प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
ति रामः)with a colon:(ततः प्रविशति रामः:)? No, it's (ततः प्रविशति रामः)with a dot? No,रामः.)- look at it:(ततः प्रविशति रामः.)`).
-
Line 9:
रामः— (सशोकम्)(orरामः— (सशोकम् )with a dash). -
Line 10:
त्यक्त्वा तां गुरुणा मया च रहितां रम्यामयोध्यां पुरी
Wait, is there an anusvara onपुरी?
Look atपुरी: there is a dot to the right? No, there is a comma/speck far to the right, but onरीthere is no dot? Wait, at the top ofरी, no, but in line 10, the last word isपुरीorपुरीं?
Wait,रम्यामयोध्यां पुरींis grammatically required. In the print:पुरीwith no clear anusvara, wait, there is a tiny speck overरी? No, look atमया च रहितां रम्यामयोध्यां पुरी: wait, there's an apostrophe/speck at the far right. -
Line 11:
`मुद्वाप्यापि ममाभिषेकमखिलं मत्सन्नि
कष्टं वनं स्त्रीजनसौकुमार्यं
समं लताभिः कठिनीकरोति ॥ (३)
(उपेत्य) मैथिलि ! अपि तपो वर्धते !
सीता—हम् आर्यपुत्रः ! जयत्वार्यपुत्रः ।
रामः—मैथिलि ! यदि ते नास्ति धर्मविघ्नः, आस्यताम् ।
सीता—यदार्यपुत्र आज्ञापयति । (उपविशति)
रामः—मैथिलि ! प्रतिवचनार्थिनीमिव त्वां पश्यामि । किमिदम् ?
सीता—शोकशून्यहृदयस्येवार्यपुत्रस्य मुखरागः । किमेतत् ?
रामः—मैथिलि ! स्थाने खलु कृता चिन्ता ।
कृतान्तशल्याभिहते शरीरे
तथैव तावद् हृदयव्रणो मे ।
नानाफलाः शोकशराभिघाता
स्तत्रैव तत्रैव पुनः पतन्ति ॥ (४)
सीता—आर्यपुत्रस्य क इव सन्तापः ?
शब्दार्थ—उपहारसुमनः=देवताओं के लिए चढ़ाए जाने वाले पुष्प ।
आकीर्णाः=परिपूर्णा । सम्मार्जितः= स्वच्छ बना । आश्रम पदविभवेन=तपोवन
में प्राप्त पुष्प आदि सम्पदा से । अनुष्ठितः=किया है । देवसमुदाचारः=देव-
पूजा । बालवृक्षान्=छोटे पेड़ों को । उदकप्रदानेन=जल से सींचने के द्वारा ।
अनुक्रोशयिष्यामि=प्रसन्न करूंगी । अविघ्नम्=सानन्द । अस्य=सिंचन कार्य
का । त्यक्त्वा=छोड़ कर । तां=उस (अयोध्या) को । गुरुणा=पिता दशरथ के
द्वारा । मया=मुझ राम के द्वारा । रहिता=सूनी बनी । रम्यां=सुन्दर । पुरीम्
=नगरी को । उद्यम्य=प्रयत्नपूर्वक सम्पादित करके । अखिलं=सम्पूर्णां ।
मत्सन्निधौ= मेरे पास । आगतः=(भरत) आया । गुणनिधिः=गुणों का समूह
भरत । तत्र=उसी सूनी अयोध्या में । सम्प्रेषितः=भेजा गया । नृपतेः=राजा
का । धुरं=भार । सुमहती=बहुत भारी । एकः=अकेला भरत । समुत्कर्षति=
ढो रहा है । विमृश्य=विचार कर के । ईदृशशोकविनोदनार्थम्=इस प्रकार के
अर्थात् भरत वियोग जन्य दुःख को दूर करने के लिए । अवस्थाकुटुम्बिनीम्=
सभी दशाओं मे साथ रहने वाली (कुटुम्ब धातु चुरादि गण, आत्मनेपदी की
अकर्मक धातु है, जिसका अर्थ होता है "धारण करना" इसके लट्, प्र०पु०,
(142)
एक वचन में "कुटुम्बयते" रूप बनता है) । प्रत्यग्राभिषिक्तानि=अभी-अभी
सीचे गए । वृक्षमूलानि=वृक्षो की जडें । अदूरगतां=पास मे ही । वृक्षावर्ते=
पेड के थाले (आलवाल) में । सफेनम्=झाग के सहित । अवस्थित= भूमि मे
गया हुआ । तृषितपतिताः=प्यासे होने के कारण जल पीने को आए हुए ।
क्लिष्ट=कलुषित अर्थात् मटमैले । खगा=पक्षी । स्थलं=सूखी जगह पर ।
अभिपतन्ति=दौड कर जा रहे हैं । कीटा.=कीडे । जलपूरिते=पानी से भरे ।
नववलयिनः=नई गोलाकार रेखा वाले । मूले=जड भाग मे । जलक्षयरेखया=
पानी के सूख जाने के चिह्न से । श्राम्यति=थक जाता है । दर्पणे=काच को
उठाने में । नैति=न+एति=नही प्राप्त करता है । खेद=थकान को । वहन्त्याः
=लेते हुए । कष्टं=दुःख । स्त्रीजनसौकुमार्यम्=ललना स्वभाव की सुलभ कोम-
लता । कठिनीकरोति=कठोर हो जाती है । धर्मविघ्नः= अनुष्ठान मे बाधा ।
आस्यताम्=बैठो । प्रतिवचनार्थिनीम्=कुछ पूछने की इच्छुक । शोकशून्यहृद-
यस्य=दुःख से सूने हृदय वाले । मुखरागः=आनन का वर्ण । स्थाने=उचित विषय
मे । कृतान्तशल्याभिहिते = यमराज के बाण तुल्य यथा वाले । हृदयव्रणः
=पिता के वियोग के दुःख वाला मानसिक खेद । नानाफलाः=अनेक प्रकार के
फल वाले । शोकशराभिघाता.=दु ख रूपी वाणो के प्रहार । क इव=
