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प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 85, कुल 318 में से

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पृष्ठ 85

५६ प्राचीनलिपिमाला.
लिपिपत्र नवां.
यह लिपिपत्र वासिष्ठीपुत्र पुळुमायि आदि आंध्रवंशी राजाओं के नासिक के पास की गुफाओं के
७ लेखों १ से तय्यार किया गया है. वासिष्ठीपुत्र पुळुमायि के लेख में 'नु' के साथ की 'उ' की मात्रा के
अंत में एक आड़ी लकीर और लगी हुई है और 'ह्य' में 'य' को ऊपर और 'ह' को नीचे लिखा है जो
लेखकदोष है. गौतमीपुत्र यज्ञशातकर्णि के लेख में पहिले 'त' को बिना कलम उठाये ही पूरा
लिखा है जिससे उसकी आकृति मथुरा के लेखों के दूसरे 'न' (लिपिपत्र ६) से ठीक मिलती हुई है.
यह दोष अन्यत्र भी पाया जाता है.
'लिपिपत्र नवें की मूलपंक्तियों २ का नागरी अक्षरांतर—
सिद्धं (द्धं) रञो वासिठिपुतस सिरिपुळुमायिस संवछरे एकु-
नवीसे १० ९ गिम्हाण पखे वितीये २ दिवसे तेरसे
१० ३ राजरञो गोतमीपुतस हिमवतमेरुमंदरपवतस-
मसारस असिकअसकमूळकसुरठकुकुरापरांत अनूपविद-
भझाकरावतिराजस विंझछवतपारिचातसह्यकह्वगिरिमच-
लिपिपत्र दसवां.
यह लिपिपत्र पश्चिमी क्षत्रप ३, त्रैकूटक ४ तथा आंध्रवंशी ५ राजाओं के सिक्कों पर के लेखों से तय्यार
किया गया है. क्षत्रपों के छोटे सिक्कों पर लंबा लेख होने से कितने एक सिक्कों पर के कोई कोई अक्षर अधिक
सिकुड़ गये हैं जिससे उनकी आकृति स्पष्ट नहीं रही (देखो 'य' का तीसरा रूप; 'स' का दूसरा रूप;
'ह' का तीसरा, चौथा और पांचवां रूप; 'च' का पांचवां रूप; 'ज्ञ' का दूसरा रूप), और कहीं कहीं स्वरों
की मात्राएं भी अस्पष्ट होगई हैं. त्रैकूटकों के सिक्कों में 'न, व', 'ह', 'त्त', 'त्र', 'व्य' और 'ष्ण' के रूप
विलक्षण मिलते हैं. आंध्रों के सिक्कों के अक्षरों में से अंतिम तीन अक्षर ( ष, हा, हि ) उपर्युक्त गौतमीपुत्र
१ वासिष्ठीपुत्र पुळुमायि के ४ लेखों से—एं. इं; जि. ८,