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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

अयोध्याकांड ८९
इन बातो को सुनकर जानकी सभ्रम-चित्त हो उठी । प्रचंड वायु से कपायमान
होनेवाली कदली के समान वह थरथर कांपने लगी और अत्यधिक दुख से कातिहीन
होकर गद्गद स्वर में बोली—‘हे प्राणेश, यदि यह सच है, तो मै भी अवश्य इसी क्षण
आपके साथ चलूंगी । मै आपके त्रियोग में जीवित नही रह सकूंगी । मेरे प्राण मुझमें
नही रहेंगे । आप मुझे अपने साथ अवश्य ले चलिए ।’
राघव बोले—‘हे कमलाक्षी, यह कैसे संभव है कि तुम जंगलो में कंद-मूल खाते,
पथरीले रास्तो में पैदल चलते, वल्कल पहने, कड़ी धूप तथा प्रचंड वायु को सहते तथा
कड़ी भूमि पर शयन करत हुए पर्णशाला में जीवन बिताओ । तुम तो कोमलागी हो और
कष्ट का नाम तक नही जानती । ऐसी कोमलागी तुम आश्चर्यजनक हाथी, बाघ, रीछ,
-भेडिये, हिरन, साँप तथा लाल चीटियो से पूर्ण गिरि, गुफा, तथा घाटियो में कैसे
रह सकोगी ? भयावने लता-मार्गों पर, अत्यंत दुर्गम, लता, कटक, वृक्षो से भरे हुए पथो से
युक्त भयंकर वनो

६० रंगनाथ रामायण

यो कहती हुई वे राम के चरणो पर गिरकर विलाप करने लगी । फिर भी राम
को विचलित होते नही देख अत्यत दीन स्वर में वे बोली—"हे नाथ यदि जान-बूझकर,
या अनजान में मैने कोई अपराध किया हो, तो आप मुझे क्षमा कर दीजिए । कर्कश
शिलाओ से आकीर्ण प्रदेशो में भी आपकी सेवा करते हुए मुझे कोई थकावट नही होगी ।
आप जो कद-मूल कृपा-पूर्वक देंगे, वे मेरे लिए अमृत-तुल्य होगे । आप ही मेरे आप्त-बधु हैं।
अतः, मै आपके साथ अवश्य चलूँगी । न मै अपने पिता का स्मरण करूँगी न माता
का, न इष्ट वधुजनो का ।। हे प्राणेश आपने अग्नि के समक्ष मेरे पिता से मुझे सह-धर्म-
चारिणी के रूप में ग्रहण किया था । आप लोकवद्य है, सत्यनिष्ठ है । मुझे यही छोडकर
वनवास के लिए आपका चला जाना क्या उचित है ? वहाँ जो भी कष्ट हो, वह आपकी
कृपा से मेरे लिए सुख ही सिद्ध होगा । आपके बिना ये राजभवन, ये वधु-वाधव, यह
ऐश्वर्य और जीवन भी सार-हीन हो जायेंगे । मै कैसे यहाँ रह सकूँगी ? जैसे पुण्य सती
सावित्री अपने पति की अनुगामिनी होकर रही, मै भी आपकी परछाई की तरह आपके
पीछे-पीछे चलूँगी । मेरी जैसी साध्वी के लिए यही धर्म है । आपको छोडकर मै यहाँ
एक क्षण भी नही रह सकती । आपके साथ चौदह वर्ष क्या, हजार वर्ष तक जंगलो में
रहकर आपकी सेवा करती रहूँगी । आप ऐसे आदर्श का पालन कीजिए, जो ससार में पति-
पत्नियो के लिए अनुकरणीय हो । इतना ही क्यो ? यदि आप मुझे छोडकर वन चले
जायेंगे, तो मेरे प्राण भी उड जायेंगे अथवा मै स्वय अग्नि, जल या विष से अपने प्राण
त्याग दूँगी । मुझे छोडकर मत जाइए, मेरी मृत्यु देखकर जाइए ।" यो अत्यत शोकार्त
हो जानकी विलाप करने लगी ।'
१०. राम का सीता तथा लक्ष्मण को भी साथ चलन की अनुमति देना
सीता की यह दशा देख राम का हृदय दया से पिघल गया । उन्होने अपने कर-
पल्लवो से उस सुदरी को उठाकर कहा—'हे सुदरी, तुम्हें यहाँ छोड़कर अकेले वन में निवास
करना मै भी नही चाहता । मै केवल तुम्हारा हृदय परखना चाहता था । तुम मेरे साथ
चलो, तो सब तरह से मेरा कुशल ही होगा । मै तुम्हें अपने साथ ले चलूँगा । तुम चलने
से पूर्व आवश्यक दान आदि कर लो ।' कृपालु राम के अनुमति देते ही सीता ने स्वर्ण-
रत्नादि आभूषण अपने प्रिय परिजनो को दान कर दिये ।
तत्पश्चात् राम ने सौमित्र को अपने पास बुलाकर कहा—'यदि तुम भी मेरे साथ
वन में चलोगे, तो मेरे साथ तुम्हें भी खोकर हमारी माताएँ कौसल्या तथा सुमित्रा
अत्यत दुखी होगी । उनका दुख कौन दूर करेगा ? हम दोनो चले जायें, तो पिताजी की
देख-भाल करनेवाले कौन हैं ? पहले से ही माता कैकेयी सौतिया डाह मे प्रेरित है ।
अब राज-मद भी उन्हें हो जाय, तो न जाने वे अपनी प्रभुता दिखाती हुई उन्हें दुख देंगी
या धर्म का विचार करके (चुप) रह जायेंगी । अतः मेरे लौटने तक तुम्हारा यहाँ रहना
सर्वथा उचित है ।
इन बातो से दुखी होकर लक्ष्मण ने अपने भाई से कहा—'मै आपके साथ
अवश्य वन चलूँगा । यदि आप मना करेंगे, तो यही अपने प्राण त्याग दूंगा । यह मेरा दृढ़

अयोध्याकांड
६९

निश्चय है।' अनुज का यह दृढ़ निश्चय सुनकर राम ने उन्हें अपने साथ चलने की
अनुमति दे दी।
११. राम-लक्ष्मण का संपत्ति-दान
फिर राम ने अपने अनुज लक्ष्मण को भेजकर वसिष्ठ के पुत्र उत्तम गुण-सम्पन्न सुयज्ञ
को बुलवाया और उचित रीति से उनका आदर-सत्कार करके उन्हें हार, कुडल, वलय,
अंगद आदि सभी आभूषण, मामा का दिया हुआ मत्त गज, ख्याति, शत्रुजय आदि नामवाले
सहस्र हाथी, सुन्दर वस्त्र आदि दान में दिये। इनके अतिरिक्त राम ने उन्हें दस करोड सुवर्ण-
मुद्राएँ तथा अन्य अनुपम वस्तुएँ भी बडी श्रद्धा मे दी। उन्हें ग्रहण करके सुयज्ञ ने हर्षित
होकर आश्चर्य-चकित हृदय से उस राज-दंपती को आशीर्वाद दिये। उसके पश्चात् उन्होने
अपने राज-कोष का समस्त धन मँगाकर, याचको, निर्धनो तथा दीन-जनो में वितरित
कर दिये। अगस्त्य तथा कौशिक मुनियो को रत्न-राशियाँ दान कर दी। वसिष्ठ आदि मुनियों,
तथा तपस्वियो को उचित दान दिया। बंदी-मागध आदि, परिजन तथा अन्य निर्धनों को
अमित धन दिया। तत्पश्चात् ब्राह्मणो तथा बंधु-मित्रो को भिन्न-भिन्न प्रकार के दान देकर
उन्होने सौमित्र की ओर देखकर कहा—'तुम भी दान करो।' तब उस राजकुमार ने बडे
आनंद से कौशिक, गार्ग्य तथा शांडिल्य को बुलवाकर उन्हें अमित धन दिया। जिस किसी ने
जो कुछ माँगा, उसे उन्होने दे दिया। सीता ने परम कल्याणी अरुंधती तथा सुयज्ञ की
पत्नी को अपने आभूषण, अपना धन, तथा अपने अंतःपुर के सभी वस्तु-समूह दान में
दे दिये। तब अरुंधती ने वसिष्ठ को देखकर कहा—'हाय। इक्ष्वाकु के वंशजो की ऐसी
दशा देखकर चुप रह जाना क्या आपको उचित लगता है?' मुनि ने अच्छी तरह विचार
करके कहा—'यह भगवान् की इच्छा है, किसी भी तरह यह टल नही सकती। तुम चुप-
चाप देखो।'
१२. त्रिजटाख्य को राम का गायों का दान देना
उस समय त्रिजटाख्य नामक एक विप्र अपनी जीविका चलाने के उद्देश्य से खेत
जोतते हुए मन-ही-मन अपने दारिद्र्य का विचार करके दुःखी हो रहा था। उसकी स्त्री
अपने बच्चो के साथ अपने पति के पास गई और काम में व्यस्त पति को देखकर कहा—
'हे नाथ, अभी आप हल चलाने में क्यो व्यस्त हैं, हल को वही छोडकर आइए, मै एक
बात कहती हूँ। आज रामचन्द्र बडे आनंद से सभी याचको को असंख्य धन दान कर रहे है।
जो कोई जो कुछ माँगता है, उसे वे दे रहे हैं। आप अपना कुल तथा अपना नाम
बतलाकर उस काकुत्स्थ पति से अपने इच्छानुसार धन प्राप्त कर लीजिए। आप शीघ्र
जाइए।'
यह सुनकर उस विप्र की इच्छाएँ प्रबल हो उठी। वह तुरत रामचन्द्र के निकट
पहुँचकर उन्हें आशीर्वाद देकर बोला—'हे राजन्, मै निपट दरिद्र हूँ। मेरे कई बाल-बच्चे हैं।
मैं अत्यन्त निर्धन हूँ। आप मेरी रक्षा करें। तब रघुराम बोले—'अभी मेरे पास
गायो के कई समूह हैं। आप अपनी सारी शक्ति लगाकर कोई ढेला फेंकिए। आपका
ढेला जितनी दूर तक जायगा, उतनी दूर तक की भूमि में जितनी गायें हैं, वे सब आपको

