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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 236, कुल 508 में से

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पृष्ठ 236

२०६ रंगनाथ रामायण
वह लो, यहाँ से शतयोजन की दूरी पर, लंका में, वह पवित्र साध्वी बैठी है । तुम
प्रायोपवेश छोड़ो । अब उठो । पौलस्त्यपति ( रावण ) की लंका में जाकर सीता के
दर्शन करो ।'
इतना कहकर वह वानरों को लंका का मार्ग बताकर बड़े हर्ष से महेन्द्र गिरि पर
चला गया । तब सभी वानर-वीर प्रसन्नचित्त हो, शीघ्र गति से महासागर के पास पहुँचे।
उस सागर की शब्दमयी तरंगें, प्रचण्ड वायु के आघात से, अत्यधिक उद्धत होकर विहार
कर रही थीं । उनमें उत्पन्न झाग दिगंतों तक फैल गया था और ऐसा लग रहा था,
मानो वह समुद्र का गडूष (कुल्ली) हो, उस समुद्र में भयंकर मगर अपनी पूँछ-रूपी
तलवारों से बड़े आवेश से लड़ रहे थे । ऐसे समुद्र के निकट पहुँचकर सभी वानर (मन-
ही-मन) अत्यंत व्याकुल हो, थोड़ी देर तक निश्चेष्ट बैठे रहे और चिन्ता करने लगे कि
इस समुद्र को कौन पार कर सकता है ? ऐसी शक्ति किसमें है ?'
२१. वानरों का अपनी शक्ति का परिचय देना
अंगद ने वह रात उस समुद्र-तट पर बिताई और दूसरे दिन अलग-अलग सभी
वानरों को संबोधित करके कहा—'यदि तुम वीर वानर अपने पौरुष को खोकर, सौ योजन
की जलराशि को पार करने के लिए इतना झिझकते हो, तो अपयश-रूपी विशाल समुद्र
को किस प्रकार पार कर सकोगे ? तुम सब अलग-अलग अपनी-अपनी शक्ति का परिचय
मुझे दो ।'
तब व्याकुल-चित्त सभी वानर सावधान हो गये और अपनी शक्ति का विचार कर
अपने-अपने बल का परिचय देने लगे । गज ने कहा—'मैं दस योजन लाँघ सकता हूँ ।'
गवाक्ष ने कहा—'मैं बीस योजन बिना किसी कठिनाई के लाँघ सकता हूँ ।' शरभ ने
कहा—'अपनी शक्ति के प्रताप से मैं चालीस योजन पार कर सकता हूँ ।' गंधमादन ने
अपना पराक्रम प्रकट करते हुए कहा—'मैं पचास योजन की दूरी लाँघ सकता हूँ ।' मैन्द ने
कहा—'मैं अपनी शक्ति को हानि पहुँचाये बिना साठ योजन पार कर सकता हूँ। द्विविद ने
कहा—'बिना विशेष प्रयत्न के मैं सत्तर योजन की दूरी लाँघकर जा सकता हूँ।' तार ने
अपनी शक्ति को प्रकट करते हुए कहा—'मैं अस्सी योजन लाँघ सकता हूँ ।'
इस प्रकार सभी वानर निःशंक होकर अपनी-अपनी शक्ति का सही-सही परिचय देने लगे ।
तब अत्यंत वृद्ध तथा समस्त संसार में पराक्रमी, भल्लूकनाथ (जाम्बवान्) ने कहा-
"यदि मैं अपने लड़कपन (या यौवन) की बात कहूँ, तो वह उपहास का विषय होगा,
फिर भी कहता हूँ, सुनो । पहले जब अमृत के लिए सुर तथा दानवों ने युद्ध किया था,
तब मैंने सुरों की सहायता की थी और बड़े प्रेम से उनका दिया हुआ अमृत पान किया था।
मैं सप्त समुद्रों को पार करने की क्षमता रखता हूँ । उदयाचल पर खड़े होकर
अपना दूसरा चरण अस्ताचल पर रख सकता हूँ। सभी लोकों में मेरी समता कर सकनेवाला
कोई नहीं है । जब त्रिविक्रम ने महाबली बलि महाराज का दर्प तोड़ा था, उस दिन मैंने समस्त
पृथ्वी की इक्कीस बार परिक्रमा की और त्रिविक्रम की प्रार्थना की । उस समय मेरी टाँग
टूट गई, मेरा दर्प तथा शक्ति नष्ट हो गई । ऊपर से वृद्धावस्था ने भी मुझे आ घेरा।