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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 296 में से

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पृष्ठ 134

( 143 )

सीता—आर्ये, आश्रम में बिखरे हुए पूजा के फूलों को साफ कर दिया ।
आश्रम सुलभ फल फूल आदि से देव पूजा भी कर ली । तो अब जब
तक पतिदेव नहीं आते हैं, मैं इन छोटे पौधों को जल से सींच लूँ ।
तापसी—तुम्हारा यह कार्य बिना बाधा के होवे ।
(इसके बाद राम आते हैं)
राम—(खेद पूर्वक) पिताजी और मुझ से रहित उस सुन्दर अयोध्या को
छोड़ कर, मेरे अभिषेक की सारी सामग्री साथ लेकर भरत मेरे पास
आया । मैंने पुनः उस गुणों के आगार भरत को राज्य के पालन के
लिए वहीं पर भेज दिया । बड़े कष्ट की बात है कि पिताजी के
राज्य के भारी भार को वह अकेला ही खेच रहा है । (१)
(सोच कर) यह राजकार्य ऐसा ही है । तो अब मैं ऐसी चिन्ताओं से
मुक्ति पाने के लिए मेरी सहचरी सीता को देखूँ । सीता अभी
कहाँ गई होगी ? (घूम कर और देख कर) अरे, ये तत्काल सींचे गए
पौधों के थाल बता रहे हैं कि सीता यहीं कहीं पास में है । क्योंकि—
पेड़ों के थालों में पड़ा झाग वाला जल अभी भी घूम रहा है और प्यासे
पक्षी पास आकर भी इस मैले पानी को नहीं पी रहे हैं । जल से भीगे
कीड़े अपने बिलों से भाग कर बाहर आ रहे हैं तथा पेड़ों की जड़ों
में कई गोलाकार रेखाएं पड़ गई हैं । (२)
(देख कर) अरे, सीता तो यह रही । हाय, बड़ा दुःख है ।
इसका हाथ कभी दर्पण उठाने में भी थक जाता था, वही हाथ अब
घड़ा उठाने में भी नहीं थकता । वनवास ने लताओं के साथ नारी
की सुकुमारता को भी कठोरता में बदल दिया है । (३)
(पास जाकर) सीते, क्या तुम्हारा तप बढ़ रहा है ?
सीता—अरे, पतिदेव । आर्यपुत्र की जय हो ।
राम—सीते, यदि तुम्हारे धार्मिक कार्य में कोई रुकावट न हो, तो बैठ जाओ ।
सीता—जैसी आपकी आज्ञा । (बैठती है)
राम—सीते, लगता है जैसे तुम कुछ पूछना चाहती हो ? क्या बात है ?
सीता—आपके मुख से लग रहा है मानो आपका हृदय किसी दुःख से
सना हो रहा है । यह क्या है ?