रंगनाथ रामायण (प्रसिद्ध दक्षिण भारतीय रामायण - सम्पूर्ण सविस्तार हिन्दी अनुवाद)
Ranganatha Ramayana: Complete Hindi Translation
रंगनाथ कवि (हिन्दी अनुवादक: अवधेश गुप्त) द्वारा
पृष्ठ 123, कुल 508 में से
संदर्भ में पढ़ेंअयोध्याकांड [९३]
की रक्षा करने के हेतु मुझे वन-गमन के लिए उद्यत देखकर साध्वी जानकी तथा सौमित्र,
मेरे मना करने पर भी मेरे साथ वन जाने के लिए प्रस्तुत हो गये हैं । उन्हें भी वन जाने
की अनुमति प्रदान कीजिए ।'
इन वचनो को सुनकर राजा ने कहा—'मतिभ्रष्ट कैकेयी की बातो में आकर मैने
तुम्हें वन जाने का आदेश देकर बडी निर्दयता की है । किन्तु तुम्हें उसका पालन करने
की आवश्यकता ही क्या है ? तुम अपने ढंग से राज्य करो ।'
इस पर राम ने हाथ जोडकर कहा—'हे राजन्, आप मेरे गुरु हैं, पृथ्वीपति हैं,
प्रेम से मेरी रक्षा करनेवाले आप्त-बन्धु हैं । अतः, आप अपनी आज्ञा का पालन करने की अनु-
मति मुझे दीजिए और जाने की आज्ञा भी दीजिए । सत्यनिष्ठ होकर आप सदा समस्त
लोको का पालन कीजिए ।'
दशरथ बोले—'हे वत्स ! तुम चिरायु, अमितशुभ, सुयश, पराक्रम, निष्कलंक धर्म-
बुद्धि प्राप्त करो । तुम्हें किसी प्रकार का कष्ट न हो । हे पुत्र, तुम आज रात को यही
रहकर कल वन के लिए प्रस्थान करो ।' इस पर राम ने कहा—'हे महाराज, हमारा
अब यहाँ रहना उचित नही है । आज और कल में विशेष अंतर नही पडता । अतः, आप
हमें स्नेह से जाने की अनुमति दीजिए । मेरे अनुज भरत को राज्य-पालन करने दीजिए ।
अब आप शोक मत कीजिए ।'
राम की त्याग-बुद्धि देखकर महाराज दशरथ को अत्यधिक दुख हुआ । वे बोले—
'तुम्हारे जैसे सुपुत्र को घोर जंगलो में निवास करने की अनुमति मैं किस मुंह से दूँ ?
हाय ! कैकेयी की बातो में आकर मै धोखा खा गया ।' यो कहते हुए वे करुणोत्पादक ढंग
से विलाप करने लगे । अंतःपुर की सब नारियाँ भी रोने लगी । इसी समय कौसल्या
तथा सुमित्रा दुख-संतप्त हृदय से वहाँ आईं और राजा के साथ विलाप करने लगीं ।
उन रमणियो तथा राजा का विलाप सुनकर सुमंत्र अपार दुख से पीडित हुए और
क्रोध से कैकेयी की ओर देखकर कहने लगे—'आपके कारण ही राजा को तथा हम सबको
यह संताप हो रहा है । मैं आपको क्या कहूँ ? आप पति के हित का विचार न करने-
वाली राक्षसी है । आप भी अपनी माता के समान ही पति की हत्यारिन हैं । आपके
पिता सभी भाषाओ के ज्ञाता थे । एक दिन वे और आपकी माता शय्या पर लेटे हुए थे ।
तब उन्होने किन्ही कीडो को आपस में बोलते हुए सुना और उसका विचार करके
हँस दिया । तब तुम्हारी माँ ने अपने पति से कहा—'बतलाइए कि आप क्यो हँस रहे
रहे है ?' तब उन्होंने कहा—'यदि मैं इसका कारण तुम्हें बतला दूँ, तो मेरी मृत्यु हो
जायगी ।' किन्तु आपकी माँ ने कहा कि 'मै आपकी मृत्यु से नही घबराती, आप अवश्य
अपनी हँसी का कारण बतलाइए । तब उन्होने निर्दय होकर आपकी माता को नगर से
निर्वासित कर दिया । भला, ऐसी चंडी की पुत्री, आपको अपने पति के हित का विचार
कैसे होगा ?'
कैकेयी सिर झुकाकर थोडी देर तक सोचती रही और फिर दशरथ को देखकर
बोली—'हे राजन्, प्राचीन काल में आपके वंशज महाराज सगर महान् यशस्वी होकर