९२ रंगनाथ रामायण
मिल जायेंगी । मन-ही-मन हर्षित होते हुए उस विप्र ने अपनी धोती तथा शिखा कसकर
बाँध ली, सभी नाडियो को कस लिया, दाँत पीसे और हाथ में ढेला लिये हुए श्रीरमापति
विष्णु तथा श्रीराम का नाम-स्मरण करके अपनी मुट्ठी जोर से घुमाकर ढेला सरयू नदी
तक फेंक दिया । सरयू नदी तक की भूमि में जितनी गायें थीं, उन्हें ब्राह्मण ने ले लिया ।
ब्राह्मण के इस बाहुबल को देख राम को आश्चर्य हुआ । उन्होने ब्राह्मण से कहा कि यदि
आपकी इच्छा हो, तो मैं बिना किसी संकोच के आपको और एक हजार गायें
तथा वस्त्र आदि दूंगा । तब विप्र ने कहा- 'आप मुझे एक यज्ञ के लिए आवश्यक धन
दे सकें, तो अच्छा होगा ।' राम ने उसकी इच्छा के अनुसार उसे धन देकर संतुष्ट किया ।
ब्राह्मण धन आदि लेकर अपनी पत्नी के साथ संतुष्ट मन से घर लौट गया ।
तब रघुराम अपने-आपको कृत-कृत्य मानते हुए अतःपुर के भीतर आये और गृह-
देवताओ की पूजा की, भक्ति के साथ मुनियो को प्रणाम किया और याचको को मुंह-मांगा
दान दिया । उसके पश्चात् उन्होने अपने गुरु के घर में रखे हुए तथा धनुष-यज्ञ के समय
वरुण से प्राप्त कोदंड, तूणीर, खड्ग आदि अपने अनुज के द्वारा मँगवाये और उन्हें धारण
करके सीता तथा लक्ष्मण के साथ राजा के दर्शन करने चले । नगर की प्रजा उन्नत सौध-
शिखरो तथा चौपालो से राजचिह्न-रहित राम को जाते हुए देख अत्यंत शोक-संतप्त होकर
कहने लगी- 'क्या राम ऐसी दुर्दशा को प्राप्त होने योग्य हैं ? वे जहाँ जायँगे, हम भी
वहीं जायँगे ।' कुछ लोग कहते- 'हम सब इस राजकुमार के साथ वन चले जायँ और
उजड़े हुए नगर पर कैकेयी राज्य करे ।' इसी तरह कुछ दूसरे लोग कहते- 'यह नगर
धीरे-धीरे भालू, बाघ, सिंह, लोमड़ी, पिशाच तथा असंख्य भूत-प्रेतो का निवास-स्थान बन
जायगा और वन में जहाँ राम रहेंगे, वही एक नगर बस जायगा ।' इस प्रकार लोगो के
रोने-पीटने से सभी दिशाएँ गूंज उठीं ।
१३. सीता-लक्ष्मण-सहित राम का दशरथ के दर्शनार्थ जाना
लोगो की आर्त ध्वनियो को बडे धैर्य के साथ सुनते हुए राम महाराज के अंतःपुर
में पहुँचे । उन्होने सुमंत्र के द्वारा राजा को अपने आगमन की सूचना भेजी । सुमंत्र ने
शोक-संतप्त राजा को देखकर कहा- 'महाराज, राम-लक्ष्मण पूज्यशीला सीता के साथ
आये हैं ।' यह संवाद सुनते ही राजा मूर्च्छित हो गये । जब उनकी मूर्च्छा दूर हुई, तब वे
धीरे-धीरे उठकर आसन पर बैठ गये और धैर्य धरकर गद्गद कंठ से बोले- 'मेरी सभी
रानियाँ रघुराम को देखने के लिए आवें ।'
सुमंत्र राजा के वचन सुनकर रनवास में गये और राजा की तीन सौ पचास रानियो
को अत्यंत विनय के साथ बुला लाये । तत्पश्चात् वे महान् तेजस्वी रामचंद्र को सीता
और लक्ष्मण के साथ महाराजा के सामने ले गये । राजा राम को हृदय से लगा लेने
के लिए उठे, किन्तु उनके पैर आगे नहीं बढ़ सके । वे वही लड़खड़ाकर भूमि
पर गिर पड़े । तब राम ने उन्हें उठाया और उनका सिर अपनी गोद में रखकर दुःख प्रकट
करने लगे । थोड़ी देर बाद राजा की चेतना लौट आई और वे उठ बैठे । पिता
को एकटक अपनी ओर ताकते हुए देखकर लोकवन्द्य राम बोले- 'हे अनघ, आपके वचन

अयोध्याकांड [९३]

की रक्षा करने के हेतु मुझे वन-गमन के लिए उद्यत देखकर साध्वी जानकी तथा सौमित्र,
मेरे मना करने पर भी मेरे साथ वन जाने के लिए प्रस्तुत हो गये हैं । उन्हें भी वन जाने
की अनुमति प्रदान कीजिए ।'
इन वचनो को सुनकर राजा ने कहा—'मतिभ्रष्ट कैकेयी की बातो में आकर मैने
तुम्हें वन जाने का आदेश देकर बडी निर्दयता की है । किन्तु तुम्हें उसका पालन करने
की आवश्यकता ही क्या है ? तुम अपने ढंग से राज्य करो ।'
इस पर राम ने हाथ जोडकर कहा—'हे राजन्, आप मेरे गुरु हैं, पृथ्वीपति हैं,
प्रेम से मेरी रक्षा करनेवाले आप्त-बन्धु हैं । अतः, आप अपनी आज्ञा का पालन करने की अनु-
मति मुझे दीजिए और जाने की आज्ञा भी दीजिए । सत्यनिष्ठ होकर आप सदा समस्त
लोको का पालन कीजिए ।'
दशरथ बोले—'हे वत्स ! तुम चिरायु, अमितशुभ, सुयश, पराक्रम, निष्कलंक धर्म-
बुद्धि प्राप्त करो । तुम्हें किसी प्रकार का कष्ट न हो । हे पुत्र, तुम आज रात को यही
रहकर कल वन के लिए प्रस्थान करो ।' इस पर राम ने कहा—'हे महाराज, हमारा
अब यहाँ रहना उचित नही है । आज और कल में विशेष अंतर नही पडता । अतः, आप
हमें स्नेह से जाने की अनुमति दीजिए । मेरे अनुज भरत को राज्य-पालन करने दीजिए ।
अब आप शोक मत कीजिए ।'
राम की त्याग-बुद्धि देखकर महाराज दशरथ को अत्यधिक दुख हुआ । वे बोले—
'तुम्हारे जैसे सुपुत्र को घोर जंगलो में निवास करने की अनुमति मैं किस मुंह से दूँ ?
हाय ! कैकेयी की बातो में आकर मै धोखा खा गया ।' यो कहते हुए वे करुणोत्पादक ढंग
से विलाप करने लगे । अंतःपुर की सब नारियाँ भी रोने लगी । इसी समय कौसल्या
तथा सुमित्रा दुख-संतप्त हृदय से वहाँ आईं और राजा के साथ विलाप करने लगीं ।
उन रमणियो तथा राजा का विलाप सुनकर सुमंत्र अपार दुख से पीडित हुए और
क्रोध से कैकेयी की ओर देखकर कहने लगे—'आपके कारण ही राजा को तथा हम सबको
यह संताप हो रहा है । मैं आपको क्या कहूँ ? आप पति के हित का विचार न करने-
वाली राक्षसी है । आप भी अपनी माता के समान ही पति की हत्यारिन हैं । आपके
पिता सभी भाषाओ के ज्ञाता थे । एक दिन वे और आपकी माता शय्या पर लेटे हुए थे ।
तब उन्होने किन्ही कीडो को आपस में बोलते हुए सुना और उसका विचार करके
हँस दिया । तब तुम्हारी माँ ने अपने पति से कहा—'बतलाइए कि आप क्यो हँस रहे
रहे है ?' तब उन्होंने कहा—'यदि मैं इसका कारण तुम्हें बतला दूँ, तो मेरी मृत्यु हो
जायगी ।' किन्तु आपकी माँ ने कहा कि 'मै आपकी मृत्यु से नही घबराती, आप अवश्य
अपनी हँसी का कारण बतलाइए । तब उन्होने निर्दय होकर आपकी माता को नगर से
निर्वासित कर दिया । भला, ऐसी चंडी की पुत्री, आपको अपने पति के हित का विचार
कैसे होगा ?'
कैकेयी सिर झुकाकर थोडी देर तक सोचती रही और फिर दशरथ को देखकर
बोली—'हे राजन्, प्राचीन काल में आपके वंशज महाराज सगर महान् यशस्वी होकर

