रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमप्रकाशः १. ( १७ )
मढहीं सकल दिशा । सबई सब विधि छम बसत यथा
क्रम देवपुरी सम दिवस निशा ॥ ४० ॥
टी०-ताहीश्वेतपताका पंक्तिमें फेरि तर्क है ॥ ३९॥ द्वै छंदको अन्वय एकहै
क्षोभैहैं डरतैहैं हम समर्थ रातिउ दिन देवपुरी सम है यामें श्लेषार्थ हूहै कैसी देव-
पुरी औ अयोध्या है सम बराबरी है दिनराति जामें घटत बढ़त नहीं
छह महीना उत्तरायण दिन रहत है दक्षिणायन राति रहति है औ समहै
तुल्य आनंद दायक है रातिउ दिन जामें रात्रिहूको चौरादिको भय नाहीं होत
और अर्थ दुवोपक्षकही है ॥ ४० ॥
मू ०-कविकुल विद्याधर सकल कलाधर राजराजबरवेष
बने । गणपति सुखदायक पशुपति लायक शूर सहायक
कौन गने ॥ सेनापति बुधजन मंगल गुरु गण धर्मराज मन
बुद्धि घनी । बहु शुभ मनसाकर करुणामय अरु सुरतरं-
गिनी शोभसनी ॥ ४१ ॥
टी ०--फेरि कैसी है देवपुरी कवि शुक औ कुल कहे समूह विद्याधरनके
विद्याधर देवयोनि विशेष हैं औ सकल कलाधर चंद्रमा औ राजराज कुबेर ये
सब पवरद कहे सुंदरवेष कहे रूपसों बनैहैं औ सुखदायक जो गणपति गणेश हैं
औ लायक कहे श्रेष्ठ पशुपति महादेव हैं औ सूर कहे सूर्य औ जे इन्द्र
सहायक कामादि हैं तिन्हें को गनै अर्थ की अनेक हैं सेनापति स्वामिकार्तिक
औ बुधजन चन्द्र पुत्रजन पद इहाँ स्वरूपको वाची है औ मंगल भौम • औ
गुरु बृहस्पति औ गणकहै गणदेवता ॥ “आदित्यविश्ववसवस्तुषिताभास्वर।-
निलाः । महाराजिकसाध्याश्च रुद्राश्च गणदेवताः । इत्यमरः” औ मनमें बुद्धिहै
घनी जिनके ऐसे धर्मराज कहे यमराज हैं बहु शुभयुक्त हैं मनसाकर कहे
कल्पवृक्ष औ 'करुणामय कहे विष्णु औ सुरतरंगिनी आकाशगंगा इन सबकी
शोभा सों सनीहै अर्थ ये सब बसत हैं यामें अयोध्या कैसी है कवि काव्यकर्ता
वाल्मीकि सदृश औ विद्या चतुर्दश ॥ “अंगानि वेदाश्चत्वारो मीमांसान्याय-
विस्तरः ॥ पुराणं धर्मशास्त्रं च विद्याश्चैताश्चतुर्दशः” इति । मनुः ॥ अथवा
धनुर्विद्यादि तिनके धर्ता औ सकल कहे चौंसठिहू कलानके धर्ता औ राजराज
कहे बड़े राजा ते वरवेषसों बनेहैं अनेक राजा राजादशरथकी सेवामें हाजिर
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