प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 82, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मी लिपि. ५३
इस लिपि में 'आ' की मात्रा का चिह्न बहुधा ⌉ है परंतु कहीं कहीं-कोण के स्थान में गोलाई
भी मिलती है (देखो, का, खा, ता). 'ऊ' की मात्रा में भी अशोक के लेखों से भिन्नता है (देखो,
जू, ब्रू, ब्रू) परंतु बाकी की मात्राओं में विशेष अंतर नहीं है. केवल कहीं कहीं सीधी लकीर को
तिरछा या गोलाईदार बना दिया है.
लिपिपत्र चौथे की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
¹कुरुपितुनेा च कुरुमातु च कुरुच च सिवका च स-
जुसं पणति फाल्लिग यमुन. ²ब बुधसरिगनं निखेतु.
³बलवपुतस कुरुश षपितुकप सजुम. ⁴उतारे पि-
गहपुतो काणीठो. ⁵अरहदिसानं गोठिया मजू-
स च पण्गो च तनकम येन कुबिरको राजा
अंकि. ⁶नेगमा वळो चद्यो जेतो जंधो तिसो रेतो
अचिन पभिका अखघो केलो केसो महे। सेटे। छदि-
लिपिपत्र पांचवां.
यह लिपिपत्र पभोसा के २ लेखों, मथुरा के छोटे छोटे ४ जैन लेखों तथा महाक्षत्रप शोडास के
मथुरा के लेख से तय्यार किया गया है. पभोसा के लेखों के अक्षरों में 'अ' की दाहिनी तरफ़ की
खड़ी लकीर को नीचे के छोर से बाईं तरफ मोड़कर ऊपर की ओर कुछ बढ़ा लिया है, जैसे कि ई. स.
की दूसरी शताब्दी से दक्षिण के लेखों में मिलता है. 'री' में 'ई' की मात्रा और 'पू' में 'ऊ'
की मात्रा में पहिले के लिपिपत्रों से भिन्नता है (देखो, 'री' और 'पू'). मथुरा के लेखों
में 'ख' और 'म