किस प्रकार का । सन्ताप.=शोक ।
अन्वय--गुरुणा मया च रहिताम् ताम् रम्याम् अयोध्याम् पुरीम्
त्यक्त्वा, अखिलम् मम अभिषेकम् उद्यम्य मत्संन्निधौ आगतः अपि गुणनिधिः
भरतः पुनः तत्र एव रक्षार्थम् सम्प्रेषितः । एकः नृपतेः सुमहतीम् धुरं
समुत्कर्षति, कष्टम् भोः । (१)
अन्वय-सलिलम् वृक्षावर्ते अवस्थितम् सफेनम् भ्रमति । तृषितपतिताः
एते खगाः क्लिष्टम् जलम् न पिवन्ति । बिले जलपूरिते आर्द्रा. कीटाः स्थलम्
पतन्ति । वृक्षाः मूले जलक्षयरेखया नववलयिनः । (२)
अन्वय-य अस्या. करः दर्पणे अपि श्राम्यति, स कलशम् वहन्त्याः
खेदम् न एति । कष्टम् (यत्) वनम् लताभिः समम् स्त्रीजनसौकुमार्यम्
कठिनीकरोति । (३)
अन्वय-कृतान्तशल्याभिहिते मे शरीरे हृदयव्रणः तावत् तथा एव ।
नानाफला. शोकशराभिघाताः तत्रैव तत्रैव पुनः पतन्ति । (४)
हिन्दी अर्थ
(सीता और तापसी का प्रवेश)
( 143 )
सीता—आर्ये, आश्रम में बिखरे हुए पूजा के फूलों को साफ कर दिया ।
आश्रम सुलभ फल फूल आदि से देव पूजा भी कर ली । तो अब जब
तक पतिदेव नहीं आते हैं, मैं इन छोटे पौधों को जल से सींच लूँ ।
तापसी—तुम्हारा यह कार्य बिना बाधा के होवे ।
(इसके बाद राम आते हैं)
राम—(खेद पूर्वक) पिताजी और मुझ से रहित उस सुन्दर अयोध्या को
छोड़ कर, मेरे अभिषेक की सारी सामग्री साथ लेकर भरत मेरे पास
आया । मैंने पुनः उस गुणों के आगार भरत को राज्य के पालन के
लिए वहीं पर भेज दिया । बड़े कष्ट की बात है कि पिताजी के
राज्य के भारी भार को वह अकेला ही खेच रहा है । (१)
(सोच कर) यह राजकार्य ऐसा ही है । तो अब मैं ऐसी चिन्ताओं से
मुक्ति पाने के लिए मेरी सहचरी सीता को देखूँ । सीता अभी
कहाँ गई होगी ? (घूम कर और देख कर) अरे, ये तत्काल सींचे गए
पौधों के थाल बता रहे हैं कि सीता यहीं कहीं पास में है । क्योंकि—
पेड़ों के थालों में पड़ा झाग वाला जल अभी भी घूम रहा है और प्यासे
पक्षी पास आकर भी इस मैले पानी को नहीं पी रहे हैं । जल से भीगे
कीड़े अपने बिलों से भाग कर बाहर आ रहे हैं तथा पेड़ों की जड़ों
में कई गोलाकार रेखाएं पड़ गई हैं । (२)
(देख कर) अरे, सीता तो यह रही । हाय, बड़ा दुःख है ।
इसका हाथ कभी दर्पण उठाने में भी थक जाता था, वही हाथ अब
घड़ा उठाने में भी नहीं थकता । वनवास ने लताओं के साथ नारी
की सुकुमारता को भी कठोरता में बदल दिया है । (३)
(पास जाकर) सीते, क्या तुम्हारा तप बढ़ रहा है ?
सीता—अरे, पतिदेव । आर्यपुत्र की जय हो ।
राम—सीते, यदि तुम्हारे धार्मिक कार्य में कोई रुकावट न हो, तो बैठ जाओ ।
सीता—जैसी आपकी आज्ञा । (बैठती है)
राम—सीते, लगता है जैसे तुम कुछ पूछना चाहती हो ? क्या बात है ?
सीता—आपके मुख से लग रहा है मानो आपका हृदय किसी दुःख से
सना हो रहा है । यह क्या है ?
(144)
राम—सीते, तुम्हारा सोचना नितान्त उचित है ।
यमराज के बाणों के प्रहार होने वाले मेरे शरीर पर हृदय का घाव
तो अभी वैसा ही है । इसी बीच अनेक फल वाले दुःख रूपी बाणों
के आघात उसी स्थान पर बार-बार गिर रहे हैं । (४)
सीता—आखिर आर्यपुत्र को किस बात की चिन्ता है ?
(२) मूल
रामः—श्वस्तत्रभवतस्तातस्यानुसंवत्सरश्राद्धविधिः ।
कल्पविशेषेणनिवपनक्रियामिच्छन्ति पितरः । तत
कथं निर्वर्तयिष्यामीत्येतच्चिन्त्यते । अथवा—
इच्छन्ति तुष्टिं खलु येन केन
त एव जानन्ति हि ता दशा मे ।
इच्छामि पूजां च तथापि कर्तुम्
तातस्य रामस्य च सानुरूपाम् ॥ (५)
सीता—आर्यपुत्र ! निर्वर्तयिष्यति श्राद्धं भरत ऋद्ध्या, अवस्था-
नुरूपं फलोदकेनाप्यार्यपुत्रः । एतत् तातस्य बहुमततरं
भविष्यति ।
रामः—मैथिलि !
फलानि दृष्ट्वा दर्भेषु स्वहस्तरचितानि नः ।
स्मारितो वनवासं च तातस्तत्रापि रोदिति ॥ (६)
(ततः प्रविशति परिव्राजकवेषो रावणः)
रावणः—एष भोः !
नियतमनियतात्मा रूपमेतद् गृहीत्वा
खरवधकृतवैरं राघवं वञ्चयित्वा ।
स्वरपदपरिहीणां हव्यधारामिवाहं
जनकनृपसुतां तां हर्तुकामः प्रयामि ॥ (७)
(परिक्रम्याधो विलोक्य)
इदं रामस्याश्रमपदद्वारम् । यावदवतरामि । (अवतरति)
यावदहमप्यतिथिसमुदाचारमनुष्ठास्यामि । अहमतिथिः ।
कोऽत्र भोः !
