सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

( 108 )
अन्वय—ननु त्वया वयम् अयशसा योजिताः, आर्यः चीरेण (योजितः)
नृपः गृहमृत्युना, कृत्स्ना अयोध्या प्रततरुदितैः, लक्ष्मणः मृगैः सह (योजितः),
दयिततनयाः अम्बाः शोकेन, स्नुषा अध्वपरिश्रमैः, आत्मा च उग्रेण धिक्
इति वचसा (यजिता) । (१७)
अन्वय—ननु शीलसंक्रान्तदोषैः तावत् पुत्राः स्नेह त्यक्त्वा अपुत्राः
क्रियन्ते । एषः अहम् लोके अपूर्वम् धर्मम् स्थापयामि, भर्तृद्रोहात् माता
अपि अमाता अस्तु । (१८)
हिन्दी अर्थ
भरत—हा तात, (उठकर) तात, अब मैं माताओं को प्रणाम करने का क्रम
जानना चाहता हूँ ।
सुमन्त्र—अच्छा, यह श्री राम की माता देवी कौसल्या हैं।
भरत—माँ, यह निरपराध भरत आपको प्रणाम करता है।
कौसल्या—पुत्र, तुम्हारा दुःख दूर होवे ।
भरत—(मन मे) इस कथन से तो मानो मेरी भर्त्सना की जा रही है। (प्रकट-
रूप से) बड़ी कृपा है । अच्छा, फिर ।
सुमन्त्र—यह लक्ष्मण की मां सुमित्रा देवी हैं।
भरत—माँ, मैं प्रणाम करता हूँ, जिसे राम की सेवा का अवसर न देकर
लक्ष्मण ने ठग लिया है।
सुमित्रा—पुत्र, कीर्ति प्राप्त करने वाले बनो ।
भरत—माँ, इसका प्रयास करूँगा । कृतकृत्य हूँ । इसके बाद ।
सुमन्त्र—यह तुम्हारी माता है ।
त—(क्रोध सहित उठकर) अरी पापिनी,
मेरी जननी कौसल्या और जननी सुमित्रा के बीच बैठी हुई तुम उसी
तरह बुरी लगती हो, जैसे गंगा और यमुना के बीच में प्रविष्ट कोई
कुनदी । (१६)
कैकयी—पुत्र, मैंने क्या किया ?
भरत—'क्या किया' यह कहती हो ।
तुमने हमे (मुझे) अपयश से कलंकित किया, पूज्य राम को वल्कल

धारण करने वाला बना दिया । महाराज को गृहकलह से मरने को
विवश किया। सारी अयोध्या को निरन्तर रुला दिया । लक्ष्मण को
हरिणों का सहवासी बना दिया । पुत्रों से स्नेह करने वाली माताओं
को शोक सागर में डुबो दिया । पुत्रवधू सीता को वन मे भटकने को
बाध्य किया और अपने को भी कठोर धिक्कार का पात्र
बनाया । (१७)
कौसला—पुत्र, सब प्रकार के शिष्टाचार को जानते हुए भी तुम अपनी जननी
को प्रणाम क्यों नही करते हो ?
भरत—क्या अपनी जननी को ? माँ, आप ही मेरी जननी है । माँ, मै प्रणाम
करता हूँ ।
कौसल्या—नही, नही, यह कैकयी तुम्हारी जननी है ।
भरत—पहले थी । किन्तु अब नही है । आप देवी देखिए,
इसने दुष्ट परिजनो के सहवास मे सत्य स्नेह को छोड़ कर बेटों से
नाता तोड लिया है । आज मै संसार मे एक नये धर्म की स्थापना
करने जा रहा हूँ कि जो स्त्री अपने स्वामी से विद्रोह करे, वह माँ
कहलाने की अधिकारिणी नहीं है । (१८)
(७) मूल
कैकेयी—जात ! महाराजस्य सत्यवचनं रक्षन्त्या मया तथोक्तम् ।
भरतः—किमिति किमिति ।
कैकेयी—पुत्रको मे राजा भवत्विति ।
भरतः—अथ स इदानीमार्योऽपि भवत्याः कः ?
पितुर्मे नौरसः पुत्रो न क्रमेणाभिषिच्यते ।
दयिता भ्रातरो न स्युः प्रकृतीनां न रोचते ॥ (१९)
कैकेयी—जात ! शुल्कलुब्धा ननु प्रष्टव्या ।
भरतः—वल्कलैर्हृतराजश्रीः पदातिः सह भार्यया ।
वनवासं त्वयाऽऽज्ञप्तः शुल्केऽप्येतदुदाहृतम् ॥ (२०)
कैकेयी—जात ! देशकाले निवेदयामि ।
भरतः—अयशसि यदि लोभः कीर्तयित्वा किमस्मान्