राज्य करते थे । क्या उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र अममजस को विना किसी झिझक के नगर
म बाहर नहीं कर दिया था ? तब आप भी यदि राम को वन में भेज दें, तो इसमें
दोप ही क्या है ?'
शोक-समुद्र में डूबे हुए दशरथ इसका प्रत्युत्तर नहीं दे सके । तब सिद्धार्थ नामक
मंत्री ने कपटी कैकेयी को देखकर कहा—'असमंजस दर्प से उद्धण्ड होकर नगर के बालकों
को वाँव-वाँधकर सरयू नदी में फेंक देता था । जब प्रजा ने राजा से इसकी शिकायत की,
तब जन-हित का विचार करके उन्होंने अपने पुत्र को नगर से निर्वासित कर दिया । क्या
रामचंद्र में कोई दोप है ? वे तो उत्तम गुण-सपन्न हैं ।'
तब कैकेयी बोली—'राम तो पिता के दिये हुए वचनो का पालन कर रहा है ।
वह सुकृति है ।' कैकेयी की निष्ठुरता देखकर दशरथ बहुत दुखी हुए और सुमंत्र को देखकर
बोले—'हे सुमंत्र, तुम राज्य के धन, मणियाँ, गोधन, बंधुजन, अत पुर के निवासी मित्र,
मंत्री तथा विजय-चिह्नो से अलंकृत गज, रथ, तुरग आदि सब को राम के साथ भेज दो ।
इस शून्य नगर पर ही कैकेयी का पुत्र राज्य करेगा ।'
इन वचनो को सुनते ही कैकेयी क्रोध से जल उठी । वह अपने पति को कोसती
हुई बोली—'हे राजन्, आप रामचंद्र को राज्य का ऐश्वर्य देकर उजड़ा हुआ नगर भरत
को क्यो देना चाहते हैं ? ऐसी वातें क्यो करते हैं ? यदि राम, सौमित्र तथा जानकी के
माथ वल्कल पहनकर संतुष्ट मन से सारे ऐश्वर्य को त्याग कर मेरे देखते हुए वनवाम के
लिए नहीं जायगा, तो आपका वचन पूरा नहीं होगा । आपका वचन भूठा होगा । हे राजन्,
में आपके वर नहीं चाहती । निश्चय ही आपका वचन भग हुआ ।'
कैकेयी की वातें सुनकर दशरथ मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े । उस दगा में
पृथ्वी पर पड़े हुए पिता को देखकर घोर परिताप से पीड़ित होकर राघव बोले—
'हे माताजी ! आप वार-वार महाराज की निंदा क्यो करती हैं ? मेरे गुरु, महाराज, मेरे
पूज्य पिता, मेरे परमदेव, मुझे आज्ञा दें, तो मे प्रेम से विप-पान भी करूँगा । प्रचंड
अग्नि या विप के समुद्र में भी प्रविष्ट होऊँगा । वनो में जाकर मुनियों के साथ रहना
कौन-सा वडा कार्य है ?'
दशरथ उन वचनो को सुनकर कैकेयी को देखकर बोले—'सुनो, में भी राज्य छोड़-
कर राम के साथ वन में जाऊँगा । तुम समस्त वैभव के साथ भरत को अयोध्या का राजा
वनाकर राज्य करो । अब अधिक विवाद क्यो ?' तब राम ने राजा से कहा—'महाराज,
निर्जन वन मेरे लिए योग्य रहेगा । मेरे साथ और कोई क्यो आये ? मेरे लिए वल्कल
मँगाइए । में उन्हें धारण कर चौदह वप तक वन में रहते हुए आपकी आज्ञा का पालन
करूँगा । माता, आप शीघ्र हमें वल्कल दीजिए ।'
तब कैकेयी निर्लज्ज होकर मन-ही-मन प्रसन्न होती हुई सबके सामने वल्कल ले
आई और उन्हें राम को देकर बोली—'हे राजकुमार ! इन्हें धारण कर लो ।'
राम ने वडी प्रसन्नता से माता से वल्कल ले लिये और अपने कपड़े उतारकर
वल्कल पहन लिये । राम के ममान ही लक्ष्मण ने भी वल्कल पहने । कैकेयी ने मीता को

अयोध्याकांड ६५
दो वल्कल दिये । तब सीता ने मन-ही-मन व्याकुल होकर राम से कहा—'वन में रहने-
वाले मुनि, न जाने इन वल्कलो को कैसे पहनते होगे ।' उन्होने एक वस्त्र को अपने कवे
पर डाल लिया और दूसरे को हाथ में लिये पहनने में असमर्थ हो खडी रही । राम ने
यह ढग देखा तो उन्होने स्वय सीता को वह वल्कल पहना दिया । सभी रानियो ने राघव
को देखकर कहा--'हे राजकुमार ! इस श्रेष्ठ राजकुमारी सीता को इतना निष्ठुर होकर
तपस्विनी की तरह घने जगलो में क्यो ले जा रहे हो ? हमारी बात मानकर तुम सीता
को हमारे पास छोड़ दो और लक्ष्मण के साथ तुम वन जाओ।'
१४. कैकेयी पर वसिष्ठ का क्रोध
तब वसिष्ठ कैकेयी को देखकर अत्यत क्रोध से बोले—"तुम कुलनाशिनी हो ।
तुमने राजा को धोखा दिया है । तुमने जैसा पाप किया, वैसा पाप कही भी किसी ने नही
किया है । रघुराम की आज्ञा से जानकी को रानियो के साथ रहने दो । तुम इसे स्वीकार
क्यो नही करती हो ? यदि वैदेही वन में चली जायगी, तो हम भी नगर-निवासियो के
साथ वन चले जायेंगे । इतना ही नही, भरत तथा शत्रुघ्न अत्यत प्रसन्न मन से रामचन्द्र
की सेवा करने के लिए वन जायेंगे । तब तुम इस निर्जन नगर में रहोगी । राम पुण्यशील हैं ।
उसके रहने से इस नगर की शोभा है । उसके चले जाने के बाद यह नगर उजडा
हुआ दीखेगा । पाप-पूर्ण मन से तुमने पति को धोखा दिया । अधिक लोभ से प्रेरित हो,
तुम राम को वन में भेजकर भरत का राज-तिलक करके चिर काल तक राज्य करने की
बात सोच रही हो । भरत कभी अपने पिता की आज्ञा नही टालेगा । वह अपने भाई
रामचन्द्र को पितृ-तुल्य मानता है । तुम्हारी बात सुनकर, धर्म-निष्ठा को त्यागकर, रामचन्द्र
को ठुकराकर क्या वह राज्य ग्रहण करेगा ? वह दशरथ का पुत्र है । तुम्हारा दोष
सिद्ध होने पर, क्या वह तुम्हे मन से माता मानेगा ? क्या राम के वन में रहते हुए वह
साम्राज्य का भार वहन करेगा ? तुम भरत का हृदय नही जानती । अगर उसे यह बात
मालूम हो जाय, तो वह तुम पर क्रुद्ध होगा । किसके लिए तुम इतने निष्ठुर बन रही हो ?
क्या भरत इसके लिए अपनी स्वीकृति देगा ? कदापि नही । इसलिए इसे तुम
शुभप्रद मत समझो । इतना ही नही, राम तथा सीता को वल्कल देने के लिए तुम्हारे
हाथ कैसे आगे आये ? वल्कल छोड़कर नवरत्न-खचित आभूषण तथा चीनाम्बर पहने जानकी
परिचारिकाओ के साथ वन में जाय ।"
इस प्रकार कहते हुए उस सयमीश्वर ने सीता को सुन्दर वस्त्र तथा आभूषण दिये ।
सीता ने उन्हें ग्रहण किया और वल्कल वही छोड़ दिये । सब लोग कैकेयी की निंदा करने लगे ।
राजा सबकी निंदा सुनते रहे और अत में कैकेयी को देखकर बोले—'तुमने मन
में पाप का सकल्प करके राम के लिए वनवास माँगा था । लेकिन क्या तुमने मुझसे
यह भी माँगा था कि सीता को वल्कल पहनने चाहिए ? क्या यह मानवती इसके लिए
योग्य है ? मैने क्या पाप किया, जो तुम इतनी क्रूर बनी हुई हो ? विनयाभिराम राम को
तपस्वी के रूप में वन भेजने से बढकर कोई और पाप है ? उसे यहाँ से भगाकर भी तुम्हें
चैन क्यो नही मिलता ? ऐसी पापिनी का पति मेरे पापो का अत ही नही है क्या ?'

९६ रंगनाथ रामायण
तब राम ने दशरथ से कहा—'महाराज, मेरे वियोग से शोक-सन्तप्त मेरी माता
कौसल्या को सांत्वना देते हुए आप उनकी रक्षा करते रहें।'
तब दशरथ ने अत्यन्त दुःखी होकर कहा—'हे राम, न जाने मैने पूर्व जन्म में कौन-सा
पाप किया था ? उसका फल तो मुझे भोगना ही चाहिए। माताओ से पुत्रो को अलग करके
तुम्हारे हृदयो को दुःख देना पड रहा है। हाय, कैकेयी के वचनो के कारण तुम्हें वन में कष्टो को
सहने के लिए निष्ठुर होकर भेजना पड रहा है। हे पुत्र, हे राम, यह कैसा अनर्थ है।'
यो कहकर दशरथ मूर्च्छित हो गये। उपचार के उपरात जब वे कुछ सँभले, तब
उन्होने चौदह वर्ष के लिए आवश्यक श्रेष्ठ वस्त्र तथा आभूषण सीता को दिलवाये।
सीता ने उन श्रेष्ठ वस्त्रो तथा आभूषणो को धारण किया।
१५. राम का दशरथ को सांत्वना देना
तब दशरथ को देखकर राम ने कहा—'महाराज में चौदह वर्ष की अवधि चौदह
दिन की तरह बिताकर शीघ्र ही लौट आऊँगा। मेरी अपेक्षा भरत आपका प्रिय भक्त है।
आप दुख मत कीजिए। भरत का राज-तिलक कर दीजिए। माता कैकेयी के कृत्य को
सोचते हुए आप मन-ही-मन क्षुब्ध मत होइए। मेरी माँ आपकी सेवा अच्छी तरह करती
रहेगी। उन पर आप भी कृपा-दृष्टि रखिए।'
यो कहकर उन्होने सीता तथा लक्ष्मण के साथ उनकी परिक्रमा की और प्रणाम
किया। तब राजा ने अपने पुत्रो तथा बहू को आशीर्वाद दिया—'तुम वन जाकर कुशल-
पूर्वक लौटो।' उसके पश्चात् उन तीनो ने कौसल्या के चरण-कमलो का स्पर्श किया।
राघव की वेश-भूषा देखकर माता ने क्रूर विधि की निंदा करती हुई विलाप किया और
फिर राम तथा लक्ष्मण को आशीर्वाद दिये।
१६. सीता को सीख देना
फिर जानकी को देखकर कौसल्या अत्यन्त दुःखी होकर बोलीं—'राम को योग्य राज-
पुत्र समझकर बिना हमारे माँगे ही तुम्हारे पिता ने तुम्हारा विवाह उसके साथ कर दिया।
किन्तु आज दैव-योग से तुम्हारी यह दशा हो गई। तुम्हें तापस-वृत्ति ग्रहण कर अपने
पति के साथ वनो में निवास करना पड रहा है। इसके लिए चिन्ता मत करो। राघव
अवश्य बाद को पृथ्वी का पालन करेगा। चाहे पति निर्धन ही क्यो न हो जाय, फिर भी
स्त्री को उसे त्यागना नहीं चाहिए। यही सती स्त्रियो का धर्म है। पति की आज्ञा पालन
करनेवाली स्त्रियो का दोनो लोको में शुभ होगा।'
तब सीता ने कौसल्या को देखकर कहा—'हे माताजी, मैं अवश्य पति के अनुकूल
होकर भक्ति के साथ उनकी सेवा करूँगी और धर्म के मार्ग पर चलूँगी। पति की प्रसन्नता
जिस रमणी को प्राप्त नही है, वह चक्र-हीन रथ के समान और तार-हीन वीणा के समान है।
वह पुत्रोवाली पुण्यवती होने पर भी अत्यन्त दुःखी रहेगी। अत, यदि पति को प्रिय हो,
तो मै अपने प्राणो को भी बडे हर्ष से निछावर कर दूँगी।'
तब कौसल्या ने सीता से कहा—'भू-माता की पुत्री होकर तुम्हारे ये गुण तुम्हारे
अनुकूल ही हैं। लक्ष्मण, उज्ज्वल गुण-सम्पन्न तुम्हारे पति का आप्त-बन्धु है। उसके प्रति