( 145 )
रामः-(श्रुत्वा) स्वागतमतिथये।
रावणः-साधु विशेषितं खलु रूपं स्वरेण।
रामः-(विलोक्य) अये भगवान्। भगवन्! अभिवादये।
रावणः स्वस्ति।
रामः-भगवन्! एतदासनमास्यताम्।
रावणः--(आत्मगतम्) कथमाज्ञप्त इवास्म्यनेन।
(प्रकाशम्) बाढम्। (उपविशति)
रामः-मैथिलि! पाद्यमानय भगवते।
सीता-यदार्थपुत्र आज्ञापयति। (निष्क्रम्य प्रविश्य)
इमा आपः।
रामः-शुश्रूषय भगवन्तम्।
सीता-यदार्थपुत्र आज्ञापयति।
रावणः-(मायाप्रकाशनपर्याकुलो भूत्वा) भवतु भवतु। इयमेका
पृथिव्या हि मानुषीणामरुन्धती।
यस्या भर्तेति नारीभिः सत्कृतः कथ्यते भवान्॥ (८)
रामः-तेन हि आनय, अहमेव शुश्रूषयिष्ये।
रावणः-अयि, छाया परिहृत्य शरीरं न लङ्घयामि। वाचानुवृत्तिः
खल्वतिथिसत्कारः। पूजितोऽस्मि। आस्यताम्।
रामः-बाढम्। (उपविशति)
रावणः-(आत्मगतम्) यावदहमपि ब्राह्मणसमुदाचारमनुष्ठास्यामि
(प्रकाशम्) भोः! काश्यपगोत्रोऽस्मि। साङ्गोपाङ्गं
वेदमधीये, मानवीयं धर्मशास्त्रं, माहेश्वरं योगशास्त्रं, बार्ह-
स्पत्यमर्थशास्त्रं, मेघातिथेर्न्यायशास्त्रं, प्राचेतसं श्राद्धकल्पं च।
रामः-कथं कथं श्राद्धकल्पमिति।
शब्दार्थ - श्वः=कल। तत्रभवतः=पूज्य। तातस्य=पिता दशरथ की।
अनुसंवत्सर=प्रत्येक वर्ष मे किया जाने वाला। श्राद्धविधिः=श्राद्धकर्म। कल्प-
विशेषेण=विशिष्ट वस्तु दान के द्वारा। निवपनक्रियाम्=पिण्ड दान के कार्य
को। पितरः = मृत पूर्वज। निवर्तयिष्यामि = पूर्ण करूंगा। चिन्त्यते=विचार
किया जा रहा है। तृप्तिम् = तृप्ति को। येन केन = अपनी दशा के अनुरूप।
त इव = वे ही। मे = मेरी। रामस्य = स्वयं के। सानुरूपाम् = अपने योग्य।
( 146 )
ऋद्ध्या = ऐश्वर्य के साथ । फलोदकेन = फल-फूल और जल से । बहुमतं
= अधिक प्रिय । दर्भेषु = कुश घास पर । नः = हमारे । स्मारितः = याद दिला
जायेगा । रोदिति = रोएँगे । परिव्राजकवेषः = साधु के रूप मे । नियतम् = जितेन्द्रिय
राम को । अनियतात्मा = अजितेन्द्रिय मैं रावण । रूपम् = वेश को । खरं
कृतवैरम् = खर नामक राक्षस को मारने के कारण उत्पन्न शत्रु को । वञ्च-
यित्वा = ठग कर । स्वराङ्गपरिहीणा = स्वर और शब्द के विभाग से रहित
हव्यधाराम् = हवि और घी की धारा को । हर्तुकामः = अपहरण की इच्छा
वाला । प्रयामि = जा रहा हूँ । अधः = नीचे । अवतरामि = नीचे उतरूं । प्रतिपत्ति
समुदाचारम् = अभ्यागतोचित व्यवहार को । अनुष्ठास्यामि = करूँगा । साधु =
स्वभाव सुन्दर । विशेषितम् = और अधिक सुन्दर किया है । रूप = आकृति ।
स्वरेण = शब्द के द्वारा । आज्ञप्तः = आज्ञा दिया गया । वाढम् = ठीक ।
पाद्यम् = पाव धोने के लिए जल । भगवते = महानुभाव के लिए । शुश्रूषय = सेवा
करो । मायाप्रकाशनपर्याकुलः = सीता द्वारा रावण के पैर छूने पर उस अजिते-
न्द्रिय के रोमाञ्च आदि से सन्यासी का कपट भेद खुल जाने से व्याकुल ।
भूत्वा = होकर । अरुन्धती = वसिष्ठ पत्नी के तुल्य पतिव्रता । भर्ता = पति ।
सत्कृतः = पूजित । कथ्यते = कहे जाते हो । भवान् = आप । आनय = लाओ ।
लङ्घयामि = छूने दूंगा । वाचानुवृत्तिः = अच्छी वाणी को कहना । पूजितः =
सम्मानित । समुदाचारम् = आचरण को । साङ्गोपाङ्गम् = अंग और उपांग
के सहित । वेद के छ अग = शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिष ।
उपांग चार हैं = पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशास्त्र । अधीये = पढा हुआ
हूँ । मानवीयं = मनु द्वारा प्रवर्तित । माहेश्वरं = महेश्वर द्वारा कथित । धर्म-
शास्त्र = धर्मानुशासन । योगशास्त्र - पातंजल उपजीव्य योगविद्या का रहस्य ।
बार्हस्पत्यम् = बृहस्पति द्वारा कथित । अर्थशास्त्र = अर्थनीति प्रतिपादन प्रधान
राजनीतिशास्त्र । मेधातिथेः = मेधातिथि नामक महर्षि का । न्यायशास्त्र = तर्क-
शास्त्र विशेष । प्राचेतस = वरुण द्वारा कथित । श्राद्धकल्प = श्राद्धविधान ।
अन्वय — येन केन खलु तुष्टिम् इच्छन्ति, हि ते एव मे तां दशां
जानन्ति । तथापि तातस्य च रामस्य सानुरूपा पूजा कर्तुम् इच्छामि । (५)
अन्वय — दर्भेषु नः स्वहस्तरचितानि फलानि दृष्ट्वा तातः वनवासं
स्मारितः च तत्रापि रोदिति । (६)
( 147 )
अन्वय-अनियतात्मा एतत् रूप ग्रहीत्वा नियतं खरवधकृतवैर राघवं
वा अह स्वरपदपरिहीणा हव्यधाराम् इव तां जनकनृपसुता हर्तुं कामः
। (७)
अन्वय—इयं हि पृथिव्या मानुषीणाम् एका अरुन्धती । यस्याः भर्ता
खान् नारिभिः सत्कृतः कथ्यते । (८)
। अर्थ
-कल पिताजी का वार्षिक श्राद्ध दिवस है । पितर लोग सामर्थ्य के अनुसार
अपना पिण्डदान चाहते है । उमे मैं किस प्रकार पूरा करूँगा, यही
चिन्ता है ।
अथवा—
वे जिस भांति तृप्त होते है, होवे । क्योकि वे मेरी पूरी स्थिति को
तो जानते ही है । फिर भी मैं पिताजी की प्रतिष्ठा तथा अपने सामर्थ्य
के अनुरूप पितृश्राद्ध करना चाहता हूँ । (५)
सीता—आर्यपुत्र, बडे वैभव के साथ पिताजी का श्राद्ध तो भरत करेंगे ही,
आप भी अपनी अवस्था के योग्य फल-जल से श्राद्ध करे । पिताजी
इसे ही पर्याप्त मान लेगे ।
सीते, —
राम—कुशों पर हमारे हाथों से रखे फलो को देखते ही हमारे वनवास की
याद आ जाने से पिताजी वहां पर भी रो देगे । (६)
(इसके बाद संन्यासी के वेश में रावण का प्रवेश)
रावण—अरे यह,
राम ने खर दूषण का वध करके मेरे साथ वैर बढाया है । मैं आज
उसे ठगने के लिए अविरक्त होकर भी विरक्त का रूप धारण करता
हूँ । मैं सीता का हरण करने उस प्रकार जा रहा हूँ, जिस प्रकार
स्वर तथा पद से अशुद्ध मन्त्रोच्चारण हवन की आज्यधारा को हर
लेता है । (ऐसी मान्यता है कि मन्त्रदोष से दीयमान हव्यधारा को
राक्षस ग्रहण कर लेते है ।) (७)
(घूम कर तथा नीचे की ओर देख कर) यह राम के आश्रम के
स्थान का द्वार है । तो मै नीचे उतरूं । (उतरता है) अब मै अतिथि
के योग्य आचरण करता हूँ । मैं अतिथि हूँ । अरे, यहां कौन है ?
