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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

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पृष्ठ 16

(१०) रामचन्द्रिका-सटीक ।
टीका-केशव पूँछयो कि लोभ मोहादि कृत जो दुःख हैं सो कैसे तरिहैं
तब मुनि कह्यो कि, जब तू रामनाम ग्रहण करिहै तब रामचन्द्र हरि हैं छोडाइ हैं
इहां हरिशब्द यासों कह्यो कि 'हरतिदुःखमिति' हरिः अर्थ दुःख हरिवो उनके
नामहींको अर्थ है ॥ ११ ॥ दुःख छोडाई रामचंद्र मुक्ति देहिं या निश्चय के अर्थ
रामचंद्रको ईश्वरत्व केशवको मुनि चारिछंदमें देखावत हैं जो जगत्‌को शरण
रक्षक है सो बरण रूप राम रूप अथवा रामनामांक तुम करिकै वर्णिवे है अर्थ
रामचंद्र को रूप अथवा राम नाम वर्णन करो ॥ १२ ॥ सब जग कहत है कि
रघुनन्दन जे रामचन्द्र हैं ते सुखके कंद कहे मूलहैं इनहीं के आश्रित सब सुख
है औ जग वंद्यहै सब जग जिनको वंदना करत है सुखकंद कहि या जनायो कि
सुखसार रामचंद्रही सों पाइ है और देव देवेको समर्थ नहीं हैं ॥ १३ ॥ जिन
रामचंद्रको वेद जो हैं सो एकरूपी कहे जो सदा एकरूप रहतहें ब्रह्मज्योति
जासों गुन्यो कहे ठहरायोहै सो गान करत हैं सो हम वेद वाक्य सों सुन्यो है
अथवा एककहे जिन सम दूसरो नहींहै औ रूपीकहे अनेक रूपसों सर्वत्र व्याप्त हैं
फिरि कैसे हैं जिनको महादेव सदा ध्यावते हैं ॥ १४ ॥ यामें रामचंद्रके गुणन-
को माहात्म्य है अनंत शेष विशेष निर्णय ॥ १५ ॥
मू०-नगस्वरूपिणीछंद ॥ भलोबुरोनतुंगुनै। वृथाकथाकह्रै-
सुनै॥ नरामदेवगाइहै। न देवलोक पाइहै ॥ १६ ॥ षटपद॥
बोलिनबोल्यो बोल दयो फिर ताहि न दीन्हों। मारिनमार्यो-
शत्रुक़ोधमनवृथानकीन्हों ॥ जुरिन मुरे संग्राम लोककीलीक
न लोपी । दान सत्य सन्मान सुयश दिशि विदिशा ओपी॥
मनलोभ मोहमदकामवश भये न केशवदास भणि । सोइ
परब्रह्म श्रीरामहै अवतारी अवतार मणि ॥ १७ ॥ दोहा ॥
मुनिपति यहउपदेशकै, जबहीं भयो अदृष्ट ॥ केशवदास तहीं
करचो, रामचन्द्रजू इष्ट ॥ १८ ॥
टी०-तू अनेक कथा वृथा कह्यो सुनो करत है आपनो भलो बुरो नहीं
गुनतो विचारतो जबलौं जैसो पूर्व कहि आयं ऐसे रामदेव को न गाइ है तबलों
अनेक कथन सों देवलोक न पैहै इहाँ देवलोक वैकुंठ जानो वैकुंठ देवेकी शक्ति