स्नेह रखना ।' 'आपकी आज्ञा शिरोधार्य है'—सीता ने कहा और उन्हें प्रणाम किया ।
कौसल्या ने उन्हें हृदय से लगा लिया और आशीर्वाद दिये ।
फिर कौसल्या ने राम को संबोधित करके कहा—'हे राजकुमार, मैथिली तथा
सौमित्र का सतत ध्यान रखना ।' राम बोले—'माता, आपकी आज्ञा का पालन अवश्य
करूँगा । लक्ष्मण तो मेरा दाहिना हाथ हैं और सीता मेरी गति के समान हैं । क्या में
कभी इनके प्रति असावधान रह सकता हूँ ? यदि में धनुष धारण करूँ, तो (इन्हें) कौन-सा
भय हो सकता हैं । चाहे त्रिनयन ही क्यो न आ जायें । अब आप शोक मत कीजिए ।
हम तीनो, आपको, पिताजी को और सब माताओ को प्रणाम करते हैं, आप हमें आशीर्वाद
दीजिए ।'
इस प्रकार कहते हुए उन्होने सीता तथा लक्ष्मण के साथ तीन सौ पचास माताओ
की प्रदक्षिणा की । यह दृश्य देखकर सभी माताओ का हृदय पिघल गया और वे विलाप
करने लगी ।
जब तीनो ने माता सुमित्रा को प्रणाम किया, तब उन्होने उन्हें हृदय से लगा लिया
और राम तथा सीता को आशीर्वाद दिये । उसके पश्चात् वे महाराज के अनुचित कार्य
का विचार करके दुःखी हुई और लक्ष्मण को पास बुलाकर अत्यंत गंभीर स्वर में बोली—
'हे वत्स ! तुम राम को ही अपने पिता दशरथ के समान और जानकी को मेरे समान
मानना । वन को ही अयोध्या समझना और अत्यंत भक्तियुक्त होकर राम की सेवा करते हुए
अत्यधिक विजय तथा उन्नति प्राप्त करो ।' उसके बाद वे राम को देखकर बोली—
'हे रघुवीर, लक्ष्मण सतत तुम्हारे कल्याण का विचार करनेवाला, कल्मष-रहित सखा तथा
अनुज है । वन में तुम इसकी रक्षा करते रहना ।' राम ने माता की आज्ञा को बड़ी नम्रता
से स्वीकार किया ।

१७. राम का वन-गमन

तत्पश्चात् राम ने गृह-देवताओ, मुनियो तथा माताओ को प्रणाम किया और सीता
तथा लक्ष्मण के साथ शर-चाप-तूणीर से युक्त हो वे वन के लिए रवाना हुए । तब दशरथ ने
मन-ही-मन दुःखी होते हुए सुमंत्र को देखकर कहा—'वह देखो, राम वन जा रहा है,
उसके लिए रथ ले जाओ ।'
राजा की आज्ञा मानकर सुमंत्र रथ को लिये राम के पास पहुँचे और भक्ति से
प्रणाम करके बोले--'हे रघुराम, राजा ने यह रथ भेजा है । इस पर आरूढ होकर आप
वन के लिए प्रस्थान कीजिए ।' राजा की आज्ञा को मानकर राम ने सीता को पहले रथ
पर बिठाया, फिर अपने शस्त्रो को रखने के बाद लक्ष्मण के साथ स्वयं भी उस विशाल
रथ पर चढ़कर वन के लिए रवाना हुए ।
नागरिक, वृद्ध, आप्त, मंत्री, स्त्रियाँ, बालक, मित्र, आश्रित, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य
तथा शूद्र अत्यधिक दुःख प्रकट करते हुए रथ के आगे-पीछे तथा दोनो ओर भीड लगाकर
चलने लगे । कुछ लोग मथरा को कोस रहे थे कि उसने इक्ष्वाकु-वंश के गौरव को नष्ट
कर दिया, कुछ कैकेयी की निंदा करते हुए कह रहे थे कि क्या रघुराम को तपस्वी का
१३

८६ रंगनाथ रामायण
रूप देना उचित था, दूसरे कुछ लोग दशरथ पर क्रोध प्रकट करते हुए कह रहे थे कि
राजा का इस प्रकार अपनी पत्नी से भीत होना उचित नहीं था, कुछ लोग दुखी होकर
कह रहे थे कि आज राम तथा सौमित्र अधिकार-रहित होकर कितने अनाथ हो गये ?
ऐसे भी लोग थे, जो कह रहे थे कि प्राप्त होनेवाले साम्राज्य का भार वहन किये बिना
व्यर्थ ही ये लोग वन में जा रहे है ? कुछ कह रहे थे, चौदह वर्ष तक ये लोग कैसे
विपत्तियो को झेलते रहेंगे ? कुछ मन-ही-मन सोच रहे थे कि न जाने इस राजकुमारी ने
किस व्रत का अनुष्ठान किया है ? कुछ कह रहे थे कि अत्यंत दुखी होकर राम के
वन चले जाने के पश्चात् बुद्धिमान् भरत कैसे राज्य करेंगे ? कुछ सीता की प्रशसा कर रहे थे
कि कोमलगात्री भूमि-सुता को पति ने यही (अयोध्या में ही) क्यो नही छोड़ दिया ?
कुछ आश्चर्य कर रहे थे कि ऐसे पुत्र को वन जाते हुए देखकर न जाने कौसल्या कैसे
धैर्य रख सकी ? इस प्रकार, कहते हुए सभी लोग शोक-सतप्त मन-से रथ के पीछे-पीछे
जाने लगे ।
कौसल्या तथा सुमित्रा अत्यंत दुख के प्रवाह में डूबी हुई (उनके पीछे) जा रही थी ।
उनके हाथो का सहारा लिये हुए, झुके हुए, दुख से लडखडाते महाराज दशरथ
रनवास की स्त्रियो के साथ अविरल अश्रु-जल से भरे नेत्रो से, 'हे राम ! हे राम !'
का आर्त्तनाद करते हुए अत पुर से वाहर निकले । तब रवि का प्रकाश मद पड गया और
अधकार चारो ओर से आकाश में व्याप्त होने लगा । अग्नि ने अपना सहज दहन-गुण
त्याग दिया । पृथ्वी में दरारें पड गई । नक्षत्रो का प्रकाश मद पड गया । आकाश में
ग्रह एक दूसरे से टकरा गये । हाथियों का मदजल सूख गया । अश्वो की आँखो से अश्रु
टपकने लगे । छोटे, वडे, वूढे, वच्चे, सभी की विलाप-ध्वनि सारे आकाश में व्याप्त हो गई ।
सुर-लोक की कामिनियो का अत्यधिक आर्त्तनाद नगर-निवासियो को सुनाई पडने लगा ।
तब दशरथ ने अश्रुपूरित नेत्रो से रथ की ओर देखा, मगर उन्हें कुछ भी दृष्टि-
गोचर नही हुआ । तब वे उच्च स्वर में चिल्लाने लगे--'हे सुमत्र, रथ लौटा लाओ ।
रामचन्द्र का चद्रविव-सदृश मुख एक वार देखने दो ।' इस तरह नगर के बाहर भी शीघ्र
गति से आनेवाले महाराज को देखकर रामचंद्र सुमंत्र से बोले--'वह देखो, सूर्यवंशाधिप
आ रहे है । रथ की गति तीव्र कर दो । शीघ्रता करो ।'
उनकी आज्ञा के अनुसार सुमंत्र ने रथ की गति तीव्र कर दी। तब वसिष्ठ राजा से
मन-ही-मन दुखी होते हुए बोले--'हे अनघ, इस प्रकार दुखी होकर तुम्हें
(अपनी सतान को) भेजना नही चाहिए । यहाँ से अब तुम लौट चलो ।' तब दशरथ
रुक गये और अपने पुत्र के रथ की ओर अपलक-दृष्टि से देखते रहे । जब वे आँखो से
ओझल हो गये, तब उस रथ की धूलि की ओर देखते रहे । जब वह भी दिखाई नही पडी
तब वे ऊँचे स्वर में--'हा राम ! हा राम !' का आर्त्तनाद करते हुए पृथ्वी पर गिर-
कर लोटने लगे ।
जब उनकी मूर्च्छा छूटी, तब वे अत्यंत क्रोध-भरी दृष्टि से कैकेयी को देखकर बोले--
'तुम्हारी पाप-मंत्रणा से अनभिज्ञ होकर मैं अपने पुत्र-रत्न को खो बैठा । तुम्हारे साथ

-रात्रि के समय सुमंत्र से प्रजा को भुलावा देकर वहाँ से चल देने`

  • न देखकर, राम ने अर्द्ध-रात्रि के समय (अर्द्ध-रात्रि)
  • सुमंत्र से प्रजा को भुलावा देकर वहाँ से चल देने

Line 35:

  • की बात उन्हें समझाकर कहा कि रथ तैयार करके ले आओ । रथ के आते ही उन्होंने
    • की बात उन्हें समझाकर कहा कि रथ तैयार करके ले आओ । (wait, is it तैयार? Look at L35: रथ तैयार - wait! Is it तैयार or तैयार? Look at the matra on त: it's ऐ matra, but look at the letter: तै with dot? No, wait! रथ तैयार vs रथ तैयार? Look at नैयार: wait, is the first letter त or न? Look at L35: रथ नैयार करके? Wait, let's look at तैयार: the letter is नै! No, wait, look at न in उन्होंने: it has a loop. Look at त in बात: it curves down. In रथ ... करके ले आओ: the letter has a loop! It looks like तैयार where the top loop of त is closed, or is it a typo नैयार? Wait, look at तैयार vs `नैयार

