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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

वहाँ से चौदह योजन से अधिक की दूरी पर स्थित मेरु पर्वत पर ढूँढना । उस मेरु पर्वत
के चारो ओर चक्कर काटनेवाले सूर्य के चरणों में वन्दना करना और उसी प्रकार वाल-
खिल्य आदि को भी प्रणाम करना। उसके पश्चात् उदयाद्रि में भी सीताजी का अन्वेषण करके
रावण के निवास-का पता लगाकर हमें समाचार देना । (उदयाद्रि के) उस पार की भूमि
पर रवि का प्रकाश न पडने के कारण, वहाँ सदा अधकार व्याप्त रहता है । अत मैं
वहाँ के प्रदेशो के सवध में नही जानता । तुम तुरन्त यहाँ से प्रस्थान करो और एक मास
के भीतर वापस लौट आओ । ऐसा न करने से तुम्हें अपमानित होना पडेगा ।'
तब विनत ने वालि के भाई सूर्य-पुत्र को अत्यन्त विनम्र होकर प्रणाम किया
और एक लाख वानरो को साथ लेकर पूर्व की दिशा में प्रस्थान कर गया । इसके पश्चात्
सूर्य-पुत्र ने सुशीर, नील, हनुमान्, अगद, जाववान्, गज, गधमादन, गवाक्ष, विजय, मैन्द,
द्विविद और तार आदि वानरो को बुलाकर कहा—'अब तुम योग्य वानरो को साथ लेकर
शीघ्र दक्षिण दिशा में चल पडो । विंध्याचल से प्रारभ करके तुम नर्मदा तथा दशार्ण
नगर में ढूंढना । फिर दण्डकवन में अवश्य उनकी खोज करना । वहाँ से चलकर गोदावरी
के तट पर ढूंढना, फिर वेत्रवती के निकट देखना । तदनतर तुम कलिंग तथा निष्ध देशो
में अन्वेषण करना । फिर कर्णाटक, आध्र, चोल, चेर, केरल, तथा पाण्ड्य देशो में ढूंढना ।
तत्पश्चात् मलय-पर्वत तथा कावेरी के किनारे देखना, फिर अगस्त्य के आश्रम में जाना
और उस महात्मा की आज्ञा प्राप्त करके ताम्रपर्णी नदी को पार करना । उसके बाद
समुद्र के तट पर स्थित वनो में ढूंढना, और फिर स्वर्णपुरी में उनकी खोज करना । वहाँ
से बडी तत्परता से महेन्द्र पर्वत पर जाकर देखना, उसके उस पार रहनेवाले विप्रमाद्रि
में ढूंढना, फिर पुष्पाद्री में देखना और क्रैव कुजर नामक पहाड पर अन्वेषण करना । वहाँ
विश्वकर्मा द्वारा निर्मित अगस्त्य का आश्रम है । वहाँ भी सीता को ढूंढना । उसके पश्चात्
अजना नदी को पार करना । अजना नदी के उस पार भोगवती नामक नगर है, जो मणियो
से पूर्ण तथा फणियो से रक्षित है । तुम अवश्य उस नगर में प्रवेश करके वहाँ सीता का
अन्वेषण करना । वहाँ से चलकर तुम वृषभाद्रि पर जाना । उस पर्वत पर गधर्व, अप्सराएँ
तथा सुर रहते हैं । वहाँ भी तुम सीताजी को ढूंढना और विना विचलित हुए वैंतरणी
पार करके वैवस्वत नगर में चले जाना । वहाँ यम की अनुमति प्राप्त करके समस्त पितृ-
लोक में सीताजी की खोज करना और उनका समाचार जानकर एक महीने के भीतर
अवश्य लौट आना । वैवस्वत नगर के उस पार का प्रदेश अधकारावृत हैं । वहाँ देवता
भी नही जा सकते ।

१५. हनुमान् को मुद्रिका देना
तब वे सब कपिश्रेष्ठ, आनद के समुद्र में गोते लगाते हुए, सूर्य के तेज से भी
अधिक दीप्तिमान् राम-भूपति को अपनी शक्ति का परिचय देते हुए कहने लगे—“हे राजन्,
किसी भी प्रकार से क्यो न हो, हम जानकी का पता लगाये विना वापस नही लौटेंगे ।
तब राम, भावी कार्यों का निश्चय करते हुए बडी कृपापूर्ण दृष्टि मे हनुमान् की ओर
देखकर तथा उन्हें अपने निकट बुलाकर कहा— हे पवनसुत, तुम मेरे निकट आओ । तुम

२०० रंगनाथ रामायण
अवश्य ही जानकी को देख सकोगे । हे अनघ, तुम्हारे द्वारा कार्य की सिद्धि होगी । तुम
कार्य करने की शक्ति रखते हो । तुम्हारा बाहुबल भी वैसा है । यह मेरी मुद्रिका लो ।
इसे सीता को देना और उस रमणी के चित्त का दुःख दूर करना । सीता से हमारे कुशल-
समाचार कहना और उसका कुशल सुनाने के लिए तुम शीघ्र यहाँ लौट आना ।' इस
प्रकार कहकर राम ने अगूठी हनुमान् को दी, तो उसने उसे अपने सिर पर इस प्रकार रख
लिया, मानो उदयाचल ने अपने शिखर पर सूर्य को धारण कर लिया हो ।
तब हनुमान् अत्यधिक हर्ष से उछल पड़ा और हाथ जोड़कर बोला—'हे सूर्य-कुल
के अधीश्वर, चाहे जितनी भी दूर जाना पड़े, मैं अवश्य जाकर सीताजी का पता लगाकर
आऊँगा । आवश्यकता हुई तो सूर्य तथा चंद्र को भी रोककर पृथ्वी, समुद्र तथा आकाश में
भी प्रवेश करके सीता की खोज करूँगा । रावण के निवास में इस प्रकार प्रविष्ट होऊँगा
कि मेरी अनुपम शक्ति की सब लोग प्रशंसा करेंगे । अब मैं जाता हूँ ।' ऐसा कहकर
वायु-पुत्र ने अंगद आदि के साथ दक्षिण की ओर प्रस्थान किया ।
उसके पश्चात् वानरेश्वर ने सुषेण से कहा—'तुम एक लाख वानरों को साथ लेकर
सौराष्ट्र में जाकर वहाँ सीताजी का अन्वेषण करो । वहाँ से निकलकर धैर्य के साथ बाह्लीक
देश में प्रवेश करो और वहाँ ढूँढ़ने के पश्चात् श्रीसपन्न सिंधु, सौवीर, तथा कैकय देश में
जाकर देखो । तत्पश्चात् अच्छी तरह पुन्नाग वन में ढूँढो और पश्चिमी सागर में ढूँढो ।
तदनंतर ललित नारिकेल वनों में देखो और बिना क्लान्त हुए वज्राद्रि पर पहुँच जाओ ।
वहाँ से निकलकर पारियात्रक (पर्वत के) वन में पहुँचो और वहाँ रहनेवाले गंधर्वो का
परिचय प्राप्त करके सीताजी का अन्वेषण करो । उसके पश्चात् तुम उस चक्रवन्त पर्वत पर
चले जाओ, जहाँ विष्णु ने हयग्रीव तथा पंचजन्य नामक राक्षसो का वध करके शंख तथा
चक्र प्राप्त किये थे । वहाँ से तुम मेघाद्रि पर चले जाना और वहाँ पर स्थित साठ
कचनाद्रियों में सीताजी को ढूँढ़ना । फिर जिस स्थान पर सूर्य अस्त होता है, उस अस्ताद्रि में
जाकर सौवर्ण नामक पर्वत पर ढूँढो और फिर वरुण की राजधानी में देखो । तदनंतर वहाँ
पर रहनेवाले मेरु सावर्णि नामक मुनि के दर्शन करके एक महीने के अंदर सीताजी का
समाचार लेकर वापस आओ । उसके बाद की पृथ्वी सूर्य-रहित तथा सीमाहीन होने के
कारण, मैं उसके संबंध में कुछ नहीं जानता ।' इस आदेश को मानकर सुषेण पश्चिम की
ओर चल पड़ा ।
फिर सूर्य-पुत्र ने शतबली को बुलाकर कहा—"तुम एक लाख सैनिको को लेकर
पुलिंदो के देश में प्रवेश कर वहाँ सीताजी को ढूँढो । फिर शूरसेन प्रदेश में देखो और
वहाँ से समस्त भरत भूमि में ढूँढ़ते हुए यवनराजा के देशो में जाओ । वहाँ ढूढकर,
कांबोज तथा कोकण प्रदेशों को देखते हुए हेमत पर्वत पर चले जाओ । वहाँ के सोमाश्रमो
में ढूँढ़कर, श्रीसमन्वित कालाख्य शिखर पर पहुँच जाओ । वहाँ देखने के पश्चात् तुम सुदर्शन
नामक पर्वत पर ढूँढो और फिर कनकाद्रि पर पहुँच जाओ । वहाँ से कैलास पर्वत पर चले
जाओ और कौवेर वन में देखो । फिर कुवेर के नगर में तथा उसके सरोवर के तट पर
देखो । उसके पश्चात् कुवेर की आज्ञा प्राप्त करके क्रौंचाद्रि में जाकर सीतांजी का अन्वेषण करो ।

