसे कमलो का
शत्रु (चद्रमा) क्रोध में कमलो को जैसे तोड डालेगा, वैसे ही हमारे कमलाप्त-कुल-तिलक
(सूर्यवशतिलक) दशकठ के वदन-कमलो को भी तोड देगा । वे इस प्रकार कुमुदो*
को कुचल डालते थे, मानो कह रहे हो कि हम दुष्ट-शत्रु की स्त्रयो को दुख* देकर, जानकी
के दुखो* को भी इसी प्रकार* कुचल डालेंगे । सरोवरों के गर्भ से दीर्घ मृनालो को वे इस
प्रकार उखाडते थे, मानो कह रहे हो कि हम राक्षसो के उदरस्थ आँतो को इसी प्रकार
चीरकर बाहर निकालेंगे । इस प्रकार के विनोदो में मग्न होते हुए सभी वानर सरोवरों
के किनारे लाँघकर जाते और फिर पहाडो पर चढकर वहाँ प्राप्त होनेवाला मधु छककर
खाते और फिर जल पीकर बडे उत्साह के साथ आगे बढते जाते थे ।
४ महेन्द्र पर्वत से राम का समुद्र का देखना
तब रामचन्द्र ने महेन्द्र पर्वत पर चढकर वहाँ से अनतिदूर पर दीखनेवाले समुद्र
का अवलोकन किया । वह समुद्र विविध क्रूर प्राणियो को अपने गर्भ में एकत्र किये हुए
बडा प्रचड रूप धारण करके ऐसा कहते हुए-से दिखाई दे रहा था कि जो रावण दीर्घ-
काय मगर-रूपी हाथियो के झुडो से, उत्तुग तरग-रूपी घोडो से, कछुए तथा केंकडे-रूपी
रथ-समूह से, असख्य मत्स्य-रूपी सैनिको मे, सर्पों के फन-रूपी पताकाओ से, उनकी सुदर
तथा चटुल पूँछ-रूपी खड्गोसे, मीनावली-रूपी चामरो से, ऊपर तैरनेवाले झाग-रूपी छत्रो से,
घनघोष-रूपी भेरी-निनाद से तथा जल-रूपी वीर रस से, मेरी शरण में आया हुआ है,
उसका वध में कैसे करने दूँ गा ?
ऐसे विशाल समुद्र को देखकर राघव आश्चर्यचकित हुए और निदान उस समुद्र
के निकट पहुँचे । समुद्र के किनारे समस्त सेना को एकत्र करने लायक चन्द्रकात शिलाओ
से पूर्ण एक विशाल प्रदेश में रामचन्द्र इस प्रकार बैठ गये, मानो वे अपने शर-रूपी वसी
से समुद्र के आश्रय में विचरनेवाले रावण-रूपी मोटे पाठीन (मछली विशेष) को पकड़ने
के लिए बैठे हो । तब वे अपने पास ही बैठे हुए सूर्यपुत्र सुग्रीव को देखकर बोले-
- इन सभी शब्दो के लिए तेलुगु में एक ही शब्द (तोग) का उपयोग होता है ।
कवि ने यहाँ इस शब्द का प्रयोग करके यमक अलकार सिद्ध किया है । —लेखक
'हे सुग्रीव, हम तो समुद्र के किनारे पहुँच ही गये । अब कहाँ से और कैसे इस समुद्र को पार
किया जाय, इसका उपाय तुम सोचो । पहले एक सुंदर स्थान में इस वानर-सेना को ठहरने
की आज्ञा दो ।' सुग्रीव ने इस कार्य के लिए नील को नियुक्त किया । नील ने शीघ्र ही
सारी सेना को एक सुन्दर स्थान में ठहराने का प्रबंध किया । वानरों के, शिविरों में आने तथा
वहाँ उनके ठहरते समय जो तुमुल शब्द हो रहा था, वह सूर्यमंडल तक व्याप्त होकर
ऐसा लगता था, मानो वह समुद्र को डाँट रहा हो कि ऐ समुद्र, मैं स्वयं तो वनचरों
(वानर) से उत्पन्न हूँ, भला मैं तुम्हारे वनचरों से (जल-चर) उत्पन्न घोष को कैसे सहन
