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रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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आत्म-चरित्र ३
निर्वाह (गुजर-बसर) हो सकता था ? दादीजी ने बहुत प्रयत्न किया कि अपने आप
केवल एक समय आधा पेट भोजन करके बच्चों का पेट पाला जाए, किन्तु फिर
भी निर्वाह न हो सका। बाजरा, कुकनी, सामा, ज्वार आदि खाकर दिन काटने
चाहे, किन्तु फिर भी गुजारा न हुआ। तब आधा बथुआ, चना या कोई दूसरा
साग, जो सबसे सस्ता हो उसको लेकर, सबसे सस्ता अनाज उसमें आधा मिलाकर
थोड़ा-सा नमक डालकर उसे स्वयं खातीं और लड़कों को चना या जौ की रोटी
देती थीं। दादाजी भी इस प्रकार समय व्यतीत करते थे। आधा पेट खाकर बड़ी
कठिनाई से दिन तो कट जाता, परंतु पेट में घोंटू दबाकर रात काटना कठिन हो
जाता। यह तो भोजन की दशा थी, वस्त्र तथा रहने के स्थान के किराये के लिए
धन कहाँ से आता ? दादीजी ने चाहा कि भले लोगों के घरों में उन्हें कोई
मजदूरी ही मिल जाए, किन्तु अनजान व्यक्ति का, जिसकी भाषा भी अपने देश
की भाषा से न मिलती हो, भले घरों में सहसा कौन विश्वास कर सकता था ?
कोई मजदूरी पर अपना अनाज भी पीसने को न देता था। डर था कि अकाल
का समय है, खा लेगी। बहुत प्रयत्न करने पर दो एक महिलाएँ अपने घर पर
अनाज पिसवाने पर राजी हुईं, किन्तु काम कर रही पुरानी मजदूरिनों को जवाब
कैसे दें ? इसी प्रकार अड़चनों के बाद पाँच-सात सेर अनाज पीसने को मिल
जाता, जिसकी पिसाई उस समय एक पैसे प्रति पंसेरी थी। बड़ी कठिनाई से आधा
पेट एक समय भोजन करके तीन-चार घंटों तक पीसकर एक पैसा या डेढ़ पैसा
मिलता। फिर घर पर आकर बच्चों के लिए भोजन तैयार करना पड़ता था। दो,
तीन वर्ष तक यही दशा रही। दादाजी प्रायः अपने गाँव लौट जाने का विचार
प्रकट करते, किन्तु दादीजी का यही उत्तर होता कि जिनके कारण देश (गाँव)
छूटा, धन-सामग्री सब नष्ट हुई और ये दिन देखने पड़े अब उन्हीं के पैरों में
सिर रखकर दासत्व स्वीकार करने से इसी प्रकार प्राण देना ही श्रेष्ठ है, ये दिन
सदैव न रहेंगे। सब प्रकार के संकट सहे, किन्तु दादीजी देश (गाँव) को लौट
कर न गईं।