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रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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2 रामप्रसाद बिस्मिल की आत्मकथा
व्यतीत करता है। राज्य को लिखा गया, जिसका परिणाम यह हुआ कि उतनी
भूमि उन महाशय को माफी में दे दी गई। इसी प्रकार एक समय इन गाँवों के
निवासियों को एक अद्भुत खेल सूझा। उन्होंने महाराजा के रिसाले के साठ ऊँट
चुराकर बीहड़ों में छिपा दिए। राज्य को लिखा गया, जिसपर राज्य की ओर से
आज्ञा हुई कि दोनों गाँव तोप लगाकर उड़वा दिए जाएँ। न जाने किस प्रकार
समझाने-बुझाने से वे ऊँट वापस किए गए और अधिकारियों को समझाया गया
कि इतने बड़े राज्य में थोड़े से वीर लोगों का निवास है, इनका विध्वंस न करना
ही उचित होगा। तब तोपें लौटाई गईं और गाँव उड़ाए जाने से बचे। ये लोग
अब राज्य के निवासियों को तो अधिक नहीं सताते, किन्तु अनेक बार अंग्रेजी
राज्य-³ में आकर उपद्रव कर जाते हैं और अमीरों के मकानों पर छापा मार कर
रात-ही-रात बीहड़ में दाखिल हो जाते हैं। बीहड़ में पहुँच जाने पर पुलिस या
फौज कोई भी उनका बाल-बाँका नहीं कर सकती। ये दोनों गाँव अंग्रेजी राज्य की
सीमा से लगभग पंद्रह मील की दूरी पर चंबल नदी के तट पर हैं। यहीं के एक
प्रसिद्ध वंश में मेरे पितामह (बाबा) श्री नारायणलाल जी का जन्म हुआ था। वह
पारिवारिक कलह और अपनी भाभी के असहनीय दुर्व्यवहार के कारण मजबूर हो
अपनी जन्मभूमि छोड़ इधर-उधर भटकते रहे। अंत में अपनी धर्मपत्नी व दो पुत्रों
के साथ वह शाहजहाँपुर पहुँचे। उनके इन्हीं दो पुत्रों में ज्येष्ठ पुत्र श्री मुरलीधर
जी मेरे पिता हैं। उस समय उनकी आयु आठ वर्ष और उनके छोटे पुत्र- मेरे
चाचा श्री कल्याणमल- की उम्र छः वर्ष की थी। इस समय यहाँ अकाल का
भयंकर प्रकोप था।
दुर्दिन
अनेक प्रयत्न करने के बाद शाहजहाँपुर में एक अत्तार महोदय की दुकान
पर मेरे बाबा श्री नारायण लाल जी को तीन रुपये मासिक वेतन की नौकरी
मिली। तीन रुपये मासिक में अकाल के समय चार प्राणियों का किस प्रकार