वहाँ से मैनाक पर्वत पर पहुँच जाओ और वहाँ वैखानस नामक सरोवर में ढूँढो ।
उस सरोवर के पार जो शैलोदया नामक नदी बहती है, उसे लाँघकर उत्तर कुरुभूमि
में अन्वेषण करो । उन प्रदेशों में गंधर्व तथा अप्सराएँ अपनी इच्छा से विचरण करती
रहती हैं । उन प्रदेशों में तुम सीताजी का अन्वेषण करो और वहाँ न ठहरकर उत्तर समुद्र
को पार करके सोमाद्रि पर पहुँच जायो । वहाँ ब्रह्मा तथा शिव अविचल समाधि में रहते हैं ।
तब तुम वहाँ से लौटकर एक महीने में समाचार ले आओ ।' इस आदेश के अनुसार शतवली
रामचन्द्र की आज्ञा लेकर उत्तर दिशा की ओर चल पड़ा ।
इसके पश्चात् रघुराम ने सूर्य-पुत्र को देखकर कहा—'हे सुग्रीव, तुमने इन सब
प्रदेशों को कब देखा ?' तब सुग्रीव ने कहा—'हे देव, जिस दिन में वालि से भयभीत
होकर भागा था और वालि मेरा पीछा करने लगा था, उस दिन मैंने पृथ्वी के चारों ओर
चक्कर काटकर इन सब प्रदेशों को देखा था ।'
इस प्रकार कुछ दिन व्यतीत हुए । राम की आज्ञा के अनुसार पूर्व तथा पश्चिम
दिशाओं में गये हुए वानर सीता का अन्वेषण करते हुए पृथ्वी के उस भाग तक गये, जहाँ
तक सूर्य की किरणें पहुँचती हैं और वहाँ से लौटकर राम से निवेदन किया कि हम कहीं
भी सीताजी का पता नहीं लगा सके । तब राम तथा सुग्रीव बड़ी उत्कण्ठा से प्रतीक्षा करते
हुए सोचते रहे कि न जाने अंगद आदि वानर-वीर क्या समाचार लायेंगे ।
अंगद आदि वानर-वीर एक दूसरे से स्पर्धा करते हुए बड़े हर्ष के साथ अपनी
शक्ति तथा प्रताप का प्रदर्शन करते हुए, सुग्रीव के आदेश का अक्षरश पालन करते हुए,
पहले विंध्याचल पर गये । वहाँ की गुफाओं तथा वनों में उन्होंने सीताजी को ढूँढा ।
वहाँ से वे दक्षिण की ओर चले । मार्ग में पड़नेवाली पुष्प-लता-समूहों में, पेड़ों में, नदियों में
पहाड़ों में, तथा नगरों में सीताजी को ढूँढ़ते हुए, वे आगे बढ़ते जाते थे । किन्तु कहीं
भी सीता का पता न लगने से वे बहुत चिंतित थे । वे उस वन में से होकर जाने लगे,
जो महामुनि कडु की शापाग्नि से निर्जन, छायाहीन तथा जल-रहित हो गया था । अपने
दस वर्ष की अवस्था के पुत्र की मृत्यु के तीव्र दुःख से अभिभूत होकर कडु मुनि ने अपने
शाप से उस वन को ऐसा बना दिया था ।
१६. महर्षि कंडु के आश्रम में
वानर अत्यंत क्लांत हो, पानी ढूँढ़ते हुए उस वन में फिर रहे थे । तब एक राक्षस ने
उनका मार्ग रोककर भयंकर गर्जन करके कहा—'मेरे हाथों मरे विना अब तुम कहाँ
जाओगे ? तब अंगद ने क्रुद्ध होकर उस पर ऐसा प्रहार किया कि वह राक्षस मुँह से
रक्त उगलते हुए पृथ्वी पर गिर पड़ा । तब सब वानर थककर एक महान् वृक्ष की छाया
में बैठ गये और प्यास से व्याकुल होते हुए सोचने लगे कि यहाँ जल कहाँ मिलेगा ?
वहाँ उन्होंने एक गुफा के द्वार से कुछ जल-पक्षियों को उड़ते हुए देखा और निश्चय किया
कि अवश्य वहाँ जल मिल सकता है । यो सोचकर उन्होंने उस गुफा में प्रवेश किया ।
गुफा में अंधकार व्याप्त रहने के कारण उन्हें मार्ग न दीखता था । फिर भी धैर्य के साथ,
एक दूसरे का आधार लेते हुए वे आगे बढ़ते गये । कुछ दूर जाने पर मार्ग का अंधकार
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२०२ रंगनाथ रामायण

दूर हो गया और वहाँ उन्होंने ससार-भर में अद्भुत तथा अनुपम नगर देखा । वे खडे
होकर उस नगर के स्वर्ण-गोपुरो, स्वर्ण-सौधो, स्वर्ण-अट्टालिकाओ, स्वर्ण-दुर्गो, स्वर्ण-वृक्षो
तथा स्वर्ण के पुष्प-लता-समूहो के देखकर आश्चर्यचकित हो गये । वे सोचने लगे—
'यह कितने आश्चर्य की बात है । ऐसे ऐश्वर्य से परिपूर्ण यह नगर जन-रहित क्यो है ?
यह नगर ऐसा क्यो बन गया ? उनकी समझ में नही आता था कि उस नगर से बाहर
कैसे निकला जाय । चिंता में पडे हुए वे कुछ देर तक वही भटकते रहे । एक दिन उन्होंने
उस नगर के मध्य में स्थित सब सौधो में श्रेष्ठ, एक गगनचुबी सीध को देखा । तुरत
सभी वानर उस सौध पर चढ गये और वहाँ मृगछाला पहनी हुई, तरुण इदु की काति
के समान दीप्त एक पुण्यात्मा स्त्री को तपस्या में निरत देखा । हनुमान् ने उसे प्रणाम
किया और अकलक मन से कहा—'हे साध्वी, तुम कौन हो ? अकेली यहाँ किस कारण
से तपस्या में लीन रहती हो ? यह पुण्य नगर किस महात्मा का है ? हमने तो
ऐसा अनोखा नगर कही भी नही देखा ।'
१७. स्वयंप्रभा का सत्कार
तब वह कोमलांगी, हनुमान् को देखकर अपना पूर्व वृत्तांत यो कहने लगी—'पूर्व-
काल में मय नामक राक्षस राजा ने ब्रह्मा की वडी तपस्या की और वास्तु-कला में अद्भुत
कुशलता प्राप्त की । तत्पश्चात् उसने यह नगर बनाया और हेमा नामक एक दिव्य रमणी
के साथ बहुत वर्ष तक अबाध गति से यहाँ जीवन व्यतीत करता रहा । अमरवल्लभ
(इन्द्र) वज्रायुध से उस राक्षस राजा का वध करके उसकी स्त्री को उठा ले गया । उसी
चंचल नेत्रवाली (देव-स्त्री) की मैं सखी हूँ । मेरे पति महान् आत्मा सौवर्णी है । मेरा
नाम स्वयंप्रभा है और उस देव-स्त्री की आज्ञा से तप में निरत होकर मैं यहाँ रहती हूँ।'
इतना कहकर उसने कंद-मूल-फल देकर सब वानरो का सत्कार किया, जल देकर उनकी
प्यास बुझाई और फिर पूछने लगी—'हे अनघ, तुम कौन हो और यहाँ क्यो आये हो ?
यहाँ पहुँचना देवताओ के लिए भी कठिन है । तुम लोग यहाँ किस प्रकार आये ?'
तब हनुमान् ने उस स्त्री से कहा—'हे साध्वी, अपने पिता की आज्ञा से जब राम
मुनि-वेश धारण कर दण्डक-वन में निवास करते थे, तब उनकी पत्नी कमलाक्षी सीता को
(रावण) चुरा ले गया । राम की आज्ञा से हम उनके (सीता के) अन्वेषण में निकले हैं ।
मार्ग में प्यास के कारण अत्यत क्लात हो हमने एक गुफा में प्रवेश किया और उस
गुफा के अधकार से विचलित न होकर हम आगे बढ़ते गये और सयोग से तुम्हारे इस
आश्रम में आ पहुँचे । यहाँ से निकलकर जाने का मार्ग न जानकर विवश हो हम कई
दिनो से यही भटक रहे है ।'
तब उसने वडी भक्ति से उन्हें देखकर कहा—'तुम लोग राम के कार्य के लिए
आये हो । तुम पुण्यात्मा हो । तुम लोग जो चाहो, सो मुझ से माँगो ।' तब उन्होने कहा-
'तुम हमें यहाँ से बाहर जाने का मार्ग बताओ । हम शीघ्र यहाँ से सीता के अन्वेषण में
जाना चाहते हैं ।' तब उस स्त्री ने अत्यत आनंद से कहा—'तुम सब अपनी आँखें बद
कर लो ।' उसके पश्चात् वह अपनी तपस्या की शक्ति से सहज ही एक क्षण-मात्र में उन्हें

गुफा के बाहर पहुँचा दिया और स्वयं फिर उस गुफा में चली गई । सभी वानर-पुगव
उस स्त्री की प्रशंसा करते हुए आगे बढ़े । वे श्रेष्ठ वीर-वानर, मार्ग में पड़नेवाले एक
विशाल सरोवर में जल पीकर फिर महेन्द्राद्रि पर पहुँचे ।