१०० रंगनाथ रामायण
कराया और तृण तथा शिला-आवृत भूमि पर अत्यत वेग से उसे चलाने का आदेश दिया ।
उनका गमन तथा महाराज के आदेश की कथा सुनकर मार्ग के ग्राम-वासी अत्यत दु खी
हुए और धैर्य तजकर रुदन करने लगे । ऐसे कितने ही ग्रामवासियों का रुदन वार-वार
सुनते हुए मार्ग के विविध वन-दृश्यों को सीता को दिखाते हुए, प्राचीन काल में सूर्य-वश-
मणि इक्ष्वाकु को मनु के द्वारा दी हुई भूमि का अवलोकन करते हुए अत्यत शीघ्र गति से
उन्होने सरयू नदी¹ को पार किया और दूसरे दिन सध्या तक गगा नदी के तट पर
पहुँच गये । वहाँ पहुँचकर उन्होने एक इगुदी-वृक्ष के नीचे बडी शान्ति के साथ विश्राम किया ।
वहाँ, तमसा नदी के तट पर अयोध्या की प्रजा ने प्रभात के समय उठकर चारो
ओर देखा, तो वे सभ्रमित तथा आश्चर्य-चकित रह गये । वहाँ न राम-लक्ष्मण थे, न रथ
का कही पता था । उनके शोक की सीमा नही रही । रथ के पहियो के चिह्न देखकर
उन्होने सोचा कि कदाचित् महाराज की आज्ञा पाकर राम राज्य-भार को वहन करने
अयोध्या लौट गये हैं । वे अयोध्या को लौट आये, किन्तु वहाँ भी राम को न देखकर वे
शोकाग्नि में तपने लगे और कहने लगे—‘हाय ! राम हमें भुलावा देकर चले गये ! ’
वे राम की दयालुता, उनकी सत्यनिष्ठा तथा सद्व्यवहार की प्रशसा करते हुए उनके वियोग
में दु ख का अनुभव करने लगे ।
१५. गुह से राम की भेंट
निषादराज गुह को जब यह समाचार मिला कि राघव गगा-तट पर ठहरे हुए हैं,
तब वह राम-लक्ष्मण की सेवा में कदमूल-फल आदि खाद्य पदार्थ, सुनहले वस्त्र तथा
विविध उपहार लेकर आया और बडी भक्ति से उन्हें प्रणाम करके सब वस्तुओ को उनके
चरणो में अर्पित करके कहा—‘हे देव, क्या कारण है कि आप राज-पाट छोडकर वनवास
के लिए पधारे हैं ? हे सूर्य-वश-तिलक, मेरे जैसे सेवक के रहते हुए आपकी ऐसी दशा क्यो ?
जिस दुष्ट ने आपकी यह दशा कर दी है, उस नीच का मैं युद्ध में वध कर डालूँगा ।’
उसकी सद्भक्ति, शक्ति तथा धीर वचनो को सुनकर राघव अत्यत प्रसन्न हुए और
उसे गले से लगाकर अपना सारा वृत्तात कह सुनाया । सारी कथा सुनने के पश्चात्
गुह मन-ही-मन चितित हुआ और कैकेयी की करतूत पर दुःख प्रकट करने लगा । उसने
दशरथ की सरलता पर खेद प्रकट किया और दशरथात्मजो की दुर्दशा का विचार करके
शोक-पीडित हुआ । राम अत्यत स्नेहातुर हुए और आप तथा लक्ष्मण दोनो ने उचित रीति
से गुह के दु ख का शमन किया ।
इतने में सूर्यास्त हो गया । राजकुमारो ने सध्या-वंदन आदि से निवृत्त होकर गगा-
जल से अपनी क्षुधा शात की । उसके पश्चात् राम, जानकी तथा लक्ष्मण तृण-शय्या पर
विश्राम करने लगे । सूत (सुमन्त्र) तथा शृगवेरपुर का स्वामी गुह उनकी सेवा में लगे रहे ।
१ सरयू नदी तो अयोध्या से उत्तर होकर बहती है और फिर विहार में प्रवेश
करती है । राम दक्षिण की ओर चले थे, उन्हें सरयू नदी कैसे मिलती ? वाल्मीकि ने
गंगा के निकट पहुँचने के पहले राम को वेदश्रुति और गोमती नदी को पार
उतरवाया है ।—सम्पादक

लक्ष्मण ने चौदह वर्ष तक अपने भाई की रक्षा में सलग्न रहने के उद्देश्य से दिन-
रात कभी नहीं सोने की प्रतिज्ञा की और धनुष-बाण धारण किये अपने भाई की शय्या से
थोड़ी दूर पर खड़े हो गये। उस रात को निद्रा देवी स्त्री का रूप धारण करके आईं
और लक्ष्मण से बोली—'हे मानधनी, में निद्रादेवी हूँ। विधि के निर्देश का पालन तो मुझे करना ही
होगा। आप मेरे लिए क्या व्यवस्था देते हैं, जिससे मैं आपको छोड़कर चली जाऊँ ?'
तब लक्ष्मण बोले—'तुम दिन-रात ऊर्मिला पर हावी होकर रहो। अवधि पूरा
करके मैं तुम्हें ग्रहण करूँगा।' उनका आदेश शिरोधार्य करके निद्रा चली गई और लक्ष्मण
भी निद्रा देवी की कृपा प्राप्त करके संतुष्ट हो गये।
इसके पश्चात् लक्ष्मण ने सुकुमार यौवन-शोभा-सपन्न तथा धीरचेता राम एवं
सीता के दुख का वृत्तांत गुह को कह सुनाया और कहा—'हंस-तूलिका-तल्प (हंसों के
पंखों से बनाई हुई कोमल गद्दी) पर शयन करनेवाले (भोगी) आज खुरदरे पत्थरों पर
बिछी पल्लव-शय्या पर पत्थरों के चुभते रहने से परेशान होते हुए किसी तरह गाढ निद्रा
में खर्राटे भर रहे हैं।' इसके पश्चात् उन्होंने गुह को माता कौसल्या और सुमित्रा के
शोक का वृत्तांत सुनाया और दोनों अत्यंत शोकमग्न हो गये।
इतने में अरुणोदय हुआ। राघव ने निष्ठा से प्रातःकाल के सब विधि-विधान
पूरा किये। उसके पश्चात् उन्होंने गुह के द्वारा वट का दूध मँगाया, लक्ष्मण तथा अपने
कोमल तथा दीर्घ केश खोलकर उन्हें उस दूध से जहाँ-तहाँ भिगोकर उनकी जटाएँ बनाईं।
वैदेही विवश तथा क्षुब्ध हो देखती रही। फिर अनुज के साथ राम ने बड़ी निष्ठा से वैखानस-
वृत्ति (वानप्रस्थ की एक शाखा) ग्रहण की।
तत्पश्चात् राम ने सुमंत्र को पास बुलाकर कहा—'हे सुमंत्र अब हमें रथ पर चढ़ना
नहीं चाहिए। अतः, तुम रथ को लेकर अयोध्या को लौट जाओ और राजा की सेवा में
प्रवृत्त हो जाओ। महाराज को तथा माताओं को हमारे प्रणाम कहना। तब सौमित्र ने
क्रोध से कहा—'अब भी ऐसी बातें क्यों ? (शान्तिपूर्ण वचन क्यों ?) उनमें मेरी ओर
से कहना कि अपनी स्त्री की प्रेरणा से उन्होंने नीति-भ्रष्ट होकर, किसी बात का विचार
किये बिना ही हमारी ऐसी दशा कर दी। अब वे अपनी स्त्री तथा प्रिय पुत्र के साथ
राज-भोग का अनुभव करें। अब तुम जा सकते हो।' लक्ष्मण की बातों से अप्रसन्न होकर
राम ने कहा—'सौमित्र, तुम अपनी बातें बन्द करो।' और, सुमंत्र को संबोधित करके
कहा—'तुम ये बातें राजा से मत कहना। यदि वे ये बातें सुनेंगे, तो और अधिक दुख से
पीड़ित होंगे।' तब सुमंत्र ने अत्यधिक शोक-संतप्त तथा अत्यंत भीत होकर कहा—
'हे देव, आपको वन में छोड़कर मैं दीन की तरह अयोध्या कैसे जाऊँ ? मैं प्रजा से यह
समाचार कैसे कहूँ ? मैं यह रिक्त रथ किस मुँह से ले जाऊँ ? कौसल्या को मैं कैसे
सांत्वना दूँ ? कैकेयी का मुँह मैं कैसे देखूं ? नहीं, यह मुझसे नहीं हो सकता। मैं भी
आपके साथ चलूँगा।'
तब राम हँसकर बोले—'हमने गंगा पार करके वन में प्रवेश किया है, यह समाचार
तुम जब जाकर कैकेयी से कहोगे, तभी वे उसे सत्य मानेंगी। इसलिए तुम शोक न

