प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 87, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें५८ प्राचीनलिपिमाला.
अक्षरों में 'अ', 'क', 'र' आदि खड़ी लकीर वाले अक्षरों की तथा 'पु' में 'उ' की मात्रा की खड़ी
लकीर को लंबा कर नीचे के भाग में बाईं ओर ग्रंथि सी बना कर अक्षर में अधिक सुंदरता लाने का
यत्न स्पष्ट पाया जाता है.
लिपिपत्र ११ वें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर—
सिधं ओतराहस दांतामितियकस यणकस धंमदेवपुतस
इंद्राग्निदतस धंमात्मना इमं लेणं पवते तिरणहुम्हि खा-
नितं अभंतरं च लेणस चेतियघरो पोढियो च माता-
पितरो उदिस इम लेण कारितं सवबुधपुजाय चातुदि-
शस भिखुसंघस नियातितं सह पुतेन धंमरखितेन.
लिपिपत्र १२ वां.
यह लिपिपत्र अमरावती के कई एक लेखों¹ तथा जग्गयपेट के ३ लेखों² से तय्यार किया गया
है. अमरावती के लेखों के अक्षरों में 'इ' की तीन बिंदियों के स्थान में तीन आड़ी लकीरें बनाई हैं
इतना नहीं किंतु उनको वक्र भी बनाया है और 'जा' में 'आ' की मात्रा को नीचे की ओर झुकाया है.
जग्गयपेट के लेखों में 'अ', 'क', 'ञ' आदि अक्षरों की खड़ी लकीरों को नीचे की ओर बहुत बढ़ा
कर उनमें बाईं ओर घुमाव डाला है. और 'ल' की खड़ी लकीर को ऊपर की ओर बढ़ाकर घुमाया है, ऐसे
ही 'इ', 'ई' को और कहीं 'उ' की मात्राओं को भी; 'इ' के चिह्न की तीन बिंदियों के स्थान में अधिक
मुड़ी हुई लकीरें बनाई हैं. 'इ' के पहिले रूप की इन तीनों लकीरों को चलती कलम से जोड़ कर
लिखने से वर्तमान तामिळ लिपि के 'इ' का पूर्वरूप बन जाता है (देखो, लिपिपत्र ८४ में तामिळ
लिपि की उत्पत्ति में 'इ' का तीसरा रूप).
लिपिपत्र १२ वें की मूल पंक्तियों⁴ का नागरी अक्षरांतर—
सिधं। रञो (ञो) माढरिपुतस इखाकुना (णं) सिरिविरपुरिसदतस सं-
वछर २० वासापखं ६ दिवसं १० कमाकरथे णडतुरे
आवेनिस नाकचंदस पूतो गामे महाकांदूरुरे आवेसनि
सिधथो आपणो मातरं नागिलनिं पुरतो कातुनं घरनिं
लिपिपत्र १३ वां.
यह लिपिपत्र मोग्रिडवोलु से मिले हुए पल्लववंशी शिवस्कंदवर्मन् के दानपत्र⁵ से तय्यार किया
गया है. इसमें 'ए', 'ज', 'त', 'न', 'म' और 'स' अक्षर विलक्षण हैं. 'ए' की त्रिकोण
आकृति मिटकर नया रूप बना है जो त्वरा से लिखने के कारण ऐसा हुआ है. कलम उठाये बिना
ही 'त' को पूरा लिखने से उसके बीच में ग्रंथि बन गई है⁶. 'न' कार्ले के लेख में मिलनेवाले
१. ये मूल पंक्तियां इंद्राग्निदत्त के लेख से हैं (एं. इं; जि. ८, नासिक के लेखों का प्लेट ५, लेखसंख्या १८.)
२. आ. स. स. इं; जि. १, प्लेट ५६, लेखसंख्या १, १३, १६, १७, १८, ३०, ३१, ३८, ४०, ४१, ४५, ५३.
३. आ. स. स. इं; जि. १, प्लेट ६२, ६३, लेखसंख्या १-३.
४. ये मूल पंक्तियां आ. स. स. इं; प्लेट ६३, लेखसंख्या ३ से हैं.
५. ऎं. इं; जि. ६, पृ. ८४ से ८८ के बीच के ५ प्लेटों से.
६. 'त' का ऐसा ही रूप कन्हेरी के एक लेख में भी मिलता है (देखो, लिपिपत्र ११ में).
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