रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)
Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary
महाकवि केशवदास द्वारा
कहे चन्द्रमाकी अर्थ चन्द्रप्रकाश नहीं होन पावत औ नै जे नदी हैं ते न कहे
नहीं हैं अमल निर्मल अर्थ नदीनको जल म्लान है जात है औ कमलनको दल
समूह दलित होत है औ निकाई कहे काई सों रहित है अथवा कमलदलकी
दलित है निकाई जामें केशवदास कहत हैं कि रेणुका जो धूरिरहै ताको गमनहर
प्रबल है क कहे जल जामें अर्थ ऐसो जल चारों ओर भयो है जासों धूलि नहीं
उडति औ मुकुत कहे त्यक्त है हंसक जे हंस हैं तिनको सुखदाई शब्द जामें
वर्षामें हंस उडजातहैं यह प्रसिद्ध है औ अम्बर जो प्रकाश है तामें वलित
कहे युक्त नीलकण्ठ जे मोर हैं तिनकी मतिको मोहै कहे प्रसन्न करति हैं कालि-
का कैसी है कि भौंहैं हैं सुरचाप इन्द्रधनुषहू ते चारु जाकी औ प्रमुदित कहे
उन्नत हैं पयोधर स्तन जाके भूषणनमें जराइ कहे जराऊ जो ज्योति है तामें
तडित जो बिजुली है ताकी तरलाई चंचलता है अथवा भूषणमें जडाऊकी जो
ज्योति है सो जटिल समरलाई कहे योजित है अर्थ भूषणनमें रतननकी ज्योति
बिजुली सम दमकति है रत्नजटित भूषण जडाऊ कहावत हैं औ दूरि कीनी है
सुख मुख कहे सहज मुखही सो शशि जो चन्द्र है ताकी सुखमा शोभा अर्थ
सहजमुख ऐसो छविवान् है जामें चन्द्र द्युति मंद होति है औ अमल कहे स्वच्छ
जे नयन हैं तिन करिकै कमलदलकी निकाई दलित है अर्थ जिनके नयननके
आगे कमलनकी छवि दलि जाति है औ केशवदास कहत हैं कि प्रबल कहे
नीको जो करेनुका हस्तिनी को गमन है ताकी हरणहारी है औ मुकुत कहे
छूटचो अर्थ उच्चरित जो हंसक कहे बिछुवान को शब्द है सोहै सुखदायी जाको
अर्थ जाके चलतमें सुखदायक अनेक रंगको बिछुवानको शब्द होतहै औ अम्बर
जो वस्त्रहैं तामें वलित युक्त नीलकण्ठ जे महादेव हैं तिनकी मति को मोहन है
यहाँ काली पदते पार्वती जानो ॥ २० ॥
मू०-तारककन्द ॥ अभिसारिनिसीसमुझैंपरनारी । सत-
मारगमेटनकोअधिकारी ॥ मतिलोभमहामदमोहछयीहै ।
द्विजराजसुमित्रप्रदोषमयीहै ॥ २१ ॥ दोहा ॥ वर्णतकेशव
सकलकवि, विषमगाढ़तमसृष्टि ॥ कुपुरुषसेवाज्योंभई,
संततमिथ्यादृष्टि ॥ ॥ २२ ॥ चंद्रकलाछंद ॥ कलहंसकला
निधिखंजनकंजकछूटिदिन केशवदेखिजिये । गतिआननलो-
चनपायनकेअनुरूपकसेमनमानिलिये ॥ यहिकालकरालते-
शोधिसबैहठिकैबरषामिसदूरिकिये । अबधौं बिनप्राणप्रियार-
हिहैंकहिकौनहितूअवलम्बिहिये ॥ २३ ॥
टी०-सत कहे उत्तम मार्ग यथोचित कुलांगनन की रीति औ राजमार्गादि
ग्रामते ग्रामांतर की राह इति कि लोभ औ महामद औ मोह सों छई मति बुद्धि है
वर्षा द्विजराज चन्द्रमा औ सुमित्र सूर्य तिनके दोषमयी है अर्थ चंद्र सूर्यको उदय
नहीं होन पावत औ मति द्विजराज ब्राह्मण औ सुष्ठुमित्र इनके दोषमयी है
यासों या जानौं लोभ मद मोह युक्त प्राणी मित्र दोष द्विजदोष करत नहीं
डरत ॥ २१ ॥ विषम कहे भयानक जो गाढ तम अन्धकार है ताकी सृष्टि
कहे वृद्धि में मिथ्या दृष्टि भई जैसे कुपुरुषकी सेवामें होति है तैसी सकल कवि
वर्णत हैं अर्थ जब कुपुरुष सेवा कोऊ करत है तब वाहि यह देखि परतहै कि
कछू पायहैं जब कछू ना पायो तब पूर्ण दृष्टि मिथ्या होतभई तैसे जा दृष्टि सों
सब विषय पदार्थ देखि परत हैं ताही दृष्टिसों वर्षांधकारमें निकटगत बस्तु
नहीं देखियत पूर्ण दृष्टि मिथ्या होतिहै ॥ २२ ॥ अनुरूपक कहे प्रतिम जा
वस्तुके वियोगसों विकलता होति है ताकी प्रतिमा देखि कछू बोध होतहै यह
जो हमारो कराल कहे भयानक काल कहे समयहै जामें सीयावियोगादि दुःख
भये ताही काल वर्षाको व्याज करि हमको दुःख देवेको तिनहुन कलहंसादिक-
नको दूरि कीन्हों ॥ २३ ॥
मू०-दोहा ॥ बीतेबर्षोकालयों, आईशरदसुजाति ॥ गये
अँध्यारीहोतिज्यों, चारुचांदनीराति ॥ २४ ॥ मोटनकछंद ॥
दंतावलिकुन्दसमानगनो । चंद्राननकुन्तलचौरघनो ॥ भौंहैं
धनुखंजननैनमनो । राजीवनिज्यों पदपानिभनो ॥ २५ ॥
हारावलिनीरजहीपरमैं । हैंलीनपयोधरअम्बरमैं ॥ पाटीरजो-
न्हाइहिअंगधरे । इसीगतिकेशवचित्तहरे ॥ २६ ॥ श्रीनार-
१ सुंदर. २ सदृश.
