रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रकट सुरपुर की चली । यह किधौं सरित सुदेश मेरी करो
दिवि खेलित भली ॥ ३८ ॥
टी०-उपवन वाटिका ॥ ३४ ॥ ३५ ॥ अवास पर ॥ ३६ ॥ दंडधारिणी हैं
दंडिन के ब्रत को धरे हैं दंडी दंड धरे रहते हैं ये दंड कहे ध्वजदंड धरे हैं कैसो
है ध्वजा औ दंडी अति सुंदर हैं सुवस्त्र रचित औ तपतेज करिः भव्यरूपहै साधु-
राग द्वेषरहित दुवौहैं थिरनरहत वायुयोगसों चंचलरहती हैं औ अनेक तीर्थनमें
फिरबो करतहै औ परमतपोमय है सदा शीत घाम तोयसहती हैं औ प्राणाया-
मादि अनेकतप करत हैं औ अर्थ विरोधाभास है विरोधार्थ अतिसाधु हैं औ पल
आधु थिर नहीं रहती तौ साधुविषे चंचलता विरोध है औ परम तपोमय कहे
बडे तपको करती है औ दंडधारिणी हैं दंडकहे राजदंड डांड इति धारण करता
है लेता है तो तपस्वीको दंडलेवो विरोधहै अविरुद्धार्थ प्रथमको ते जानो ॥३७॥
द्रोणगिरि सदृश मंदिर है शिखर अग्रभाग औषधि सरीस करचो तासों अरुण
पताका वर्णन जानो औ की दामिनी बिजुलीकी द्युतिहै अरुझि रही है तिनको
बारिदके वश्यहै अर्थ बारिद की आज्ञासों वायुवह कहे अनेक प्रकारसों बहोरत है
मेघनक पास लैजायो चहतहै यासों मंदिरनकी अति उच्चता जनायो प्रताप पावक
रघुवंशिन को इतिशेषः ॥ या प्रकार अरुणपताका पंक्ति को वर्णन करि यह पदसों
दूसरी श्वेतपताका पंक्तिको अवलोकि वर्णन लगे सो जानो मेरीकरी कहे बनाई
विश्वामित्र सृष्टिकरन लागे हैं तब नदी बनायोंहै सो आकाशमें हैं पुराणोक्त है
कवि प्रियाहूमें कह्यौहै कि, ऊँचे ऊँचे अटनिपताका अति ऊँची जनु कौशिक की
कीन्हीं गंगा खलँये तरल तर । अथवा मेरीकहेहमारी ‘भगिनीभगिनीतिशेषः’ ।
दिवि कहे दिव्यरूप कहे खेलतिहै आकाशमें कौशिकी नदीहै सो विश्वामित्रकी
भगिनीहै ॥ ३८ ॥
दोहा ॥ जातिजीतिकीरतिलई, शत्रुनकी बहुभाँति ॥
पुर पर बाँधी शोभिजै, मानो तिनकी पाँति ॥ ३९ ॥ त्रिभं-
गी छन्द ॥ सम सब घर शोभैं मुनि मन लोभैं रिपुगण छोभैं
देखि सबैं । बहु दुंदुभि बाजैं जनु घन गाजैं दिग्गज लाजैं
सुनत जबैं ॥ जहँतहँ श्रुति पढ़हीं विघ्न न बढ़हीं जैजस