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रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)

Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation

रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा

DevanagariHindipublished508 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 508 में से

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पृष्ठ 124

राज्य करते थे । क्या उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र अममजस को विना किसी झिझक के नगर
म बाहर नहीं कर दिया था ? तब आप भी यदि राम को वन में भेज दें, तो इसमें
दोप ही क्या है ?'
शोक-समुद्र में डूबे हुए दशरथ इसका प्रत्युत्तर नहीं दे सके । तब सिद्धार्थ नामक
मंत्री ने कपटी कैकेयी को देखकर कहा—'असमंजस दर्प से उद्धण्ड होकर नगर के बालकों
को वाँव-वाँधकर सरयू नदी में फेंक देता था । जब प्रजा ने राजा से इसकी शिकायत की,
तब जन-हित का विचार करके उन्होंने अपने पुत्र को नगर से निर्वासित कर दिया । क्या
रामचंद्र में कोई दोप है ? वे तो उत्तम गुण-सपन्न हैं ।'
तब कैकेयी बोली—'राम तो पिता के दिये हुए वचनो का पालन कर रहा है ।
वह सुकृति है ।' कैकेयी की निष्ठुरता देखकर दशरथ बहुत दुखी हुए और सुमंत्र को देखकर
बोले—'हे सुमंत्र, तुम राज्य के धन, मणियाँ, गोधन, बंधुजन, अत पुर के निवासी मित्र,
मंत्री तथा विजय-चिह्नो से अलंकृत गज, रथ, तुरग आदि सब को राम के साथ भेज दो ।
इस शून्य नगर पर ही कैकेयी का पुत्र राज्य करेगा ।'
इन वचनो को सुनते ही कैकेयी क्रोध से जल उठी । वह अपने पति को कोसती
हुई बोली—'हे राजन्, आप रामचंद्र को राज्य का ऐश्वर्य देकर उजड़ा हुआ नगर भरत
को क्यो देना चाहते हैं ? ऐसी वातें क्यो करते हैं ? यदि राम, सौमित्र तथा जानकी के
माथ वल्कल पहनकर संतुष्ट मन से सारे ऐश्वर्य को त्याग कर मेरे देखते हुए वनवाम के
लिए नहीं जायगा, तो आपका वचन पूरा नहीं होगा । आपका वचन भूठा होगा । हे राजन्,
में आपके वर नहीं चाहती । निश्चय ही आपका वचन भग हुआ ।'
कैकेयी की वातें सुनकर दशरथ मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़े । उस दगा में
पृथ्वी पर पड़े हुए पिता को देखकर घोर परिताप से पीड़ित होकर राघव बोले—
'हे माताजी ! आप वार-वार महाराज की निंदा क्यो करती हैं ? मेरे गुरु, महाराज, मेरे
पूज्य पिता, मेरे परमदेव, मुझे आज्ञा दें, तो मे प्रेम से विप-पान भी करूँगा । प्रचंड
अग्नि या विप के समुद्र में भी प्रविष्ट होऊँगा । वनो में जाकर मुनियों के साथ रहना
कौन-सा वडा कार्य है ?'
दशरथ उन वचनो को सुनकर कैकेयी को देखकर बोले—'सुनो, में भी राज्य छोड़-
कर राम के साथ वन में जाऊँगा । तुम समस्त वैभव के साथ भरत को अयोध्या का राजा
वनाकर राज्य करो । अब अधिक विवाद क्यो ?' तब राम ने राजा से कहा—'महाराज,
निर्जन वन मेरे लिए योग्य रहेगा । मेरे साथ और कोई क्यो आये ? मेरे लिए वल्कल
मँगाइए । में उन्हें धारण कर चौदह वप तक वन में रहते हुए आपकी आज्ञा का पालन
करूँगा । माता, आप शीघ्र हमें वल्कल दीजिए ।'
तब कैकेयी निर्लज्ज होकर मन-ही-मन प्रसन्न होती हुई सबके सामने वल्कल ले
आई और उन्हें राम को देकर बोली—'हे राजकुमार ! इन्हें धारण कर लो ।'
राम ने वडी प्रसन्नता से माता से वल्कल ले लिये और अपने कपड़े उतारकर
वल्कल पहन लिये । राम के ममान ही लक्ष्मण ने भी वल्कल पहने । कैकेयी ने मीता को