९
दकीदरशेमतिसी । लोपैतमताअपकीरतिसी ॥ मानौपति-
देवनकीरतिको । सतमारगकीसमुझैगतिको ॥ २७ ॥
टी०-सुजातिकहे उत्तम॥२४॥ द्वै छंदको अन्वय एकहै शरदको स्त्री रूप करि
कहतहैं कुंदके जे पुष्पहैं तेई दंतनकी अवली पंक्तिहै कुन्द शरत्कालमें फूलतहैं
यह कवि नियमहै औ चन्द्रमा जो है सोई आनन मुखहै चन्द्रमा वर्षाके मेहनमें
मूंद्यो रहत है शरत्कालमें प्रकाशित होतहै औ सब राजा शरत्काल में पूजन
करि धनुष चामरादि धारण करत हैं सो चौंर जे हैं तेई कुन्तल केशपाश हैं
घनो कहे अति सघन औ धनुष जे हैं तेई भौंहैं हैं औ शरत्कालमें खंजन आवत
है तेई नयन हैं औ राजीव कहे कमल फूलतहैं तेई पद औ पाणि कहे कर हैं
औ स्वातीनक्षत्रकी वर्षा सों नीरज मोती होतहैं तिनकी हारावलि हृदयमें
है जाके औ पयोधर जे मेघहैं ते अम्बर कहे आकाशमें लीनहैं मिलैहैं स्त्री
पक्ष पयोधर कुच अम्बर वस्त्रमें लीनहैं औ जोन्हाई जो है सोई पाटीर कहे
चन्दनलेपहैं शरत्पक्षहंसी गति कहे हंसनकी गति स्त्रीपक्ष हंसन की ऐसी गति
इन सब करिकै सबके चित्त को हरे है वश्य करे है ॥ २५ ॥ २६ ॥ तमता
अंधकार औ तमोगुण नारद सत्त्वगुणी हैं पतिदेव जे पतिव्रता हैं तिनकी रति
प्रीति को मानौ कहे जानौं अर्थ शरत्काल नहीं है पतिव्रतन की प्रीति है
प्रीति कैसी है पतिसेवा आदि जे सत कहे उत्तम मार्ग हैं तिनकी गति कहे
तिनविषे गमन समुझति कहे जानति हैं शरत्कैसी है सत कहे उत्तम जे मार्ग
राह हैं तिनकी गति कहे प्रभाव को समुझै कहे जानति है अर्थ वर्षा करिके
विदारित जे सतमार्ग हैं तिनको प्रकट करति है ॥ २७ ॥
मू०-दोहा ॥ लक्ष्मणदासीवृद्धसी, आईशरदबजाति ॥
मनहुँजगावनकोहमहिं,बीतेवर्षांराति ॥ २८ ॥ कुंडलिया ॥
तातेनृपसुग्रीवपै, जैयेसत्वरतात । कहियोवचनबुझाइकैकै, कुश-
लनचाहोगात ॥ कुशलनचाहोगातचहतहौबालिहिदेखो। कर-
हुनसीताशोधकामवशरामनलेखो॥रामनलेखोचित्तचहीसुख
संपतिजाते । मित्रकह्योगहिबाहँकानिकीजतहै ताते ॥ २९ ॥
दोहा ॥ लक्ष्मणकिष्किंधागये, वचनकहेकरिकोध ॥ तारातब
त्रयोदशप्रकाशः १३. ( १३१ )
समुझाइयो, कीन्होंबहुतप्रबोध ॥ ३०॥ दोधकछंद ॥ बोलिल-
येहनुमानतबैलू ॥ ल्यावहुवानरबोलिसबैजू ॥ बारलगैनकहू
बिरमाहीं ॥ एकनकोउरहैघरमाहीं॥३१॥त्रिभंगीछंद ॥ सुग्री-
वसंघातीसुखदुतिरातीकेशवसाथहिसूरनये । आकाशबिलासी
सूरप्रकाशीतबहींवानरआइगये ॥ दिशिदिशिअवगाहनसीतहि
चाहनयूथपयूथसबैपठये । नलिनीलऋच्छपतिअंगदकेसँग
दक्षिणदिशिको बिदाभये ॥ ३२ ॥
टी०-जैसे वृद्धदासीके शुक्ल रोमनकरिके सर्वाङ्ग शुक्लहोतेहैं तैसे याहू शुक्ल है
तासों वृद्धदासी समकह्यो लक्ष्मण संबोधन है ॥ २८ ॥ सत्वर कहे शीघ्र चित्त
चही कहे मनमानी ॥ २९ ॥ ३० ॥ ३१ ॥ साथहि कहे लक्ष्मणके साथहि
रामचन्द्रके पास आइ गये लक्ष्मण इतिशेषः सूरमकाशी कहे सूर्यको ऐसोहै-
प्रकाश जिनको ॥ ३
अति जोर सों कूर्दिकै गगन कहे आकाश को मंडिकै भूषित करिकै अर्थ अति-
आकाश मार्ग ह्वैकै धावतहैं सीताको लक्ष्मण कहे खोज नहीं पावत धीरके धरन
हार जे वीर वरण स्वरूप सब हैं ते सिंधुके तटमें स्वभाव ही साधरमको परम
कहे बडो धाम जो रामनाम है औ कर्म वालिवधादि तिन्हें गावत हैं धीरधरण
कहि या जनायो कि यद्यपि खोज नहीं सीताको पायो परन्तु धीरको धरे हैं
अधीर नहीं भये तौ जहां ताईं खोजपाइहैं तहां ताईं ढूंढ़ि हैं औ स्वभावही कहि
या जनायो कि कछुभय मानिकै रामनामको नहीं गावत ॥ ३४ ॥
मू०-अंगद-अनुकूलछंद ॥ सीयनपाई अवध बिनासी ।
होहुसबैसागरतटवासी ॥ जोघरजैयेसकुचअनंता।मोहिनछोडै
जनकनिहंता ॥ ३५ ॥ हनुमान ॥ अंगदरक्षारघुपतिकीन्हों ।
सोधनसीताजलथललीन्हों ॥ आलसछांडौंकृतउरआनौ।होहु
कृतघ्नीजनिशिखमानौ ॥ ३६ ॥ अंगददंडक ॥ जीरणजटायु
गीधधन्यएकजिनरोंकिरावणबिरथकीन्होंसहिनीजप्राणहानि।
हुतेहनुमंतबलवंततहांपांचजनदीनेहुतेभूषणकछूकरनरूपजा-
नि॥ आरतपुरकारतहीरामरामबारबारलीन्होंनछंडाइतुमसीता
अतिभीतमानि। गाइद्विजराजतियकाजनपुकारलागैभोगवैन-
रकघोरचोरकोअभयदानि ॥३७॥ दोहा ॥ सुनिसंपातिसप-
क्षह्वै,रामचरितसुखपाय।सीतालंकामांझहैं,खगपतिदईबताय॥
॥ ३८ ॥ दंडक ॥ हरिकैसोवाहनकीबिधिकैसोहेमहंसलीक-
सीलिखत भवाहनकेअंकको । तेजकोनिधानराममुद्रिकाबि-
मानकौधौलक्ष्मणकोबाणछूट्योरावणनिशंकको । गिरिगजगं-
डेतेउड्यान्योसुवरण अलि सीतापदपंकजसदाकलंकरंकको ।
हवाईसीछूटीकेशोदासआसमानमेंकमानकैसोगोलाहनुमान-
चल्योलंकको ॥ ३९ ॥
टी०-मास दिवस की अवधि दियो है । यथा वाल्मीकीये ॥ “अधिगम्य-
तुर्वैदेहीन्निलयंरावणस्यच । मासेपूर्णेनिवर्तध्वमुदयं प्राप्यपर्वतम् ॥ १ ॥ ऊर्द्धमा-
त्रयोदशप्रकाशः १३. ( १३३ )
सान्नवस्तव्यावसन्वध्योभवेन्मम '' ॥ ३५ ॥ ३६ ॥ जीरण वृद्ध ॥ ३७ ॥ चंद्रमा