राम— (सुन कर) अतिथि का स्वागत है ।
( 148 )
रावण—इसके स्वर ने रूप को और चमका दिया है ।
राम—(देख कर) अरे भगवान् हैं ।' भगवान्, प्रणाम ।
रावण—कल्याण हो ।
राम--भगवान्, यह आसन है, बैठिए ।
रावण—(मन मे) इसके द्वारा मे मानो आदेश दिया गया हूँ । (प्रव
अच्छा । (बैठता है)
राम—सीते महात्मा के लिए पाद्य जल लाओ ।
सीता—जैसी आर्यपुत्र की आज्ञा । (बाहर जाकर और प्रवेश करके)
‧ जल है ।
राम—महात्मा की सेवा करो ।
सीता--जैसी आपकी आज्ञा ।
रावण—(भेद खुलने के भय से हक्का-बक्का होकर) रहने दो, रहने दो ।
सचमुच मे यह अकेली सीता पृथ्वी पर स्त्रियो मे अरुन्धती के समान
पतिव्रता है, जिसके स्वामी होने के कारण स्त्रियाँ आपका यश
गाती है । (८)
राम—तो फिर लाओ । मैं स्वयं ही सेवा करूंगा ।
रावण—अरे, छाया के समान सीता से सेवा का निषेध करने वाला में शरीर
के समान आपसे कैसे ग्रहण करूंगा । सच्चा अतिथि सत्कार तो
मीठे वचनो के स्वागत से होता है । मेरा सम्मान हो गया है । बैठिए ।
राम--अच्छा । (बैठते हैं)
रावण—(स्वागत) तब तक मैं भी ब्राह्मण के अनुरूप कार्य करूँ । (प्रकट)
श्रीजी, मैं काश्यप गोत्र का हूँ । मैंने छहों अंग व चारों उपांगो के
सहित वेद, मानकीय धर्मशास्त्र, माहेश्वर योगशास्त्र, वृहस्पति का
अर्थशास्त्र, मेधातिथि का न्यायशास्त्र और प्रचेता का श्राद्धकल्प इन
सबका अध्ययन किया है ।
राम—क्या कहा ? श्राद्धकल्प ।
(३) मूल
रावणः—सर्वा. श्रुतीरतिक्रम्य श्राद्धकल्पे स्पृहा दर्शिता किमेतत् ?
रामः—भगवन् ! भ्रष्टाया पितृसन्तानायामागम इदानीमेष ।
( 149 )
[रा]वणः--अलं परिहृत्य । पृच्छतु भवान् ।
[रा]मः--भगवन् ! निवपनक्रियाकाले केन पितॄंस्तर्पयामि ?
[रा]वणः--सर्वम् श्रद्धया दत्तं श्राद्धम् ।
[रा]मः--भगवन् ! अनादरतः परित्यक्तं भवति । विशेषार्थम् पृच्छामि ।
[रा]वणः--श्रूयताम् । विरूढेषु दर्भाः, ओषधीषुतिला, कलाय शाकेषु,
मत्स्येषु महाशफर., पक्षिषु वार्ध्रीणसः, पशुषु गौः खड्गो वा,
इत्येते मानुषाणां विहिताः ।
रामः--भगवन् ! वाशब्देनावगतमन्यदप्यस्तीति ।
रावणः--अस्ति प्रभावसम्पाद्यम् ।
रामः--भगवन् ! एष एव मे निश्चयः ।
उभयस्यास्ति सान्निध्यं यद्येतत् साधयिष्यति ।
धनुर्वा तपसि श्रान्ते श्रान्ते धनुषि वा तपः ॥ (६)
रावणः--सन्ति । हिमवति प्रतिवसन्ति ।
रामः--हिमवतीति । ततस्ततः ।
रावणः--हिमवत. सप्तमे शृंगे प्रत्यक्षस्थाणुशिरःपतितगङ्गाम्बु-
पायिनो वैदूर्यश्यामपृष्ठा. पवनसमजवाः काञ्चनपार्श्वा नाम
मृगाः, यैर्वैखानसबालखिल्यनैमिषीयादयो महर्षयश्चिन्तित-
मात्रोपस्थितविपन्नैः श्राद्धान्यभिवर्धयन्ति ।
तैस्तर्पिताः सुतफलं पितरो लभन्ते
हित्वा जरा खमुपयान्ति हि दीप्यमानाः ।
तुल्यं सुरैः समुपयान्ति विमानवास
मावृत्तिभिश्च विपयैन बलान् ध्रियन्ते ॥ (१०)
रामः--मैथिलि !
आपृच्छ पुत्रकृतकान् हरिणान् द्रुमांश्च
विन्ध्य वनं तव सखीर्दयिता लताश्च ।
वत्स्यामि तेषु हिमवद्गिरिकाननेषु
दीप्तैरिवौषधिवनैरुप रञ्जितेषु ॥ (११)
सीता--यदार्यपुत्र आज्ञापयति ।
रावणः--कौसल्यामातः ! अलमतिमनोरथेन । न ते मानुषैर्दृश्यन्ते ।
( 150. )
रामः—भगवन् ! किं हिमवति प्रतिवसन्ति ?