१८. वानरों की व्याकुलता

तब अंगद इस प्रकार दुख करने लगा—'सूर्य-पुत्र की दी हुई अवधि समाप्त
हो गई', किन्तु अबतक सूर्यवंशी (राम) की पत्नी का पता हम नहीं लगा सके । आज्ञा-
पालन को विशेष महत्त्व देनेवाले सुग्रीव, यह कहकर हमारा वध कर देंगे कि इन्होंने मेरी
आज्ञा का उल्लंघन किया । इसलिए कपिराज के दर्शनार्थ हमारा जाना उचित नहीं है ।
हम जिस गुफा से अभी बाहर आये, उसी में प्रवेश करके, वही सुख से रहेंगे । वहाँ का
मार्ग अष्ट-दिक्पालों के लिए भी अभेद्य है । वहाँ के वन विविध प्रकार के पके हुए फलों
से भरे हुए हैं । वहाँ कोई भी प्रवेश नहीं कर पायेगा ।' कुछ वानरों ने अंगद की बातों
का समर्थन किया ।
तब मारुति ने क्रुद्ध होकर कहा—'तुम बड़े बुद्धिमान् हो ! काका की आज्ञा से
बड़े वीर के समान राम का कार्य करने चले । अब चंचल-चित्त हो कपियों के साथ उस
गुफा में प्रवेश करने का जो प्रस्ताव तुम करते हो, क्या यह सूर्य-पुत्र की आज्ञा का
तिरस्कार नहीं हुआ ? मैं, नील, तार और नल—चारों इसके लिए किसी भी प्रकार
सहमत नहीं हो सकते । अन्य वानर भी अपने सगे-संबंधियों को छोड़कर तुम्हारी सेवा में
नहीं रह सकेंगे । इतना ही नहीं, पूर्वकाल में इन्द्र ने अपने वज्र के आघात से उस गुफा
का निर्माण किया था । लक्ष्मण के पास उनके वज्र की समता करनेवाले पैने अस्त्रों की
कमी नहीं है । क्या वे बात-की-बात में तुम्हें और तुम्हारे सैनिक-बल का सर्वनाश नहीं
कर देंगे ? इसलिए यह दुर्बुद्धि छोड़ दो । हम सूर्य-पुत्र की सेवा में पहुँचकर कहेंगे कि हम
सीता को नहीं देख सके । वे तुम्हें और हमें अवश्य ही क्षमा करेंगे । सौजन्य के कारण
मुझ पर, और तुम्हारी माता पर अनुरक्त होने के कारण तुम पर, वे क्रोध नहीं करेंगे ।
तुम उनके पुत्र हो, इसलिए वे तुमको ही राज्य देंगे ।'
तब वालि-पुत्र ने कहा—'मेरे काका पितृ-तुल्य वालि का वध कराके, उनकी स्त्री
के साथ विवाह करके, उपकार करनेवाले राम के कार्य को भूलकर, भोग-विलास में
निमग्न रहे । लक्ष्मण के क्रोध करने पर ही तो वे राम के पास आये । क्या, तुम उनका
नीच व्यवहार नहीं जानते ? ऐसे कृतघ्न तथा कामांध का विश्वास कैसे किया जाय ?
इतना ही क्यों ? श्रीराम का कार्य किये बिना वहाँ पहुँचकर उस रवि-पुत्र के हाथों मरने
की अपेक्षा यहीं मर जाना अच्छा है । अब प्रायोपवेश के लिए तत्पर हो जाओ ।'
ऐसा कहकर अंगद तथा अन्य कपि दर्भ-शय्या पर लेट गये । अपना प्रयत्न विफल
होने से वे मन-ही-मन दुःखी होने लगे । प्रायोपवेश करते रहने से तथा मानसिक पीड़ा
से परितप्त होते रहने से वे बहुत ही निर्बल हो गये । कभी वे उठकर बैठते, कभी लेट
जाते, कभी चारों दिशाओं में शून्य दृष्टियों से देखते, कभी अपने पुत्र तथा सगे-संबंधियों
का स्मरण करते और कहते—'हे भगवान्, आप इस प्रकार हमारे प्राण क्यों लेना चाहते हैं ?

फिर सभी वानर अलग-अलग समूहों में एकत्र होकर आपस में कहते—'हाय !
सूर्यकुलसंभव (राम) वन में आये ही क्यों ? अपनी पत्नी को राक्षसों के हाथ में खोया
ही क्यों ? उस राक्षस ने जटायु का वध ही क्यों किया ? राम ने उसको देखा ही क्यों?
उस जटायु ने सीता का समाचार उनसे कहा ही क्यों ? राम पंपा सरोवर के तट पर
आये ही क्यों ? वहाँ उन्होंने सुग्रीव से भेंट ही क्यों की ? सुग्रीव उनके मित्र ही क्यों
बने ? राजकुमार ने वालि का वध ही क्यों किया ? इतनी बड़ी कपि-सेना एकत्र ही
क्यों हुई ? सूर्य-पुत्र ने हमें यहाँ भेजा ही क्यों ? हमारी ऐसी दुर्गति ही क्यों हुई ?
हमारे प्राण व्यर्थ क्यों जायँ ? हाय, कैकेयी के वर ने सूर्यवंश के साथ ही हमारे वंश का
भी सर्वनाश कर दिया ।' इस प्रकार सभी वानर विलाप करने लगे ।

१९. संपाति से भेंट

तब एक विशालकाय, यौवन तथा पंखों से हीन एवं अत्यन्त वृद्ध संपाति नामक
पक्षिराज उस पहाड़ की गुफा से बाहर निकला और मृत्यु की इच्छा करते हुए धरती पर
पड़े हुए वानर-समूह को देखकर धीरे-धीरे उनके समीप आया । वह सोचने लगा कि
भगवान् ने बड़ी कृपा करके मुझे आहार भेजा है । उसे देखकर सभी चपल वानर अपने
निश्चय पर पश्चात्ताप करने लगे । तब अंगद ने हनुमान् से कहा—'यह पक्षी नहीं है ।
स्वयं यम् निर्दयी होकर हमारे प्राण लेने के लिए इस रूप में आया है । उस दिन जटायु ने,
राम की पत्नी को चुराकर ले जानेवाले रावण के साथ युद्ध करके उसके प्रखर खड्ग के
प्रहार से मृत्यु प्राप्त की और फलतः सहज ही स्वर्ग का लाभ कर लिया । अब राम के
कार्य के लिए आये हुए हम भी इस महाबली के हाथों में अपने प्राण खो दें, तो अच्छा ही
होगा ।' उनकी बातों को सुनते ही अरुण-पुत्र (संपाति) का कंठ शोक से गद्गद
हो गया । वह उन कपि-वीरों के निकट जाकर पूछने लगा—'हे वानरो, तुम कहाँ से आये हो ?
वह जटायु मेरा प्रिय अनुज है । हम दोनों अरुण के पुत्र हैं । वह पैने तथा भयंकर
नखोंवाला, गुफा के समान मुखवाला, दशरथ का मित्र, सन्त सुखी मृत्यु को कैसे प्राप्त
हुआ ?' तब वालि-पुत्र ने उसे सारा समाचार कह सुनाया । उस समाचार को सुनकर
संपाति अत्यधिक शोक से संतप्त हुआ । दुःखी होनेवाले उस पक्षी को वानरों ने उठाकर
समीप ही रहनेवाले समुद्र के पास पहुँचा दिया, तो उसने समुद्र में स्नान किया और
उसके पश्चात् बड़े दुःख से पीड़ित होते हुए अपनी पूर्व-कथा उन वानरों से कहने लगा ।
उसने कहा—'मैं और जटायु, हम दोनों किसी समय कैलास पर्वत पर एक साथ
रहते थे । अपने यौवन तथा शक्ति के गर्व से प्रेरित होकर एक दिन प्रभात के समय हम
दोनों साथ-साथ आकाश में उड़ते-उड़ते बहुत दूर चले गये । मध्याह्न के समय हम सूर्य-
मंडल के समीप पहुँचे । जटायु सूर्य की किरणों के लगने से जलने लगा । तब मैंने उसे
अपने पंखों के नीचे छिपा लिया । तब मेरे पक्ष भी जल गये । पंखों के जल जाने से,
अपनी सारी शक्ति खोकर, मैं इस आश्रम-भूमि में गिर पड़ा । पता नहीं, जटायु कहाँ चला गया ।
तुम लोगों से यह समाचार सुनकर भी मैं आज चुप बैठा हुआ हूँ । यदि पहले
की तरह मेरे पक्ष होते, तो मैं अपनी शक्ति से अपने भाई का प्रतिशोध लेता और राम