करके लौट जाओ। मेरे बदले तुम राजा को बार-बार धैर्य देते हुए, उनकी सेवा करते
रहना।' तब अत्यंत दीन होकर सुमंत्र साकेत नगर के लिए रवाना हुए।
१९. राम का गंगा पार करके वन में प्रवेश करना
राघव ने बड़ी भक्ति के साथ मन-ही-मन अयोध्या नगर को प्रणाम किया और गुह
की लाई हुई नाव में बैठकर गंगा पार करने लगे। बीच धारा में पहुँचने पर सीता ने
गंगा नदी को भक्ति के साथ हाथ जोड़कर प्रणाम किया और अत्यंत विनीत भाव से
प्रार्थना करने लगीं—'हे माता गंगे ! दशरथ नृप की आज्ञा से राज त्यागकर दुर्दशा को
प्राप्त मेरे पति घोर कानन में चौदह वर्ष तक निवास करने जा रहे हैं। मैं उनके साथ
भ्रमण करती हुई (अवधि-समाप्ति पर) यदि राम-लक्ष्मण के साथ सकुशल लौट आऊँगी,
तो आपकी सेवा में असंख्य गायें, वस्त्र, मिष्टान्न आदि विविध चढ़ावे समर्पित करूँगी और
भूसुरों को दान दूँगी।' इस प्रकार उन्होंने भव-भंग (संसार के पापों का नाश करनेवाली)
धवलांग (धवल शरीरवाली) भवमौलिसंग (शिव के जटाजूट में निवास करनेवाली)
गंगा की प्रार्थना की।
गंगा नदी पार करने के पश्चात् राम ने गुह का आभार मानकर उसे विदा किया
और उसके बताये हुए मार्ग से सीता को बीच में करके आगे-आगे लक्ष्मण तथा पीछे-पीछे
स्वयं चलने लगे। इस प्रकार तीन योजन का मार्ग तय करके सुधर्मद नामक सरोवर के
निकट पहुँचकर उस दिन वहीं ठहर गये। उस भयंकर कानन में अकेली सीता को सोती
हुई देखकर, अपनी दशा, अपनी माताओं का शोक कैकेयी की इच्छा की पूर्ति, महाराज की
सत्य-निष्ठा, प्रजा का दुःख—इन सब के बारे में अपने अनुज से कहते हुए रामचन्द्र की
आँखों में अश्रु बहने लगे।
रात्रि व्यतीत हुई। प्रभात- होते ही राघव वहाँ से रवाना हुए और तीन योजन
चलकर पवित्र गंगा तथा यमुना के संगम-स्थल पर प्रयाग पहुँचे। वहाँ निवास करनेवाले
मुनिलोक-वंद्य भरद्वाज मुनि को देखकर राम ने उन्हें प्रणाम किया और सारा समाचार उनसे
निवेदन किया। उस तपोधन ने रघुवंशज उन दोनों भाइयों को आशीर्वाद दिये, रघुराम
की सुशीलता पर आश्चर्य प्रकट किया और तथ्य को जान गये। उन्होंने कंद-मूल-फल
आदि से उन्हें संतुष्ट करके बड़े प्रेम से उनका सत्कार किया। वहाँ उन्होंने बड़े आराम
से रात बिताई और प्रातःकाल ही बड़ी निष्ठा से संध्योपासना करके मुनियों के आशीर्वाद
प्राप्त किये। इसके पश्चात् पुण्यात्मा भरद्वाज से अनुपम चित्रकूट पर्वत का मार्ग जानकर
वे वहाँ से विदा हुए। वन के बीच राम अपने धनुष की टंकार-मात्र सुनकर भागनेवाले
मृग-समूहों को सीता को दिखाते हुए उनका मनोरंजन करते जाते थे। जब वे थक जाते
या सीता थक जाती थीं, तो थोड़ी देर के लिए ठहर जाते और फिर चल पड़ते। इस
प्रकार कई दुर्गम स्थलों को पार करके वे यमुना के तट पर पहुँच गये। यमुना को पार
करते ही उन्होंने सिद्ध-वटवृक्ष (अक्षय वट) को देखा। सीता ने बड़ी भक्ति से अपनी
कार्यसिद्धि-हेतु हाथ जोड़कर उस वृक्ष की प्रार्थना की। वे उस रात को वहीं ठहर गये।
और, दूसरे दिन घोर जंगलों में सुरक्षित मार्ग से होते हुए उन्होंने माल्यवती से घिरकर,

अयोध्याकांड १०३
श्रेष्ठ सयमी मुनियो के निवास-स्थान से होते हुए सुललित तरु-लताओ के समूह से भरे
चित्रकूट को देखा । उस पर्वत पर निवास करनेवाले तपोधन मुनियो को देखकर उन्होने
प्रणाम किया और उनसे उचित आदर-सत्कार प्राप्त किया । फिर, उनकी आज्ञा प्राप्त
करके गम और उनके अनुज दोनो ने एक स्थान पर बडे उत्साह से पेडों की शाखाओ
को काटकर अनोखी पर्णशाला बनाई । एक काले हिरन का वध करके गृह-शान्ति तथा
हवन-आदि विधिवत् पूरा किये । उसके पश्चात् राम और सीता ने उस पर्णशाला की
प्रशंसा करते हुए उसमें प्रवेश किया और मुनियो की प्रशंसा प्राप्त करते हुए उनकी चरित्र-
चर्चाओ में आनंद लेने हुए वहाँ रहने लगे ।
२०. काकासुर-वृत्तांत
एक दिन सीता की जाँघ पर सिर रखे राम सोये हुए थे । सीता भोजन के लिए
कंद-मूल-फल आदि तैयार कर रही थी । तब निर्भय गति से एक दुष्ट कौआ पर्णशाला में
प्रवेश करके उसका नाश करने लगा । सीता ने उसे भगाने का प्रयत्न किया, फिर भी वह
भागा नही । वह इधर-उधर देखकर अंत में सीता के स्तन पर बैठकर चोंच मारने लगा ।
जब रक्त की धारा बहने लगी, तब राम जाग पडे । उस दुष्ट कौए की करतूत पर क्रुद्ध
होकर राम ने उस पर एक बाण चलाया । उसने कौए का पीछा किया । कौआ काँव-काँव
करता हुआ (उस बाण से बचने के लिए) तीनो लोको का चक्कर काटने लगा । मगर कही
कोई रक्षक नही मिला । उसने दिक्पाल, ब्रह्मा तथा शिव की शरण माँगी । किन्तु उन्होने कहा—
'यह श्रीराम का शर है । इसे हम रोक नही सकते ।' तब वह कौआ फिर राम की
शरण में आया । तब अत्यन्त कृपा से उस कौए को देखकर राम ने कहा—'मेरा बाण कभी
खाली नही जायगा । अत तुम अपना कोई अग उसे देकर अपनी जान बचाओ । तब
कौए ने बडी भक्ति से अपनी एक आँख उस अस्त्र को भेंट की और वहाँ से चला गया ।
तब राम ने देवताओ को सीता के तैयार किये हुए फल आदि का भोग चढ़ाया और उसके
पश्चात् सब लोगो ने उन फलो को ग्रहण किया ।
२१. सुमंत्र का अयोध्या पहुँचना
वहाँ सुमंत्र राम की गति-विधि जानने के लिए तीन दिन तक गुह के साथ रहे ।
फिर दूसरे दिन उन्होने घोर दुख से पीडित होते हुए अयोध्या नगर में प्रवेश किया ।
सहज श्री से हीन उस राज-मार्ग में जब वह जाने लगा, तब नगरवासी रथ की ध्वनि
सुनकर यह कहते हुए सुमंत्र के पास आये कि देखो, रामभद्र आ गये हैं । किन्तु रथ में
रघुराम को न देखकर वे सुमंत्र से कहने लगे—'हे क्रूरकर्मी, राम के बिना यह रिक्त
रथ यहाँ क्यो लाये हो ?' इस प्रकार लोगों की भीड एकत्रित होकर उनकी निंदा
करने लगी । सुमंत्र उन्हें रामचन्द्र का वृत्तांत सुनाते हुए राजा के अंत पुर के निकट आ
पहुँचे । वहाँ रथ से उतरकर वे गजा के निवास की ओर गये । उन्होने धूलि-धूसरित
शरीर तथा अश्रु-पूरित नयनों से, मन-ही-मन कुढ़नेवाले राजा को अविगत दुख से अभि-
भूत होकर कौसल्या के घर में पडे और विलाप करते हुए देखा । उन्होने राजा को प्रणाम

१०४ रंगनाथ रामायण
करके कहा—'हे राजन्, आपके पुत्र-रत्न सत्यनिष्ठ राम तथा लक्ष्मण, दोनो ने जटाएँ
धारण किये, गंगा को पार किया और पैदल चित्रकूट पर्वत की ओर चले गये हैं ।'
इन वचनों को सुनकर राजा अत्यधिक शोक करने लगे । उन्होंने सुमंत्र को अपने
निकट बुलाकर अपने पुत्र का समाचार विस्तार-पूर्वक जान लिया और उसके पश्चात्
बोले—'हे अनघ, सुमंत्र, हे मतिमान्, तुम्हारे कारण मैं अपने रामभद्र का कुशल-समाचार
जान पाया । नेत्रों का दुःख तथा मन का शोक दूर करनेवाले उसे (राम को) जी भरकर
देखे बिना मेरे ये प्राण शरीर में रहते नहीं दीखते । तुम मुझे राम के पास
ले चलो ।' तब सुमंत्र बोले—'राजन्, यदि आप श्रीराम के पीछे जायेंगे, तो प्रजा को दुख होगा
और कैकेयी आपकी निंदा करेंगी । अत यह आपके लिए उचित नही है ।' हे
मानवेंद्र, आप इतना दुःख मत कीजिए, धैर्य धारण कर धर्म का पालन करते हुए पुण्यवान्
बनिए । समस्त दुःख भूलकर बिना किसी अभाव का अनुभव किये आपके पुत्र कानन में
सुख-पूर्वक रहते हैं ।'
इसके पश्चात् सुमंत्र ने लक्ष्मण के वचन राजा को सुनाये, तो राजा अत्यधिक ग्लानि
का अनुभव करते हुए बोले—'सौमित्र के वचन सत्य हैं । मैं वैसा ही कामांध हूँ । क्रूर-
कर्मी तथा पापी हूँ ।' इस प्रकार कहते हुए राजा ने सुमंत्र को भेज दिया और स्वयं मन-
ही-मन कुढ़ने लगे । उन्हें देखकर कौसल्या बोलीं—'हे राजन्, अब 'हे राम, हे राम, का
आर्त्तनाद करते हुए चिंतित क्यों हो रहे हैं ? क्यों ऐसा स्वांग भरते हैं ? इस तरह शोक
का अभिनय क्यों कर रहे हैं ? क्या मैं सब बातें नहीं जानती ? लोक-निंदा के भय से
आपने स्वयं कैकेयी को सारी बातें सिखा दी थीं । फिर अपने राम का राज-तिलक करके
उसे समस्त पृथ्वी का पालन कराऊँगा, ऐसी घोषणा करके आपने उसे वन भेज दिया है ।
आप महादुष्ट हैं । आप का भी कोई धर्म है ? निंदा के भय से आपने मेरे पुत्र का राज-तिलक
रोकने के लिए उसे वन भेज दिया है । निस्संकोच होकर यदि कैकेयी राम का वध
करने के लिए भी कहे, तो आप उसका वध भी कर देंगे । बहुत समय तक संतानहीन
होकर मैं दुःखी रहती थी । निदान कितने ही जप-तप और व्रतों के उपरांत मैंने इस इकलौते
पुत्र को प्राप्त किया था और इससे मेरा चित्त कुछ शांत हुआ था । आपने मुझे शांत
रहने भी नही दिया ।'
इस प्रकार निंदा करनेवाली कौसल्या को देखकर राजा अपनी पूर्व-कथा उन्हें
सुनाने का विचार करके बोले—'हे कौसल्ये ! तुम जो कुछ कह रही हो वह सत्य ही है ।
मैं निश्चय ही पापकर्मी हूँ । अब बहुत समय तक मेरे शरीर में प्राण नहीं रहेंगे, इसलिए
चिढ़ा-चिढ़ाकर मुझे मत मारो । मैंने जो पाप-कर्म पहले किये थे, वे वैसे ही नहीं टलेंगे ।
देवताओं को भी अपने कर्म का फल अवश्य भोगना ही पड़ता है । मैं अपनी एक कथा
सुनाऊँगा । तुम उसे सुनो ।'
२३. दशरथ का कौसल्या को अपने शाप का वृत्तांत सुनाना
“यह मेरी युवावस्था की बात है । मैं सारे राज्य पर शासन करता था । एक दिन
अर्धरात्रि के समय मैं मृगया की इच्छा से धनुष-बाण लिये सरयू नदी के किसी अनुपम