रावणः—अथ किम् ?
रामः—तेन हि पश्यतु भवान् ।
सौवर्णान् वा मृगांस्तान् मे हिमवान् दर्शयिष्यति ।
(भिन्नो मद्बाणवेगेन क्रौञ्चत्वं वा गमिष्यति ।) (१२)
रावणः—(स्वगतम्) अहो असह्यः खल्वस्यावलेपः ।
(प्रकाशम्) अये विद्युत्सम्पात इव दृश्यते । कौसल्या-मात-
रिहस्थमेव भवन्तं पूजयति हिमवान् । एष काञ्चनपार्श्वः ।
रामः—भगवतो वृद्धिरैषा ।
सीता—दिष्ट्याऽऽर्यपुत्रो वर्धते ।
रामः—न न,
तातस्यैतानि भाग्यानि यदि स्वयमिहागतः ।
अर्हत्येष हि पूजाया लक्ष्मणं ब्रूहि मैथिलि ॥ (१३)
शब्दार्थ - श्रुतीः = वेदो को । अतिक्रम्य = छोड कर । स्पृहा=इच्छा
भ्रष्टाया = समाप्त हुए । पितृमत्ताया = पिता की जीवित स्थिति के
आगम. = शास्त्र । अल परिहृत्य = मत छोडिए । निवपनक्रियाकाले=पिण्ड दा
के समय मे । पितॄन् = पितरो को । अनादरतः = अपमानपूर्वक दिया गया
विशेषार्थम् = विशिष्ट बात को । विरूढेषु = उगने वालीवस्तुओं मे । दर्भाः =
कुश घास । श्रोप वीषु = वनस्पतियो मे । कलाय = मटर । शाकेषु = सागो मे
मत्स्येषु = मछलियो मे । महाशफरः=बड़ी पोठी मछली, जिसके शरीर
चमक होती है । वार्ध्रीणसः = एक पक्षी, जिसकी गर्दन, सिर, पैर और प
क्रमशः नीले, लाल, काले और श्वेत वर्ण के होते हैं, "नीलग्रीवो रक्तशी
कृष्णपादः सितच्छदः । वार्ध्रीणसः स्यात् पक्षीश. ।" खड्गः = गैंडा
विहिता. = निश्चित या विधान किए हुए । वा = अथवा । अवगतम्=जा
गया । प्रभावसम्पाद्यम्=विशिष्ट तेजस्वियो द्वारा किया जाने योग्य । उभयर-
=दोनो प्रकार से । सान्निध्यं=समीपता । साधयिष्यति=पूर्ण करेगा । तपसि=
तप के । श्रान्ते=थक जाने पर । हिमवति= हिमालय पर । प्रतिवसन्ति=निवास
करते है । श्रृङ्गे=शिखर पर । प्रत्यक्ष=साक्षात् वर्तमान । स्थाणु =शिव । पतितं
=गिरने वाले । अम्बुपायिनः=जल पीने वाले । वैदूर्य=लहमुनिया
रत्न । श्याम-पृष्ठाः=काले रंग की पीठ वाले । पवनसमजवाः = हवा
के समान वेग वाले । काञ्चनपार्श्वा = इस नाम वाले ।
वानस=वानप्रस्थ । बाल-खिल्य=एक प्रकार के ऋषि, पुराणों के अनुसार
ह्मा के रोम से उत्पन्न ऋषि-समूह, जिनके शरीर का आकार अँगुठे के
रावर है, इस समूह में ६० हजार ऋषियों की गणना है और ये सब के
सब बड़े तेजस्वी है । नैमिषीय=निमिषारण्य वासी । चिन्तितमात्रोपस्थित-
विपन्नैः=सोचने मात्र से आने वाले और मर जाने वाले । अभिवर्धयन्ति=
सम्पन्न करते हैं । तर्पिता.=सन्तुष्ट बने । सुतफल=पुत्रजन्म के प्रयोजन को ।
हित्वा=नष्ट करके । जरां=बुढ़ापे को । खम्=स्वर्ग मे । उपयान्ति=चले जाते हैं ।
दीप्यमानाः=तेज से चमकते हुए । समुपयान्ति=प्राप्त करते हैं । आवर्तिभिः=
जन्म मरण के चक्र वाले । विषयैः=भोग विलास की वस्तुओ से । बलात् =
जबर्दस्ती । ध्रियन्ते = खीचे जाते है । आपृच्छ=विदा ले लो । पुत्रकृतकान् =
पुत्र तुल्य पाले जाने वाले । विन्ध्यं=विन्ध्य पर्वत से । सखी =सखियां बनी ।
दयिता =प्रिय (स्त्रीलिंग, द्वितीया, बहुवचन) । लताः =वल्लरियों से ।
वत्स्यामि = निवास करू गा । हिमवद्गिरिकाननेषु=हिमालय के वनों मे ।
दीप्तंः इव = प्रज्वलित हुई के समान । ओषधिवनं =वनस्पतियो के वन वाले ।
उपरंजितेषु=प्रकाशमान । अतिमनोरथेन=मानुषी सीमा के पार वाली अभि-
लाषा से । दृश्यन्ते=देखे जाते है । सौवर्णान्=काचनपार्श्व नामक । दर्शयिष्यति
=दिखाएगा । भिन्न =विदीर्ण हुआ । क्रौञ्चत्वम्=क्रौंच पर्वत तुल्य दशा को
(एक बार परशुराम और कार्तिकेय दोनो महादेव से अस्त्र वेद का सविधि
अध्ययन कर रहे थे । इनमें विद्या के तारतम्य का संघर्ष उपस्थित हुआ।
महादेव ने परीक्षा के लिए तय किया कि जो इस पर्वत को वाणों द्वारा भेद
देगा, उसे प्राथम्य प्राप्त होगा । परशुराम ने ऐसा ही किया ।) अवलेपः=
शूरवीरता का गर्व । विद्युत्सम्पात =बिजली की चमक । इहस्थम्=यही विद्यमान ।
वृद्धि =प्रभाव । दिष्ट्या=सौभाग्य से (अव्यय) । वर्धते=विजयते । अर्हति =
योग्य है । ब्रूहि=कहो ।
अन्वय—उभयस्य सान्निध्यम् अस्ति, एतत् यदि साधयिष्यति ।
तपसि श्रान्ते धनुः वा धनुषि श्रान्तेः । (६)
अन्वय—तैः तर्पिताः पितरः सुतफलं लभन्ते, हि दीप्यमानाः जरां
हित्वा खम् उपयान्ति । सुरैः तुल्यं विमान वासं समुपयान्ति च आवर्तिभिः
विषयैः बलात् न ध्रियन्ते । (१०)
( 152 )
अन्वय-पुत्रकृतकान् हरिणान् द्रुमान् विन्ध्यं वनं तव दयिता. मखी
लताः च आपृच्छ । दीप्तैः इव ओषधिवनैः उपरजितेपु तेपु हिमवद्गिरि
काननेषु वत्स्यामि । (११)
अन्वय-हिमवान् तान् सौवर्णान् मृगान् मे दर्शयिष्यति, वा मद्बाण-
वेगेन भिन्नः क्रौञ्चत्वम् गमिष्यति । (१२)
अन्वय-यदि इह स्वयम् आगतः, एतानि तातस्य भाग्यानि । हि
एषः पूजायाम् अर्हति । मैथिलि, लक्ष्मण ब्रूहि । (१३)
हिन्दी अर्थ
रावण-आपने सभी वेद-शास्त्रो को छोट कर श्राद्धकल्प में विशेष उत्कण्ठा
प्रकट की है। ऐसा क्यो ?