के पास पहुँचकर उनसे अपने पौरुष की प्रशंसा प्राप्त करता । लेकिन अब उन बातो से
क्या प्रयोजन है ?'
तब जाम्बवान् ने हनुमान् तथा अगद को अत्यत हर्षित करते हुए उस पक्षी से कहा-
'ऐसे शक्तिशाली जटायु के अग्रज तुम्हारा इस ससार में कौन सामना कर सकता है ?
कोई ऐसा स्थान नही होगा, जिसे तुमने नही देखा हो । तुम कृपया हमें बताओ कि रावण ने
रघुराम की पत्नी को कहाँ छिपा रखा है ?'
२०. सीता का पता बताना
सपाति का सदेह दूर हुआ । उसने कहा—'मेरा पुत्र सुपार्श्व, दुर्दम पराक्रमी तथा
महान् पितृभक्त है । पखो के जलने से असमर्थ हो यहाँ पर पड़े हुए मुझे वह प्रति दिन
बडी भक्ति के साथ भोजन लाकर दिया करता है । एक दिन की बात है कि वह बहुत
विलव से, बिना भोजन लाये ही यहाँ आया । जब मैने उससे विलब का कारण पूछा तब
उसने उत्तर दिया—'पिताजी, आपके लिए आहार प्राप्त करने के उद्देश्य से मै हेमेन्द्र गिरि
के समीप समुद्र-तट पर बैठा था। उसी समय काजल के पर्वत के सदृश एक राक्षस, सूर्य-प्रभा
के समान एक रमणी को साथ लिये हुए आया और मुझसे मीठी-मीठी बातें करने लगा ।
मेरे मार्ग देने पर वह शीघ्र वहाँ से चला गया । तब वहाँ रहनेवाले मुनि मुझे देखकर
हर्ष से कहने लगे कि आज तुम मृत्यु के मुख से बच गये । वह (काला पुरुष) यम रूपी
रावण था । श्रीराम की पत्नी को चुराकर वह लका को ले जा रहा था । इसी कारण
से मुझे यहाँ आने में विलब हुआ है । अब इसमें कोई सदेह नही है कि जानकी, वादलो
से घिरी हुई चद्रिका की तरह, राक्षस-रमणियो से परिवृत हो लका में रहती है । मेरी
दृष्टि इस पृथ्वी पर शत योजन तक देख सकती है । सभी पक्षियो की अपेक्षा मेरी दृष्टि
तथा गमन-शक्ति अधिक है ।'
सपाति ने आगे कहा—'जब मेरे दोनो पख जल गये और मै मृत्यु से बचकर,
मूर्च्छित होकर यहाँ गिर पडा, तब कई वर्ष तक प्यास से व्याकुल हो, कराहते हुए यहाँ
पडा रहा । एक दिन मेरे सौभाग्य से सकल जनो का ताप हरण करनेवाले, साक्षात् निशाकर
(चंद्रमा) के समान गुणवाले निशाकर (नामक मुनि) को मैने देखा । सूर्य-तेज से दग्ध
अपने पखो का वृत्तात मैने उनसे कहा । वे मुनि-शिरोमणि पहले से ही मुझे जानते थे ।
इसलिए दयार्द्र होकर बोले— आश्रितवत्सल, परात्पर विष्णु महाराज दशरथ के यहाँ जन्म
लेंगे । वह सूर्य-वश-तिलक वनवास के लिए भयकर वनो में आयेंगे, उनकी पत्नी को
रावण चुराकर ले जायगा । उस रमणी को अमृताशु (चन्द्र) अमृतान्न देंगे, जिससे वह
क्षुधा तथा तृषा से मुक्त होकर रहेगी । तब राम शीघ्र आकर इन्द्र-पुत्र (वालि) का
सहार करके सूर्य-पुत्र की रक्षा करेंगे और सीता के अन्वेषणार्थ वानरो को चारो दिशाओ
में भेजेंगे । जिस दिन तुम राम के उन भटो को यह वृत्तात सुनाओगे, उसी दिन तुम्हारे
पख तुम्हें मिल जायेंगे । उनके आदेशानुसार मैने तुम लोगो से यह वृत्तात सुनाया । लो,
देखो, मुझे अपने पख भी मिल गये ।' इतना कहकर वह एकदम उछलकर आकाश में
उड़ा और कहने लगा—'देखा मैने सीता को । लका के समीप एक वन में मैंने सीता को देखा ।

२०६ रंगनाथ रामायण
वह लो, यहाँ से शतयोजन की दूरी पर, लंका में, वह पवित्र साध्वी बैठी है । तुम
प्रायोपवेश छोड़ो । अब उठो । पौलस्त्यपति ( रावण ) की लंका में जाकर सीता के
दर्शन करो ।'
इतना कहकर वह वानरों को लंका का मार्ग बताकर बड़े हर्ष से महेन्द्र गिरि पर
चला गया । तब सभी वानर-वीर प्रसन्नचित्त हो, शीघ्र गति से महासागर के पास पहुँचे।
उस सागर की शब्दमयी तरंगें, प्रचण्ड वायु के आघात से, अत्यधिक उद्धत होकर विहार
कर रही थीं । उनमें उत्पन्न झाग दिगंतों तक फैल गया था और ऐसा लग रहा था,
मानो वह समुद्र का गडूष (कुल्ली) हो, उस समुद्र में भयंकर मगर अपनी पूँछ-रूपी
तलवारों से बड़े आवेश से लड़ रहे थे । ऐसे समुद्र के निकट पहुँचकर सभी वानर (मन-
ही-मन) अत्यंत व्याकुल हो, थोड़ी देर तक निश्चेष्ट बैठे रहे और चिन्ता करने लगे कि
इस समुद्र को कौन पार कर सकता है ? ऐसी शक्ति किसमें है ?'
२१. वानरों का अपनी शक्ति का परिचय देना
अंगद ने वह रात उस समुद्र-तट पर बिताई और दूसरे दिन अलग-अलग सभी
वानरों को संबोधित करके कहा—'यदि तुम वीर वानर अपने पौरुष को खोकर, सौ योजन
की जलराशि को पार करने के लिए इतना झिझकते हो, तो अपयश-रूपी विशाल समुद्र
को किस प्रकार पार कर सकोगे ? तुम सब अलग-अलग अपनी-अपनी शक्ति का परिचय
मुझे दो ।'
तब व्याकुल-चित्त सभी वानर सावधान हो गये और अपनी शक्ति का विचार कर
अपने-अपने बल का परिचय देने लगे । गज ने कहा—'मैं दस योजन लाँघ सकता हूँ ।'
गवाक्ष ने कहा—'मैं बीस योजन बिना किसी कठिनाई के लाँघ सकता हूँ ।' शरभ ने
कहा—'अपनी शक्ति के प्रताप से मैं चालीस योजन पार कर सकता हूँ ।' गंधमादन ने
अपना पराक्रम प्रकट करते हुए कहा—'मैं पचास योजन की दूरी लाँघ सकता हूँ ।' मैन्द ने
कहा—'मैं अपनी शक्ति को हानि पहुँचाये बिना साठ योजन पार कर सकता हूँ। द्विविद ने
कहा—'बिना विशेष प्रयत्न के मैं सत्तर योजन की दूरी लाँघकर जा सकता हूँ।' तार ने
अपनी शक्ति को प्रकट करते हुए कहा—'मैं अस्सी योजन लाँघ सकता हूँ ।'
इस प्रकार सभी वानर निःशंक होकर अपनी-अपनी शक्ति का सही-सही परिचय देने लगे ।
तब अत्यंत वृद्ध तथा समस्त संसार में पराक्रमी, भल्लूकनाथ (जाम्बवान्) ने कहा-
"यदि मैं अपने लड़कपन (या यौवन) की बात कहूँ, तो वह उपहास का विषय होगा,
फिर भी कहता हूँ, सुनो । पहले जब अमृत के लिए सुर तथा दानवों ने युद्ध किया था,
तब मैंने सुरों की सहायता की थी और बड़े प्रेम से उनका दिया हुआ अमृत पान किया था।
मैं सप्त समुद्रों को पार करने की क्षमता रखता हूँ । उदयाचल पर खड़े होकर
अपना दूसरा चरण अस्ताचल पर रख सकता हूँ। सभी लोकों में मेरी समता कर सकनेवाला
कोई नहीं है । जब त्रिविक्रम ने महाबली बलि महाराज का दर्प तोड़ा था, उस दिन मैंने समस्त
पृथ्वी की इक्कीस बार परिक्रमा की और त्रिविक्रम की प्रार्थना की । उस समय मेरी टाँग
टूट गई, मेरा दर्प तथा शक्ति नष्ट हो गई । ऊपर से वृद्धावस्था ने भी मुझे आ घेरा।