110 )
किम् नृपफलतर्पं, किम् नरेन्द्रो न दद्यात् ।
अथ तु नृपतिमातेत्येप शब्दस्तवेष्टो
वदतु भवति ! सत्य किम् तवार्यो न पुत्रः ॥ (२१)
कष्टं कृतं भवत्या,
त्वया राज्यैषिण्या नृपतिरसुभिर्नैव गणितः
सुतं ज्येष्ठं च त्व व्रज वनमिति प्रेषितवती ।
न शीर्णम् यद् दृष्ट्वा जनकतनयां वल्कलवती
महो धात्रा सृष्टं भवति ! हृदयं वज्रकठिनम् ॥ (२२)
सुमन्त्रः--कुमार ! एतौ वसिष्ठवामदेवौ सह प्रकृतिभिरभिषेकं
पुरस्कृत्य भवन्तं प्रत्युद्गतौ विज्ञापयतः,
गोपहीना यथा गावो विलयं यान्त्यप्रालिता ।
एवं नृपतिहीना हि विलयं यान्ति वै प्रजाः ॥ (२३)
भरतः--अनुगच्छन्तु मां प्रकृतयः ।
सुमन्त्रः--अभिषेकं विसृज्य क्व भवान् यास्यति ?
भरतः--अभिषेक्रमिति । इहात्रभवत्यै प्रदीयताम् ।
सुमन्त्र--क्व भवान् यास्यति ?
भरतः--तत्र यास्यामि यत्रासौ वर्तते लक्ष्मणप्रियः ।
नायोध्या तं विनायोध्या सायोध्या यत्र राघवः ॥ (२४)
(निष्क्रान्ता सर्वे)
तृतीयोऽङ्कः ।
शब्दार्थ— जात = पुत्र । सत्यवचन - विवाह के समय दिया गया शुल्क
प्रतिज्ञा वाक्य । रक्षन्त्या = सच करने वाली । तथोक्तम् = वैसा कहा । पुत्रकः
-- वेटा । भवत्याः = आपका अर्थात् कैकेयी का । मे = मेरे । औरसः = स्व
योत्पन्न । क्रमेण = वड' की परम्परा से । अभिषिच्यते = राज्याभिषेक किया
जाता है । दयिताः = प्रिय । स्युः = होवे । प्रकृतीना = अमात्य आदि को (यहाँ
'रुच्' के योग मे चतुर्थी आनी चाहिए, किन्तु षष्ठी का प्रयोग किया गया है ।
यह भास का 'आर्ष प्रयोग' है) । रोचते = अच्छा लगता है । शुल्कतुब्धा =
विवाह मे प्रतिज्ञात अर्थ को लेने की लोभी । ननु = क्या । प्रष्टव्या = पूछा
जाना चाहिए । हृतराजश्रीः = जिसकी राजलक्ष्मी ले ली गई है । पदातिः =

( 111 )

पैदल चलने वाला । भार्यया सह = सीता के साथ । आज्ञप्तः = आज्ञा प्राप्त
करके लिया गया है । उदाहृतम् = कहा गया है । देशकाले = उचित स्थान
और अवसर पर । अयशसि = अपयश मे । लोभः = आकर्षण । कीर्तयित्वा =
कह कर या नाम लेकर । किमु = क्या । नृपफलतर्षः = राजभाव से प्राप्त
भोग्य वस्तु की तृष्णा । दद्यात् = प्रदान की । नृपतिमाता = राजा की जननी ।
इष्टः = अभिलषित । भवति = हे देवी । आर्यः = राम । कष्ट = बहुत बुरा
पाप । { राज्यैषिण्या = राज्य की कामुक बनी । असुभिः = प्राणो से । गणितः
–श्राप } । प्रेषितवती = भेजा । शीर्णम् = टूटा । वल्कलवतीम् = वल्कलवस्त्र
–धारण करने वाली को । धात्रा = विधाता के द्वारा । सृष्ट = बनाया गया है ।
वज्रकठिनम् = इन्द्र के आयुध वज्र के समान कठोर । प्रकृतिभिः = मन्त्री आदि
अधिकारियों के साथ । पुरस्कृत्य = आगे करके । प्रत्युद्गतौ = सम्मान करते
[L1

( 112 )
अन्वय-- यत्र असौ लक्ष्मणप्रियः वर्तते, तत्र यास्यामि । अयोध्या तं
विना अयोध्या न । सा अयोध्या यत्र राघवः । (२८)
हिन्दी अर्थ
कैकेयी—पुत्र, महाराज की प्रतिज्ञा की रक्षा के लिए ही मैने वैसा कहा था।
भरत— आपने क्या कहा था ?
कैकयी— कि मेरा बेटा राजा बने ।
भरत— तो फिर वे पूज्य राम आपके क्या हैं ?
क्या राम मेरे पिता दशरथ के स्वयं के पुत्र नहीं हैं ? क्या
अभिषेक ज्येष्ठ के क्रम से नहीं हुआ है ? क्या हम भाइयो मे परस्पर
अनुराग नहीं है ? क्या राम का अभिषेक प्रजाओ की रुचि के अनुसार
नहीं था । (१६)
कैकयी—पुत्र, विवाह शुल्क की लोभी माँ से ऐसे प्रश्न नहीं पूछे जाते ।
भरत —तुमने राज्य को लेकर और वल्कल पहना कर राम को सीता के साथ
जो पैदल वन मे भेज दिया, क्या वह भी विवाह शुल्क मे ही कहा
गया था ? (२०)
कैकयी— पुत्र, उपयुक्त स्थान और समय पर ही बताऊँगी ।
भरत— हे देवी, यदि तुम्हे अपयश ही प्रिय था, तो बीच मे ही मेरा नाम
क्यो लिया ? यदि तुमको राज्य के ऐश्वर्य की कामना थी, तो महाराज
से तुम्हे क्या नहीं मिल सकता था ? यदि तुम्हे ‘राजमाता’ कहलाने
की ही अभिलाषा थी, तो सच बताना, क्या राम तुम्हारे पुत्र नहीं
है ? (२१)
तुमने बहुत बुरा किया है ।
तुमने राज्य के लोभ के कारण महाराज के जीवन की भी चिन्ता
नहीं की और ‘वन मे जाओ’ यह कह कर बड़े पुत्र राम को भी वन मे
भेज दिया । सीता को वल्कल पहने देखकर भी तुम्हारी छाती नहीं
फटी, यह बड़े आश्चर्य की बात है । लगता है, विधाता ने तुम्हारे
हृदय को वज्र के से भी अधिक कठोर बनाया है। (२२)
सुमन्त्र — कुमार, प्रजावर्ग और अमात्यो के साथ महर्षि वसिष्ठ और वामदेव
आपके राज्याभिषेक के लिए आपको सूचित कर रहे हैं कि—

