रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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( १८ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
पुरीमें बसे रहतहैं औ सुखदायक गणपति कहे यूथप औ लायक श्रेष्ठ पशुपति
गोपालादि अथवा गजादि औ सहायक कहे जे सबकी सहाय करत हैं ऐसे जे
शूर योद्धा हैं तिन्हें को गनै बहुत हैं औ सेनापति चमूनाथ बुधजन पंडित औ
मंगल पाठी औ गुरुगण वसिष्ठादि अथवा मंगल कर्ता जे गुरुगण वसिष्ठादिहैं
औ मनमें बुद्धि है घनी जाके ऐसो धर्मराज कहे न्यायदर्शी है कोतवालेति औ
बहुत प्राणी शुभ जो मनसा मनोभिलाष है ताके करनहार हैं अर्थ मनोरथके
दाता हैं औ बहुत करुणामय कहे दयाशील हैं. औ सुरतरंगिनी सरयू इनकी
शोभा सों सनी है अर्थ इन सबसों युक्त है ॥ ४१ ॥
मू०-हीरकछन्द ॥ पंडितगण मंडितगुण दंडित मति
देखिये। क्षत्रिय बर धर्म प्रवर क्रुद्ध समर लेखिये ॥ वैश्य
सहित सत्य रहित पाप प्रगट मानिये । शूद्र सकति विप्र
भगति जीव जगत जानिये ॥ ४२ ॥
टी०-पंडित पदते ब्राह्मण जानौ ते अनेक गुण जे शास्त्रादि हैं तिनसों
पंडित युक्त हैं औ दंडित हैं संक्षितहै मति जिनकी अर्थ सत् मति सों युक्तहैं
औ क्षत्रिय क्षत्र धर्म करिकै प्रवर बली हैं औ समरहीमें क्रोधकरत हैं औ
वैश्य बनिया सत्य सों युक्त हैं औ पापसों रहित हैं औ शूद्रन के जीवमें
ब्राह्मण की भक्तिज्ञ गति है ताही में तिनकी शक्तिबल जानियतहैं अर्थ शूद्र-
भक्ति युक्त ब्राह्मणकी सेवा करत है अथवा शूद्रनके जीवमें शक्ति कहे देवी
औ विप्रकी भक्ति जगतिहै शूद्रनको देवी औ ब्राह्मणनकी उपासना उचितहै
या प्रकार आपने अपने धर्म सों युक्त चारों वर्ण बसत हैं यामें ॥ ४२ ॥
मू०-सिंहविलोक्ति छंद ॥ अति मुनितन् मन तहँ
मोहि रह्यो । कछु बुधिवल वचन न जाइ कह्यो ॥ पशु
पक्षि नारि नर निरखि तबै । दिन रामचन्द्र गुण गनत सबै
॥ ४३ ॥ मरहट्टाछन्द ॥ अतिउच्च अगारनि बनी पगारनि
जनु चिंतामणि नारि । बहुशत मख धूपनिधूपित अंगनि
हरिकीसी अनुहारि । चित्रीबहु चित्रनि परम विचिन्त्रिनि