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सर्वकोश
रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा (काकोरी के अमर शहीद की जेल डायरी व आत्मकथा)

Autobiography of Ram Prasad Bismil

पं. रामप्रसाद 'बिस्मिल' (सम्पादक: बनारसीदास चतुर्वेदी) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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प्रथम खण्ड
आत्म-चरित्र
तोमरधार-1 में चंबल नदी के किनारे पर दो ग्राम आबाद हैं, जो ग्वालियर
राज्य में बहुत प्रसिद्ध हैं, क्योंकि इन गाँवों के निवासी बड़े उद्दंड हैं। इन गाँवों
के निवासी राज्य की सत्ता की कोई चिन्ता नहीं करते। ज़मींदारों का यह हाल है
कि जिस साल उनके मन में आता है राज्य को भूमि-कर (लगान) दे देते हैं और
जिस साल उनकी इच्छा नहीं होती, मालगुजारी देने से साफ इंकार कर जाते हैं।
यदि तहसीलदार या कोई और राज्य का अधिकारी आता है तो ये ज़मींदार
बीहड़-2 में चले जाते हैं और महीनों बीहड़ों में ही पड़े रहते हैं। उनके पशु भी
वहीं रहते हैं और उनका खाना-पीना भी बीहड़ों में ही होता है। घर पर कोई
ऐसा मूल्यवान पदार्थ नहीं छोड़ते जिसे नीलाम करके मालगुजारी वसूल की जा
सके। एक ज़मींदार के संबंध में यह कथा प्रचलित है कि मालगुजारी न देने के
कारण ही उसको कुछ भूमि माफी में मिल गई। पहले तो कई साल भागे रहे।
एक बार धोखे से पकड़ लिए गए तो तहसील के अधिकारियों ने उन्हें बहुत
सताया। उनको कई दिनों तक बिना खाना-पानी दिए रस्सी से बाँधकर रखा। अंत
में जलाने की धमकी दे, उसके पैरों पर सूखी घास डाल कर आग लगवा दी।
किन्तु उन ज़मींदार महोदय ने भूमि-कर देना स्वीकार नहीं किया। और यही उत्तर
दिया कि ग्वालियर महाराज को कोष में मेरे कर न देने से ही घाटा नहीं पड़
जाएगा। संसार क्या जानेगा, अमुक व्यक्ति उद्दंडता के कारण ही अपना समय