( 113 )
जिस प्रकार गोपाल के बिना गाएँ सुरक्षा के अभाव में नष्ट हो
जाती है, उसी प्रकार राजा के बिना भी प्रजाएँ निश्चित ही
विनाश को प्राप्त करती हैं। (२३)
[भरत]—प्रजा मेरे पीछे-पीछे आए।
[सुमं]त्र—राज्याभिषेक को छोड़ कर आप कहाँ जायेगे ?
[भर]त—अभिषेक ? अभिषेक तो इन देवी को दीजिए।
[सुमं]त्र—आप कहाँ जायेगे ?
[भर]त—जहाँ वे लक्ष्मण के प्रिय राम है, मै वही पर जाऊँगा। अयोध्या
उनके बिना अयोध्या नही है। वही अयोध्या है, जहाँ राम है। (२४)
(सब निकल जाते है)
तीसरा अंक समाप्त।

( 126 )
इदं तत् स्त्रीमयं तेजो जातं क्षेत्रोदराद्धलात् ।
जनकस्य नृपेन्द्रस्य तपसः सन्निदर्शनम् ॥ (१४)
आर्ये ! अभिवादये, भरतोऽहमस्मि ।
सीता—(आत्मगतम्) नहि रूपमेव । स्वरयोगोऽपि स एव । (प्रका-
शम्) वत्स ! चिरजीव ।
भरत—अनुगृहीतोऽस्मि ।
सीता—एहि वत्स ! भ्रातृमनोरथं पूरय ।
सुमन्त्रः—प्रविशतु कुमारः ।
भरतः—तात ! इदानीं कि करिष्यसि ?
सुमन्त्रः—अहं पश्चात् प्रवेक्ष्यामि स्वर्गम् याते नराधिपे ।
विदितार्थस्य रामस्य ममेतत् पूर्वदर्शनम् ॥ (१५)
भरतः--एवमस्तु । (राममुपगम्य) आर्य ! अभिवादये, भरतो-
ऽहमस्मि ।
रामः—(सहर्षम्) एह्येहि इक्ष्वाकुकुमार ! स्वस्ति, आयुष्मान् भव ।
वक्षः प्रसारय कवाटपुटप्रमाणं
मालिङ्ग मा सुविपुलेन भुजद्वयेन ।
उन्नामयाननमिदं शरदिन्दुकल्पं
प्रह्लादय व्यसनदग्धमिदं शरीरम् ॥ (१६)
भरतः--अनुगृहीतोऽस्मि ।
शब्दार्थ —आत्माभिप्रायम् = मेरी इच्छा को । अनुवर्तयितुम् =
जानना । सत्कृत्य = सत्कार करके । इय=यह सीता । मानहेतोः = सम्मान के
लिए । भावं = स्नेह या वात्सल्य को । तनये = पुत्र पर । निवेश्य = आगे
करके । तुषारपूर्णोत्पलपत्रनेत्रा = हिम से भरे नील कमल दल के समान नेत्रो
वाली । हर्षाम्बुम् = आनन्दाश्रु को । आसारम् इव = धारासम्पात या मूसला-
धार वर्षा के समान । उत्सृजन्ती छोड़ती हुई । हुं = अरे । वेलाम् = समय
पर । वधूः = वह अर्थात् रामपत्नी सीता । स्त्रीमय = स्त्री के रूप मे । तेजः =
ओज । जातम् - उत्पन्न हुआ । क्षेत्रोदरात् = खेत के बीच से । हलात् = हल
चलाते समय । तपसः = तपस्या का । सन्निदर्शनम्=अच्छा उदाहरण । चिरं =

( 127 )
बहुत समय तक । जीव = जीवित रहो । पूरय = सफल करो । पश्चात् = बाद
मे। प्रवेक्ष्यामि = प्रवेश करूँगा । याते = चले जाने पर । विदितार्थस्य =
वृत्तान्त को जानने वाले । पूर्वदर्शनम् = प्रथम बार मिलना । स्वस्ति =
कल्याण हो । प्रसारय = फैलाओ । कवाटपुटप्रमाणम् = किवाड़ो के समान
विस्तीर्ण । आलिङ्ग = भेंट करो । सुविपुलेन = खूब लम्बे । भुजद्वयेन = दोनों
हाथो से । उन्नामय = ऊँचा उठाओ । आननम् = मुख को । शरदिन्दुकल्पम् =
शरत्काल के चन्द्रमा के समान । प्रह्लादय = शीतल बनाओ । व्यसनदग्धम्
= दुख से जले हुए ।
अन्वय— इयं तुषारोत्पलपत्रनेत्रा आसारम् इव हर्षास्रम् उत्सृजन्ती
तनये भावं निवेश्य माता इव स्वयं मानहेतोः गच्छतु । (१३)
अन्वय—हलात् क्षेत्रोदरात् जातम् इद तत् स्त्रीमयं तेजः नृपेन्द्रस्य
जनकस्य तपसः सन्निदर्शनम् । (१४)
अन्वय—अहम् पश्चात् प्रवेक्ष्यामि, नराधिपे स्वर्गम् याते विदितार्थस्य-
रामस्य मम एतत् पूर्वदर्शनम् । (१५)
अन्वय—कवाटपुटप्रमाण वक्षः प्रसारय । मां सुविपुलेन भुजद्वयेन
आलिङ्ग इद । शरदिन्दुकल्पम् आननम् उन्नामय । इदं व्यसनदग्धं शरीरं
प्रह्लादय । (१६)
हिन्दी अर्थ
राम—वत्स लक्ष्मण, क्या इसमें भी तुम मेरी अनुमति की आवश्यकता
समझते हो । जाओ और जल्दी से भरत को सम्मानपूर्वक अन्दर
ले आओ ।
लक्ष्मण—जैसी आपकी आज्ञा ।
राम—अथवा तुम रुक जाओ ।
यह सीता स्वयं जाए और माँ की तरह सस्नेह भरत का सत्कार
करके उन्हे भीतर ले आए । यह सीता जो ओस की बूँदों से भरे
नील कमल की तरह आंखो वाली है और जिन आँखों से स्वतः
प्रेमाश्रु की धारा वर्षा की झड़ी की तरह वह रही है । (१३)