ऋषि को आशीर्वाद रह्यो है कि सीताके खोजको वानर ऐ हैं तिन्हें मिले पच्छ
तेरे जामिहैं तुलसीकृतरामायणमों प्रसिद्ध है ॥ ३८ ॥ सदा कलंकही को रंक
कहे दरिद्र अर्थ कलंक रहित जो सीतापदपंकज हैं कमान तोपको नाम पश्चिम-
मों प्रसिद्ध हैं औ गोला के साहचर्य सों अति निश्चित है यथा भूषणकविः ।
“छूटतकमाननकेगोलीतीरवाननकेमुसकिलजात मुरचानहूं के ओटमें । नाही-
समैंशिवराजदावकरीपैंडापर दैसुरंगहलाकोहुकुमकरयोगोटमें ॥ भूषणभनतक-
हौंकिमतिकहांलौंदेसीहिम्मतइहांलौंशरजाकेभटजोटमें । ताउदैदै मोछन कंगूरनमैं
पारंदैदै धाउदैदैअरुमुख कूदेजाय कोटमें” ॥ ३९ ॥
मू०-दोहा ॥ उदधिनाकपतिशत्रुको उदितजानिबलवंत ॥
अंतरिक्षहींलक्षिपद, अच्छछुयोहनुमंत ॥ ४० ॥ बीचगयेसुर-
सामिली, औरसिंहिकानारि ॥ लीलिलियोहनुमंततेहि, कढ़े-
उदरकहँफारि ॥ ४१ ॥
टी०-उदधि जो समुद्रहैं तामें नाकपति जे इन्द्र हैं तिनको शत्रु मैनाक ताको
उदित कहे आपने विश्रामके लिये उठचो जानिकै अंतरिक्ष ही कहे आकाशही
सों लक्षि कहे देखिकै बलवंत जे हनुमंतहैं तिन ता मैनाकके बोधके लिये अच्छ कहे
स्वच्छ जो पद हैं तासों छुयो स्पर्शमात्र करचो काहे ते वाल्मीकीयरामायणमें
लिख्यो है कि हनुमान मैनाक सों अपनी प्रतिज्ञा कह्योहै कि मध्यमें विश्राम न
करिहौं । यथा-“त्वरतेकार्यकालोमे अहश्चाप्यनिवर्तते । प्रतिज्ञाचमयादत्तानस्थात-
व्यमिहांतरा '' ॥ अथवा पदके सदृश अच्छसो छुयो अर्थ जैसे पदसों स्पर्शकरि
लघुविश्राम करनोरहै तैसे केवल दृष्टि सों स्पर्श करि विश्राम कियो ॥ ४० ॥
सिंहिकाने हनुमंत को लीलिलियो ॥ ४१ ॥
मू०-तारकछंद ॥ कछुरातियेगयेकरिदंशदशासी । पुरमांझ
चलेबनराजिबिलासी॥ जबहींहनुमंतचलेतजिशंका । मगरों-
किरहीतियद्वैतबलंका ॥ ४२ ॥ लंका ॥ कहिमोहिंउलंघ्यच-
लेतुमकोहौ ॥ अतिसूक्षमरूपधरेमनमोहौ ॥ पठयेक्यहिकार-
णकौनचलेहौ । सुरहौकिधौंकोऊसुरेशभलेहौ ॥ ४३ ॥ हनू-
( १३४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
मान ॥ हमबानरहैंरघुनाथपठाये । तिनकीतरुणीअवलोकन-
आये ॥ लंका ॥ हतिमोहिंमहामतिभीतरजैये ॥ हनूमान ॥
तरुणीहिंहते कबलोंसुखपैयै ॥ ४४ ॥ लंका ॥ तुममोरेहिपै-
पुरपैठनपैहौ । हठकोटिकरौघरहीफिरिजैहौ ॥ हनुमंतबलीते-
हिथापरमारी । तजिदेहभईतबहीबरनारी ॥ ४५ ॥ लंका-चौ-
पाई ॥ धनदपुरीहोंरावणलीन्ही । बहुविधिपापनकरेसभीनी ।
चतुराननचितचिंतनकीन्हों ॥ बरुकborder/रुणाकरिमोहँदीन्हों ॥
॥ ४६ ॥ जबदशकंठसियाहरिलैहैं । हरिहनुमंतबिलोकनऐहैं ॥
जबवहतौहिहतैतजिशंका । तबप्रभुहोइविभीषणलंका ॥४७॥
चलनलगौं जबहीतबकीजो । मृतकशरीरहिपावकदीजो ॥
यहकहिजातभईवहनारी । सबनगरीहनुमंतनिहारी ॥ ४८ ॥
टी०-दंशकहे डास यामें कोऊ कोऊ संदेह करत हैं कि दंश रूप धरिकै
गये मुद्रिका कैसे लैगये तालिये और अर्थ करि दंशकहे सिंह “करिणंहस्तिनंद-
शतीतिकरिदंशः” । ताको रूप करि चले तो सिंहको औ श्वानको रूप एक
होताहै ताही सों श्वानको नाम ग्रामसिंह है श्वानको ग्राममें जैबो साधारण
रहत है तासों श्वानको रूप धरिकैगये ॥ ४२ ॥ सूक्ष्म कहे लघु श्वानके अर्थमें
सूक्ष्म कहे तुच्छ ॥४३॥४४॥४५॥ धनद कुबेर ॥४६॥ हरि बानर॥४७॥मृतक
शरीर कहे पुरी रूप मृतक शरीर लंकाने या प्रकार को बर मांग्यो है ताही
लिये हनुमान लंकापुरीको जारी हैं ॥ ४८ ॥
मू०-तबहरिरावणसोवतदेख्यो । मणिमयपालिककीछ-
बिलेख्यो ॥ तहँतरुणीबहुभाँतिनगावैं । बिच बिच आवझ
बीनबजावैं ॥ ४९ ॥ मृतकचितापरवानहुंसोहैं । चहुँदिशि-
प्रेतवधूमनमोहैं ॥ जहाँ जहाँ जाइतहाँदुखदूनो । सियबिनहै-
सिगरोपुरसूनो ॥ ॥ ५० ॥ भुजंगप्रयातछंद ॥ कहूंकिन्नरी-
किन्नरीलैबजावैं । सुरी आसुरीबांसुरीगीतगावैं ॥ कहूंयक्षिणी-
त्रयोदशप्रकाशः १३. ( १३५ )
पक्षिणीलैपढ़ावैं । नगी कन्यकापन्नगीकोनचावैं ॥ ५१ ॥
पियैंएकहालागुहैंएकमाला । बनीएकबालानचैचित्रशाला ॥
कहूंकोकिलाकोककीकारिकाको । पढ़ावैसुआलैशुकीशारि-
काको ॥ ५२ ॥ फिरयोदेखिकै राजशालासभाको । रह्योरी-
झिकैबाटिकाकीप्रभाको । फिरयो बीरचौंहूंचितैशुद्धगीता ।
बिलोकीभलीसिंसिपामूलसीता ॥ ५३ ॥
टी०-॥ ४९ ॥ ५० ॥ किन्नरी सारंगी बाँसुरीमें गीत गावती हैं अथवा
बाँसुरी सम गीत गावतीहैं ॥ ५१ ॥ हाला मदिरा सुष्ठु जे आलय घर हैं तिनमें
शुकी औ शारिका मैना कोकिला जे हैं ते कोकशास्त्र की कारिका पढ़ावती हैं
अथवा स्त्री कोकिला सम पढ़ावती हैं ॥ ५२ ॥ या प्रकार सब स्थाननमें
फिरयो सो ऐसी राजशाला सभा कहे राजभवनमें स्त्रीनकी सभाको देखिकै रीझि रह्यो
अथवा या प्रकार राजशाला औ राजसभाको देखि कै रीझि रह्यो जब सीताको
तहां न देख्यो तब वाटिका की प्रभाको फिरयो अर्थ वाटिकाको गमन करचो
