रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रथमप्रकाश: १. ( १५ )
टी०-मोदतकहे सुगंधको पसागत ॥ ३१ ॥ ३२ ॥ द्वैछंदको अन्वय एक है
बनवारी कहे उपवन औ श्लेषते वनकी वारी कुमारी कुमारीपक्ष विरोध है वाटिका
पक्ष शुद्धार्थ है विरोधाभास अलंकार है चंचल स्वभाव चंचल औ वायु योग-
सां चंचलहै पत्तजाभारी कहे गरूहे देह जाकी और दीर्घवृक्षयुक्त तपोधन
तपस्विनी औ तपस्वी सम शीत घाम तोय दुःख सहनिहैं गृहघर और परिखा-
छार दिवालीति दिगंबर वस्त्र रहित दुवौ पक्ष में पुष्पवती रजो धर्मिणी औ प्रफु-
ल्लित तन अति कहे स्थूलकाय औ बहुत भूमि में विस्तार है जाको अति पावन
पवित्र अति दुवौ पक्ष में गर्व सहित गुर्विनी औ फलगर्भ सहित यासां सदा
फलोत्पत्ति जनायो रति रस सुरत औ प्रीति जग जन लीना अनेक पुरुष भोगिनी
परकीयाइति । औ जगके जनन करिकै युक्त अर्थ अति सुख पाइ जग जन
बैठत हैं जामें प्रवीना दोष रहित औ सर्वोत्तमा नवीनापाठ होइ तौ नवोढा औ
नूतनयनि आपनो पुरुष औ राजा सौंपीपति की औ स्त्री औ राजपत्नी ॥ ३३ ॥
मू०-पुनिगर्भ संयोगी रति रस भोगी जगजनलीन कहावै ।
गुणि जग जललीना नगरप्रवीना अति पतिके चित भावै ।
अति पतिहि रमावै चित्त भ्रमावै सौतिन प्रेम बढ़ावै । अब
योंदिनरातिन अद्भुतभाँतिन कविकुल कीरतिगावै ॥ ३४॥
हाकलिकाछंद ॥ संग लिये ऋषि शिष्यन घने पावक
सेतपतेजनिसने ॥ देखत सरिता उपवनभले । देखन अव-
धिपुरी कहँ चले ॥ ३५॥ मधुभारछंद ॥ ऊंचे अवास ।
बहु ध्वज प्रकाश ॥ शोभा विलास । शोभै अकास ॥ ३६ ॥
आभीरछन्द ॥ अति सुन्दर अति साधु । थिर न रहत पल
आधु । परमतपोमय मानि । दण्ड धारिनी जानि ॥ ३७ ॥
हरिगीत छन्द ॥ शुभद्रोण गिरिगण शिखर ऊपर उदित
औषधिसी गनौ । बहु वायु वश वारिद बहोरहि अरुझि
दामिनि द्युतिमनौ ॥ अति किधौं रुचिर प्रताप पावक