( 128 )
सीता—जैसी पतिदेव की आज्ञा । (उठ कर, घूम कर और भरत को देख कर)
अरे, मुझसे पहले ही भीतर से आर्यपुत्र बाहर कैसे आ गए ? नहीं,
नहीं । यह तो केवल आकृति की समता है ।
सुमन्त्र—अरे, यह तो बहू है ।
भरतः—क्या, यह पूज्या जनक तनया सीता है ?
यह वही दीप्तिमान् नारी रूप तेज है, जो खेत को जोतते समय पृथ्वी
के गर्भ से उत्पन्न हुआ था और जो राजर्षि जनक की तपस्या का
ज्वलन्त उदाहरण है । (१४)
आर्ये, मैं प्रणाम करता हूं । मैं भरत हूं ।
सीता—(अपने मन में) केवल आकृति ही नहीं, आवाज भी वैसी ही है ।
(प्रकट रूप में) वत्स, चिरजीवी बनो ।
भरत—कृतकृत्य हो गया ।
सीता—आओ वत्स, अपने भाई की इच्छा को पूरी करो ।
सुमन्त्रः—राजकुमार, आप जाइए ।
भरत—तात, इस समय आप क्या करेंगे ?
सुमन्त्र—मैं बाद में आऊँगा क्योंकि महाराज की मृत्यु की सूचना जब से
राम को मिली है, इसके बाद उनसे यह मेरी पहली भेंट है । (१५)
भरत—ऐसा ही हो । (राम के पास जाकर) आर्य, मैं प्रणाम करता हूं । मैं
भरत हूं ।
राम—(प्रसन्नता से) आओ, आओ, इक्ष्वाकु राजकुमार, कल्याण हो । तुम
दीर्घ काल तक जीवित रहो ।
तुम किवाड़ की तरह अपनी चौड़ी छाती फैला कर अपनी विशाल-
काय भुजाओं से मेरा आलिङ्गन करो । तुम शरद् ऋतु के चन्द्रमा
के समान अपने आह्लादक मुख को ऊपर उठाओ तथा शोक की
ज्वाला में जलते हुए मेरे हृदय को शीतल करो । (१६)
भरत—मैं कृतकृत्य हुआ ।
(५) मूल
सुमन्त्रः—(उपेत्य) जयत्वायुष्मान् ।
रामः—हा तात !

( १२९ )
गत्वा पूर्वम् स्वसैन्यैरभिसरिसमये ख समानैर्विमानै
विख्यातो यो विमर्दे स स इति बहुशः सासुराणा सुराणाम् ।
स श्रीमास्त्यक्तदेहो दयितमपि विना स्नेहवन्तं भवन्त
स्वर्गस्थः साम्प्रत कि रमयति पितृभिः स्वैर्नरैन्द्रैर्नरेन्द्रः ॥
( १७ )
सुमन्त्रः—(सशोकम्)
नरपतिनिधनं भवत्प्रवासं
भरतविषादमनाथतां कुलस्य ।
बहुविधमनुभूय दुष्प्रसह्यं
गुण इव बहुवपराद्धमायुषा मे ॥ ( १८ )
सीता—रुदन्तमार्यपुत्रं पुनरपि रोदयति तातः ।
रामः—मैथिलि ! एष व्यवस्थापयाम्यात्मानम् । वत्स ! लक्ष्मण
आपस्तावत् ।
लक्ष्मणः—यदाज्ञापयत्यार्यः ।
भरतः—आर्य ! न खलु न्याय्यम् । क्रमेण शुश्रूषयिष्ये ।
अहमेव यास्यामि । (कलशं गृहीत्वा निष्क्रम्य प्रविश्य)
इमा आपः ।
रामः— (आचम्य) मैथिलि ! विशीर्यते खलु लक्ष्मणस्य व्यापारः ।
सीता—आर्यपुत्र ! नन्वेतेनापि शुश्रूषयितव्यः ।
रामः—सुष्ठु खल्विह लक्ष्मणः शुश्रूषयतु । तत्रस्थो मां भरतः शुश्रू-
षयतु ।
भरतः—प्रसीदत्वार्यः ।
इह स्थास्यामि देहेन तत्र स्थास्यामि कर्मणा ।
नाम्नैव भवतो राज्यं कृतरक्षं भविष्यति ॥ ( १६ )
रामः—वत्स ! कैकेयीमातः ! मा मैवम् ।
पितुर्नियोगादहमागतो वनं
न वत्स दर्पान्न भयान्न विभ्रमात् ।