शुद्ध गीता सीताको विशेषण है शिंशुपासी सौ अथवा “ अगुरु पिच्छिलागुरु
शिंशुपा ” इति विश्वः ॥ ५३ ॥
मू०-धरेएकबेनीमिलीमैलसारी । मृणालीमनोपंकसोंकाढ़ि
डारी ॥ सदारासनामैररैदीनबानी । चहूँओरहैंएकसीदुःखदा-
नी ॥ ५४ ॥ ग्रसीबुद्धिसीचित्तचिंतानिमानों । कियौजीभदं-
तावलीमेंबखानो ॥ किधौंधेरिकैराहुनारीनलीनी । कलाचं-
द्रकी चारूपीयूषभीनी ॥ ५५ ॥ किधौंजीवकोजोतिमायान-
लीनी । अविद्यानकेमध्यविद्याप्रवीनी ॥ मनोसर्वस्त्रीनमैं-
कामबामा । हनूमानऐसीलखीरामरामा ॥ ५६ ॥ तहाँदेव-
द्वेषीदशग्रीवआयो । सुन्योदेविसीतामहादुःखपायो ॥ सबै-
अंगलैअंगहीमेंदुरायो । अधोदृष्टिकैअश्रुधाराबहायो ॥५७॥
रावण ॥ सुनोदेविमोपैकछूदृष्टिदीजे । इतोशोचतोरामकाजैं-
( १३६ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
नकीजे ॥ बसैंदंडकारण्यदेखैनकोऊ । जोदेखैमहाबावरोहो-
यसोऊ ॥ ५८ ॥
टी०-पंकसदृश मैल सारोहै कहूंपंक शोकाधिकारी पाठ है तौ मानो पंक
युक्त मृणाली है शोकाधिकारी कहे अति शोक युक्त दुहुन को विशेषणहै
॥ ५४ ॥ ५५ ॥ संसार विषे कीनी बुद्धि अविद्या है ईश्वर विवेकिनी बुद्धि
विद्या है रामा स्त्री ॥ ५६ ॥ अति लाज भयसों अंग सिकोरिके बैठी ॥ ५७॥
चारि छंदको अन्वय एक हैं रावण कहत है कि हे देवि ! ऐसे जे रामचंद्र हैं
तिनको शोचना करो हमजे तुम्हारे सदादास हैं तिनपै कृपा काहे नाहि करियत
जासों अदेवी दैत्य स्त्री देवांगना तिनकी रानी होय औ वाणी सरस्वती औ
मधौनी इंद्राणी मृडानी पार्वती तुम्हारी सेवा करें औ किन्नरी सारंगी लिये
किन्नरी किन्नर कन्या तुम्हारे समीप गीत गावैं औ सुकेशी औ उर्वशी नाचैं
तुमसों मान कहे आदर पावैं यामें आपनो प्रभाव दिखायो कि ए सब इंद्रादि
मेरी आज्ञाकर हैं रामचन्द्र कैसे हैं दंडकारण्य में बसत हैं अर्थ वनवासी हैं औ
ऐसे छिपे रहत हैं जिनको कोऊ कबहूं देखत नहीं औ जो देखत है औ सो महा
बावरो आपने तनकी औ भवनादि की सुधि भूलि जात है यासों या जनायो कि
बावरो होत है ताहीको संग्रह कोऊ नाहीं करत औ वे ऐसे हैं जिनको देखत
औरऊ बावरो होत है तासों सोच करिवे लायक नहीं है अनाथ के अनुसारी
कहे अनुगामी हैं अर्थ यह कि काहू बडेके अनुगामी नहीं हैं ‘तुम्हें देवि दूषै
हितू ताहि मानैं’ इत्यादि दुवौ वचन भेद उपायकेहैं सरस्वती उक्तार्थः ॥ हे देवि !
हे जगदंब ! हमपर कछु कृपादृष्टि दीजै अर्थ तुम्हारी नेक कृपादृष्टिसों हमारो
भलो होत है औ रामचन्द्रके काज येतो शोच काहेको करती हौ रामचंद्र
शोचनीय नहीं हैं काहेते वे ऐसे प्रतापी हैं कि निर्जन दंडकारण्यमें बसते
हैं आशय कि अति निर्भय हैं औ देखै न कोऊ अर्थ अनेक ध्यानादि उपाय
योगी जन जिनके देखिबेको करत हैं ताहूपर दर्शन नहीं पावत सो छठे प्रकाशमें
कह्यो है कि “सिद्धसमाधि सजैं अजहूं न कहूं जग योगिन देखन पाई” । औ
जो देखतहै अर्थ जाको दर्शन होतहै सो महा बावरो होत है अर्थ बावरे सम
संसार सुखको त्यागकरि जीवन्मुक्त है जात है अथवा बावरे सम देहकी सुधि
नहीं रहति जैसे सुतीक्षणको भयो अथवा महा बावरो महादेव होई अर्थ महादेव
सम प्रभावको प्राप्त होइ ॥ ५८ ॥
मू०-कृतघ्नीकुदाताकुकन्याहिचाहै॥ हितूनग्नमुंडीनहींको
सदाहै॥ अनाथैसुन्योमैंअनाथानुसारी। बसैचित्तदंडीजटी
मुंडधारी॥ ५९॥
टी०-कृत जो कर्म हैं ताके हंता नाशकत्र्ता हैं अर्थ शुभाशुभ कर्म बन्धन तोरि
दासनको मुक्तकरत हैं औ कु जो पृथ्वी है ताके दाता हैं अर्थ पूर्ण पृथ्वीके
दाता हैं बावनरूप ह्वै बलिसों ले इंद्रको दियो औ कु जो पृथ्वी है ताकी
कन्या चैत्रमहौ तिन्हें चाहत हैं औ नग्न औ मुण्डी जे तप स्त्री हैं तिनके हितू हैं
औ अनाथ कहे जिनको नाथ स्वामी कोऊ नहीं है आशय कि आपही सबके
नाथ हैं औ अनाथ कहे अशरण जे मानी हैं तिनके अनुसारी अगामी हैं जाको
रक्षक कोई नहीं है ताकी रक्षा करिवे को पाछे पाछे आपु फिरत हैं जैसे गज
प्रह्लादकी रक्षा करचो औ दण्डी औ जटी औ मुण्डधारी जे तपस्वी हैं तिनके
चित्तमें बसत हैं अर्थ राजाको सदा ध्यान करतहैं अथवा दंडी औ जटी औ
मुण्डधारी ऐसे जे महादेव हैं तिनके चित्तमें बसत हैं औ द्रव्यरूप लक्ष्मीको
जे दूषत हैं औ उदासीन रहत हैं ते दास विष्णुको अतिप्रिय हैं औ निर्गुणी कहे
प्राकृत गुणन करि रहित हैं अर्थ अति उत्कृष्ट गुणहैं जिनके। यथा वायुपुराणे॥
“ सत्त्वादिगुणहीनत्वान्निर्गुणी हरिरीश्वरः”॥ औ ता नाम कहे ताको नाम ऐसो
है जाकारिकै नहीं लीजियत अर्थ जाके नामको शिवादि देव सब जपतहैं अथवा
महानिर्गुणी कहे रज सत्त्व तमोगुण करि रहित हैं औ ताको नाम नहीं लीजियत
है अर्थ जाके नामका जप नहीं है ऐसी जो ब्रह्मज्योति है सो है अथवा हे देवि!