राम-श्रीमन्, पिता से विहीन होने के कारण अभी इसी का ज्ञान अपेक्षित
है।
रावण-आप संकोच मत करें। आप पूछिए।
राम-भगवन्, पिण्डदान के समय पितरों को किससे तृप्त करूॅ ? -
रावण-जो कुछ श्रद्धा से दिया जाए, वह श्राद्ध कहलाता है ।
राम-भगवन्, अनादर से दी गई वस्तु तो परित्यक्त होती है। मेरा प्रश्न
विशेष वस्तु के विषय में है।
रावण-सुनो, घासो में कुश, ओषधियों में तिल, शाको में मटर, मछलियों
मे मगरमच्छ, पक्षियो में वार्ध्रीणस, पशुओ में गाय या गैंडा। ये सारी
चीजें मनुष्यो के लिए कही गई है ।
राम-भगवन् "वा" शब्द से लगता है कि कुछ और वस्तु भी शेष बची है।
रावण-हाँ है, किन्तु उसे तो कोई प्रतापी व्यक्ति ही प्राप्त कर सकता है।
राम-भगवन्, यही तो मेरा निश्चय है।
इस कार्य को पूरा करने के लिए दोनो साधन मेरे पास हैं। यदि तप
असफल हुआ तो धनुष और धनुष के असफल होने पर तप। (६)
रावण-हैं। किन्तु उनका निवास हिमालय पर है।
राम-हिमालय पर। अच्छा इसके आगे।
रावण-उनका नाम कांचनपाश्र्व नामक हिरण है। वे हिमालय की मातवी
चोटी पर माक्षात् महादेव के मस्तक से गिरने वानी गंगा का जल
( 153 )
पीते हैं। उनकी पीठ वैदूर्य मणि की भाँति श्याम वर्ण की है। वे
वायु के समान शीघ्रगामी है। वैखानस, बालखिल्य तथा नैमिषा-
रण्य मे रहने वाले ऋषि गण ध्यान मात्र से ही उन्हे बुला कर
श्राद्ध कर्म करते है।
उनसे तर्पित होकर पितर गण पुत्र के फल को प्राप्त करते हैं। फिर
प्रकाशमान कान्ति वाले वृद्धावस्था को त्याग कर सीधे स्वर्ग चले
जाते हैं। वहाँ वे देवताओं के साथ विमान में रहते हैं और आवा-
गमन की वासना से बलपूर्वक खींचे नहीं जाते। (१०)
राम—सीते,
अपने पुत्र के समान पाले-पोसे गए हरिणों और वृक्षों से, विन्ध्य
पर्वत तथा इसके वन से, अपनी प्रिय सखियों के समान लताओं से
तुम विदा ले लो। मैं अब यहां से जाकर चमकने वाली जड़ी
बूटियों से भासित हिमालय पर निवास करूंगा। अतः वहा जाना
है। (११)
सीता—जैसी आर्यपुत्र की आज्ञा।
रावण—राम, अधिक मनोरथ मत बढ़ाओ। वे हिरण मनुष्यों को न
दिखाई देते हैं।
राम—भगवान्, क्या वे हिमालय पर रहते हैं ?
रावण—और क्या ?
राम—तो फिर आप देखिए—
या तो हिमालय उन कांचन मृगों को लाकर मेरे सामने उपस्थित
करेगा अथवा मेरे बाणों द्वारा विदीर्ण होकर क्रौञ्च पर्वत की दशा
को प्राप्त करेगा। (१२)
रावण—(स्वगत) अहो, इसका घमण्ड तो सहा नही जाता (प्रकट) अरे,
बिजली की चमक सी दिखाई दे रही है। हे राम, तुम्हारे यही रहने
पर भी हिमालय तुम्हारा आदर कर रहा है। यह कांचनपार्श्व
मृग है।
राम—यह तो आपका प्रभाव है।
( 156 )
राम-- तब तो मैं ही जाऊँगा ।
सीता-आर्यपुत्र, मैं क्या करूँगी ?
राम-भगवान् (इस संन्यासी) की सेवा ।
सोता-जैसी आर्यपुत्र की आज्ञा ।
( राम निकल जाते हैं )
रावण--अरे, यह राम अभी तो मेरे लिए अर्घ्य लेकर आ रहे थे और
ये अब बिना पूजा किए ही दौड़ते हुए हरिण को देखकर उस पर
धनुष चढ़ा रहे हैं ।
अहा, कैसी असीम शक्ति, कैसा असीम पराक्रम, कैसा असीम धैर्य
और कैसा असीम वेग है । "राम" इन थोड़े से अक्षरों से मानो
उचित रूप मे ही यह पूरा संसार व्याप्त हो रहा है । (१४)
यह हरिण एक ही छलांग मे वाण के निशाने से बाहर होकर घने
वन में घुस गया ।
सीता-(अपने मन मे) यहां पर पतिदेव के अभाव मे मुझे भय लग रहा है ।
रावण-(अपने मन मे) राम को छल-कपट से दूर करने पर मैं इस आश्रम
से अकेली रोती हुई बाला सीता को मन्त्र के उच्चारण से शून्य
आहुति की भांति हरण करता हूँ । (१५)
सीता-तो फिर पर्णशाला में प्रवेश करती हूँ । (जाना चाहती है)
रावण-(अपना रूप धारण करके) सीते ठहरो, ठहरो ।
सीता-(डर कर) यह अब कौन है ?