किष्किन्धाकांड २०७
अब मैं बहुत वृद्ध हो चला हूँ । मेरी अवस्था नब्बे वर्ष की है । अब मैं ऐसा कार्य करने
योग्य नही रहा । तब नील ने कहा—'मै नब्बे योजन की जलधि को पार कर सकता हूँ ।
मारुति अपनी शक्ति का परिचय दिये बिना चुपचाप बैठा रहा । तब अगद ने कहा—
'मै अत्यधिक प्रयत्न से शत योजन पार कर सकता हूँ, किन्तु कदाचित् लौटकर आ नही
सकता ।'
तब जाम्बवान् ने अगद से कहा—'हे अनघ, तुम हमारे नेता हो । तुम इम समुद्र
को पार भी कर सकते हो और लौट भी सकते हो । तुम सुग्रीव के समान इम वानर-
सेना के राजा हो । अत तुम्हारे लिए उचित यही है कि तुम हम से काम लो । इतनी
दीनता क्यो व्यक्त करते हो ? राम के कार्य में सतत तत्पर रहनेवाले, रवि-पुत्र के मत्री,
इस वानर-समूह के लिए प्राण-सम, पवन-कुमार के रहते, भला तुम्हारे लिए कौन-सा कार्य
असाध्य है ? तुम निश्चित रहो ।"
२२. समुद्र लाँघने के लिए हनुमान् को प्रेरित करना
इसके पश्चात् जाम्बवान् ने हनुमान् को बुलाकर बडे स्नेह से कहा—"हे पवन-सुत,
यह क्या उचित है कि अपना काम हम पर छोडकर स्वय चुपचाप बैठे रहो ? ललित
लावण्य-विलास से परिपूर्ण अप्सरा स्त्रियो में श्रेष्ठ 'पुञ्जिक-स्थल' नाम से विख्यात तुम्हारी
माता ने अग्निदेव के शाप से अजना के नाम से वानर-युवती होकर जन्म लिया और
इस पृथ्वी पर केसरी की पत्नी होकर रही । एक दिन जब वह वन में विचरण कर रही थी,
तब वायुदेव उस युवती के मद गमन, सुडौल जघा, भारी नितब, चन्द्र-मुख, सुदर अधर,
क्षीण कटि, उन्नत कुच और विशाल आँखें देखकर उस पर मोहित हो गया । मन्मथ के
बाणो से आहत होकर उसने अजना के वस्त्रो को उडा दिया और उसके समीप पहुँचकर
उसका आलिंगन किया । तब अजना ने क्रुद्ध होकर कहा—'किस दुर्मति ने मेरा शील
बिगाडने का यह साहस किया है ?' तब वायुदेव ने कहा—'हे सुदरी, क्रुद्ध मत होओ ।
मैं पवन हूँ । हे कमलाक्षी, मैने तुम्हारे साथ केवल हृदय-सगम किया है, जिससे तुम्हारा
शील खडित न हो । इससे तुम्हें ऐसा पुत्र उत्पन्न होगा, जो बल, तेज, विक्रम, पौरुष तथा
धैर्य से सपन्न होगा ।' इतना कहकर वायुदेव चले गये । उस नारी-रत्न ने वायुदेव की
विमल कृपा से अत्यन्त हर्ष से तुम्हें जन्म दिया । तुम इस पृथ्वी पर वायु के समान शक्ति-
शाली हो । यही नही, किसी भी आयुध से तुम्हारी मृत्यु नही हो सकती । सभी लोको में
तुम्हारी समता करनेवाला कोई नही है । मै तुम्हारी शक्ति से भली भाँति परिचित हूँ ।
अत, तुम समुद्र को पार करो, सीता के दर्शन करो और यत्नपूर्वक राम का कार्य सपन्न
करके, कपियो के, दशरथ-पुत्रो के तथा वानर-राजा के प्राणो की रक्षा करो । हे जगत्प्राण-
नदन, तुम इस प्रकार उत्तम लोको की गति प्राप्त करो ।"
तब हनुमान् ने कहा—"ऐसा ही हो । मैं तुम्हारी आज्ञा का पालन करूँगा ।
हे वानरो, आज तुम मेरी शक्ति देखो । मै समस्त लोक के हितार्थ समुद्र को पार करूँगा ।
भले ही देवता भी मुझे रोकें, मैं उन्हें भी जीत लूँगा । (आवश्यकता पडे तो) समस्त
लोको का नाश भी कर दूँगा । सब को आश्चर्यचकित करनेवाली अपनी शक्ति से

३०८ रंगनाथ रामायण
लंका में प्रविष्ट होऊँगा । अथक परिश्रम करके ढूँढूँगा और भूमि-सुता को देखकर ही वापस
आऊँगा । अथवा उस लंका को भी उखाड़कर यहाँ ले आऊँगा तथा सीता को अवश्य ही
राम के चरणों में पहुँचा दूँगा । नहीं तो सभी समुद्रों का मथन करूँगा, उद्धत गति से
अमराद्रि को नष्ट-भ्रष्ट करूँगा, पृथ्वी को चूर-चूर कर दूँगा, मृत्यु का भी संहार करूँगा,
समस्त द्वीपों को छान डालूँगा, देवेन्द्र को त्रास दूँगा, सभी दुष्ट राक्षसों का संहार करूँगा,
और समस्त संसार में अंधकार फैला दूँगा, किन्तु बिना कार्य सम्पन्न किये तुम्हारे निकट
नहीं आऊँगा ।'
२३. समुद्र पार करना—मैनाक से भेंट
इतना कहकर हनुमान् महेन्द्रगिरि पर चढ़ गया और त्रिविक्रम विष्णु के समान ऐसा
अद्वितीय शरीर धारण किया, मानो प्रलयकालीन काल सभी समुद्रों के साथ सारी सृष्टि
को निगलने के लिए प्रस्तुत हुआ हो । उसके पश्चात् उसने अंगद आदि वानरों की अनुमति ली ।
मन-ही-मन अपने पिता वायुदेव का स्मरण किया, श्रीराम के चरण-कमलों को अपने
हृदय में प्रतिष्ठित किया । दृढ़ता के साथ अपने पैरों को पहाड़ पर जमाया, कंठ ऊपर को
उठाया, देह को झुकाया और भौंहें उठाकर विशाल जल-राशि को चारों ओर से देखा ।
उसके उपरान्त उसने रावण की नगरी पर दृष्टि डाली, अपना लांगूल जोर से घुमाया,
दोनों कान खड़े किये, शिलाओं पर अपने हाथ टेके और आकाश की ओर बड़े वेग से
ऐसे उछला, जैसे पूर्वकाल में अमृत को छीनने के उद्देश्य से गरुड़ पृथ्वी से आकाश की ओर
उड़ा था । उस वेग के प्रभाव से पर्वत-शृंग चूर-चूर हो गये, मानो रावण ने अबतक
जो अत्यधिक महत्त्व और यश प्राप्त किया था, वे सब चूर-चूर हो गये हों । (उस पर्वत
पर के) वृक्ष उसके वेग के कारण उसके साथ ही आकाश की ओर उड़ चले और खंड-
खंड होकर उस सागर में ऐसे गिरे, मानो पवन-पुत्र ने स्वयं ही भावी सेतु का शकुनस्थापन
किया हो ।
उस समय उत्पन्न प्रचंड वायु के कारण बादल चारों ओर ऐसे भागे, मानो वे पवन-
पुत्र के लंका में आगमन की सूचना इंद्र आदि देवताओं को देने के लिए जा रहे हों !
समुद्र का सारा जल एक ओर हट गया और जल के भीतर पाताल-लोक ऐसा दीखने
लगा, मानो समुद्र हनुमान् को यह दिखा रहा हो कि रावण ने मेरे जल में जानकी को
नहीं छिपाया है । हनुमान् की स्वामिभक्ति, धैर्य, साहस, तेज, चातुर्य, और उदात्त शक्ति
को देखकर इन्द्रादि देवता उनकी प्रशंसा करने लगे ।
इस प्रकार जानेवाले हनुमान् को देखकर समुद्र मन-ही-मन सोचने लगा—'यह
पुण्यात्मा, जगत् के कल्याण के लिए बहुत दूर जा रहा है । उसका श्रम दूर करने के
निमित्त, मैं मैनाक को भेजूँगा ।' यों सोचकर उसने मैनाक को बुलाकर कहा—'अभी हनु-
मान् यहाँ आया है । उचित रीति से उसके अतिथि-सत्कार की व्यवस्था करो ।'
शोभा-समन्वित, स्वर्ण-शिखरों से विलसित, स्वर्ग-सम सुंदर वह मैनाक पर्वत तुरन्त
अपने विशाल पंखों को फैलाते हुए उड़ा और समुद्र के मध्य भाग से ऊपर आया और
हनुमान् के सामने आ पहुँचा । हनुमान् ने अपने सामने उस विशाल पर्वत को देखकर

