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सर्वकोश
रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

रामचन्द्रिका (महाकवि केशवदास - सविस्तार सान्वय हिन्दी व्याख्या सटीक)

Ramachandrika of Mahakavi Keshavdas with Commentary

महाकवि केशवदास द्वारा

DevanagariHindipublished269 पृष्ठ

पृष्ठ 143, कुल 269 में से

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पृष्ठ 143

मू०-कृतघ्नीकुदाताकुकन्याहिचाहै॥ हितूनग्नमुंडीनहींको
सदाहै॥ अनाथैसुन्योमैंअनाथानुसारी। बसैचित्तदंडीजटी
मुंडधारी॥ ५९॥
टी०-कृत जो कर्म हैं ताके हंता नाशकत्र्ता हैं अर्थ शुभाशुभ कर्म बन्धन तोरि
दासनको मुक्तकरत हैं औ कु जो पृथ्वी है ताके दाता हैं अर्थ पूर्ण पृथ्वीके
दाता हैं बावनरूप ह्वै बलिसों ले इंद्रको दियो औ कु जो पृथ्वी है ताकी
कन्या चैत्रमहौ तिन्हें चाहत हैं औ नग्न औ मुण्डी जे तप स्त्री हैं तिनके हितू हैं
औ अनाथ कहे जिनको नाथ स्वामी कोऊ नहीं है आशय कि आपही सबके
नाथ हैं औ अनाथ कहे अशरण जे मानी हैं तिनके अनुसारी अगामी हैं जाको
रक्षक कोई नहीं है ताकी रक्षा करिवे को पाछे पाछे आपु फिरत हैं जैसे गज
प्रह्लादकी रक्षा करचो औ दण्डी औ जटी औ मुण्डधारी जे तपस्वी हैं तिनके
चित्तमें बसत हैं अर्थ राजाको सदा ध्यान करतहैं अथवा दंडी औ जटी औ
मुण्डधारी ऐसे जे महादेव हैं तिनके चित्तमें बसत हैं औ द्रव्यरूप लक्ष्मीको
जे दूषत हैं औ उदासीन रहत हैं ते दास विष्णुको अतिप्रिय हैं औ निर्गुणी कहे
प्राकृत गुणन करि रहित हैं अर्थ अति उत्कृष्ट गुणहैं जिनके। यथा वायुपुराणे॥
“ सत्त्वादिगुणहीनत्वान्निर्गुणी हरिरीश्वरः”॥ औ ता नाम कहे ताको नाम ऐसो
है जाकारिकै नहीं लीजियत अर्थ जाके नामको शिवादि देव सब जपतहैं अथवा
महानिर्गुणी कहे रज सत्त्व तमोगुण करि रहित हैं औ ताको नाम नहीं लीजियत
है अर्थ जाके नामका जप नहीं है ऐसी जो ब्रह्मज्योति है सो है अथवा हे देवि!
जे तुम्हें दूषतहैं तिन्हें कहा हितू मानत हैं अर्थ हितू नहीं मानते जो तुम्हारी-
रंचकऊ विरोधी है ताही रामचन्द्र परम विरोधी मानत हैं जयंतादि ते जानौ औ
तोसों उदासीन है ताहू को कहा हितू मानत है अर्थ ताहू को आपनो परम हितूहू
होइ पै विरोधही जानतहैं सीय खोजको वानर पठाइबेंमें सुग्रीव उदासीनता करचो
प्रेमकरि आपुहीसों वानर न पठयो तब कोपकरि लक्ष्मणसों विरोधी सम वचन
कहि पठावनादि सों जानौं औ महानिर्गुणी कहे उत्कृष्ट गुणन करि युक्त जे
रामचन्द्र हैं तिनको नाम कहाना लीजै अर्थ यह कि लीजै ताहीके नामसों
मुक्ति प्राप्ति होती है॥ मैं तुम्हारो सदा दास हौं मोपै कृपा काहे नहीं कीजत
सेवकपर कृपा करिवो स्वामीको उचित है अदेवीनकी रानीहोहु इत्यादि वचन
आशीर्वादात्मक हैं कि तुम ऐसे सुखको प्राप्त होहु॥ ५९॥