प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 81, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंसांची के लेख के 'ली' में 'ई' की मात्रा की दोनों खड़ी लकीरों को दाहिनी ओर झुकाया है.
हाथीगुंफा के लेख में अक्षरों के सिर बनाने का यत्न पाया जाता है परंतु वे वर्त्तमान नागरा अक्षरों
के सिरों जैसे लंबे नहीं किंतु बहुत छोटे हैं. ये सिरे पहिले पहिल इसी लेख में मिलते हैं. 'भि' और
और 'लिं' में 'इ' की मात्रा भरहुत स्तूप के उपर्युक्त 'वि' के साथ लगी हुई 'इ' की मात्रा के सदृश
है और 'दी' में 'ई' की मात्रा की दाहिनी ओर की खड़ी लकीर को भी वैसा ही रूप दिया है. 'ले' में
'ल' के अग्रभाग को दाहिनी ओर नीचे को झुकाया है और 'गो' में 'ओ' की मात्रा नानाघाट के
लेख के 'थो' के साथ की 'ओ' की मात्रा की नांई व्यंजन के ऊपर उसे स्पर्श किये बिना एक ही आड़ी
लकीर के रूप में धरी है.
लिपिपत्र तीसरे की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
१सुगनं रजे रञो गागीपुतस विसदेवस पौतेण गोति-
पुतस आगरजुस पुतेण वाछिपुतेन धनभूतिन
कारितं तोरनां(णं) सिलाकंमंता च उपंणा.
२धमंस नमो इंदस नमो संकंसनवासुदेवानं चं-
दस्स......मा...तानं चतुंनं चं लोकपालानं यमवरुन-
कुबेरवासवानं नमो कुमारवरस वेदिसिरिस र...
लिपिपत्र चौथा.
यह लिपिपत्र भट्टीप्रोलु के स्तूप से निकले हुए पत्थर के ३ पात्रों के ढक्कनों पर खुदे हुए ६
लेखों से तथा स्फटिक के एक छोटे से टुकड़े पर, जो वहीं से मिला था, खुदे हुए लेख से तय्यार किया
गया है.३ 'अ' से 'सं' तक के अक्षर उक्त नौ लेखों से और अंतिम ६ अक्षर ('ग' से 'हि' तक) स्फटिक
पर के लेख से लिये हैं, जिसकी लिपि पहिले तीन लिपिपत्रों की शैली की (ब्राह्मी) है. पाषाण के
पात्रों पर खुदे हुए ६ लेखों की लिपि में 'घ', 'द', 'भ', 'म', 'ल', 'ष' और 'ळ' इन ७ अक्षरों में पहिले
तीन लिपिपत्रों के अक्षरों से भिन्नता है (इन अक्षरों को लिपिपत्र १ से ३ तक के अक्षरों से मिलाकर
देखो). दूसरा भेद यह है कि प्रत्येक व्यंजन जब स्वरों की मात्रा से रहित होता है तब उसके साथ दाहिनी
ओर एक आड़ी लकीर लगाई गई है जैसे अशोक के लेखों में 'आ' की मात्रा लगाई जाती थी. यह
लकीर बहुधा व्यंजन के अग्रभाग से सटी रहती है परंतु कभी कभी कुछ नीचे की तरफ़ और कभी
मध्य में लगाई जाती है. 'ज' के साथ जब स्वर की कोई मात्रा नहीं होती तब वह अशोक के लेखों
के 'ज' के समान होता है (बीच की आड़ी लकीर स्वरचिह्नरहित दशा की है); परंतु जब उसके
साथ कोई स्वर की मात्रा लगी रहती है उस समय उसका रूप बहुधा [ मिलता है (देखो, जु, जू, जे, जं).
इन भेदों से पाया जाता है कि उक्त लेखों की लिपि पिप्रावा, बर्ली और अशोक के लेखों की लिपि से
नहीं निकली किंतु उस मूल लिपि से निकली होगी जिससे स्वयं पिप्रावा, बर्ली और अशोक के लेखों
की लिपि निकली है४. संभवतः यह द्रविड (द्राविडी) लिपि५ हो.
१. ये पहिली तीन पंक्तियां भरहुत के स्तूप के लेख से हैं (इं. ऐं.; जि. १४, पृ. १३६).
२. यहां से तीन पंक्तियां नानाघाट के लेख से हैं (आ. स. वे. इं; जि. ५, प्लेट ५१, लेख संख्या १).
३. ऐं. इं; जि. २, पृ. ३२८-२९ के बीच के प्लेट. ४. देखो ऊपर पृ. ४२.
५. भट्टीप्रोलु के उक्त ६ लेखों के अतिरिक्त इस शैली की लिपि (द्राविडी) का और कोई शिलालेख अब तक नहीं
मिला, परंतु आंध्रवंशी राजा गौतमपुत्र श्रीयज्ञशातकर्णी के एक प्रकार के सिक्के पर एक तरफ़ 'रञो गोतमिपुतस सिरियञ-