समये = देवताओ की सहायतार्थ जाने के समयWait, look atअभिसारिसमयेin line 12:अ भ ि स ा र ि स म य े: अभिसारिसमये. Line 13: मे । खम् = आकाश मे । समानैः = तुल्य । विमानै. = वायुयान के द्वाराLine 14:विख्यातः = सुप्रसिद्ध । यः = जो व्यक्तिविशेष । विमर्दे = युद्ध मे । बहुशः =Line 15:अनेक बार । सासुराणाम् = असुरो के सहित । सुराणाम् = देवताओ के ।Line 16:श्रीमान् = राजा दशरथ । त्यक्तदेहः = शरीर छोड कर । दयितम् = प्रेमीLine 17:जीव । स्नेहवन्तम् = अनुराग शाली । साम्प्रत = अब । रमयति = प्रसन्न होतेLine 18:होगे । पितृभि. = पितरो के साथ । नरेन्द्र. = राजा दशरथ । प्रवासम् = वनLine 19:यात्रा को । भरतविपादम् = भरत के दुःख को । अनाथताम् = अशरणताLine 20:को । बहुविधम् = नाना रूप वाले । अनुभूय = अनुभव करके । दुष्प्रसहम्

( 131 )
। नीचपथे = राज्य स्वीकृति के रूप मे पिता की आज्ञा न मानने वाले मार्ग
र। प्रवर्तते = चल रहे हो। मात्राभिहित = माता के द्वारा कहा गया है।
र्णे = घाव पर। प्रहर्तुम् = चोट पहुंचाना। सुगुण = हे अच्छे गुणों वाले।
सूतिः = उत्पत्ति। निभृतधीमान् = अचंचल बुद्धि वाले ' सुपुरुष = हे अच्छे
नपुरुप। मातृदोषः = जननी के द्वारा कियों गया अपराध। वरद = हे चाही
ई वस्तु को देने वाले। आर्तम् = पीड़ित। यथावत् = सही रूप में।
अन्वय-य पूर्वम् सासुराणाम् सुराणाम् विमर्दे अभिसरिसमये
श्वसैन्यं समानैः विमानैः खम् गत्वा स स इति बहुशः विख्यातः। स श्रीमान्
त्यक्तदेहः नरेन्द्रः दयितम् अपि स्नेहवन्तम् भवन्तम् विना स्वर्गस्थः साम्प्रतम
पितृभिः सह नरेन्द्रैः रमयति किम् । (१७)
अन्वय नरपतिनिधनम् भवत्प्रवासम् भरतविषादम् कुलस्य अनाथ-
ताम् बहुविधम् दुष्प्रसह्यम् अनुभूय मे आयुषा गुणे बहु अपराध्दम् इव। (१८)
अन्वय-इह देहेन स्थास्यामि, तत्र कर्मणा स्थास्यामि। भवतः नाम्ना
एव राज्य कृतरक्षं भविष्यति। (१६)
अन्वय-वत्स, अहम् पितुः नियोगात् वनम् आगतः। दर्पात् न, भयात्
न, विभ्रमात् न। न कुलम् च सत्यधनम्, ते ब्रवीमि, भवान् नीचपथे कथम्
प्रवर्तते। (२०)
अन्वय-सुगुण, त्वत् प्रसूतिः मम अपि प्रसूतिः। स खलु निभृत-
धीमान् ते पिता मे पिता च। सुपुरुष, पुरुषाणाम् मातृदोषः न दोषः। वरद,
तावत् आर्तम् भरतम् यथावत् पश्य। (२१)
हिन्दी अर्थ
सुमन्त्र-(पास जाकर) आप दीर्घायु की जय हो।
राम-हा तात,
आपके साथ जो राजा दशरथ पहले देवासुर संग्रामो मे देवो की सहा-
यता के लिए स्वर्ग जाते थे। उस यात्रा मे आपके विमान देव विमानों
के समान होते थे। उस युद्ध में महाराज की विजय पर लोग आदर
सम्मान प्रकट करते थे। वे ही राजा दशरथ अब मृत्यु के बाद आप

( 132 )
प्रेमी और स्नेही के बिना स्वर्ग में अपने अन्य पूर्वज राजाओं के
क्या आनन्द पाते होंगे । (१७)
सुमन्त्र—(दुःखपूर्वक) महाराज की मृत्यु, आपका वनवास, भरत की पी-
परिवार का रक्षकहीन होना आदि अनेक प्रकार के कष्टों को दि-
कर मेरी लम्बी उम्र ने गुणों के साथ दोष ही अधिक दिए हैं । (१८)
सीता—तात रोते हुए पतिदेव को और भी अधिक रुला रहे हैं ।
राम—सीते, यह मैं अपने आपको सँभाल रहा हूँ । वत्स लक्ष्मण, जरा पानी
तो लाओ ।
लक्ष्मण—जैसी आपकी आज्ञा ।
भरत—आर्य, यह उचित नही है । छोटा होने के कारण वारी तो मेरी है ।
मैं ही जल लाऊँगा । (कलश लेकर, बाहर जाकर, पुनः अन्दर आकर)
यह जल है ।
राम— (आचमन करके) सीते, अब तो लक्ष्मण का काम छिन रहा है ।
सीता—पतिदेव, इसे भी तो सेवा करनी चाहिए ।
राम—ठीक है । यहां वन में लक्ष्मण सेवा करे और वहाँ अयोध्या में भरत ।
भरत—आर्य प्रसन्न होइए ।
मैं यहाँ पर शरीर से रहूँगा तथा वहाँ तो केवल मेरा प्रबन्ध रहेगा
राज्य की रक्षा तो आपके नाममात्र से ही हो जायेगी । (१९)
राम—हे वत्स भरत, ऐसा मत कहो ।
हे वत्स, मैं पिता की आज्ञा से वन में आया हूँ । न तो मैं अभिमान से
यहाँ आया हूँ, न भय से अथवा न चित्त के पागलपन से । हमारा
रघुकुल सत्य के लिए प्रसिद्ध है, यह मैं तुमसे कह रहा हूँ । इसे
जानते हुए भी तुम निम्न पथगामी क्यों बन रहे हो । (२०)
सुमन्त्र—तो फिर अब राज्याभिषेक किसका होना चाहिए ?
राम—उसी का होवे, जिसके लिए जननी ने कहा है ।
भरत—आप प्रसन्न होइए । आर्य, अब घाव पर नमक न छिड़कें ।
हे गुणज्ञ मेरा जन्म भी उसी कुल में हुआ है, जिसकी आप शोभा
हैं । मेरे पिता भी वे ही प्रशस्त बुद्धि वाले हैं, जिनके आप यशस्कर