.घाट के निकट झाड़ियो में छिपा बैठा था । विविध मृग-समूहो के पानी पीने का शब्द
मुझे सुनाई पडने लगा । जैसे-जैसे शब्द सुनाई पडने लगा, वैसे-वैसे मैने शब्दवेधी वाण
चलाकर उनका वध कर डाला । मै इससे सतुष्ट न होकर वही ताक में बैठा रहा । उस
समय यज्ञदत्त नामक एक मुनि-पुत्र वहाँ आया और अपना जल-कलश पानी में डुबोया ।
कलश के डूबने से जो 'गट्गट्' की ध्वनि सुनाई पडी, उसे सुनकर मुझे भ्रम हुआ कि वह
कोई मत्त गज है । तुरन्त मैने (शब्दवेधी) वाण चलाया । उस तीव्र शर के लगते ही—
'हे पिता, हे माता, का आत्तंनाद मेरे हृदय को चीरकर निकल गया । वह मुनि-पुत्र पृथ्वी
पर गिरकर कहने लगा—'हाय, मै वनो में कन्द-मूल-फल खाते हुए तपस्वी का जीवन
व्यतीत करते, अपने माता-पिता की सेवा करता रहता हूँ । मैने किसी का अहित
नही चाहा । मुझे ऐसी घोर मृत्यु क्योकर प्राप्त हुई ? कोई पापी रात के समय, रति-
केलि में प्रवृत्त मृगो का वध नही करता । कौन है वह मदान्ध, जिसने अर्द्ध-रात्रि के समय
मुझपर बाण चलाया है । न जाने उसकी क्या दुर्गति होगी ? अब मेरी मृत्यु को वह
कैसे रोक सकेगा ? हाय मेरे अंधे, दीन तथा वृद्ध माता-पिता इस पुत्र-शोक को कैसे
सह सकेंगे ? 'रात अधिक बीत गई है, अकेले गया हुआ है, उसके आने में इतना विलम्ब क्यो
हो रहा है'—ऐसे सोचती हुई न जाने मेरी माता कितना दुख करती रहेगी ? मेरे पिता
मेरे नही लौटने का समाचार मेरी माता से कहकर न जाने शकाकुल मन से कितने व्याकुल
होते होगे ? वे सोचते होगे कि बाल-सुलभ-कौतुक में व्यस्त, हमारा पुत्र अभी तक लौटा
नही है । या सोचते होगे कि शायद जल लाने में असमर्थ होकर वह वही रह गया है ।
यदि वे मेरी मृत्यु का समाचार सुन लें, तो न जाने उनकी क्या दशा होगी ? उन्हें कौन
जल ले जाकर देगा ? उनकी रक्षा आगे कौन करेगा ? हाय, इस एक शर से हम
तीनो की मृत्यु एक साथ हो गई । विधि के क्रूर विधान को मै क्या दोष दूँ ?'

“उस मुनि-पुत्र का आर्त्तनाद सुनकर मैं अत्यत क्षोभ-युक्त हो, उस महापुरुष को
देखने की तीव्र उत्कण्ठा लिये हुए अधकार के दूर होने की प्रतीक्षा करने लगा। इतने में
उस वनधि (वन) में मेरी शोक-वनधि (शोक-समुद्र) उमडाते हुए चन्द्रोदय हुआ । तब मैने
सरयू नदी को पार किया और उत्तर की दिशा में ढूँढने लगा । वहाँ मैने एक स्थान पर
मुनि-कुमार को अपने हाथ में जल-कलश को नीचे रखकर अपना कपोल कलश के मुंह पर
टेककर पडे हुए पाया । उसके वक्ष तथा पीठ से बहनेवाली रक्त-धाराओ से सारा शरीर
भीग गया था । उसकी शिखा खुल गई थी और अत्यधिक पीडा से उसका मुख कान्ति-
हीन हो गया था । शर के भीतर प्रवेश करने से वह इस प्रकार पडा हुआ था, जैसे कोई
योगी आत्मचिंतन में लीन हो और वह दैहिक व्यापारो को रोक, इंद्रियो की गति का दमन
करके अतिम योग-क्रिया में विस्मृत होकर पडा हो ।

“उस सुंदर आकृतिवाले मुनि-कुमार को तथा अपने बाण को देखकर मै घबडा गया ।
तुरत मैने नदी से जल लाकर उस मुनि-कुमार की आँखे पोछी तथा इसका सारा
शरीर पोंछ डाला और फिर वहने लगा--'हाय मुनिनाथ ! प्रमादवश मेरे शर ने आपका वध
कर डाला। इस नदी में जल के लिए आप क्यो आये ? मै अब इस पाप से कैसे मुक्त होऊँगा?'
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१०६ रंगनाथ रामायण
"इस प्रकार मैं अपना दुःख प्रकट कर रहा था कि मुनि-कुमार ने आँखें खोलीं ।
उसने अपनी ओर, फिर मेरी ओर देखा, और मेरे भय को देखकर कहा—'हे राजन् !
आप क्या करेंगे ? आप क्यों दुःखी होते हैं ? मुझे मारने की शक्ति आपमें कहाँ है ?
दैवयोग से ही मेरी ऐसी गति हुई है । इसके लिए आप क्यों शोक करते हैं ? आपने
तो हाथी समझकर बाण चलाया था । जान-बूझकर तो नहीं चलाया । ब्रह्म-हत्या का दोष
भी आपको नहीं लगेगा; क्योंकि मैं ब्राह्मण नहीं हूँ । मैं वैश्य-पिता और शूद्र-माता से उत्पन्न
हुआ हूँ । मेरी मृत्यु देखकर आप विचलित मत होइए । आप मेरे माता-पिता को मेरी
मृत्यु का संवाद न भी दें, तो भी वे योग-दृष्टि से सभी बातें जान लेंगे । तब यदि वे
क्रुद्ध होकर आपको शाप देंगे, तो उसमें रघुकुल का क्षय हो सकता है । हे राजेन्द्र, इस
पहाड़ के निकट पश्चिमी कोने में एक वटवृक्ष है । उसी वटवृक्ष के पास में एक काँवर में
बिठाकर बड़ी श्रद्धा से उनकी सेवा-शुश्रूषा में लगा रहता हूँ । आज रात भी मैं उन्हें
उस वृक्ष के कोटर में बिठाकर आया हूँ । आप शीघ्र इस कलश का जल लेकर वहाँ
जाइए और उन्हें सावधानी से नीचे उतारकर निर्भय होकर उन्हें सारा वृत्तांत सुनाइए ।
हे राजन् ! इस अस्त्र के साथ मेरी मृत्यु अनुचित है । इसलिए धीरे-धीरे यह बाण निकाल
दीजिए । शरीर की पीड़ा अब मुझसे सही नहीं जाती । मेरे प्राण अब नहीं रहेंगे ।'
"मुनि कुमार के इन वचनों को सुनकर मैं धीरे-धीरे उनके निकट पहुँचा । अत्यधिक
आत्म-ग्लानि से पीड़ित होते हुए मैंने उस शर को निकालने के लिए हाथ बढ़ाया, किन्तु
भय से मेरा हाथ रुक गया । फिर साहस बटोरकर काँपते तथा दुःखी होते हुए मैंने उस
शर को निकाल दिया । उसी क्षण मुनिकुमार की मृत्यु हो गई ।
"मन-ही-मन दुःखी होते हुए मैं जल-कलश लेकर मुनि के आश्रम में पहुँच गया और
वहाँ अपने सुत की प्रतीक्षा करते हुए पर-कटे पक्षियों की तरह पड़े हुए वृद्ध तथा अंधे
पुण्यात्माओं को देखा । निकट सुनाई पड़नेवाली आहट सुनकर मुनि कहने लगे—'हे पुत्र,
इस प्रकार कहीं विलम्ब किया जाता है ? मैं तुम्हारी माता के साथ यही सोच रहा था
कि इतना विलंब करने का क्या कारण है ? क्या तुम एक ही स्थान में इतने समय
तक ठहर सकते हो ? तुमने कहाँ इतनी देर लगाई ? तुम्ही तो हमारी आँखें हो ।
हम अत्यंत वृद्धों के लिए तुम्ही आधार हो । हम गतिहीनों के लिए तुम्ही सद्गति हो ।
भला, तुम बोलते क्यों नहीं ? मैंने तुम्हें कहा ही क्या है ? हे पुत्र, मैं तो केवल जल
माँग रहा हूँ ।'
"मुनि के ये वचन मेरे मन के भय और शोक को बढ़ाने लगे । मैंने शीघ्र वृक्ष पर
चढ़कर काँवर नीचे उतारा और अत्यंत दीन होकर थर-थर काँपते हुए, एक क्षण तक इस
दुविधा में पड़ा रहा कि सारा समाचार कहूँ या न कहूँ । फिर यह सोचकर कि किसी
भी तरह मुझे कहना ही पड़ेगा, मैंने गद्गद स्वर से कहा—'हे उत्तम तपस्वी, मैं राजा
दशरथ हूँ । मैं आपका पालक हूँ, पुत्र नहीं हूँ । मैंने आज एक ऐसा नीच कर्म किया है,
जिसे सुनकर नीच व्यक्ति भी मेरी निंदा करेंगे । किसी भी युग में किसी और ने जो पाप
नहीं किया होगा, वैसा पाप करके मैं आज आपके पास आया हूँ । मैं कैसे कहूँ ? विधि ने

