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सर्वकोश
रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 508 में से

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पृष्ठ 121

अयोध्याकांड
६९

निश्चय है।' अनुज का यह दृढ़ निश्चय सुनकर राम ने उन्हें अपने साथ चलने की
अनुमति दे दी।
११. राम-लक्ष्मण का संपत्ति-दान
फिर राम ने अपने अनुज लक्ष्मण को भेजकर वसिष्ठ के पुत्र उत्तम गुण-सम्पन्न सुयज्ञ
को बुलवाया और उचित रीति से उनका आदर-सत्कार करके उन्हें हार, कुडल, वलय,
अंगद आदि सभी आभूषण, मामा का दिया हुआ मत्त गज, ख्याति, शत्रुजय आदि नामवाले
सहस्र हाथी, सुन्दर वस्त्र आदि दान में दिये। इनके अतिरिक्त राम ने उन्हें दस करोड सुवर्ण-
मुद्राएँ तथा अन्य अनुपम वस्तुएँ भी बडी श्रद्धा मे दी। उन्हें ग्रहण करके सुयज्ञ ने हर्षित
होकर आश्चर्य-चकित हृदय से उस राज-दंपती को आशीर्वाद दिये। उसके पश्चात् उन्होने
अपने राज-कोष का समस्त धन मँगाकर, याचको, निर्धनो तथा दीन-जनो में वितरित
कर दिये। अगस्त्य तथा कौशिक मुनियो को रत्न-राशियाँ दान कर दी। वसिष्ठ आदि मुनियों,
तथा तपस्वियो को उचित दान दिया। बंदी-मागध आदि, परिजन तथा अन्य निर्धनों को
अमित धन दिया। तत्पश्चात् ब्राह्मणो तथा बंधु-मित्रो को भिन्न-भिन्न प्रकार के दान देकर
उन्होने सौमित्र की ओर देखकर कहा—'तुम भी दान करो।' तब उस राजकुमार ने बडे
आनंद से कौशिक, गार्ग्य तथा शांडिल्य को बुलवाकर उन्हें अमित धन दिया। जिस किसी ने
जो कुछ माँगा, उसे उन्होने दे दिया। सीता ने परम कल्याणी अरुंधती तथा सुयज्ञ की
पत्नी को अपने आभूषण, अपना धन, तथा अपने अंतःपुर के सभी वस्तु-समूह दान में
दे दिये। तब अरुंधती ने वसिष्ठ को देखकर कहा—'हाय। इक्ष्वाकु के वंशजो की ऐसी
दशा देखकर चुप रह जाना क्या आपको उचित लगता है?' मुनि ने अच्छी तरह विचार
करके कहा—'यह भगवान् की इच्छा है, किसी भी तरह यह टल नही सकती। तुम चुप-
चाप देखो।'
१२. त्रिजटाख्य को राम का गायों का दान देना
उस समय त्रिजटाख्य नामक एक विप्र अपनी जीविका चलाने के उद्देश्य से खेत
जोतते हुए मन-ही-मन अपने दारिद्र्य का विचार करके दुःखी हो रहा था। उसकी स्त्री
अपने बच्चो के साथ अपने पति के पास गई और काम में व्यस्त पति को देखकर कहा—
'हे नाथ, अभी आप हल चलाने में क्यो व्यस्त हैं, हल को वही छोडकर आइए, मै एक
बात कहती हूँ। आज रामचन्द्र बडे आनंद से सभी याचको को असंख्य धन दान कर रहे है।
जो कोई जो कुछ माँगता है, उसे वे दे रहे हैं। आप अपना कुल तथा अपना नाम
बतलाकर उस काकुत्स्थ पति से अपने इच्छानुसार धन प्राप्त कर लीजिए। आप शीघ्र
जाइए।'
यह सुनकर उस विप्र की इच्छाएँ प्रबल हो उठी। वह तुरत रामचन्द्र के निकट
पहुँचकर उन्हें आशीर्वाद देकर बोला—'हे राजन्, मै निपट दरिद्र हूँ। मेरे कई बाल-बच्चे हैं।
मैं अत्यन्त निर्धन हूँ। आप मेरी रक्षा करें। तब रघुराम बोले—'अभी मेरे पास
गायो के कई समूह हैं। आप अपनी सारी शक्ति लगाकर कोई ढेला फेंकिए। आपका
ढेला जितनी दूर तक जायगा, उतनी दूर तक की भूमि में जितनी गायें हैं, वे सब आपको