( 133 )
है। हे श्रेष्ठ पुरुष, मनुष्यों में माता के अपराध को अपराध नहीं
माना जाना चाहिए। हे वर देने वाले, दुःखी भरत की ओर न्यायो-
चित दृष्टि से देखें। (२१)
मूल
-आर्यपुत्र ! अतिकरुणं मन्त्रयते भरतः । किमिदानीमार्यपुत्रेण
चिन्त्यते ।
.-मैथिलि !
तं चिन्तयामि नृपतिं सुरलोकयातं
येनायमात्मजविशिष्टगुणो न दृष्टः ।
ईदृग्विधं गुणनिधिम् समवाप्य लोके
धिग् भो विधेर्यदि बलं पुरुषोत्तमेषु ॥ (२२)
वत्स कैकेयीमातः !
यत्सत्यं परितोषितोऽस्मि भवता निष्कल्मषात्मा भवां
स्त्वद्वाक्यस्य वशानुगोऽस्मि भवतः ख्यातैर्गुणैर्निर्जितः ।
किन्त्वेतन्नृपतेर्वचस्तदनृतं कर्तुम् न युक्तं त्वया
किञ्चोत्पाद्य भवद्विधं भवतु ते मिथ्याभिधायी पिता ॥(२३)
भरतः-यावद् भविष्यति भवन्नियमावसानं
तावद् भवेयमिह ते नृप, पादमूले ।
रामः-मैवं नृपः स्वसुकृतैरनुयातु सिद्धिं
मे शापितो न परिरक्षसि चेत् स्वराज्यम् ॥ (२४)
भरतः-हन्त अनुत्तरमभिहितम् । भवतु समयतस्ते राज्यं परि-
पालयामि ।
रामः-वत्स ! कः समयः ?
भरतः-मम हस्ते निक्षिप्तं तव राज्यं चतुर्दश वर्षान्ते प्रतिग्रहीतु-
मिच्छामि ।
रामः एवमस्तु ।
भरतः-आर्ये ! श्रुतम् । आर्ये ! श्रुतम् । तात ! श्रुतम् ।
सर्वे-वयमपि श्रोतारः ।

( 134 )
भरतः—आर्य ! अन्यमपि वरं हर्तुं मिच्छामि ।
रामः—वत्स ! किमिच्छसि ? किमहं ददामि ? किमहमनुष्ठास्यामि
भरतः—पादोपभुक्ते तव पादुके मे
एते प्रयच्छ प्रणताय मूर्ध्ना ।
यावद् भवानेष्यति कार्यसिद्धिम्
तावद् भविष्याम्यनयोर्विधेयः ॥ (२५)
शब्दार्थ—अतिकरुणम् बहुत ही दीन होकर । मन्त्रयते = कह रहा
है । चिन्त्यते = विचार किया जा रहा है । सुरलोकयांत == स्वर्ग गए हुए ।
आत्मजविशिष्टगुणः=पुत्रों मे विशेष गुण वाला । ईदृग्विधम्=इस प्रकार का ।
गुणनिधि = गुणों के खजाने । समवाप्य = प्राप्त करके । धिग् = धिक्कार है ।
विधेः = भाग्य के । पुरुषोत्तमेषु = मनुष्यों में श्रेष्ठ पूज्य पिता मे । यत्सत्यम्
= सचमुच में । परितोषितः = सन्तुष्ट । निष्कल्मषात्मा - निष्पाप बुद्धि वाले ।
भवान् आप भरत । वशानुगः = वशीभूत हुआ । भवतः = आपके । ख्यातं =
सुप्रसिद्ध । निर्जितः = पराजित कर दिया है । अनृतं = मिथ्या । युक्तम् =
उचित । किञ्च = और । उत्पाद्य = उत्पन्न कर के । भवद्विधम् = तुम्हारे
जैसा । भवतु = होवे । ते = तुम्हारा । मिथ्याभिधायी = झूठ बोलने वाला ।
यावद्=जब तक । भवन्नियमावसानम् = आपके वनवास की समाप्ति । भवेयम्
= रहूँगा । इह = यहाँ पर । ते=आपके । पादमूले = चरणों मे । मैवम् =
ऐसा मत कहो । स्वसुकृतैः = अपनी सत्यवादिता जन्य पुण्य से । अनुयातु
= प्राप्त करे । सिद्धिम् = सफलता को । मे = मेरी । शापितः = सौगन्ध ।
परिरक्षसि = पालोगे । चेत् = यदि । हन्त = हाय । अनुत्तरम् = उत्तर देने
से रहित । अभिहितम् = कहा गया । भवतु -- ठीक है । समयतः = शर्त के
अनुसार । समय. = शर्त । निक्षिप्तम् = धरोहर रूप मे रखा गया । प्रतिग्रही-
तुम् = देना । श्रुतम् - सुन लिया । हर्तुम् - प्राप्त करना । अनुष्ठास्यामि =
करूँ । पादोपभुक्ते = चरणों मे पहनी हुई । पादुके = दो खडाऊ । प्रणताय =
झुके हुए । मे = मुझे । मूर्ध्ना = सिर से । एष्यति = आयेंगे । अनयोः = इन
दोनो चरण पादुकाओं का । विधेयः = आज्ञाकारी ।
अन्वय—सुरलोकयात तं नृपतिम् चिन्तयामि, येन अयम् आत्मज-
विशिष्टगुणः न दृष्टः । लोके ईदृग्विध गुणनिधिम् समवाप्य पुरुषोत्तमेषु यदि
विधेः बलम् । (तर्हि) भो धिक् । (२२)