जे तुम्हें दूषतहैं तिन्हें कहा हितू मानत हैं अर्थ हितू नहीं मानते जो तुम्हारी-
रंचकऊ विरोधी है ताही रामचन्द्र परम विरोधी मानत हैं जयंतादि ते जानौ औ
तोसों उदासीन है ताहू को कहा हितू मानत है अर्थ ताहू को आपनो परम हितूहू
होइ पै विरोधही जानतहैं सीय खोजको वानर पठाइबेंमें सुग्रीव उदासीनता करचो
प्रेमकरि आपुहीसों वानर न पठयो तब कोपकरि लक्ष्मणसों विरोधी सम वचन
कहि पठावनादि सों जानौं औ महानिर्गुणी कहे उत्कृष्ट गुणन करि युक्त जे
रामचन्द्र हैं तिनको नाम कहाना लीजै अर्थ यह कि लीजै ताहीके नामसों
मुक्ति प्राप्ति होती है॥ मैं तुम्हारो सदा दास हौं मोपै कृपा काहे नहीं कीजत
सेवकपर कृपा करिवो स्वामीको उचित है अदेवीनकी रानीहोहु इत्यादि वचन
आशीर्वादात्मक हैं कि तुम ऐसे सुखको प्राप्त होहु॥ ५९॥
( १३८ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
मू०-तुम्हैंदेखिदूपैहितूताहिमानै । उदासीनतोसोंसदाताहि
जानै॥ महानिर्गुणीनामताकोनलीजै । सदादासमोपैकृपाक्यों
नकीजै ॥ ६० ॥ अदेवीन्हृदेवीनकीहोहुरानी । करैंसेववानीम-
घौनीमृडानी ॥ लियेकिन्नरीकिन्नरीगीतगावैं । सुकेशीनचैंउर्व-
शीमानपावैं ॥ ६१ ॥ मालिनीछंद ॥ तृणबिचदैबोलीसीयगं-
भीरवानी । दशमुखशठकौलूनकोनकीराजधानी ॥दशरथसुतदे-
षीरुद्रब्रह्मानभासै। निशिचरवपुराबूझ्योनँश्योमुलनासै॥६२॥
अतितनुधनुरेखानैकनाकीनजाकी । खलशरखरधाएक्योंसहै-
तिच्छताकी। बिडकनघनघूरेमक्षिक्योंबाजजीवै।शिवशिरशशि
श्रीकोराहुकैसेसोछीवै ॥ ६३ ॥
टी०-॥ ६० ६१ ॥ पतिब्रतनको परपुरुषसों संभाषण अनुचित हैं तासों तृण कहे
खरको अंतरकरचो यह लोकमर्यादा है अथवा तृण अंतरमें करि या जनायो कि हम
प्राणनको तृण समान समुझे हैं जो तूस्पर्श करिहै तौ प्राण तृण समानछोडि देहैं
अथवा रावणको जनायो कि तू तृणसमानहै काहेते गंभीरवाणी बोली याते कछू भय
नहीं सूचितहोत कोऊ कोऊ तृणअंचलहूको कहत हैं तौ अंचल ओट सों बोली या
जानौं तेरो तो मूल तबही नशिगयोरहै जब हम को हरिल्यायोरहै तामें कछू
लग्यो है ताको ऐसी बातें कहि अवनीकी भाँतिसों काहेको नाशत है ॥ ६२ ॥
तनु कहे सूक्ष्म बिट पुरीष तेरो राज्य सुख बिडकन सदृश है हम बाज सदृश हैं
औ हम शिव शिर शशिसदृश हैं तू राहु सदृश है ॥ ६३ ॥
मू०-उठिउठिशठह्याँतेभागुतौलौं अभागे । ममवचनबिस-
योंसर्पजोलोंनलागे ॥ विकलसकुलदेखौंआसुहीनाशतेरो ।
निपटमृतकतोकोंरोषऔरैनमेरो ॥ ६४ ॥ दोहा ॥ अवधिदई
द्वैमासकी, कह्योराक्षसिनबोलि । ज्योंसमुझैसमुझाइयो, युक्ति
छुरीसोंछोलि ॥ ६५॥ चामरछंद ॥ देखिदेखिकैअशोकराज
पुत्रिकाकह्यो ॥ देहिमोहिंआगितैंजोअंगआगिह्वैरह्यो ॥ ठौर
पाइपवनपुत्रडारिमुद्रिकादई । आसपासदेखिकैउठायहाथकै-
्योंसमान । पैतदपिभरत Wait, look atतीन्यों: त+ी+न+्+य+ो+ं=तीन्यों. Wait, look at अरुयदपिअनुजतीन्योंसमान: अरु यदपि अनुज तीन्यों समान । पै तदपि भरत-> printed as: अरुयदपिअनुजतीन्योंसमान । पैतदपिभरत`
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1: त्रयोदशप्रकाशः १३. ( १३९ )
2: लई ॥ ६६ ॥ तोमरछंद ॥ जबलगीसियरीहाथ । यहआगि
3: कैसीनाथ ॥ यहकह्योलोषितबताहि ॥ मणिजटितमुँदरीआहि
भावतनिदान ॥ ७५॥ ज्योंनारायणउरश्रीवसंति । त्योंरघुप-
तिउरकछुद्युतिलसंति ॥ जगतितनैहैंसबभूमिभूप । सुरअसुर
नपूजैंरामरूप ॥ ७६ ॥ सीताजू-निशिपालिकाछंद ॥ मोहिं
परतीतियहिभाँतिनहिं आवई । प्रीतिकहिधोंसुनरबानरनि
क्यों भई ॥ बातसबवर्णिपरतीतिहरित्योंदई । आशुअन्हवा-
इउरलाइमुँदरीलई ॥ ७७ ॥ दोहा ॥ आशुबरषिहियरेहरषि,
सीतासुखदसुभाइ । निरखिनिरखिपियमुद्रिकहि, बरणतिहैं
बहुभाइ ॥ ७८ ॥
टी०-पच्छ जो हैज्ञाति वर्ग तासों विरूप कहे अन्य रूप ॥ ७१ ॥ खेद डर
पाप छल यह छंद छःचरणकोहै तासों गाथा जानो यथा वृत्तरत्नाकरे ॥ "शेषं गाथा-
स्त्रिभिः षड्भिश्चरणैश्चोपलक्षिताः" ॥ माघको दूसरो छंद छः चरणको है ॥ ७२ ॥
॥७३॥ कछु कहे गुणादिकनमें काहूकोलक्षणकहौ ॥७४॥ शक्तसमर्थ ॥७५॥
नपूजेकहेसभ्यता नहीं करत ॥ ७६ ॥ ७७ ॥ भाइकहेअभिप्राय ॥ ७८ ॥
मू०-पद्धटिकाछंद ॥ यहसूरकिरणतमदुःखहारि । शशिक-
लाकिधौंउरशीतकारि ॥ कलकीरतिसीशुभसहितनाम । करौ
ज्यश्रीयह तजीराम ॥ ७९ ॥ कैनारायणउरसमलसंति । शुभ-
अंकनऊपरश्रीवसंति ॥ वरविद्यासीआनंददानि । युतअष्टाप-
दमनशिवामानि ॥ ८० ॥ जनुमायाअच्छरसहितदेखि । कै प-
त्रीनिश्चयदानिले खि । प्रियप्रतीहारनीसीनिहारि । श्रीरामो-
जयउच्चारकारि ॥ ८१ ॥ पियपठईमानौसखिसुजान । जगभू-
षणकोभूषणनिधान ॥ निजआईहमकोशीषदेन । यहिकिधौं-
हमारोमरमलेन ॥ ८२ ॥
टी०-हमारो तम अंधकार सदृश जो दुःख है ताकी रहनहारी है ताते कैधौं
सूर्य्य की किरण है कल कहे अविघ्न मुद्रिका में राम नाम लिख्यो है औ कीर-
