सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 139, कुल 296 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 139

( 148 )
रावण—इसके स्वर ने रूप को और चमका दिया है ।
राम—(देख कर) अरे भगवान् हैं ।' भगवान्, प्रणाम ।
रावण—कल्याण हो ।
राम--भगवान्, यह आसन है, बैठिए ।
रावण—(मन मे) इसके द्वारा मे मानो आदेश दिया गया हूँ । (प्रव
अच्छा । (बैठता है)
राम—सीते महात्मा के लिए पाद्य जल लाओ ।
सीता—जैसी आर्यपुत्र की आज्ञा । (बाहर जाकर और प्रवेश करके)
‧ जल है ।
राम—महात्मा की सेवा करो ।
सीता--जैसी आपकी आज्ञा ।
रावण—(भेद खुलने के भय से हक्का-बक्का होकर) रहने दो, रहने दो ।
सचमुच मे यह अकेली सीता पृथ्वी पर स्त्रियो मे अरुन्धती के समान
पतिव्रता है, जिसके स्वामी होने के कारण स्त्रियाँ आपका यश
गाती है । (८)
राम—तो फिर लाओ । मैं स्वयं ही सेवा करूंगा ।
रावण—अरे, छाया के समान सीता से सेवा का निषेध करने वाला में शरीर
के समान आपसे कैसे ग्रहण करूंगा । सच्चा अतिथि सत्कार तो
मीठे वचनो के स्वागत से होता है । मेरा सम्मान हो गया है । बैठिए ।
राम--अच्छा । (बैठते हैं)
रावण—(स्वागत) तब तक मैं भी ब्राह्मण के अनुरूप कार्य करूँ । (प्रकट)
श्रीजी, मैं काश्यप गोत्र का हूँ । मैंने छहों अंग व चारों उपांगो के
सहित वेद, मानकीय धर्मशास्त्र, माहेश्वर योगशास्त्र, वृहस्पति का
अर्थशास्त्र, मेधातिथि का न्यायशास्त्र और प्रचेता का श्राद्धकल्प इन
सबका अध्ययन किया है ।
राम—क्या कहा ? श्राद्धकल्प ।
(३) मूल
रावणः—सर्वा. श्रुतीरतिक्रम्य श्राद्धकल्पे स्पृहा दर्शिता किमेतत् ?
रामः—भगवन् ! भ्रष्टाया पितृसन्तानायामागम इदानीमेष ।