प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)
Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa
महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकष्टं वनं स्त्रीजनसौकुमार्यं
समं लताभिः कठिनीकरोति ॥ (३)
(उपेत्य) मैथिलि ! अपि तपो वर्धते !
सीता—हम् आर्यपुत्रः ! जयत्वार्यपुत्रः ।
रामः—मैथिलि ! यदि ते नास्ति धर्मविघ्नः, आस्यताम् ।
सीता—यदार्यपुत्र आज्ञापयति । (उपविशति)
रामः—मैथिलि ! प्रतिवचनार्थिनीमिव त्वां पश्यामि । किमिदम् ?
सीता—शोकशून्यहृदयस्येवार्यपुत्रस्य मुखरागः । किमेतत् ?
रामः—मैथिलि ! स्थाने खलु कृता चिन्ता ।
कृतान्तशल्याभिहते शरीरे
तथैव तावद् हृदयव्रणो मे ।
नानाफलाः शोकशराभिघाता
स्तत्रैव तत्रैव पुनः पतन्ति ॥ (४)
सीता—आर्यपुत्रस्य क इव सन्तापः ?
शब्दार्थ—उपहारसुमनः=देवताओं के लिए चढ़ाए जाने वाले पुष्प ।
आकीर्णाः=परिपूर्णा । सम्मार्जितः= स्वच्छ बना । आश्रम पदविभवेन=तपोवन
में प्राप्त पुष्प आदि सम्पदा से । अनुष्ठितः=किया है । देवसमुदाचारः=देव-
पूजा । बालवृक्षान्=छोटे पेड़ों को । उदकप्रदानेन=जल से सींचने के द्वारा ।
अनुक्रोशयिष्यामि=प्रसन्न करूंगी । अविघ्नम्=सानन्द । अस्य=सिंचन कार्य
का । त्यक्त्वा=छोड़ कर । तां=उस (अयोध्या) को । गुरुणा=पिता दशरथ के
द्वारा । मया=मुझ राम के द्वारा । रहिता=सूनी बनी । रम्यां=सुन्दर । पुरीम्
=नगरी को । उद्यम्य=प्रयत्नपूर्वक सम्पादित करके । अखिलं=सम्पूर्णां ।
मत्सन्निधौ= मेरे पास । आगतः=(भरत) आया । गुणनिधिः=गुणों का समूह
भरत । तत्र=उसी सूनी अयोध्या में । सम्प्रेषितः=भेजा गया । नृपतेः=राजा
का । धुरं=भार । सुमहती=बहुत भारी । एकः=अकेला भरत । समुत्कर्षति=
ढो रहा है । विमृश्य=विचार कर के । ईदृशशोकविनोदनार्थम्=इस प्रकार के
अर्थात् भरत वियोग जन्य दुःख को दूर करने के लिए । अवस्थाकुटुम्बिनीम्=
सभी दशाओं मे साथ रहने वाली (कुटुम्ब धातु चुरादि गण, आत्मनेपदी की
अकर्मक धातु है, जिसका अर्थ होता है "धारण करना" इसके लट्, प्र०पु०,