सोचा—'यह दैत्यो की माया है । यह कदाचित् मेरे कार्य में विघ्न डालना चाहता है ।
पर कोई चिंता की बात नही है । मै अपनी शक्ति से इसका नाश करूँगा । यो सोचकर
हनुमान् ने वज्र के समान कठोर-अपने वक्ष.स्थल से उस पर्वत को धक्का दिया । तुरन्त
वह पर्वत, बवंडर में फँसे हुए सूखे पत्ते की तरह शक्तिहीन होकर चक्कर खाने लगा ।
फिर वह मनुष्य का रूप धारण करके हनुमान् से बोला--'हे अनिलकुमार, मै तुम्हारा
शत्रु नही हूँ । समुद्र की आज्ञा से मैं तुम्हारे पास आया हूँ । उस महानुभाव ने तुम्हें
आतिथ्य देने के निमित्त, मुझे तुम्हारे पास भेजा है । इसलिए मै तुम्हारे पास आया हूँ ।
प्राचीन काल में सभी पर्वतो के पख थे । अपने इन पखो के कारण जब वे गर्व करने लगे,
तब इन्द्र क्रोध में आकर वज्रायुध से सभी पर्वतो के पख एक-एक करके काटने लगा ।
तब यह देखकर तुम्हारे पिता पवन सहज ही मुझे इस लवण-समुद्र में ले आये ओर मेरे
पखो की तथा मेरी रक्षा की । इसलिए मैं तुम्हारा अपना ही व्यक्ति हूँ, पराया नही हूँ ।
मैं पर्वतश्रेष्ठ शीताचल का पुत्र हूँ । मेरा नाम मैनाक है । मेरे पेडो पर जो फल लगे है,
उनको ग्रहण करके, अपनी क्षुधा तथा क्लान्ति दूर करो । हे पवन-पुत्र, उसके पश्चात्
तुम लंकापुर को जा सकते हो ।' तब उस महाबली हनुमान् ने कहा--'अब विश्राम
करना उचित नही है । मैने प्रतिज्ञा की है कि मैं समुद्र के मध्य में कही नही ठहरूँगा ।
अत, हे पर्वतराज, मुझे यहाँ कही ठहरना नही चाहिए।' इस प्रकार कहकर उसने अपने
करतल से उस पर्वत की मूर्धा का स्पर्श किया और कहा—'हे अनघ, तुम्हारी पूजा फलवती
हुई । अब तुम जाओ ।'
इस प्रकार कहकर शीघ्र गति से जानेवाले अनिलकुमार की शक्ति को देखकर देवता
आश्चर्य तथा हर्ष से भर गये । देवेन्द्र ने भी मैनाक पर्वत को देखकर बड़े प्रेम से कहा--
'श्रीराम के कार्य के लिए जानेवाले हनुमान् के प्रति तुमने उचित व्यवहार किया । अत,
में तुम्हें अभय-दान देता हूँ । तुम सुख से यही रहो ।'
तब गंधर्व, अमर तथा मुनियो ने हनुमान् की शक्ति की परीक्षा लेने का विचार
करके सुरसा नामक नाग-माता को हनुमान् का मार्ग रोकने के लिए भेजा । तब वह एक
राक्षसी का रूप धारण करके हनुमान् के मार्ग में आ खडी हुई ओर बोली—'इस समुद्र
के ऊपर से होकर जानेवाले तुम्हें मैंने देखा, दैवयोग से अब मेरे प्राण बच गये, मैं बहुत
भूखी हूँ । अत, तुम अब मुझसे बचने की चेष्टा न करके, मेरे मुँह में प्रवेश करो।
तब हनुमान् ने कहा--हे नारी, तुम मेरा मार्ग मत रोको । मै राम का कार्य पूरा करके
लौटते समय तुम्हारी इच्छा पूरी करूँगा । अब मै जाता हूँ । मै असत्य वचन नही कहता।'
तब वह स्त्री क्रुद्ध होकर हनुमान् का मार्ग रोककर खड़ी हो गई और बोली, -
'में तुम्हें जाने नही दूँगी, मै अवश्य तुम्हारा वध करुँगी ।' यो कहती हुई उसने अपना
मुँह खोल दिया । तब अनिलकुमार ने अपना शरीर दस योजन तक बढ़ा लिया । तब
उस स्त्री ने अपना मुँह उसके दुगुना चौडा कर लिया । हनुमान् ने अपना शरीर तीस
योजन तक बढाया, तो उस स्त्री ने अपना मुँह चालीस योजन विशाल बना लिया। इस
प्रकार एक-दूसरे से स्पर्धा करते हुए क्रमशः अपने शरीर तथा मुँह को शत योजन तक
२७

२६० रंगनाथ रामायण
वढा दिया । तव हनुमान् ने वडी चतुरता से एक अगुष्ठ प्रमाण-मात्र का अपना शरीर
वनाकर, सूक्ष्म रूप से उस स्त्री के मुँह में प्रवेश करके सहज हीं इस प्रकार वाहर निकल
आया जैसे कोई ज्ञानी ससार के जटिल वधनो से अपने-आपको मुक्त करकें निकल आता है ।
उसके पश्चात् उसने उस स्त्री को देखकर कहा—'हे नारी, मैने तुम्हारी इच्छा पूरी
कर दी, अव मे समुद्र पार जाऊँगा ।' उस स्त्री ने भी उस कपिकुलोत्तम हनुमान् की
वुद्धि की प्रशसा करती हुई दिव्य रूप धारण करके वड़े स्नेह से आशीर्वाद दिया और कहा-
'शीघ्र ही तुम्हारा कार्य सिद्ध हो ।'
तव हनुमान् समझ गया कि यह छायांग्राहिणी है और बिना भय के तुरत सूक्ष्म
रूप धारण करके उसके उदर में प्रवेश किया । फिर उसने उसका उदर चीरकर उस दुष्ट
राक्षसी को समुद्र में फेंक दिया । इन्द्रादि देवता इसे देखकर अत्यत हर्षित हुए और पुष्प-
वृष्टि करने लगे । इस प्रकार हनुमान् सहज ही समुद्र पार करके सुवेल (त्रिकूट) पर्वत
पर पहुँच गया ।
इस प्रकार, आन्ध

श्रीरंगनाथ रामायण
(सुन्दरकांड)

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१. हनुमान् का लंका में प्रवेश
श्रीराम का कार्य सपन्न करने का निश्चय करके हनुमान् ने विशाल सागर को
ऐसा पार किया, मानो वह एक छोटी-सी नहर हो और उस सुवेल पर्वत पर चढ गया,
जो लकापुरी के 'निकट था । वह लकापुरी सुदर शृंगोसे, पहाडी तराइयो से, प्रचुर वृक्षो
तथा लता-समूहो से, कैरव, बधूक, कल्हार एव कुमुद आदि पुप्पो से, सारस आदि 'जलचर
पक्षियो से, विलास गति से विहरण करनेवाले हसो के कलरव से, क्रौंच पक्षियो के निनादो
सै तथा कमल का मकरद पान करने से मत्त होकर झकार करनेवाले भ्रमरो की पक्तियो
सं युक्त तडागो से परिपूर्ण था ।
उस पर्वत पर चढकर हनुमान् ने दक्षिण दिशा में दृष्टि दौडाई और लका नगरी
को देखा । वह नगरी त्रिकूटाद्रि पर सुशोभित थी, और धर्म, अर्थ तथा काम इन तीनो
को एकत्र किये बैठी लक्ष्मी के समान सुशोभित थी । अपनी उज्ज्वल कान्ति के कारण
वह ताराद्रि की समता करती थी और आकाश-मार्ग से स्पर्धा करती हुई दिखाई पडती थी ।
वह अपने रत्नो की कान्ति से सुशोभित होकर ऐसी दीखती थी, मानो देवताओ से
युक्त अमरावती ही समुद्र के मध्य में सुदर ढग से शोभायमान हो रही हो । अथवा सुदर

२१४ रंगनाथ रामायण
मकर, कच्छप तथा पद्मिनिधियो से युक्त अलकापुरी ही मानो कुबेर से रूठकर वहाँ आ
गई हो, या चिरकाल से समुद्र के नीचे रहने के कारण ऊबकर भोगवती नगरी ही समुद्र-
तल से ऊपर उठकर त्रिकूट पर्वत पर आ गई हो । उस नगरी का प्रभा-समन्वित स्वर्ण-
दुर्ग, समुद्र को ही अपनी परिखा बनाकर, ब्रह्माण्ड के समान सुशोभित था और ब्रह्मादि
देवताओ को भी अभेद्य दीखता था । वह लकापुरी दुर्वार गज, रथ, तुरग तथा भयकर
एव श्रेष्ठ वीरो से युक्त थी और अलौकिक ऐश्वर्य से सपन्न हो बहुत सुदर दीखती थी ।
ऐसी लका नगरी को देखकर हनुमान् आश्चर्य-चकित हो गया और निनिमेष नेत्रो से जहाँ-
तहाँ देखता ही रह गया । वह सोचने लगा--'अकेले समस्त लोको को जीतकर, अपने
पराक्रम से सभी लोको में अपनी श्रेष्ठता स्थापित करनेवाला दशकंधर ऐसे ऐश्वर्य से
सपन्न लका का राजा बना हुआ है । फिर भी, उसके भाग्य में जीवित रहना नही लिखा है ।
सर्वेश्वर रामचंद्र की पत्नी को ले आकर इस मूर्ख ने क्यो मृत्यु को आमंत्रित किया है ?'
इस प्रकार रावण की निंदा करते हुए वह शक्तिशाली हनुमान् लका में प्रवेश करने
का उपाय सोचने लगा । वह नगर के उत्तर द्वार पर पहुँचा और सारी परिस्थिति तथा
अपने कर्त्तव्य का विचार किया । उसके पश्चात् वह सोचने लगा--'भला, इस विशाल
सागर को वानर कैसे पार कर सकेंगे ? यदि पार भी करेंगे, तो इन्द्रादि देवताओ के लिए
भी दुर्भेद्य इस लका को जीतना क्या किसी भी रीति से उनके लिए सभव होगा ? युद्ध-
भूमि में भयकर साहसी रावण को राम कैसे जीत सकेंगे ?'
एक मुहूर्त्त काल तक इस प्रकार सोचने के पश्चात् हनुमान् ने मन-ही-मन विचार
किया--यदि मै अपने इस विशालकाय के साथ, दिन को ही इस नगर में प्रवेश करूँगा,
तो राक्षस भटो से मेरा सामना हो जायगा । उस प्रकार मै सीताजी का पता नही लगा
सकूँगा । अत मै सूक्ष्म रूप धारण करके इस नगर में प्रवेश करूँगा और दैत्यो की आँखो
में धूल झोंककर अवश्य ही सीताजी के दर्शन करूँगा । इस प्रकार मन में विचार करके
वह सूर्यास्त की प्रतीक्षा में वैठा रहा । निदान सूर्य-विव इस तरह तिरोहित होने लगा,
मानो सूर्य यह सोच रहा हो कि विशाल शक्तिशाली राम की पत्नी सीता देवी का पता
लगाने के लिए जो यह (हनुमान्) आया है, मेरे आकाश में रहते समय उसके लिए लका
में प्रवेश करना कठिन होगा । दिशाओ में घोर अधकार ऐसा व्याप्त हो गया, मानो अनिल-
पुत्र के आगमन से भयभीत हो राक्षस (रावण) के घोर पाप चारो ओर भाग रहे हो ।
क्रमश दैत्यो की कलकल ध्वनि मद पडने लगी । यह देखकर पवन-पुत्र ने सारी बातें
मन-ही-मन विचार करके एक बिल्ली के समान छोटा रूप धारण किया और फिर राघवो
का स्मरण करके लका में प्रवेश करने का उपक्रम करने लगे ।
२. लंकिणी का हनुमान् को रोकना
उस समय भयकर आकारवाली लकिणी हनुमान् के मार्ग को रोककर ऐसे खडी हो गई,
जैसे किमी निधि को बाहर लाते समय उस प्रयत्न में बाधा डालने के लिए कोई भूत उत्पन्न
होकर खड़ा हो जाता है । उसने अट्टहास करके पवनकुमार को डाँटते हुए कहा--'तुम कौन हो ?
तुम्हारा नाम क्या है ? इस नगरमें तुम क्यो प्रवेश कर रहे हो ? किसने तुम्हें यहाँ भेजा है ?'

