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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 75, कुल 318 में से

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पृष्ठ 75

४६ प्राचीनलिपिम़ाला.
अन्तस्थ. य र ल व
ऊष्मन्. श ष १ स ह
यम.२ कुँ खुँ गुँ घुँ
इस तरह वैदिक साहित्य में अधिक से अधिक ६४ (ऋग्वेद में ६४३ और यजुर्वेद में ६३४)
ध्वनिसूचक संकेत अर्थात् वर्ण थे, परंतु पीछे से साधारण मनुष्यों एवं जैन और बौद्धों में, जिन-
का प्रारंभिक साहित्य प्राकृत में था, ४६ या ४७५ अक्षर व्यवहार में आते थे. ई. स. की चौथी
१. याज्ञवल्क्य के अनुसार उत्तर-भारत के यजुर्वेदी लोग संहितापाठ में टवर्ग के साथ के संयोग को छोड़ कर और
सर्वत्र ‘ष’ को ‘ख’ बोलते हैं, जैसे षष्ठी=खष्ठी; इसीसे मिथिला, बंगाल, पंजाब आदि के संस्कृतज्ञ तथा अन्य लोग
भी संस्कृत एवं ‘भाखा’ में बहुधा ‘ष’ को ‘ख’ बोलने लग गये. इसी वैदिक उच्चारण से प्राकृत में ‘क्ष’ के दो रूप छ (च्छ)
और ख (क्ख) हो गये.
२. वर्गों के पहिले चार वर्णों का जब किसी वर्ग के पांचवें वर्ण से संयोग होता है तब उस अनुनासिक वर्ण के पहिले
वैदिक काल में एक विलक्षण ध्वनि होती थी जिसे यम कहते थे, जैसे ‘पत्नी’ में ‘त्’ और ‘न्’ के बीच में. इस तरह बीस
यम होने चाहियें, परंतु प्रातिशाख्यों में तथा शिक्षाओं में चार ही यम माने हैं और उनके नाम या संकेत ‘कुँ’, ‘खुँ’, ‘गुँ’ और
‘घुं’ दिये हैं. इसका तात्पर्य यह है कि वर्गों के पहिले अक्षरों अर्थात् क, च, ट, त, प के संयोग से जो यम उत्पन्न होता
था वह ‘कु’ कहलाता था, और उसके लिये एक चिह्न नियत था. इसी तरह ख, छ, ठ, थ, फ के संयोग से उत्पन्न होने-
वाले यम के लिये ‘खु’ प्रकृति का चिह्न, ग, ज, ड, द, ब के संयोग से बने हुए यम के लिये ‘गु’ प्रकृति का कोई तीसरा
चिह्न, और घ, झ, ढ, ध, भ के संयोग से उद्धत यम के लिये ‘घ’ प्रकृति का कोई और चिह्न नियत था. ये चिह्न कैसे थे
इसका पता न तो शिलालेखादि में और न पुस्तकों में मिलता है, किंतु व्याकरणवाले इन यमों को क, ख, ग, घ से बतलाते
हैं, जैसे-
पत्नी= पत् ( मूल व्यंजन ) क् ( यम ) नी= पत्क्नी
सक्थ्ना= सक्थ ( ,, ,, ) ख् ( ,, ) ना= सक्थ्खना
अग्नि= अग् ( ,, ,, ) ग् ( ,, ) नि= अग्ग्नि
यज्ञ= •यज् ( ,, ,, ) ग् ( ,, ) ञ= यज्‌ग्ञ
गृभ्णामि= गृभ् ( ,, ,, ) घ् ( ,, ) णामि= गृभ्घ्णामि.
३. ऋग्वेद में २१ स्वर (‘लृ’ के दीर्घ और प्लुत को छोड़ने से), ४ अयोगवाह (अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय और
उपध्मानीय), २५ स्पर्श वर्ण (पांचों वर्गों के २५ और ‘ळ’ तथा ‘ळ्ह’), ४ अंतःस्थ, ४ ऊष्मन् और ४ यम, मिलकर ६४ वर्ण
होते हैं.
४. यजुर्वेद में वर्णसंख्या बहुधा ऋग्वेद के समान ही है, केवल ‘ळ’ और ‘ळ्ह’ का प्रयोग उसमें नहीं होता परंतु
उसमें अनुस्वार का ऴ रूप अलग होता है. इसीसे उसमें ६३ वर्ण काम में आते हैं.
५. जैनों के दृष्टिवाद में, जो लुप्त हो गया है, ब्राह्मी अक्षरों की संख्या ४६ मानी है, (वे; इं. स्ट, १६, २८१), जो अ,
आ, इ, ई, उ, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ, अं, अः, क, ख, ग, घ, ङ, च, छ, ज, झ, ञ, ट, ठ, ड, ढ, ण, त, थ, द, ध, न, प, फ, ब,
भ, म, य, र, ल, व, श, ष, स, ह और ळ (या क्ष) होने चाहिये. हुएन्त्सँग अक्षरों की संख्या ४७ बतलाता है (बी; बु. रे. वे.
घ; जिल्द १, पृ. ७८), जो 'अ' से 'ह' तक के ४५ अक्षर तो ऊपर लिखे अनुसार और बाकी के दो अक्षर 'क्ष' और 'ज्ञ'
होने चाहियें. बौद्ध और जैनों के प्राकृत ग्रंथों में ऋ, ॠ, लृ, ॡ इन चार स्वरों का प्रयोग नहीं है. प्राकृत साहित्य में इन-
की आवश्यकता ही नहीं रहती. जहां संस्कृत शब्द के प्रारंभ में 'ऋ' होता है वहां प्राकृत में 'रि' हो जाता है (ऋषभ=
रिसभ, ऋक्ष=रिच्छ या रिक्ख); और जहां व्यंजन के साथ 'ऋ' की मात्रा लगी होती है वहां 'ऋ' के स्थान में 'अ', 'इ'
या 'उ' हो जाता है (मृग=मग, तृषा=तिसा, सुर्वण=सुहंग; निभृत=निहुअ). ये चारों वर्ण (ऋ, ॠ, लृ, ॡ) अब भी
साधारण लोगों के व्यवहार में नहीं आते और प्रारंभिक पढ़ने वालों की 'बारखड़ी' (द्वादशाक्षरी) में भी इनको स्थान नहीं
मिलता. यह आरंभिक पठनशैली आधुनिक नहीं है, किंतु अशोक के समय अर्थात् ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी में भी
ऐसी ही थी, क्योंकि बुद्धगया के अशोक के समय के बने हुए महाबोधी मंदिर के पास बुद्ध के चंक्रम अर्थात् भ्रमणस्थान में
दोनों ओर ११, ११ स्तंभों की दो पंक्तियां हैं उन स्तंभों की कुंभियों (आधार) पर शिल्पियों ने एक एक करके 'अ' को छोड़ कर
'आ' से 'ह' तक के अक्षर खोदे हैं. उनमें भी ये चारों स्वर नहीं है. यद्यपि सामान्य लोगों के व्यवहार में ये चार वर्ण
नहीं आते थे तो भी वर्णमाला में उनको स्थान अवश्य मिलता था, क्योंकि जापान के होर्युजी नामक स्थान के बौद्ध
मठ में रक्खी हुई ई. स. की छठी शताब्दी की 'उष्णीषविजयधारणी' नामक ताड़पत्र पर लिखी हुई बौद्ध पुस्तक