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प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

प्रतिमानाटकम् (महाकवि भास - विमला संस्कृत-हिन्दी टीका एवं सविस्तार व्याख्या सहित)

Pratimanatakam of Mahakavi Bhasa

महाकवि भास (व्याख्याकार: डॉ. श्रीकृष्ण कुमार) द्वारा

DevanagariHindipublished296 पृष्ठ

पृष्ठ 145, कुल 296 में से

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पृष्ठ 145

( 156 )
राम-- तब तो मैं ही जाऊँगा ।
सीता-आर्यपुत्र, मैं क्या करूँगी ?
राम-भगवान् (इस संन्यासी) की सेवा ।
सोता-जैसी आर्यपुत्र की आज्ञा ।
( राम निकल जाते हैं )
रावण--अरे, यह राम अभी तो मेरे लिए अर्घ्य लेकर आ रहे थे और
ये अब बिना पूजा किए ही दौड़ते हुए हरिण को देखकर उस पर
धनुष चढ़ा रहे हैं ।
अहा, कैसी असीम शक्ति, कैसा असीम पराक्रम, कैसा असीम धैर्य
और कैसा असीम वेग है । "राम" इन थोड़े से अक्षरों से मानो
उचित रूप मे ही यह पूरा संसार व्याप्त हो रहा है । (१४)
यह हरिण एक ही छलांग मे वाण के निशाने से बाहर होकर घने
वन में घुस गया ।
सीता-(अपने मन मे) यहां पर पतिदेव के अभाव मे मुझे भय लग रहा है ।
रावण-(अपने मन मे) राम को छल-कपट से दूर करने पर मैं इस आश्रम
से अकेली रोती हुई बाला सीता को मन्त्र के उच्चारण से शून्य
आहुति की भांति हरण करता हूँ । (१५)
सीता-तो फिर पर्णशाला में प्रवेश करती हूँ । (जाना चाहती है)
रावण-(अपना रूप धारण करके) सीते ठहरो, ठहरो ।
सीता-(डर कर) यह अब कौन है ?
रावण-क्या तू नहीं जानती ?
युद्ध में जिसने दानवों और देवताओं को परास्त किया, जिसने इन्द्र
आदि को जीता, जिसने शूर्पणखा की नासिका भंग को देखा, जिसने
खर और दूषण भाइयों का मारा जाना सुना, वही मैं रावण इस समय
गर्व से दुष्ट बुद्धि एवं अतुलनीय शक्ति वाले राम को माया से ठग
कर हे विशाल नेत्रों वाली सीते, तुम्हे हर कर ले जाने के लिए
उपस्थित हुआ हूँ । (१६)
(5) मूल
सीता--हं रावणो नाम । (प्रतिष्ठते)
रावणः--आः ! रावणस्य चक्षुर्विषयमागता क्व यस्यासि ?
सीता--आर्यपुत्र ! परित्रायस्व परित्रायस्व । सौमित्रे ! परित्रायस्व ।
परित्रायस्व ।