तिहू जा प्राणीकी होति है ताके नाम के साथही रहति है प्रथम ताको नाम
कहि कीरति कही जाति है राज्य श्रीहूको रामचन्द्र छांड़्यो है औ याहू को
छांड़्यो है ॥ ७९ ॥ नारायणके उरमें अंक जो गोदहै तापर श्री बसति है
अथवा अंक कहे श्रीवत्सादि चिह्न पर श्री बसति है मुद्रिकामें श्रीरामोजयति
लिख्यो है तहां रामोजयति इन अंकनके ऊपर श्रीअंक लिख्यो है शिवा पार्वती
पक्ष अष्टापद कहे पशु पशुपदते सिंह अथवा वृषभ जानौ । “चामीकरं जातरूपं
महा रजतकांचने ॥ रुक्मं कार्तस्वरं जाम्बूनदमष्टापदोऽस्त्रियामित्यमरः” मुद्रिका
पद सुवर्ण ॥ ८० ॥ अक्षर विष्णु औ अंक पिय जे रामचन्द्र हैं तिनकी प्रति-
हारिणी चोबदारिनी हैं यामें श्रीरामोजयति लिख्यो है प्रतिहार को नामोच्चार
करिवो धर्म है ॥ ८१ ॥ सखी कैसी है जगके जितने भूषण गहने हैं तिनको
जो भूषण कहे भूषिबो है ताको निधान भांडा है अर्थ अनेक प्रकार सों भूषण
पहिराइवे में चतुर है औ मुद्रिका कैसी है जग भूषण जे रामचन्द्र हैं तिनको
भूषणनको निधान कहे भांडा है अर्थ जब याको रामचन्द्र पहिरत हैं तब अनेक
भूषण पहिरे सम अपना को मानत हैं अथवा जब या मुद्रिकाको धारण करत हैं
तब अनेक भूषण पहिरे समान छबि होति है अथवा जगके जे भूषण गहने हैं
तिनको जो भूषण है सो माताको निधान कहे भांडा है काहेते मोहर है सब
राज्यको व्यवहार मोहरके अंकन सों सही होतहै ॥ ८२ ॥
मू०-दोहा ॥ सुखदा शिखदा अर्थदा, यशदा रसदातारि ।
रामचन्द्रकी मुद्रिका, किधौं परम गुरुनारि ॥ ८३ ॥ बहु बर-
णा सहजप्रिया, तमगुनहराप्रमान । जगमारग दरशावनी,
सूरुज किरण समान ॥ ८४ ॥
टी०-परम गुरुनारि कैसीहै कोमल भाषणादि करिकै सुखदा है औ शिख-
दाता है कि कुलांगननको ऐसो करिवो उचित है सो करौ औ अर्थ जो प्रयोजन
है ताकी दाता है कि स्त्रियनको पतिब्रतसों देवलोक गमन होत हैं यह पतिब्रतमें
देवलोक गमनरूप जो प्रयोजन है ताको देति है औ पतिव्रत साधब करार यश
देति है औ अनेक वचन चातुर्य्यादि रस कहे गुण देति है औ मुद्रिका दर्शन-
सों सुखदा है औ शिख दाताहै काहेते शिक्षा दियो कि धीरज धरौ औ अर्थ प्रयो-
जनकी दाता है काहेते रामचन्द्रको संदेशरूप हमारो प्रयोजन रह्यो ताको
दियो अथवा अर्थ जो ज्ञानहै ताको दाता है औ अतिमूल्याधिक्य सो जाके
पास रहै ताको यश दाता है औरस कहे प्रेमकी दाता है अर्थ रामचन्द्र प्रतिप्रेम
( १४२ ) रामचंद्रिका-सटीक ।
वढावन हारी है ॥ "शृंगारादौविषेवीर्येगुणेरागेद्रवेरसः ॥ इत्यमरः ॥ ८३ ॥ बहु
वरणा कहे बहुत हैं वरण रंग अक्षर जिनके औ सहज प्रिया दुवौ हैं तमगुण
अंधकार औ अज्ञान सूरज किरण जगके मारग राह देखावत हैं औ मुद्रिकाहू
जगमारग दशावनी है काहेते जहाँ रामचंद्र हैं तहांकी राह देखायो जा मारग
हैं हमारो मन रामचंद्रके निकट गयो दोहा क्षेपक है ॥ ८४ ॥
सू०-दोहा-श्रीपुरमेंवनमध्यहों, तुमगकरीअनीति। कहिसुँ-
दरीअबतियनकी, कोकरिहैपरतीति ॥ ८५ ॥ पद्धटिकाछंद॥
कहि कुशलमुद्रिकेरामगात । पुनिलक्ष्मणसहितसमानतात ॥
यहउत्तरदेतिनबुद्धिवंत ॥ केहिकारणधौंहनुमंतसंत ॥ ८६ ॥
हनूमान-दोहा ॥ तुमपूंछतकहिमुद्रिकै, मौनेहातियहिनाम ॥
कंकनकीपदवीदई तुमबिनयाकहँराम ॥ ८७ ॥ दंडक ॥
दीरघदरीनबसैंकेशोदासकेशरीज्योंकेशरीकोदेखिबनकरी-
ज्योंकपतहैं । बासरकीसंपतिउलूकज्योंनचितवतचकवाज्यों-
चंदचितैचौगुनोंचपतहैं । केकासुनिब्यालज्योंबिलातजात-
घनश्यामघननकेघोरनजवासोज्योंतपतहैं ॥ भँवरज्योंभवत-
वनयोगीज्योंजगतैरैनिसाकतज्योंरामनामतेरोईजपतहैं॥८८॥
टी०-श्रीजो राज्यश्रीहै तेहिपुरमें अयोध्यामें रामचन्द्रको छोडिदियो औ
बनके मध्यमें हमछाँड्यौ राम हमें तू छोड्यो सो हे सुन्दरी ! कहौ तियनको
अबको परतीतिकारि है अर्थ कोऊ ना करि है ॥ ८५ ॥ ८६ ॥ तुम्हारे
विरह सों रामचन्द्र ऐसे दुर्बल भये हैं जासों याको कंकनके स्थानमों पहिरत हैं
इति भावार्थः ॥ ८७ ॥ सीताजू सों हनुमान कहतहैं कि हे सीता ! तुम्हारे विरह
सों रामचंद्र ऐसी दशाको प्राप्त हैं कि दीरघ दरीन में केशरी जो सिंहहै ताके
समान बसत हैं जैसे सिंह भूमिहीमें सोवत बैठत है कछू सेजादि सुख की इच्छा
नहीं करत तैसे रामचंद्र हैं औ केशरी पदश्लेष है करी कहे हस्ती पच्छ सिंह
जानौ रामपक्ष केशरी केशरी उदीप कहे तासों औ बासर जो दिन है ताकी
संपत्ति कहे लक्ष्मी शोभा इति ताको उलूक जो घूघू पक्षी विशेष है ताके समान
नहीं देखत घूघू को दिनको देखि नहीं परत औ रामचन्द्रको अनेक वस्तु देखि
Here is the complete, line-by-line transcription of the Hindi and Sanskrit text from the page:
त्रयोदशप्रकाशः १३. (१४३)
विरह उद्दीपन होतहै तासों दिनमें इउत नहीं निरखत औ चंद्रमाको देखि
चक्रवाक समान जपत हैं चन्द्रमा विरह उद्दीपन है तासों औ केका जो मोर-