( 135 )
अन्वय—भवता यत्सत्यम् परितोषितः अस्मि, भवान् निष्कल्मषात्मा,
तैः भवतः गुणैः निर्जितः । त्वद् वाक्यस्य वशानुगः अस्मि । किन्तु एतत्
तेः वचः तत् त्वया अनृतं कर्तुम् न युक्तम् । किञ्च भवद्विधम् उत्पाद्य ते
ता मिथ्याभिधायी भवतु । (२३)
अन्वय—यावत् भवन्नियमावसानं भविष्यति, नृप, तावत् इह ते पादमूले
यम् । मैवम् नृपः स्वसुकृतैः सिद्धिम् अनुयातु, चेत् स्वराज्यं न परिरक्षसि,
शपितः । (२४)
अन्वय—मूर्ध्ना प्रणताय मे एते पादोपभुक्ते तव पादुके प्रयच्छ । यावत्
भवान् कार्यसिद्धिम् एष्यति, तावत् अनयोः विधेयः भविष्यामि । (२५)
हिन्दी अर्थ
सीता—पतिदेव, भरत बहुत दीनता से बोल रहे हैं। आप अब क्या सोच
रहे है ?
राम—सीते,
मैं स्वर्ग लोक मे गए हुए अपने उन पिताजी के विषय में सोच रहा हूँ,
जिन्होने अपने अनुपम इस पुत्र रत्न को नही देखा। संसार में इस
प्रकार के गुणसागर पुत्र को प्राप्त करके भी पिताजी की मृत्यु हो
गई, तो भाग्य की इस विडम्बना को धिक्कार है। (२२)
हे वत्स भरत,
तुमने मुझे सचमुच मे प्रसन्न कर दिया। तुम्हारी अन्तरात्मा अति
पवित्र है। तुम्हारी बात को मै मानता हूँ। तुम्हारे सुविख्यात गुणो
ने मुझे जीत लिया है। ये सारी बाते ठीक है। किन्तु तुम्हारे द्वारा }
पिताजी के इस वाक्य को कि "भरत राजा बने" मिथ्या करना समु-
चित नहीं है। तुम्हारे जैसे इतने अच्छे पुत्र को उत्पन्न करके तुम्हारे
पिता झूठ बोलने वाले हों, यह अच्छा नही है। (२३)
भरत—हे महाराज राम, जब तक आपका यह वनवास समाप्त नहीं होगा,
तब तक मैं भी यही आपके चरणो की सेवा में रहूँगा।
राम—ऐसा मत कहो। राजा दशरथ को अपने पुण्य से सिद्धि भोगने दो।
यदि तुम अपना राज्य नही सँभालो, तो तुम्हे मेरी शपथ है। (२४(

( 136 )
भरत—हाय, आपने तो मुझे अनुत्तर सा कर दिया । अच्छा, मैं एक शर्त पर
आपके राज्य का पालन करूँगा ।
राम—वत्स, वह कौन सी शर्त है ।
भरत—मेरे हाथ में धरोहर रखा हुआ आपका राज्य चौदह वर्ष के अन्त में
पुनः आपको लौटाना चाहता हूँ ।
राम—ऐसा ही होवे ।
भरत—आर्य, सुना । हे पूज्ये, सुना । तात, सुना आपने ।
सभी—हम लोग साक्षी हैं ।
भरत—आर्य, मैं एक वरदान और लेना चाहता हूँ ।
राम—वत्स, क्या चाहते हो ? मैं क्या दूँ ? मैं क्या करूँ ?
भरत—आपके चरणों में मस्तक झुकाने वाले मुझे आपके पाँवों में पहनी
हुई ये खड़ाऊ दे दें । जब तक आप अपना वनवास पूरा करके लौटें
तब तक मैं इनका सेवक बन कर आपका राज्य भार संभालूँगा । (२५)
(७) मूल
रामः—(स्वगतम्) हन्त भोः ।
सुचिरेणापि कालेन यशः किञ्चिन्मयार्जितम् ।
अचिरेणैव कालेन भरतेनाद्य सञ्चितम् ॥ (२६)
सीता—आर्यपुत्र ! ननु दीयते खलु प्रथमयाचनं भरताय ।
रामः—तथास्तु । वत्स ! गृह्यताम् ।
भरतः—अनुगृहीतोऽस्मि । (गृहीत्वा) आर्य !
अत्राभिषेकोदकमावर्जयितुमिच्छामि ।
रामः—तात ! यदिष्टं भरतस्य तत् सर्वम् क्रियताम् ।
सुमन्त्रः—यदाज्ञापयत्यायुष्मान् ।
भरतः— (आत्मगतम्) हन्त भोः!
श्रद्धेयः स्वजनस्य पौररुचितो लोकस्य दृष्टिक्षमः
स्वर्गस्थस्य नराधिपस्य दयितः गीfull/शीलान्वितोऽहं सुतः ।
भ्रातॄणां गुणशालिनां बहुमतः कीर्तेर्महद् भाजनं
संवादेषु कथाश्रयो गणवतां लब्धप्रियाणां प्रियः ॥ (२७)

