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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 78, कुल 318 में से

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पृष्ठ 78

ब्राह्मी लिपि. ४६
अक्षरों में (लिपिपत्र ३) दिया गया है. 'ऐ', 'ए' के अग्रभाग के साथ बाईं ओर एक आड़ी लकीर जोड़ने
से बनता था जैसा कि हाथीगुंफा के लेख में मिलता है (देखो, लिपिपत्र ३). 'औ' का प्राचीन रूप
अशोक के लेखों में अथवा गुप्तों के समय के पूर्व के किसी लेख में नहीं मिलता. उसका अशोक के समय
का रूप ⅂ होना चाहिये. 'ङ' बुद्धगया के उपर्युक्त मंदिर के स्तंभ पर मिलता है जिसकी आ-
कृति [ है. 'ठ' का रूप बिलकुल वृत्त O है और वह देहली के सवालक स्तंभ पर के अशोक के लेख
में मिलता है (देखो, लिपिपत्र २). 'श' और 'ष' अशोक के खालसी के लेख में मिलते हैं (देखो,
लिपिपत्र २).
इस लेख में बहुतेरे अक्षरों के एक से अधिक रूप मिलते हैं. संभव है कि कुछ तो उस समय
भिन्न भिन्न रूप से लिखे जाते हों परंतु यह भी हो सकता है कि उक्त लेख का लेखक जैसे शुद्ध लिखना
नहीं जानता था वैसे ही बहुत सुंदर अक्षर लिखनेवाला भी न था; क्योंकि इस लेख की लिपि वैसी सुंदर
नहीं है जैसी कि अशोक के देहली के सवालक स्तंभ और पडेरिया (रुंमिंदेई) के स्तंभ के लेखों की है, और
जैसे उनमें अक्षर तथा स्वरों की मात्राओं के चिह्न एकसा मिलते हैं वैसे इस लेख में नहीं हैं. यह भी संभव
है कि लेखक सिद्धहस्त न हो और त्वरा से लिखता हो जिससे अक्षर एकसा नहीं लिख सका.
इसीसे कहीं सीधी खड़ी लकीर को तिरछा (देखो, उ, झ, न और प के दूसरे रूप) या गोलाईदार
(देखो, ग और फ के दूसरे रूप) कर दिया है और कहीं गोलाईदार को तिरछा (देखो, 'अ' का चौथा
रूप और 'घ' का तीसरा रूप) बना दिया है.
लिपिपत्र पहिले की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
इयं धंमलिपी देवानं प्रियेन प्रियदसिना राजा लेखा-
पिता इध न किंचि जीवं आरभित्या प्रजूहितव्यं न
च समाजो कतव्यो बहुकं हि दोसं समाजम्हि पसति
देवानं प्रियो प्रियदसि राजा अस्ति पि तु एकचा समा-
जा साधुमत्ता देवानं प्रियस प्रियदसिनो राज्ञो पुरा महा-
नसम्हि देवानं प्रियस प्रियदसिनो राज्ञो अनुदिवसं ब-
लिपिपत्र दूसरा.
यह लिपिपत्र देहली के सवालक स्तंभ¹, खालसी², जोगड³ और सिद्धापुर⁴ के चटानों तथा राधिआ⁵,
सारनाथ⁶ और सांची⁷ के स्तंभों पर खुदे हुए अशोक के लेखों के फोटों से बनाया गया है और इसमें
बहुधा वे ही अक्षर लिये गये हैं जिनमें लिपिपत्र पहिले के अक्षरों से या तो कुछ भिन्नता पाई जाती है
या जो लिपिपत्र पहिले में नहीं मिले. यह भिन्नता कुछ तो देशभेद से है और कुछ लेखक की
रुचि और त्वरा से हुई है.
देहली के सवालक स्तंभ के लेख की लिपि बड़ी सुंदर और जमी हुई है और वह सारा लेख
सावधानी के साथ लिखा गया है. उसमें 'आ' में 'आ' की मात्रा का चिह्न ऊपर नहीं किंतु मध्य में लगा
१. ई. ऍ; जि. १३. पृ. ३०६-१० के बीच के सेट. २. ऍ. इं; जि. २, पृ. ४५०-६० के बीच के सेट.
३. आ. स. स. इं; जि. १, सेट ६७-६६. ४. ऍ. इं; जि. ३, पृ. १३८-४० के बीच के सेट.
५. ऍ. इं; जि. २, पृ. २४८-४६ के बीच के सेट. ६. ऍ. इं; जि. ८, पृ. १६८ के पास का प्लेट.
७. ऍ. इं; जि. २, पृ. ३६६ के पास का प्लेट.