तब हनुमान् अविचल खडा होकर बोला—'तुम कौन हो ? तुम्हारा नाम क्या है ?
तुम क्यो मेरे मार्ग को रोककर खडी हो ? पहले तुम अपना परिचय दो, तो फिर मै अपने
वारे में कहूँगा ।' तब वह बोली—'मै दशकठ की आज्ञा से, बडे यत्न से इस नगर की
रक्षा करती रहती हूँ । मेरा नाम लकिणी है । जब मैं पराये व्यक्तियो को देखती हूँ, तब
उन्हें नगर के भीतर प्रवेश करने नही देती और उन्हें तुरत मार डालती हूँ । तब हनुमान् ने
उस स्त्री से कहा—'हे नारी, मैं इस नगर को देखने के उद्देश्य से आया हूँ; मुझे जाने
दो ।' तब वह राक्षसी आँखो से क्रोध प्रकट करती हुई बोली—'अब तुम कहाँ जाओगे ?
अब तो तुम मेरे हाथ में पड गये हो । तुम्हें पकडकर तुम्हारे शरीर के टुकडे-टुकडे कर
दूँगी और तुम्हारा रक्त पी जाऊँगी ।' यो कहती हुई उसने बडे क्रोध से उस श्रेष्ठ
वानर के वक्ष पर एक घूँसा मारा । हनुमान् ने सोचा कि स्त्री का वध करना पाप है।
इसलिए उसने लकिणी के वक्ष पर ऐसा घूँसा जमाया कि वह अपनी सारी शक्ति खोकर
पृथ्वी पर गिर पड़ी और हनुमान् को देखकर क्षीण स्वर में प्रार्थना करने लगी—'हे कपि-
कुलोत्तम, मुझपर कृपा करो । जिस दिन इस नगर का निर्माण हुआ, उस दिन निपुण
ब्रह्मा ने कहा था कि जिस दिन एक वानर यहाँ आकर तुम्हें दुख पहुँचावेगा, उसी दिन
से राक्षसो का नाश प्रारभ हो जायगा । इसलिए मुझे विश्वास है कि तुम्हारी मनष्कामना
सफल होगी ।' इस प्रकार कहती हुई वह स्त्री चली गई । उस स्त्री की बातो से हनुमान्
अत्यत हर्षित हुआ और मन-ही-मन यह निश्चय करके कि अब राक्षसो का नाश निश्चित है,
पहली बार लका की धरती पर अपना वाम चरण प्रतिष्ठित किया ।
३ हनुमान् का लंका में सीता का अन्वेषण
फिर हनुमान् ने सूक्ष्म रूप धारण किया और किले की भित्तियो पर चढकर इस
प्रकार लका में प्रवेश किया कि किले के द्वार-रक्षक तथा सैनिक उनको देख न सके ।
फिर गुप्त रूप से मार्गों, बाजारो तथा चौपालो को देखते हुए वह आगे बढा । उसके
पश्चात् बडे-बडे गोपुरो पर चढा और गज-शालाओ से लेकर श्रेष्ठ सौधो के सभी स्थान देखे।
फिर उसने मदिरो में देखा, घर-घर में ढूँढा, तथा अत पुरो में ढूँढा, मडपो और मौघो में
देखा । फिर अश्वशालाओ, रथशालाओ तथा शस्त्रागारो में देखा और मणिमय भवनो में
सीता का अन्वेषण किया । तत्पश्चात् विभीषण, अतिकाय, देवातक और त्रिशिर के घरो
में, कुभकर्ण के विशाल भवन में, कुभ के घर में, निकुभ के निवास में, शोभा-समन्वित
इन्द्रजीत के अत पुर में, महोदर के भवन में और सभी दनुज-नायको के घरो में क्रमश
सीता की खोज की । दैत्यो के इन निवासो को देखकर हनुमान् आश्चर्य-चकित हो गया ।
फिर उसने सभी अत पुरो में सीता को ढूँढा, सभी स्त्री-जनो में देखा, और एक-एक करके
राक्षसो के सभी घर देख डाले । किसी-किसी स्थान पर एक आँख, एक कान, एक हाथ-
वाले विकृत रूपो को देखकर वह चकित रह गया । कही-कही उसने बहुत-से चरण,
अनेक भुजाओ तथा कई शिरोवाले राक्षसो को देखा । फिर वह जप-तप तथा
स्वाध्याय में तत्पर, सत्कर्मी तथा निष्ठावान् तपस्वीश्रेष्ठ दानवो को देखते हुए आगे
बढ़ गया ।

उसके पश्चात् हनुमान् रावण के अत पुर के निकट पहुँचा । वह (अत पुर) मकर-तोरणो
(मकर के आकार में बँधा हुआ वदनवार) पुष्प-मालिकाओ, विविध धूपो की सुगधि, रत्न
तथा मोतियों से पूरे गये चौको, चंद्रकांत-शिलाओ से निर्मित चबूतरों, स्वर्ण तथा-मणियो
से बनाये गये कपाटो, प्रशंसा के योग्य मडपो, प्रवाल के बने ऊँचे स्तभो, अनेक अट्टालिकाओ
तथा सौधो की पक्तियो से अलकृत था तथा सशस्त्र राक्षसो के द्वारा सतत रक्षित था।
उस अत पुर के पास पहुँचकर हनुमान् ने अत पुर के पहरेदारो के निकट जाकर देखा,
फिर कई द्वारो को निर्भय गति से पार करता हुआ आगे बढा और सभा-मडपो में सीता
को ढूँढा । वह रनिवास के निकट पहुँचा ही था कि इतने में, समुद्र में ज्वार उत्पन्न करते
हुए, कमल-समूह की काति को मलिन करके उन्हें मुकुलित करते हुए, मदमत्त चक्रवाल
पक्षियो को विरहाग्नि से पीडित करते हुए, मन्मथ के प्रताप को बढाते हुए, मुरझाई हुई
कमलिनियो के समूह को विकसित करते हुए, मुग्धा-जारिणियो के चित्तो में चंचलता उत्पन्न
करते हुए, घने अधकार के प्रताप को नष्ट करते हुए, चंद्रकांत-शिलाओ को गलाते हुए,
चकोर पक्षियो को प्रेम से अघाते हुए, प्रेमी-प्रेमिकाओ का मिलन सपन्न करते हुए, अपनी
संपूर्ण राका से दिशाओ को भी उज्ज्वल बनाते हुए, मन्मथ का ससुर, उत्तम शोभा की
सीमा, कुमुदिनियो का प्रेमी, नक्षत्रो के अधिपति चद्र का उदय आकाश में ऐसे हुआ, मानो
लकापुरी में सीताजी का अन्वेषण करनेवाले हनुमान की सहायता करने के हेतु देवताओ ने
मशाल जला दी हो ।
४ हनुमान् का रावण के अंतःपुर में प्रवेश करना
ऐसे चन्द्र को देखकर हनुमान् मन-ही-मन हर्षित हुआ और-सारे अत पुर में देखते
हुए जाने लगा । एक स्थान पर उसने कातिमान्, विश्वकर्मा से-रचित, अपनी इच्छा से
चलने की शक्ति रखनेवाला, विचित्र कला-कौशल से सपन्न सूर्य-चंद्र के समान प्रकाशमान
मणि-पुष्पक नामक विमान को देखा, जिसे देवलोक के शत्रु (रावण) ने युद्ध में, कुबेर को
पराजित करके छीन लिया था ।
उस विमान में पवन-पुत्र ने उन सुदरियो को देखा, जिन्होने रावण को सुख-के
समुद्र में उतराकर, मद्यपान तथा भोग-विलास के मधुर रसास्वादन के कारण शिथिल हो
सोई पडी थी । उनकी शरीर-रूपी लताएँ अलग हो पढी हुई थी; उनकी स्निग्ध जांघो
का सौंदर्य प्रकट दीख रहा था; उनकी नीवियो की गाँठे ढीली हो गई थी, उनके मुख
मुरझाये हुए थे, उनकी सुगधित साँसें चल रही थी, अधर एक विचित्र सुदरता के साथ
एक ओर झुके हुए थे और उनपर मद हास नृत्य कर रहा था, उनके अर्द्ध-निमीलित
नयन उनकी रति-क्रीड़ा की मुग्ध परवशता प्रकट कर रहे थे, उनके नूपुर निःशब्द होकर
उनके चरणो में लिपटे हुए थे, उनका चंदन-तिलक श्रम-जल से गल रहा था, उनकी
वेणियां खुली हुई थी, पुष्प-मालाएँ टूटी पडी थी, भ्रष्ठ मुक्ताओ की मालाएँ उनके दोनो
कठोर कुच-पर्वतो के बीच दबी हुई थी और उनके चित्त मदिरा-पान से मत्त थे । अपने
कटि-रूपी सैकत, केश-रूपी शैवाल, नाभि-रूपी सरोवर, भ्रू-रूपी तरगो, कुच-रूपी भँवर तथा
नयन-रूपी मीनो से युक्त वे सुंदरियाँ सुख-निद्रा में सोनेवाली नदियो के समान दीख रही थी ।

