रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)
Autobiography of Ram Prasad Bismil
पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंआत्म-चरित्र ५
शूद्र जाति (उत्तर भारत के संदर्भ में) की वधुओं के लिए भी यही नियम
है कि वे रास्ते में बिना घूँघट निकाले न जाएँ। शूद्रों का पहनावा ही अलग है,
ताकि उन्हें देखकर ही दूर से पहचान लिया जाए कि वह किसी निम्न जाति की
स्त्री है। ये प्रथाएँ इतनी प्रचलित हैं कि उन्होंने अत्याचार का रूप धारण कर
लिया है। एक समय किसी चमार की वधू, जो अंग्रेजी राज्य से विवाह करके गई
थी, कुल प्रथानुसार ज़मींदार के घर पैर छूने के लिए गई। वह पैरों में बिछुवे
पहने हुई थी और सब पहनावा चमारों का पहने थी। ज़मींदार महोदय की निगाह
उसके पैरों पर पड़ी। पूछने पर मालूम हुआ कि चमार की बहू है। ज़मींदार साहब
जूता पहनकर आए और उसके पैरों पर खड़े होकर इतने जोर से दबाया कि
उसकी अंगुलियाँ कट गईं। उन्होंने कहा कि यदि चमारों की बहुएँ बिछुवा पहनेंगी
तो ऊँची जाति के घर की स्त्रियाँ क्या पहनेंगी ? ये ऊँची जाति के लोग बहुत
अशिक्षित तथा मूर्ख हैं, किन्तु जाति के अभिमान में चूर रहते हैं। गरीब-से-गरीब
अशिक्षित ब्राह्मण या क्षत्री, चाहे वह किसी आयु का हो, यदि शूद्र जाति की
बस्ती में से गुजरे तो चाहे कितना ही धनी या वृद्ध कोई शूद्र क्यों न हो, उसे
उठकर पालागन या जुहार करनी ही पड़ेगी। यदि ऐसा न करे तो उसी समय वह
ब्राह्मण या क्षत्री उसे जूतों से मार सकता है।
परमात्मा की दया से बुरे दिन समाप्त हुए। पिताजी कुछ शिक्षा पा गए।
और एक मकान भी दादीजी ने खरीद लिया। दरवाज़े-दरवाज़े भटकने वाले कुटुंब
को शांतिपूर्वक बैठने का स्थान मिल गया और फिर श्री पिताजी का विवाह करने
का विचार हुआ। दादीजी दादाजी तथा पिताजी के साथ अपने मायके गईं। वहीं
पिताजी का विवाह कर दिया। वहाँ दो-चार मास रहकर सब लोग वधू की विदाई
कराकर साथ लिवा लाए।