( 137 )
रामः—वत्स ! कैकयीमातः ! राज्यं नाम मुहूर्तमपि नोपेक्षणीयम् ।
तस्मादद्यैव विजयाय प्रतिनिवर्ततां कुमारः ।
सीता—हम्, अद्यैव गमिष्यति कुमारो भरतः ।
रामः—अलमतिस्नेहेन । अद्यैव विजयाय प्रतिनिवर्ततां कुमारः ।
भरतः—आर्य ! अद्यैवाहं गमिष्यामि ।

*( 138 )
हम् = क्या (खेद व आश्चर्य सूचक अव्यय, जो स्त्री पात्रो द्वारा प्रयुक्त किया
जाता है) । आशावन्तः = राम के आने की आस लगाए हुए। पुरे = अयोध्या
नगर मे । पौराः = नागरिक । स्थास्यन्ति = विद्यमान होगे । त्वद्दिदृक्षया =
आपके देखने की इच्छा मे । प्रीतिम् अनुराग को । करिष्यामि = करूँ गा ।
प्रमादस्य = कृपा अर्थात् चरण पादुकाएँ । प्रयतिष्ये = प्रयत्न करूँ गा । आरो-
हतः = दोनो चढ़ते हैं । अनुयातृ = पीछे चलने वाले ।
अन्वय-मया सुचिरेण अपि कालेन किञ्चित् यश. अर्जितम् । अद्य
भरतेन अचिरेण एव कालेन सञ्चितम् । (२६)
अन्वय-अहम स्वजनस्य श्रद्देयः, पौररुचितः, लोकस्य दृष्टिक्षमः,
स्वगंस्थस्य नराधिपस्य दयितः शीलान्वित. सुतः, गुणशालिनां भ्रातृणां बहुमतः,
कीर्तेः महत् भाजनम्, गुणवता संवादेपु कथाश्रय., नब्धप्रियाणा प्रियः
जातः । (२७)
अन्वय -- पुरे पौराः आशावन्त. त्वद्दिदृक्षया स्थास्यन्ति । त्वत्प्रसा-
दस्य दर्शनात् तेषा प्रीति करिष्यामि । (२८)
हिन्दी अर्थ
राम- (स्वगत) अहा,
मैंने बहुत दिनों में जितना यश संचित किया था, भरत ने उतना यश
अल्प काल में ही अर्जित कर लिया है । (२६)
सीता-आर्यपुत्र, क्या भरत को आप प्रथम बार मांगी गई वस्तु नहीं देंगे ।
राम-अवश्य । कुमार, यह लो ।
भरत-बड़ी कृपा । (लेकर) आर्य, इन पर राज्याभिषेक के जल को छिटकना
चाहता हूं ।
राम-तात, जो भरत को प्रिय हो, वह सभी किया जाए ।
सुमन्त्र-जैसी आपकी आज्ञा ।
भरत-(मन में) अहा,
अब मैं अपने बान्धवों का विश्वास पात्र बना । नगरवासियों का प्रेम
पात्र, संसार की ओर आंख उठा कर देखने योग्य, स्वर्गवासी महाराज
दशरथ का प्रिय एवं अच्छे गुण वाला पुत्र, गुणी भाइयों का सम्मानी,

( 139 )
प्रशंसा का बहुत बडा आश्रय, गुणीजनों की पारस्परिक वार्ता का
विषय और सफल मनोरथ प्रजा का प्रिय बन गया हूँ । (२७)
राम- हे वत्स भरत, राज्य की थोड़े समय के लिए भी उपेक्षा नही करनी
चाहिए । अतः तुम आज ही विजय के लिए वापस लौट जाओ ।
सीता-अरे, क्या, आज ही कुमार भरत चले जायेगे ।
राम-अधिक स्नेह मत बताओ । आज ही भरत राज्य की रक्षा के निमित्त
वापस जाये ।
भरत--आर्य, मै आज ही चला जाऊँगा ।
प्रजा के लोग आशा लगाए हुए आपको देखने की इच्छा से अयोध्या
मे प्रतीक्षा कर रहे होगे । मैं जाकर उन्हे यह आपकी कृपा अर्थात्
चरण पादुकाएँ दिखाऊँगा और उनको प्रसन्न करूँगा । (२८)
सुमन्त्र-- हे दीर्घायु, अब मै क्या करूँ ?
राम-तात, महाराज की भाँति भरत का पालन करे ।
सुमन्त्र-यदि जीवित रहा, तो प्रयास करूँगा ?
राम-वत्स भरत, मेरे सामने ही रथ पर चढो ।
भरत-जो आज्ञा ।
(दोनो भरत और सुमन्त्र रथ पर बैठते हैं)
राम-हे सीते, जरा इधर तो आओ । वत्स लक्ष्मण, तुम भी इधर आओ ।
आश्रम के द्वार तक हम भी भरत के पीछे चलेगे ।
(इस प्रकार सभी निकल जाते है)
चौथा अंक समाप्त ।