सुन्दरकाण्ड २९७
परस्त्रियो के शरीर के विविध अगो को देखने से पुण्यात्मा हनुमान् मन-ही-मन
अत्यत दुखी था । वह सोचने लगा कि स्वामी के कार्य में निरत रहने के कारण मुझे इस
प्रकार परस्त्रियो के शरीर के अगो को देखना पडा है। पाप-बुद्धि से मैने ऐसा नही किया हैं।
इन स्त्रियो के झुड में ही सीताजी को ढूँढना है, अन्य स्त्रियो में नही ।
इस प्रकार मन में सोचते हुए दबे पाँव वह आगे बढ़ा । वहाँ उसने एक विशाल
रत्न-वेदी पर पुष्प-शय्या पर सोनेवाले इन्द्र के भोग-विलास को भी मात करनेवाले, साध्य-
राग से युक्त जलद की भाँति चदन तथा अगराग से दीप्त शरीरवाले सुदर झरनो से युक्त
नीलाद्रि के समान मोतियो की मालाओ से सुशोभित देहवाले, पचशिरवाले भयकर सर्पो की भाँति
सुपोषित उँगलियो से युक्त भुजाओवाले, स्वच्छ चाँदनी के साथ रहनेवाले अधकार के समान
अपने शरीर को स्वच्छ चादर से ढककर सोनेवाले, अपने विशाल वक्ष पर ऐरावत के दाँतो के
आघातो को बडे साहस के साथ वहन करनेवाले, अपने दोनो पार्श्वों में रखे मणिमय दीपो
की शिखाओ को अपनी उसाँसो से हिलानेवाले, मुकुट तथा कुडलो की दीप्ति से सुशोभित रूपवाले
तथा सभी शत्रुओ का गर्व निचोडनेवाले रावण को देखा और अनुमान कर लिया कि यही
राक्षस राजा है । उसके पार्श्वों में गधर्व, देव तथा दैत्य कामिनियो को देखा । उनमें से
कुछ पानदान, कुछ पीकदान और कुछ अपने हाथो में पखे लिये हुई थी । कुछ कामिनियाँ
अपने कर-ककणो से शब्द करती हुई चामर डुलाने, कुछ मधुर-मधुर गीत गाने, कुछ
नृत्य करने, कुछ वीणा बजाने और कुछ मृदग बजाने के पश्चात् अब थककर अपने-अपने
उपकरणो से लिपटी हुई सोई पडी थी ।
उसके पश्चात् परम पावन हनुमान् ने रावण की शय्या पर सोई हुई, नव यौवनवती
देव-स्त्रियो के सदृश दीखनेवाली और गगन-मडल के मध्य रहनेवाली चन्द्रकला के समान
प्रकाशित होनेवाली, मदोदरी को देखा । हनुमान् ने मन-ही-मन निश्चय कर लिया कि
मैंने सीताजी को देख लिया और वह आनदविभोर हो उठा । उस आनद में कभी
उछलता, कभी कूदता, कभी वहाँ के स्तभो पर चढता और कभी अपने लांगूल का चुम्बन करता ।
इस प्रकार वह थोडी देर तक अपनी जाति-सहज विकृत चेष्टाएँ करता रहा । फिर वह
मन-ही-मन अपने विवेक को जाग्रत करके सोचने लगा, -'मनुकुलेश्वर की पत्नी, पति-
व्रताओ में शिरोमणि, परमपावनी, तथा महाराज जनक की पुत्री, भला, देवाधिदेव राम को
छोडकर, रावण के साथ रहने की इच्छा करेंगी ? कही आसवत हो मधुपान करेंगी ? हाय,
मेरी बुद्धि को ऐसा भ्रम क्यो हुआ ? कैसे भी विचार करूँ, यह चचलाक्षी अवश्य ही कोई
दानवी है, सीता नही हैं ।'
इस प्रकार निश्चय करके वह उस स्थान को छोडकर आगे बढा और आसव, रक्त,
मधु एव मास-युक्त मधुशालाओ को देखकर उन भवनो में सीता को ढूँढ़ा, जिनमें गरुड,
उरग, अमर, गधर्व तथा सिद्धो की स्त्रियाँ बदी थी । फिर उसने जहाँ-तहाँ छाया में खडे
होकर, एकात में वार्तालाप करनेवालो का सभाषण ध्यान से सुना । बिना इस बात का
विचार किये ही कि में अमुक स्थान में प्रवेश कर सकता हूँ, अमुक स्थान में नही, अमुक
स्थान में जाना मेरे लिए उचित है, अमुक स्थान में नही, हनुमान् ने सारी लङ्कापुरी में
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ढूंढ डाला, किन्तु मानव-रूप में रहनेवाली सीता को कही भी और किसी भी प्रकार से
देख न पाने के कारण अत्यत दुःखी हुआ ।
५: हनुमान् का रावण के उद्यान में जाना
इसके पश्चात् हनुमान् ने नगर के समीप रहनेवाले और सोने की चहारदीवारी से
घिरे हुए एक उद्यान को देखा । धीरे-धीरे वह उस उद्यान के निकट पहुँचा । चारो ओर
भली भांति देखकर वह उसकी दीवार पर चढ़ गया और उस सुंदर उद्यान के भीतर देखने
लगा । वह उद्यान चंदन, पुन्नाग, सहकार, मदार, खर्जूर, कटहल, पीपल, नीबू, विजौरा,
पाटली, बकुल, घनसार, सौवीर, कर्णिकार, कुरवक, जवीर, ताल, तमाल, हिंताल, साल, नारिकेल,
अशोक, सप्तपर्णी, दाड़िम, नारंगी, केतकी और पूगीफल, आदि के वृक्षो से, मल्लिका,
मालती, माधवी, नागवल्ली, एला, लवग आदि लताओ से, पके हुए द्राक्षाफल के गुच्छो से
और पके हुए फलो तथा पुष्पो की सुगंधि से युक्त वायु से परिपूर्ण था । वह (उपवन)
पिक, शुक, नीलकंठ एवं सारिकाओ तथा भ्रमरो मे शोभायमान था । वह सुंदर सरोबरो
से, कुमुद-समूहो से, चंद्रकात-मणियो की वेदिकाओ से, स्वच्छ चाँदनी से तथा सैकत स्थलो
से अत्यत मनोहर था । वह सभी ऋतुओ में विहार करने योग्य था और उसकी शोभा
चैत्ररथ (कुवेर का उपवन) को भी मात करती थी । अमरेन्द्र के नंदन-वन की समता
करनेवाली रावण की उस उद्यान-वाटिका को देखकर हनुमान् आश्चर्यचकित हो गया और
उस उपवन में प्रवेश करके दवे पाँव सरोवरों में, खड्डो में, उनके तटो पर, निकुंजो में,
पेड़ो के नीचे तथा सुरक्षित स्थानो में बडी सावधानी से सीताजी की खोज
करने लगा । उसके पश्चात् उस उपवन के मध्य भाग में स्थित, रात-दिन पहरा देनेवाले
राक्षस-वीरो से रक्षित, गगनचुंबी अट्टालिकाओ से सुशोभित मेरु पर्वत के शिखरो के समान
स्वर्ण-कलशो से शोभायमान, स्वर्ण-स्तंभो तथा श्रेष्ठ रत्नो के वंदनवारो से भासमान एक
विशाल भवन को हनुमान् ने देखा । हनुमान् ने उस भवन में भी सीता को ढूँढा, किन्तु
वहाँ भी उनका पता नही चला ।
तब हनुमान् मन-ही-मन अत्यत दुःखी हुआ और सोचने लगा—'हाय, सूर्यकुल-तिलक
राम ने मुझे एकांत में बुलाकर, बड़े प्रेम से कहा था कि तुम अवश्य सीता का पता लगा
सकोगे और मेरे हाथ में अपनी मुद्रिका दी थी । उनका आदेश स्वीकार करके मैं यहाँ
आया हूँ । किन्तु उस कमल लोचनी का पता कही नही मिल रहा है । उस दुरात्मा
रावण के ले आते समय कदाचित् उस साध्वी ने अपने प्राण त्याग दिये हो या आकाश-
मार्ग से अत्यधिक वेग से आते समय भयभीत हो सीताजी, राक्षस के हाथो से मुक्त होकर
समुद्र में गिर गई हो, अथवा यहाँ के राक्षसो को देखकर भय से प्राण छोड़ दिये हो,
अथवा विरहाग्नि में जलकर भस्म हो गई हो, या राक्षस ने किसी ऐसी माया की रचना
की हो, जिससे सीता किसी को दीख नही पडती हो, या रावण ने उन्हें विदेशो में रख
दिया हो, या उस राक्षस ने उस चंचलाक्षी को दण्ड देकर उसके प्राण ले लिये हो । हाय,
में किस मुँह से लौट जाऊँगा और राम से क्या कहूँगा ? अब में क्या करूँ ? ज्यो ही में
यह कहूँगा कि मैने सीता को नही देखा, त्यो ही राम अपने प्राण त्याग देंगे । अपने भाई