कर सकता हूँ और वह समुद्र के घोष को दबा देता था । सारी वानर-सेना, तीन सैनिक-
शिविरों में, समुद्र-तट पर स्थित वनों में ठहर गई ।
तब रामचंद्र ने लक्ष्मण से एकांत में कहा—'हे सौमित्र, इस समुद्र की विशालता
तो देखो, इसके अंत का पता कोई कैसे पा सकेगा ? इसी प्रकार दुःख-समुद्र का भी अंत
नहीं होगा ।'
५. संध्या-वर्णन
इस प्रकार कहते हुए प्रभु रामचंद्र जब दुःख-समुद्र में डूब गये, तब सूर्य भी पश्चिम
समुद्र में ऐसा डूब गया, मानो उसने ऐसा विचार किया हो कि रामचंद्र का जीवन ही
मेरा जीवन है । सूर्यास्त होते ही समस्त लोक मणिहीन मंजूषा की भाँति कांतिहीन
हो गये । संध्या-राग चारों ओर इस प्रकार व्याप्त हो गया, मानो मनसिज के बाणों की अग्नि
से तप्त मनवाले राम का शीतोपचार करने के निमित्त पश्चिम समुद्र राग-रंजित वस्त्र
लेकर आया हो । कमल-दलों का यौवन ढल जाने से, कमल अपने शेष सौंदर्य को लिये
हुए मुकुलित हो गये, मानो यह बता रहे हों कि राम के प्रताप के आगे इंद्र के शत्रु
रावण का मुँह भी ऐसा ही कुम्हला जायगा । चारों ओर अंधकार ऐसा व्याप्त होने लगा,
मानो राम का शीतोपचार करने के लिए दिग्बधुएँ ललित तमाल-पल्लव-राशियों को उछाल
रही हों । जहाँ-तहाँ कुमुद ऐसे विकसित हुए, मानो वे यह सोचकर हँस रहे हों कि सूर्यवंश-
तिलक राम की वधू को बंदी बनाकर हर्षित होनेवाले दनुजेंद्र का हर्ष भंग हो जायगा ।
सारा आकाश इस प्रकार नक्षत्र समूह से अलंकृत था, मानो वह इस बात की सूचना दे
रहा हो कि रामचंद्र के पैने शरों से मारा समुद्र सूख जायगा और उसके गर्भ में स्थित
रत्न-राशियाँ इस प्रकार दिखाई पड़ेंगी । आकाश के सारे नक्षत्र समुद्र के जल में इस प्रकार
प्रतिबिंबित हो रहे थे, मानो रामचंद्र के विरह-ताप का शमन करने के लिए निशासुंदरी ने
सुगंधित मल्लिका-पुष्पों की शय्या का प्रबंध कर दिया हो । चक्रवाक एक दूसरे से अलग होकर
शीघ्र गति से चारों दिशाओं में चले गये, जिससे सब दिशाओं में इस बात की घोषणा
करें कि श्रीरामचंद्र विरह-व्यथा से पीड़ित हो रहे हैं, यदि हम भी विरह में पीड़ित हों,
तो क्या, आश्चर्य है । चन्द्र अपनी किरणों को आकाश में व्याप्त करते हुए ऐसा उदित
होने लगा, मानो वह श्रीराम की निंदा यों कर रहा हो कि हे राजन्, मैं राजा (नक्षत्रों
का) होकर समुद्र को प्रसन्नता से प्रफुल्ल कर देता हूँ और आप राजा होकर उसको सुखा देना
चाहते हैं । आप पूर्णकला से समन्वित हैं, क्या आपके लिए यह उचित है ? यदि आप
युद्धकांड २७५
ऐसा करेंगे, तो आपको भी (मेरे समान) कलंक लग जायगा । चन्द्रिका समस्त दिशाओ
में ऐसे व्याप्त हो गई, मानो चन्द्र विकट अट्टहास कर रहा हो कि हे राजा राम, जिस
शिव ने मुझे अपने सिर पर धारण करके मेरा सम्मान किया है, ऐसे शिवजी के धनुष