वाणी है ताको सुनि व्याल जो सर्प हैं ताके समान बिलात जातहैं सर्प भक्षनके
भयों रामचन्द्र विरह वर्द्धन भयों ॥ "केकावाणीमयूरस्येत्यमरः" औ घन-
श्याम कहे सजल जे घन मेघ हैं तिनको जो घोर शब्द है तासों जवाँसे सम तपत
हैं जवासे जल वृष्टिसों निज जरिवो जानिकै औ रामचन्द्रके विरहाग्नि ज्वलित
होति है तासों औ वनमें ठौर ठौर भौंरसम भँवत रहत हैं औ जैसे योगीध्यान
धारणादि करत राति बितावत हैं तैसे तुम्हारे वियोग सों विकल जे राम-
चंद्रहैं तिनको रात्रिहू में निद्रा नहीं आवती औ जैसे शाक्त कहे देवीको उपासक
देवीको नाम जपत हैं तैसे राम तिहारोई नाम रात्रि दिन जपत हैं ॥ ८८ ॥
मू०-हनूमान-बारिधरछंद ॥ राजपुत्रियकबातसुनौपुनि ।
रामचन्द्रमनमांहकहीगुनि ॥ रातिदीहयमराproductरजनीजनु ।
यात नानितनजानतकैमनु ॥ ८९ ॥
टी०-दीह कहे बडी जो राति है सो जानो यमराज की जनी कहे किंकरी
है ता राति करिकै कृत जो यातना पीडा है ताको कि हमारो तन जानत है कि
मन जानत है जापै बीतति है अर्थ कहिबे लायक नहीं है अति बडी है औ यम
किंकरन हूं करिकै कृत यातना कहिबे लायक नहीं होति अति कठोर होति है
तासों यमकिंकरी सम कह्यो ॥ ८९ ॥
मू०-दोहा ॥ दुखदेखैसुखहोहिगो, सुखवनदुःखविहीन ।
जैसेतपसीतपतपै, होतपरमपदलीन ॥ ९० ॥ वर्षावैभव
देखिकै, देखीशरदसकाम । जैसेरणमेंकालभट, भेंटिभेंटि-
यतबाम ॥ ९१ ॥ दुःखदेखिकैदेखिहौ, तवमुखआनँदकंद ।
तपनतातपिप्यौसनिशि, जैसेशीतलचन्द ॥ ९२ ॥ अपनी-
दशाकहाकहौं दीपद्दशासीदेह । जरतजातिबासरनिशा, केशव
सहितसनेह ॥ ९३ ॥ सुगति सुकेसिसुनैनिसुनि, सुमुखि-
सुदंतिसुश्रोणि । दरशावैगोबेगिही, तुमकोसरसिजयोनि
॥ ९४ ॥ हरिगीतछंद ॥ कछुजननिदेपरतीतिजासोंरामच-
( १४४ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
न्द्रहिआवैं । शुभशीशकीमणिदईयहकहि सुयशतवजगगा-
वैं ॥ सबकालहैहौं अमर अरु तुमसमरजयपदपाइहौ । सुत
आजुतेरघुनाथकेतुमपरमभक्तकहाइहौ ॥ ९५ ॥
टी०--तुमको हमारे विरह कृत जो दुःखहै ताके अनन्तर मिलापरूप सुख है है
इति भावार्थः॥ ९० ॥ वैभव ऐश्वर्य जैसे वर्षा बिताई शरदको भेट्यो तैसे रावणा-
दिकनको मारि तुमको भेटिहैं इति भावार्थः ॥ ९१ ॥ ९२ ॥ और अपनी दशा
कहा कहिये तुम्हारे स्नेह प्रेम सहित जो देह है सो स्नेह तैल सहित दीप दशा
कहे दीपकी बाती सम बासर निशा कहे रातोंदिन जरतजातिहै ॥ ९३ ॥ सुन्दर
है श्रोणि कहे कटि जाकी । “कटि श्रोणीककुद्मतीत्यमरः ॥” सरसिजयोनि ब्रह्मा
तुमको मोहिं दर्शावैगो मोहिं इति शेषः ॥ ९४ ॥ ९५ ॥
मू०-करजोरिपगपरितोरिउपबनकोरिकिंकरमारियो । पुनि
जंबुमालीमंत्रिसुतअरुपंचमंत्रिसंहारियो ॥ रणमारिअक्षकुमार
बहुबिधिइंद्रजीतसोंयुद्धकै । अतिब्रह्मशस्त्रप्रमाणमानिसोबश्य
भोमनशुद्धकै ॥ ९६ ॥
इति श्रीमत्सकललोकलोचनचकोरचिंतामणिश्रीरामचन्द्रचंद्रिकाया-
मिन्द्रजिद्विरचितायांहनूमद्बंधनंनामत्रयोदशः प्रकाशः ॥ १३ ॥
टी०-जंबुमाली प्रहस्तनामा मंत्रीको पुत्र है यथा वाल्मीकीये ॥ संदृष्टो राक्षसेन्-
द्रेण प्रहस्तस्य सुतो बली ॥ जम्बुमाली महादंष्ट्रो निर्जगाम धनुर्द्धरः ॥ १ ॥ पुनः
पंचमंत्रिणउक्ताः वाल्मीकीये ॥ सविरूपाक्षयूपाक्षौ दुर्द्धर्षं चैव राक्षसम् । प्रघसम्भ्रास
कर्णं च पंच सेनाग्रनायकान् ॥ ९६ ॥
इति श्रीमज्जगज्जननीजनकजानकीजानकीजानिप्रसादाय जनजानकीप्रसाद
निर्मितायां रामभक्तिप्रकाशिकायां त्रयोदशः प्रकाशः ॥ १३॥
मू०-दोहा ॥ याचौदहेंप्रकाशमें, हैहैलंकादाह ॥ सागरती-
रमिलानपुनि, करिहैरघुकुलनाह ॥ १ ॥ रावण-विजयछंद ॥
रेकपिकौनतुअक्षकोघातक दूतबलीरघुनंदनजीको। कोरघुनंदन
रेत्रिशिराखरदूषणदूषणभूषणभूषनभूको। सागरकैसेतरयौजैसेगोपद
चतुर्दशप्रकाशः १४. ( १४५ )
काजकहासियचोरहिदेखौ कैसेबँधायोजोसुंदरितेरीछुईदगसो-
वतपात़कलेखो ॥२॥ रावण-चामरछंद ॥ क्रोरिक्रोरियातना
निफोरिफारिमारिये । काटिकोटिफारिमाँसुबांटिबांटिडारिये ॥
खालखैंचिखैंचिहाडभूनिभूजिखाइरे। पौरिटांगिरुंडमुंडलैउडम्-
द्रजाहुरे ॥३॥ बिभीषण ॥ दूतमारियेनराजराजछोड़िदीजई ।
मंत्रिमित्रपूँछिकैसौऔरदंडकीजई ॥ एकरंकमारिक्यौंबडोकलं-
कलीजई । बूंदसोकिगोकुहामहासमुद्रछीजई ॥ ४ ॥
टी०-मिलान कहे विश्राम ॥ १ ॥ हम तेरी स्त्रीको सोवत में दृग सों छुयो
अर्थ देख्यो ता पातक सों बंधिगये तू रामचन्द्रकी स्त्रीको हरि ल्यायो है
तेरी अतिदुर्गति है है इतिभावार्थः ॥ २ ॥ हनूमानके कठोरवचन सुनि कोप करि
रावण राक्षसन सों कहत हैं क्रोरि क्रोरि कहे करोरि करोरि जे यातना नाना हैं
नखदंतताजनदंडवातादि सों फोरि फोरि कहे जामें चर्म फोरि रुधिर कढि आवै
या प्रकारसों मारि डारो कहूँ ताजनानि पाठ है तौ ताजन कहे चाबुक औखालखैंचै
रोमांचितके कुठारादि सों हाडनके स्थान में काटिकै औ छुरिकादि सों फारिकै