रावण-क्या तू नहीं जानती ?
युद्ध में जिसने दानवों और देवताओं को परास्त किया, जिसने इन्द्र
आदि को जीता, जिसने शूर्पणखा की नासिका भंग को देखा, जिसने
खर और दूषण भाइयों का मारा जाना सुना, वही मैं रावण इस समय
गर्व से दुष्ट बुद्धि एवं अतुलनीय शक्ति वाले राम को माया से ठग
कर हे विशाल नेत्रों वाली सीते, तुम्हे हर कर ले जाने के लिए
उपस्थित हुआ हूँ । (१६)
(5) मूल
सीता--हं रावणो नाम । (प्रतिष्ठते)
रावणः--आः ! रावणस्य चक्षुर्विषयमागता क्व यस्यासि ?
सीता--आर्यपुत्र ! परित्रायस्व परित्रायस्व । सौमित्रे ! परित्रायस्व ।
परित्रायस्व ।
(157)
रावणः—सीत ! श्रूयतां मत्पराक्रमः ।
भग्नः शक्रः कम्पितो वित्तनाथः
कृष्टः सोमो मर्दितः सूर्यपुत्रः ।—
धिग् भोः स्वर्गं भीतदेवैर्निविष्टं
धन्या भूमिर्वर्तते यत्र सीता ॥ (१७)
सीता—आर्यपुत्रे !—परित्रायस्व परित्रायस्व । सौमित्रे ! परित्रायस्व
परित्रायस्व माम् ।
रावणः—
रामं वा शरणमुपेहि लक्ष्मणं वा
स्वर्गस्थं दशरथमेव वा नरेन्द्रम् ।
किं वा स्यात् कुपुरुषसंश्रितैर्वचोभि
र्न व्याघ्रं मृगशिशवः प्रधर्षयन्ति ॥ (१८)
सीता—आर्यपुत्र ! परित्रायस्व परित्रायस्व । सौमित्रे ! परित्रायस्व
परित्रायस्व माम् ।
रावणः—विलपसि किमिदं विशालनेत्रे
विगणय मा च यथा तवार्यपुत्रम् ।
विपुलबलयुतो ममैव योद्धुं
ससुरगणोऽप्यसमर्थ एव रामः ॥ (१६)
सीता—(सरोषम्) शप्तोऽसि ।
रावणः—अहह ! अहो पतिव्रतायास्तेजः ।
योऽहमुत्पतितौ वेगान्न दग्धः सूर्यरश्मिभिः ।
अस्या परिमितैर्दग्धः शप्तोऽसीत्यभिरक्षरैः !। (२०)
सीता—आर्यपुत्र ! परित्रायस्व परित्रायस्व ।
रावणः—(सीतां गृहीत्वा) भो भोः । जनस्थानवासिनस्तपस्विनः
शृण्वन्तु भवन्तः ।
बलादेष दशग्रीवः सीतामादाय गच्छति ।
क्षात्रधर्मे यदि स्निग्धः यिङ्कुम् रामः पराक्रम ॥ (२१)
सीता—आर्यपुत्र ! परित्रायस्व । परित्रायस्व
रावणः—(परिक्रामन् विलोक्य) अये ! स्वपक्षपवनोत्क्षेपक्षुभितव
षण्डश्चण्डचञ्चुरभिधावत्येष जटायुः । आः ! तिष्ठेदानीम्
( 160 )
सीता—आर्य पुत्र, बचाओ, बचाओ । हे लक्ष्मण, मुझे बचाओ, बचाओ ।
रावण—हे दीर्घ नेत्रों वाली सीते, इस तरह क्यों विलाप कर रही हो ? जिस
प्रकार तुम्हारे पतिदेव हैं, मुझे भी वैसे ही समझो । यह राम मुझसे
लड़ने मे असमर्थ है, भले ही बहुत अधिक शक्ति से युक्त एवं देवताओ
के समूह के साथ ही क्यों न हो । (१६)
सीता—(क्रोध में) मैं तुझे शाप देती हूं ।
रावण—अहा हा, वाह रे पतिव्रता का तेज ।
जो मैं आकाश मे चलते समय सूर्य की किरणो से भी नही जलता,
वह इसके "मै शाप देती हूँ" इन थोडे से अक्षरो से कैसे जलूँगा ।
(२०)
सीता—आर्य पुत्र, रक्षा करो, रक्षा करो ।
रावण—(सीता को लेकर) अरे रे, जनस्थान मे रहने वाले तपस्वियो, आप
लोग सुनें ।
यह रावण सीता को बलपूर्वक लेकर जा रहा है । यदि राम को
क्षात्र धर्म पर कुछ आस्था हो, तो वह अपना पराक्रम प्रकट करें ।
(२१)
सीता—आर्य पुत्र, रक्षा करो, रक्षा करो ।
रावण—(घूमते हुए देख कर) अरे, अपने पंखो की तेज वायु से सारे वनवृक्षों
को कम्पित कर देने वाला ओर भयानक चोंच वाला यह जटायु मेरी
तरफ ही दौट रहा है । अरे, जरा ठहर तो,
मैं अपने हाथो मे तीखी तलवार को निकाल कर तेरे पंखो को काटता
हूँ ओर तुझे खून से भिगो कर यमलोक भेजता हूँ । (२२)
(दोनो का प्रस्थान)
पाँचवाँ अंक समाप्त
षष्ठ अङ्क
(१) मूल
(ततः प्रविशतो वृद्धतापसौ)
उभौ—परित्रायतां परित्रायतां भवन्तः !
