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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 147, कुल 296 में से

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पृष्ठ 147

( 160 )
सीता—आर्य पुत्र, बचाओ, बचाओ । हे लक्ष्मण, मुझे बचाओ, बचाओ ।
रावण—हे दीर्घ नेत्रों वाली सीते, इस तरह क्यों विलाप कर रही हो ? जिस
प्रकार तुम्हारे पतिदेव हैं, मुझे भी वैसे ही समझो । यह राम मुझसे
लड़ने मे असमर्थ है, भले ही बहुत अधिक शक्ति से युक्त एवं देवताओ
के समूह के साथ ही क्यों न हो । (१६)
सीता—(क्रोध में) मैं तुझे शाप देती हूं ।
रावण—अहा हा, वाह रे पतिव्रता का तेज ।
जो मैं आकाश मे चलते समय सूर्य की किरणो से भी नही जलता,
वह इसके "मै शाप देती हूँ" इन थोडे से अक्षरो से कैसे जलूँगा ।
(२०)
सीता—आर्य पुत्र, रक्षा करो, रक्षा करो ।
रावण—(सीता को लेकर) अरे रे, जनस्थान मे रहने वाले तपस्वियो, आप
लोग सुनें ।
यह रावण सीता को बलपूर्वक लेकर जा रहा है । यदि राम को
क्षात्र धर्म पर कुछ आस्था हो, तो वह अपना पराक्रम प्रकट करें ।
(२१)
सीता—आर्य पुत्र, रक्षा करो, रक्षा करो ।
रावण—(घूमते हुए देख कर) अरे, अपने पंखो की तेज वायु से सारे वनवृक्षों
को कम्पित कर देने वाला ओर भयानक चोंच वाला यह जटायु मेरी
तरफ ही दौट रहा है । अरे, जरा ठहर तो,
मैं अपने हाथो मे तीखी तलवार को निकाल कर तेरे पंखो को काटता
हूँ ओर तुझे खून से भिगो कर यमलोक भेजता हूँ । (२२)
(दोनो का प्रस्थान)
पाँचवाँ अंक समाप्त