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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 125, कुल 508 में से

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पृष्ठ 125

अयोध्याकांड ६५
दो वल्कल दिये । तब सीता ने मन-ही-मन व्याकुल होकर राम से कहा—'वन में रहने-
वाले मुनि, न जाने इन वल्कलो को कैसे पहनते होगे ।' उन्होने एक वस्त्र को अपने कवे
पर डाल लिया और दूसरे को हाथ में लिये पहनने में असमर्थ हो खडी रही । राम ने
यह ढग देखा तो उन्होने स्वय सीता को वह वल्कल पहना दिया । सभी रानियो ने राघव
को देखकर कहा--'हे राजकुमार ! इस श्रेष्ठ राजकुमारी सीता को इतना निष्ठुर होकर
तपस्विनी की तरह घने जगलो में क्यो ले जा रहे हो ? हमारी बात मानकर तुम सीता
को हमारे पास छोड़ दो और लक्ष्मण के साथ तुम वन जाओ।'
१४. कैकेयी पर वसिष्ठ का क्रोध
तब वसिष्ठ कैकेयी को देखकर अत्यत क्रोध से बोले—"तुम कुलनाशिनी हो ।
तुमने राजा को धोखा दिया है । तुमने जैसा पाप किया, वैसा पाप कही भी किसी ने नही
किया है । रघुराम की आज्ञा से जानकी को रानियो के साथ रहने दो । तुम इसे स्वीकार
क्यो नही करती हो ? यदि वैदेही वन में चली जायगी, तो हम भी नगर-निवासियो के
साथ वन चले जायेंगे । इतना ही नही, भरत तथा शत्रुघ्न अत्यत प्रसन्न मन से रामचन्द्र
की सेवा करने के लिए वन जायेंगे । तब तुम इस निर्जन नगर में रहोगी । राम पुण्यशील हैं ।
उसके रहने से इस नगर की शोभा है । उसके चले जाने के बाद यह नगर उजडा
हुआ दीखेगा । पाप-पूर्ण मन से तुमने पति को धोखा दिया । अधिक लोभ से प्रेरित हो,
तुम राम को वन में भेजकर भरत का राज-तिलक करके चिर काल तक राज्य करने की
बात सोच रही हो । भरत कभी अपने पिता की आज्ञा नही टालेगा । वह अपने भाई
रामचन्द्र को पितृ-तुल्य मानता है । तुम्हारी बात सुनकर, धर्म-निष्ठा को त्यागकर, रामचन्द्र
को ठुकराकर क्या वह राज्य ग्रहण करेगा ? वह दशरथ का पुत्र है । तुम्हारा दोष
सिद्ध होने पर, क्या वह तुम्हे मन से माता मानेगा ? क्या राम के वन में रहते हुए वह
साम्राज्य का भार वहन करेगा ? तुम भरत का हृदय नही जानती । अगर उसे यह बात
मालूम हो जाय, तो वह तुम पर क्रुद्ध होगा । किसके लिए तुम इतने निष्ठुर बन रही हो ?
क्या भरत इसके लिए अपनी स्वीकृति देगा ? कदापि नही । इसलिए इसे तुम
शुभप्रद मत समझो । इतना ही नही, राम तथा सीता को वल्कल देने के लिए तुम्हारे
हाथ कैसे आगे आये ? वल्कल छोड़कर नवरत्न-खचित आभूषण तथा चीनाम्बर पहने जानकी
परिचारिकाओ के साथ वन में जाय ।"
इस प्रकार कहते हुए उस सयमीश्वर ने सीता को सुन्दर वस्त्र तथा आभूषण दिये ।
सीता ने उन्हें ग्रहण किया और वल्कल वही छोड़ दिये । सब लोग कैकेयी की निंदा करने लगे ।
राजा सबकी निंदा सुनते रहे और अत में कैकेयी को देखकर बोले—'तुमने मन
में पाप का सकल्प करके राम के लिए वनवास माँगा था । लेकिन क्या तुमने मुझसे
यह भी माँगा था कि सीता को वल्कल पहनने चाहिए ? क्या यह मानवती इसके लिए
योग्य है ? मैने क्या पाप किया, जो तुम इतनी क्रूर बनी हुई हो ? विनयाभिराम राम को
तपस्वी के रूप में वन भेजने से बढकर कोई और पाप है ? उसे यहाँ से भगाकर भी तुम्हें
चैन क्यो नही मिलता ? ऐसी पापिनी का पति मेरे पापो का अत ही नही है क्या ?'