प्रथमः—इयं हि नीलोत्पलदामवर्चसा,
मृणालशुक्लोज्ज्वलदंष्ट्रहासिना ।
निशाचरेन्द्रेण निशार्धचारिणा
मृगीव सीता परिभूय नीयते ॥ (१)
द्वितीयः—एषा खलु तत्रभवती वैदेही,
विचेष्टमानेव भुजङ्गमाङ्गना
विधूयमानेव च पुष्पिता लता ।
प्रसह्य पापेन दशाननेन सा
तपोवनात् सिद्धिरिवापनीयते ॥ (२)
उभौ—परित्रायतां परित्रायतां भवन्तः ।
प्रथमः—(ऊर्ध्वमवलोक्य) अये वचनसमकाल एव दशरथस्यानृण्यं
कर्तुम् “मयि स्थिते क्व यास्यसी” ति रावणमाहूयान्तरिक्ष-
मुत्पतितो जटायुः ।
द्वितीयः—एष रोषादुद्वृत्तनयनः प्रतिनिवृत्तो रावणः ।
प्रथमः—एष रावणः ।
द्वितीयः—एष जटायुः ।
उभौ—हन्तैतदन्तरिक्षे प्रवृत्तं युद्धम् ।
प्रथमः—काश्यप ! काश्यप ! पश्य क्रव्यादीश्वरस्य सामर्थ्यम् ।
पक्षाभ्यां परिभूय वीर्यविषयं द्वन्द्वं प्रतिव्यूहते
तुण्डाभ्यां सुनिघृष्टतीक्ष्णमचलः संवेष्टनं चेष्टते ।
तीक्ष्णैरायसकण्टकैरिव नखैर्भीमान्तरं वक्षसो
वज्राग्रैरिव दार्यमाणविषमाच्छैलाच्छिला पाट्यते ॥ (३)
द्वितीयः—हन्त ! सक्रुद्धेन रावणेनासिना क्रव्यादीश्वरः स दक्षिणां-
संदेशे हतः ।
उभौ—हा धिक् । पतितोऽत्रभवान् जटायुः ।
प्रथमः—भोः कष्टम् । एष खलु तत्रभवान् जटायुः ।
कृत्वा स्ववीर्यसदृशं परमं प्रयत्नं
क्रीडामयूरमिव शत्रुमुचिन्तयित्वा ।
दीप्तं निशाचरपतेरवधूय तेजो
नागेन्द्रभग्नवनवृक्ष इवावसन्नः ॥ (४)
उभौ—स्वर्ग्योऽयमस्तु ।
प्रथमः—काश्यप ! आगम्यताम् । इमं वृत्तान्तं तत्रभवते राघवाय
निवेदयिष्यावः ।
द्वितीयः—बाढम् । प्रथमः कल्पः । (निष्क्रान्तौ)
(विष्कम्भः)
शब्दार्थ—परित्रायता = सीता की रक्षा करो । भवन्त = हे जन-
स्थान के रहने वालो । नीलोत्पलदामवर्चसा = नील कमलों की माला के
समान तेज वाला । मृणालशुक्ला = कमल तन्तु के समान श्वेत । उज्ज्वल-
दंष्ट्रहासिना = हँसते समय चमकीले दाँतो वाला । निशाचरेन्द्रेण = रावण के
द्वारा । निशार्धचारिणा = चोर के द्वारा । मृगीव - हरिणी की भाँति ।
परिभूय -- दुःख देकर । नीयते = ले जाई जा रही है । विचेष्टमाना = छट-
पटाती हुई । भुजङ्गमाङ्गना = सर्पिणी । विधूयमाना = काँपती हुई ।
पुष्पिता = खिली हुई । प्रसह्य = बलपूर्वक । पापेन = बुरा कार्य करने वाले ।
दशाननेन = रावण के द्वारा । सिद्धिः = तपस्या की फल सम्पत्ति । अपनीयते
= अपहरण की जा रही है । वचनसमकाले = बोलने के साथ ही । आनृण्यम्
= मित्रता का बदला । कर्तुम् = चुकाने के लिए । यास्यसि = जाओगे ।
प्राहूय = आवाहन करके अर्थात् बुला कर । अन्तरिक्ष = आकाश में ।
उत्पतितः = उड़ गया । रोषात् = क्रोध से । उद्वृत्तनयन. = आँखें निकाल
कर । प्रतिनिवृत्तः = वापस लौटा । जटायुः = गिद्ध, सम्पाति का भाई ।
प्रवृत्त = प्रारम्भ हो गया । काश्यप = एक वृद्ध तापस का नाम । क्रव्यादीश्व-
रस्य = क्रव्याद = कच्चे मास को खाने वाला, उसका ईश्वर = स्वामी अर्थात्
जटायु के । सामर्थ्यम् = शक्ति । पक्षाभ्यां = दोनो पक्षों से । परिभूय = मार
कर । वीर्यविषयं = अपने पराक्रम के लक्ष्य को । द्वन्द्वं = रावण से । प्रति-
व्यूहते = युद्ध कर रहा है । तुण्डाभ्या = दोनों चोचो से । सुनिघृष्टतीक्ष्णम् =
अच्छी तरह घिसी होने से तीखी बनी । अचल. = धीर । संवेष्टनं = भली
पकड़ के साथ । चेष्टते = प्रयास कर रहा है। तीक्ष्णैः = तीखे । आयसकण्टकैः
= लौह निर्मित कीले । भीमान्तर = भयंकर अन्त स्थित मास आदि । वक्षसः
= छाती से । वज्राग्रैः = वज्र की नोक के तुल्य । दार्यमाणविषमात् =
फाडने से अन्दर की वस्तु के प्रत्यक्ष हो जाने से भीषण । शैलात् = पर्वत से ।
शिला = पत्थर के समान । पाट्यते = तोड कर ले रहा है । असिना =
तलवार से । दक्षिणासदेशे = दाहिने कन्धे की ओर । हतः = मार डाला ।
पतितः = गिर पड़ा । स्ववीर्यसदृश = अपनी शक्ति के अनुसार । परमं =
उत्तम । क्रीडामयूरं = खेलने के मोर की तरह । अचिन्तयित्वा = नही गिन
कर । दीप्तं = भली प्रकार से प्रज्वलित । निशाचरपतेः = रावण के । अव-
धूय = तिरस्कार करके । तेज. = पराक्रम को । नागेन्द्रभग्नवनवृक्ष इव =
हाथी द्वारा तोडे गए जंगल के वृक्ष के समान । अवसन्नः = नष्ट हो गया ।
स्वर्ग्यः = स्वर्ग के योग्य । वृत्तान्त = समाचार को । बाढम् = उचित । प्रथमः
मुख्य । कल्प. = प्रस्ताव ।
अन्वय—नीलोत्पलदामवर्चसा मृणालशुक्ला उज्ज्वलदंष्ट्रहासिना
निशार्धधारिणा निशाचरेन्द्रेण इयं सीता मृगी इव परिभूय नीयते हि । (१)
अन्वय—विचेष्टमाना भुजगमांगना इव च विधूयमाना पुष्पिता लता
इव सा सिद्धिः इव पापेन दशाननेन तपोवनात् प्रसह्य नीयते । (२)
अन्वय—(अयम्) पक्षाभ्या परिभूय वीर्यविषय द्वन्द्वं प्रतिव्यूहते,
अचलः तुण्डाभ्यां सुनिघृष्टतीक्ष्णम् संवेष्टनं चेष्टते, आयसकण्टकैः इव तीक्ष्णैः