अयोध्याकांड १०७

ही मुझसे ऐसा दुस्साहस करने के लिए प्रेरित किया है । सरयू नदी के तट पर में अँधेरी
निशा में मृगया के लिए गया था और मृगों के आने के स्थान के पास छिपकर उनकी
आहट सुनकर उनपर शब्दवेधी बाण चलाकर उनका शिकार करता था । संयोग की बात,
उसी समय आपके पुत्र ने नदी के प्रवाह में जल के लिए कलश डुबोया । उसकी ध्वनि
सुनकर मुझे हाथी का भ्रम हुआ और मैंने बाण चला दिया । हे अनघ, मेरे उस शक्ति-
शाली बाण ने आपके पुत्र के प्राण हर लिये ।'
“इतना सुनना था कि मुनि का हृदय धक् से रह गया और वे मूर्च्छित हो गये ।
मुनि-पत्नी 'हाय पुत्र !' कहकर भूमि पर निश्चेष्ट हो गिर पड़ी । थोड़ी देर के बाद मेरा
विलाप सुनकर उनकी मूर्च्छा छूटी, तो उन्होंने मुझे देखकर कहा—'हे दशरथ ! तुमने हमको
शोकाग्नि में जलाने के लिए हमारे पुत्र को कहाँ छिपा रखा है ? वन में तपस्या करते हुए
हम अंधे तथा वृद्ध को मारकर तुमने घोर पाप किया है । तुम्हारा बाण लगते ही
न जाने हमारे पुत्र ने क्या कहा होगा ? कौन जाने कि उस हृदय-पीडा से उसके प्राण
निकल गये या अभी तक वह तड़प रहा है ? क्या मृत्यु का कोई कारण नहीं होना चाहिए
क्या बाण बिना कारण ही मुनि-पुत्र के प्राण हर सकता है ? वानप्रस्थ-आश्रम में जीवन
व्यतीत करनेवालों का वध, चाहे इन्द्र भी करें, तो उसका भी नाश हो जाता है, तो राजा
की क्या गिनती ? हे राजन्, तुमने अनजान में हमारे पुत्र का वध किया है, इसलिए तुम
पर क्रोध करना उचित नहीं है । अपने पुत्र को देखे बिना हमारी शोकाग्नि शांत नहीं
होगी । हमें अपने पुत्र के पास ले चलो ।'
“इस प्रकार शोक-विह्वल उन वृद्ध तपस्वियों को ले जाकर उन्हें उनके पुत्र को
दिखाकर मैंने कहा—'यही आपका पुत्र है । मुनि-पत्नी हाथों से टटोलते हुए कहने लगी,
'कहाँ है वह दयालु, उदार और विमलचेता ? कहाँ है वह तपोधन तथा पुण्यवान् ?
कहाँ है वह विद्वानों की प्रशंसा के योग्य आचरणवाला ? कहाँ है वह सतत वेदाध्ययन
में तत्पर ?' यों कहती हुई वह अपने पुत्र पर गिरकर विलाप करने लगी । फिर उन्होंने
उसे अपनी गोद में लिटाकर उसके भीगे हुए केशों पर सिर रखकर रोती हुई
कहने लगी—'हे विमलात्मा, हे यज्ञदत्त, हे सदाचरणवाले, हे धर्म-निपुण, तुम हमसे कहे बिना
कभी कहीं नहीं जाते थे । आज तुमने ऐसा क्यों किया ? आज स्वर्गलोक की यात्रा
के लिए जाते समय तुमने मुझसे क्यों नहीं कहा ? हे मेरे वंश-तिलक ! मैं बड़ी पापिनी हूँ ।
अर्द्ध-रात्रि के समय मैंने तुमसे (जल के लिए) जाने को कहा । गुरुजनों की भक्ति
में संसार में अद्वितीय पुत्र को मैंने खो दिया । मेरे लिए अब तपस्या किसलिए ? तुम्हारे
साथ परलोक जाने में ही मेरी सद्गति है । कहाँ तीक्ष्ण बाण और कहाँ तुम्हारे प्राण ?
कहाँ राजा दशरथ और कहाँ तुम ? हाय ! अन्त में तुम्हारे कर्म-फल ने इन सबका
संयोग करके तुम्हारे प्राण ले लिये हैं ।'
“शोक-संतप्त माता के इस तरह के आर्तनाद को सुनकर मुनि अपने पुत्र पर गिरकर
कहने लगे—'हाय पुत्र ! तुम तो मेरे पास आकर मेरी सेवा करते थे । आज मैं तुम्हारे
पास आया हूँ, तो भी तुम मेरी सेवा-शुश्रूषा नहीं करते हो, क्या तुम्हें यह उचित है ?

इस वाण से जो घाव तुम्हें लगा, उसके द्वारा क्या तुम्हारा सारा निर्मल गुण-समूह निकल
गया ? मैं अब किसे वेद पढाऊँगा ? किसे अब शास्त्र समझाऊँगा ? किसे धर्म सुनाऊँगा ?
काव्य किसे समझाऊँगा ? हमारी आवश्यकता पहचानकर हमें कौन फल तथा जल
लाकर देगा ? मैंने सदा तुम्हें चिरायु रहने का ही तो आशीर्वाद दिया है ? कब मैंने वज्रसम
‘शक्तिशाली वाण से तुम्हारी मृत्यु की कल्पना की थी ? हे पुत्र, तुम मुझे भी अपने साथ
ले चलो, तो मैं यम से भी पुत्र-भिक्षा देने की प्रार्थना करूँगा । संसार की यही रीति है
कि पुत्र अपने माता-पिता के परलोक-संबधी क्रिया-कर्म करते है । आज विधि ने उस
क्रम को उलट दिया और तुम्हारे क्रिया-कर्म करने के लिए हमें नियोजित किया । जबतक
तुम रहे, तुमने बड़ी भक्ति से हमारी सेवा करके हमारी रक्षा की । हे पुण्यचरित्र !
मैं किस युग में तुम्हारे जैसा पुत्र प्राप्त करूँगा ? तुम पाप-रहित हो, श्रेष्ठ तपोनिधि हो,
गुरुभक्त, परमार्थी, आर्य, धर्मनिष्ठ, दानी, पर-दुःखनिवारण करनेवाले, अन्न आदि महादान
करनेवाले जो पुण्य लोक प्राप्त करते हैं, वही तुम भी प्राप्त करो ।'
“इस प्रकार शोक करते हुए उन्होंने अपने पुत्र का यथाविधि अग्नि-संस्कार किया ।
यज्ञदत्त ने देवताओ के विमान में आरूढ हो आकाश की ओर प्रस्थान करते हुए कहा—
'हे गृहजनो, मैंने स्वर्गलोक का भोग प्राप्त किया है आपकी सतत सेवा करते हुए पुण्य-
वान् हुआ हूँ । अब मेरी मृत्यु का आप शोक मत कीजिए । जिस समय जो होना चाहिए,
वह हुए बिना नहीं रहता । होनहार होकर ही रहता है । आप इन पर (राजा पर)
क्रोध न कीजिए ।' इस प्रकार कह उसके स्वर्गलोक चले जाने के बाद, उन्होंने पुत्र-प्रेमजन्य
दुःख से प्रेरित होकर मुझे शाप दिया—‘हे राजन् ! लो, हम पुत्र-शोक से मर रहे हैं,
तुम भी हमारे समान ही पुत्र-शोक के कारण मृत्यु को प्राप्त करोगे ।’ इस प्रकार, कहकर
उन्होंने वहीं अपने प्राण छोड़ दिये ।”
२३. दशरथ का स्वर्गवास
'यही मेरा कर्म-फल है, जिसे भोगने का समय आसन्न है । अग्निसम पवित्र उन
तपस्वियो का अग्नि-संस्कार करके मैं नगर में लौट आया । मेरा धैर्य छूट गया है । मेरी
बुद्धि भ्रमित हो रही है, कंठ सूख रहा है, आँखें देखने में असमर्थ हो रही हैं, दूसरे के
शब्द सुनाई नहीं पड़ रहे हैं, अब मेरे प्राण रोकने पर भी इस शरीर में नहीं रुकेंगे ।
मेरे लिए कल्पतरु, बुद्धिमान्, पराक्रमी, गुणवान्, मेरा भाग्य-प्रद, शुभ-गुण-संयुक्त राम को
इस समय मैं नहीं देख पा रहा हूँ । आज सात दिन हुए, मैंने राम को नहीं देखा । राम
को छोड़कर मैं कैसे रह सकता हूँ ?’ इस प्रकार 'हा राम ! हा राम !' का आर्तनाद
करते हुए दशरथ का स्वर्गवास हो गया ।
शोक से अत्यधिक पीड़ित होकर राजा सो गये हैं, ऐसा सोचकर कौसल्या भी
सो गई । प्रभात होते ही बंदी तथा मागध स्तुति-पाठ करने लगे, मंगल-वाद्य बजने लगे और
नगर-निवासी एकत्रित होकर राजा के दर्शनार्थ उत्कंठा से प्रतीक्षा करने लगे । प्रतिदिन
की तरह राजा अबतक जगे क्यों नहीं, यह सोचते हुए परिचारक राजा की शय्या के
निकट गये और राजा को सोई हुई दशा में देख उन्हें कुछ भय हुआ । लंबी साँस भरते हुए