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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 150, कुल 296 में से

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पृष्ठ 150

प्राहूय = आवाहन करके अर्थात् बुला कर । अन्तरिक्ष = आकाश में ।
उत्पतितः = उड़ गया । रोषात् = क्रोध से । उद्वृत्तनयन. = आँखें निकाल
कर । प्रतिनिवृत्तः = वापस लौटा । जटायुः = गिद्ध, सम्पाति का भाई ।
प्रवृत्त = प्रारम्भ हो गया । काश्यप = एक वृद्ध तापस का नाम । क्रव्यादीश्व-
रस्य = क्रव्याद = कच्चे मास को खाने वाला, उसका ईश्वर = स्वामी अर्थात्
जटायु के । सामर्थ्यम् = शक्ति । पक्षाभ्यां = दोनो पक्षों से । परिभूय = मार
कर । वीर्यविषयं = अपने पराक्रम के लक्ष्य को । द्वन्द्वं = रावण से । प्रति-
व्यूहते = युद्ध कर रहा है । तुण्डाभ्या = दोनों चोचो से । सुनिघृष्टतीक्ष्णम् =
अच्छी तरह घिसी होने से तीखी बनी । अचल. = धीर । संवेष्टनं = भली
पकड़ के साथ । चेष्टते = प्रयास कर रहा है। तीक्ष्णैः = तीखे । आयसकण्टकैः
= लौह निर्मित कीले । भीमान्तर = भयंकर अन्त स्थित मास आदि । वक्षसः
= छाती से । वज्राग्रैः = वज्र की नोक के तुल्य । दार्यमाणविषमात् =
फाडने से अन्दर की वस्तु के प्रत्यक्ष हो जाने से भीषण । शैलात् = पर्वत से ।
शिला = पत्थर के समान । पाट्यते = तोड कर ले रहा है । असिना =
तलवार से । दक्षिणासदेशे = दाहिने कन्धे की ओर । हतः = मार डाला ।
पतितः = गिर पड़ा । स्ववीर्यसदृश = अपनी शक्ति के अनुसार । परमं =
उत्तम । क्रीडामयूरं = खेलने के मोर की तरह । अचिन्तयित्वा = नही गिन
कर । दीप्तं = भली प्रकार से प्रज्वलित । निशाचरपतेः = रावण के । अव-
धूय = तिरस्कार करके । तेज. = पराक्रम को । नागेन्द्रभग्नवनवृक्ष इव =
हाथी द्वारा तोडे गए जंगल के वृक्ष के समान । अवसन्नः = नष्ट हो गया ।
स्वर्ग्यः = स्वर्ग के योग्य । वृत्तान्त = समाचार को । बाढम् = उचित । प्रथमः
मुख्य । कल्प. = प्रस्ताव ।
अन्वय—नीलोत्पलदामवर्चसा मृणालशुक्ला उज्ज्वलदंष्ट्रहासिना
निशार्धधारिणा निशाचरेन्द्रेण इयं सीता मृगी इव परिभूय नीयते हि । (१)
अन्वय—विचेष्टमाना भुजगमांगना इव च विधूयमाना पुष्पिता लता
इव सा सिद्धिः इव पापेन दशाननेन तपोवनात् प्रसह्य नीयते । (२)
अन्वय—(अयम्) पक्षाभ्या परिभूय वीर्यविषय द्वन्द्वं प्रतिव्यूहते,
अचलः तुण्डाभ्यां सुनिघृष्टतीक्ष्णम् संवेष्टनं चेष्टते, आयसकण्टकैः इव तीक्ष्णैः