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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

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पीते हैं। उनकी पीठ वैदूर्य मणि की भाँति श्याम वर्ण की है। वे
वायु के समान शीघ्रगामी है। वैखानस, बालखिल्य तथा नैमिषा-
रण्य मे रहने वाले ऋषि गण ध्यान मात्र से ही उन्हे बुला कर
श्राद्ध कर्म करते है।
उनसे तर्पित होकर पितर गण पुत्र के फल को प्राप्त करते हैं। फिर
प्रकाशमान कान्ति वाले वृद्धावस्था को त्याग कर सीधे स्वर्ग चले
जाते हैं। वहाँ वे देवताओं के साथ विमान में रहते हैं और आवा-
गमन की वासना से बलपूर्वक खींचे नहीं जाते। (१०)
राम—सीते,
अपने पुत्र के समान पाले-पोसे गए हरिणों और वृक्षों से, विन्ध्य
पर्वत तथा इसके वन से, अपनी प्रिय सखियों के समान लताओं से
तुम विदा ले लो। मैं अब यहां से जाकर चमकने वाली जड़ी
बूटियों से भासित हिमालय पर निवास करूंगा। अतः वहा जाना
है। (११)
सीता—जैसी आर्यपुत्र की आज्ञा।
रावण—राम, अधिक मनोरथ मत बढ़ाओ। वे हिरण मनुष्यों को न
दिखाई देते हैं।
राम—भगवान्, क्या वे हिमालय पर रहते हैं ?
रावण—और क्या ?
राम—तो फिर आप देखिए—
या तो हिमालय उन कांचन मृगों को लाकर मेरे सामने उपस्थित
करेगा अथवा मेरे बाणों द्वारा विदीर्ण होकर क्रौञ्च पर्वत की दशा
को प्राप्त करेगा। (१२)
रावण—(स्वगत) अहो, इसका घमण्ड तो सहा नही जाता (प्रकट) अरे,
बिजली की चमक सी दिखाई दे रही है। हे राम, तुम्हारे यही रहने
पर भी हिमालय तुम्हारा आदर कर रहा है। यह कांचनपार्श्व
मृग है।
राम—यह तो आपका प्रभाव है।