ताको मांस बांटि बांटि डारिये कहे आपनो आपनो भाग करि लीजिये औ हाड
खैंचिके कहे निकारिकै भूनिभूनिकै खाय डारो रुण्ड रुण्डकी पढ़ते रुंडकी खाल
जानो अर्थ यह कि रुण्डकी खालमें तृणादि भरिकै सबके देखिवेके लिये पौरिमें
कहे पुरद्वारमें टांगिदेहु औ मुंडको लैके उड़ाइ कहे उड़िकै राम पास जाउ
रामपासइतिशेषः । जासों मुण्ड चीन्हि रामचन्द्र दूतको मार्यो जानि दुःखपावैं
इतिभावार्थः ॥ ३ ॥ ४ ॥
मू०-तूलतेलबोरिबोरिजोरिजोरिबाससी । लैअपाररारु-
नदूनसूतसोंकसी । पूंछपवनपूतकोसंवारिबारिदीजहीं ॥ अंग-
कोघटाइकैउडाईजातभोतहीं ॥५॥ चंचरीछंद ॥ धामधामनि
आगिकीबहुज्वालमालबिराजहीं। पवनकेझकझोरतेझँझरीझ-
रोखनभ्राजहीं ॥ बाजिबारणशारिकाशुकमोरजोरनभाजहीं ।
छुद्रज्योंबिपदाहिआवतछोडिजातनलाजहीं ॥६॥ भुजंगप्रया-
( १४६ ) रामचन्द्रिका-सटीक ।
तछंद ॥ जटीअग्निज्यालाअटासेतहैंज्यों। शरत्कालकेमेघसं-
ध्यासमैज्यों ॥ लगीज्वालधूमावलीनीलराजैं। मनोस्वर्णकी
किंकिणीनागलाजैं ॥ ७॥ लसैपीतक्षत्रीमठीज्वालमानौ। ढके
ओढनीलंकबक्षोजजानौ ॥ जरेजूहनारीचढ़ीचित्रसारी। मनो
चेटकामेंसतीसत्यधारी ॥८॥ कहूँ रैनिचारीगहेज्योतिगाढे।
मनोईशरोषाग्निमेंकामडाढे ॥ कहूंकामिनीज्वालमालानिभौरैं।
तजैंलालसारीअलंकारतोरैं ॥ ९ ॥
टी०-तूलरुई बाससी वस्त्र ॥ ५ ॥ झँझरीके जे झरोखा कहे छिद्र हैं तिनमें
भ्राजहीं कहे शोभित हैं जैसे छुद्रप्राणी जाके पास रहत है ताको कछू विपत्ति-
परै तो सहाय नहीं करत ताको छोडिकै भागत है लजात नहीं है तैसे अग्निदाह-
की जो विपत्तिहै तामें वारणादि सब भागत भये ॥ ६ ॥ नाग कहे हाथी ॥७॥
वक्षोज कुचसम पीत क्षत्रिय हैं ओढनी सम अग्निज्वाल है ॥ ८ ॥ भोरे कहे
भ्रमसों अलंकार स्वर्ण भूषण ॥ ९ ॥
मू०-कहूंभौनरातेरचेधूमछाहीं। शशीसूरमानोंलसैंमेघमा-
हीं। जरैअस्त्रशालाबलीगंधमाला ॥ मिलैअद्रिमानौलगीदाव
जाला ॥ १० ॥ चलीभागिचौहूंदिशाराजधानी। मिलीज्वा-
लमालाफिरैदुःखदानी॥मनोईशबानावलीलाललोलें। सबै-
दैत्यजा यानकेसंगडोलैं ॥ ११ ॥ सवैया ॥ लंकलगाइदईह-
नुमंतबिमान बचेअतिउच्चरुखीहै। छातिफटैंउचटैंबहुधामनि
रानीरटैंपानीपानीदुखीहै॥ कंचनको पबिल्योपुरपूरपयोनिधि-
मेंपसरेतिसुखीहै। गंगहजारमुखीगनिकेशोगिरामिलीमानौ-
अपारमुखीहै ॥ १२ ॥
टी०-शशि कहे श्री जो प्रताप है त्यहिसहित प्रतापरहित सूर्य्यको रंग श्वेत
है प्रतापसहित अरुण है तासों शशि कह्यो अथवा कि शशि कहे चन्द्रमा सहित
मानों सूर्य लसत हैं अर्थ चन्द्रयुक्त सूर्य होते हैं तब सूर्य्यग्रहण होत है सो
चतुर्दशप्रकाशः १४. ( १४७ )
मानो ग्रहण समयमें सूर्य शोभित हैं इत्यर्थः । औ कि मानो सूर्य मेघवनमें
शोभित हैं यथा सिद्धांत रहस्ये 'छादयत्यर्कमिन्दुर्गिति' । सर्पसम शिखैं चन्दन
गंधसम गंधहै ॥ १० ॥ महादेव त्रिपुरका भस्म करिबे को बाण चलायो है ते
बाण दैत्य जाया जे देत्यस्त्री हैं तिनके भागत में तनुमें लागे भस्म कऱ्योहैं
मानो तेईहैं बाणावली सम ज्वाला माला हैं दैत्यजाया सम राक्षसी हैं ॥ ११ ॥
पाच कहे पन्नामणि अथवा पाचि कहे पाकि कै फटे कहे फूटती हैं ते मणि
बहुधा उचटती हैं कहे उछरती हैं गंगको सहस्रमुखी कहे सहस्रधारा ह्वै समुद्रको
मिलीं गुणिकै गिरा जो सरस्वती हैं सो मानो अति सुखी ह्वै कै अपार कहे
अगन्यमुखी ह्वै कै समुद्रको मिली हैं सुवर्णद्रव सरस्वतीके जल समहै ॥ १२ ॥
मू०-दोहा ॥ हनुमतलाईलंकसब, बच्योबिभीषणधाम ॥
ज्योंअरुणोदयबेरमें, पंकजपूरबयाम ॥ १३ ॥ संयुताछंद ॥
हनुमंतलंकलगाइकै। पुनिपूछसिंधुबुझाइकैकै॥शुभदेखिसीतहि
पाँपरे। मनिपायआनँदजीभरे ॥ १४ ॥ रघुनाथपैजबहीगये।
उठिअंकलावनकोभये॥ प्रभुमैं कहाकरणीकरी। शिरपायकीध-
रणीधरी ॥ १५॥ दोहा ॥ चिन्तामणिसोमणिदई,रघुपतिकरह-
नुमंत ॥ सीताजूकोमनरँग्यो, जनुअनुरागअनंत ॥ १६ ॥
टी०-हनुमान करिकै लाई कहे जारी जो जरति सब लंका है तामें बच्यो
जो विभीषणको धाम है सो ज्वालमध्य कैसो शोभित है जैसे पूर्व याम कहे
प्रथम पहर अरुण जे सूर्य हैं तिनके उदयके बेरमें कहीं समयमें पङ्कज कमल
शोभित है जैसे कमल रात्रिको मुकुलित रहत है प्रातही सूर्योदय होत अति
प्रफुल्लित है प्रकाशको प्राप्त होत है तैसें रावणको प्रभावरूपी जो रात्रि है तामें
विभीषणको धाम उदासीन रह्यो सो लङ्कामें रामप्रतापरूपी सूर्योदय सोँ धाम
सम जो अग्नितेज है तामें शोभित भयो पूर्वयाम कहि या जानियो कि ज्यों ज्यों
सूरज सम प्रताप अधिक उदय को प्राप्त ह्वै है त्यों त्यों कमल सम विभीषणको
घर अधिक प्रकाशको प्राप्त ह्वै है इतिभावार्थः ॥ पूर्वयाम यासों कह्यो कि मेघादि
करिकै आच्छादित है मेघनसों कहि तृतीयादि पहरू मे:उदित कहावत है॥१३॥
वाल्मीकीय रामायण में कह्यो है कि, लंक दाहिकै हनुमान पश्चात्ताप करयो है