को तोडने के कारण ही आपको विरह-दुख हुआ है। उज्ज्वल चाँदनी चारो दिशाओ में
ऐसे व्याप्त हो गई, मानो चन्द्रमा ने समुद्र के फेन-रूपी चदन को अपनी किरणो के द्वारा
लहरो से आकृष्ट करके, दिग्वधुओ के शरीर पर मल दिया हो । तब चकोर-चकोरी
अत्यधिक आनद से एक दूसरे का आलिंगन करते बार-बार अपनी चोचो को पसारकर
छककर चंद्रिका-रस का पान करते, बडे अनुराग से अपनी प्रियाओ को पिलाते, उनके पीने
पर स्वय पीते और इसी प्रकार बडे मोद-मग्न हो चन्द्रिका में खेलते-कूदते । इस प्रकार,
जब वे अपनी प्रियाओ से अलग होते, फिर उनको ढूँढकर उनके साथ बडे आनंद से रहने
लगते थे । इन पक्षियो को देखकर वियोग-दुःख से पीडित राम, सीताजी का स्मरण करके
मन-ही-मन अत्यधिक व्यथा का अनुभव करने लगते ।
अपने अग्रज को इस प्रकार सतप्त होते देख लक्ष्मण उन्हें शांति पहुँचाने
के उद्देश्य से बोले--'हे देव, आप अनुपम वीर हैं, उदात्त चित्तवाले हैं । आप इसके लिए क्यो
दुखी हैं । अभी हम समुद्र को पार करके लका पहुँचेंगे, युद्ध में दशकंठ का सहार करेंगे,
और मिथिलेश की प्रिय पुत्री, कमलवदनी सीता को मुक्त करेंगे । आप खिन्न न होइए ।'
अनुज के इन नम्र वचनो को सुनकर राम प्रसन्नचित्त हुए ।
सैनिक-शिविरो में, वानर उस आनंदप्रद चाँदनी में मुदित मन से रामचन्द्र के गुणो
का गान करते, खेलते तथा कूदते रहे । कुछ लोग समुद्र के किनारे बडे आह्लाद से विचरण
कर रहे थे । कुछ लोग विष्णु के सभी अवतारो की कथाएँ दूसरो को सुना रहे थे, तो कुछ
वानर पिघलनेवाली उन चन्द्रकांत शिलाओ पर बडे आनंद से सोने का यत्न कर रहे थे ।
इस प्रकार, वे बडी देर तक विविध क्रीडाओ में मग्न रहे ।
शीघ्र ही पूर्व दिशा में अरुणिमा का ऐसा आभास हुआ, मानो वडवानल ही इस
भय से कपित होते हुए कि, जब राघव समुद्र पर अपने पैने बाणो का प्रयोग करेंगे, तब
उनका लक्ष्य बन जाऊँगा, उदयाचल पर चढ गया हो । सभी नक्षत्र इस भय से व्याकुल
हो छिपने लगे कि समुद्र का दहन करने के लिए राम के बाणो से उत्पन्न अग्नि की शिखाएँ
कही आकाश तक न व्याप्त हो जायें । धीरे-धीरे सूर्य का उदय होने लगा, मानो वे अपने
पौत्र (राम) को सचेत करने के लिए आ रहे हो कि हे राघव, अभी विलंब क्यो करते हो,
समुद्र को पार करके शीघ्र ही रावण का सहार करो । सभी कमल एक साथ ऐसे
विकसित हुए, मानो कमलाप्त-वशज (सूर्यवंशी) राघव का विजय-कमल, साम्राज्य-कमल, तथा
कीर्ति-कमल एक साथ ही विकसित हो रहे हो । तब दाशरथि जगकर प्रात कालीन मध्या-
वदन आदि नित्यकर्मो से निवृत्त हुए ।
६ मंत्रियों के साथ रावण की मंत्रणा
लका में रावण ने अपने मंत्रियो की सभा बुलाई और उनसे कहा--"हे मंत्रिवरों,
तुम जानते ही हो कि एक वानर ने, एक यत्र-सचालित चित्रो की भाँति, मेरे नगर में