सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 73, कुल 318 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 73

४४ प्राचीनलिपिमाला.
निकलीं. मद्रास इहाते के जिन हिस्सों में तामिळ लिपि का, जिसमें वर्णों की अपूर्णता के कारण
संस्कृत ग्रंथ लिखे नहीं जा सकते, प्रचार है वहां पर संस्कृत ग्रंथ इसी लिपि में लिखे जाते हैं इसीसे
इसका नाम 'ग्रंथलिपि' (संस्कृत ग्रंथों की लिपि) पड़ा हो ऐसा अनुमान होता है.
५. कलिंग लिपि—यह लिपि मद्रास इहाते में चिकाकोल और गंजाम के बीच के प्रदेश में वहां
के गंगवंशी राजाओं के दानपत्रों में ई. स. की ७ वीं से ११ वीं शताब्दी के पीछे तक मिलती है.
इसका सब से पहिला दानपत्र [गांगेय]संवत् ८७ का मिला है जो गंगवंशी राजा देवेंद्रवर्मन् का है.
उसकी लिपि मध्यदेशी लिपि से मिलती हुई है. अक्षरों के सिर संदूक की आकृति के, भीतर से
भरे हुए, हैं और अक्षर बहुधा समकोणवाले हैं (लिपिपत्र ५७ में दी हुई राजा देवेंद्रवर्मन् के दानपत्र
की लिपि को लिपिपत्र ४१ से मिला कर देखो); परंतु पिछले ताम्रपत्रों में अक्षर समकोणवाले नहीं,
किंतु गोलाई लिये हुए हैं और उनमें नागरी, तेलुगु-कनडी तथा ग्रंथलिपि का मिश्रण होता गया है.
६. तामिळलिपि—यह लिपि मद्रास इहाते के जिन हिस्सों में प्राचीन ग्रंथलिपि प्रचलित थी वहां
के, तथा उक्त इहाते के पश्चिमी तट अर्थात् मलवार प्रदेश के तामिळ भाषा के लेखों में ई. स. की
सातवीं शताब्दी से बराबर मिलती चली आती है. इस लिपि के अधिकतर अक्षर ग्रंथलिपि से
मिलते हुए हैं (लिपिपत्र ६० में दी हुई लिपि को लिपिपत्र ५२ और ५३ में दी हुई लिपियों से
मिला कर देखो); परंतु 'क', 'र' आदि कुछ अक्षर उत्तर की ब्राह्मी लिपि से लिये हुए हैं. इसका
रूपांतर होते होते वर्तमान तामिळलिपि बनी इस वास्ते इसका नाम तामिळ रक्खा गया है.
वट्टॆऴुत्तु—यह तामिळ लिपि का ही भेद है और इसे त्वरा से (घसीट) लिखी जाने वाली
तामिळ लिपि कह सकते हैं. इसका प्रचार मद्रास इहाते के पश्चिमी तट तथा सब से दक्षिणी
विभाग के ई. स. की ७ वीं से १४ वीं शताब्दी तक के लेखों तथा दानपत्रों में मिलता है परंतु
कुछ समय से इसका प्रचार नहीं रहा.
ब्राह्मी लिपि के वैदिक काल में ब्राह्मी लिपि के ध्वनिसूचक संकेत या अक्षर नीचे लिखे अनुसार
अक्षर. माने जाते थे—
स्वर. ह्रस्व. अ इ उ ऋ १ ऌ २
दीर्घ. आ ई ऊ ॠ [ॡ?]
प्लुत ३. आ ३ ई ३ ऊ ३ ॠ ३ [ॡ ३?]
संध्यक्षर. ए ऐ ओ औ
इनके प्लुत. ए ३ ऐ ३ ओ ३ औ ३

१. आज कल 'ऋ' और 'ऌ' का उच्चारण बहुधा सब लोग 'रि' और 'लि' के सदृश करते हैं. दक्षिण के कुछ
लोग 'रु' और 'लु' के से विलक्षण उच्चारण करते हैं और उत्तर-भारत के कितने एक वैदिक 'र्ॅ' और 'लॅ' के से उच्चा-
रण करते हैं; परंतु वास्तव में ये तीनों उच्चारण कल्पित ही हैं. 'ऋ' और 'ऌ', 'र' और 'ल' से स्वरमय उच्चारण थे
जो बिना किसी और स्वर की सहायता के होते थे, परंतु बहुत काल से वे लुप्त हो गये हैं. अब तो केवल उनके अक्षरसं-
केत रह गये हैं.
२. 'ऌ' स्वर वेद में केवल 'क्लृप्' धातु में मिलता है और संस्कृत साहित्य भर में उक्त धातु को छोड़ कर कहीं उसका
प्रयोग नहीं मिलता. वैयाकरणों ने तोतले बोलने वाले बच्चों के 'ऋ' के अशुद्ध उच्चारण के अनुकरण में इसे माना है, तो
भी इसके प्लुत का प्रयोग मानने को वे तय्यार नहीं हैं; क्योंकि इसका व्यवहार ही नहीं है. शुक्ल यजुर्वेद के प्रातिशाख्य में
अन्य स्वरों से समानता करने के लिये 'ऌ' के दीर्घ और प्लुत रूप माने हैं परंतु उनका प्रयोग कहीं नहीं मिलता. ह्रस्व
ऌकार वाले शब्द के कल्पित संबोधन में प्लुत 'ऌ ३' का होना वैयाकरण और कुछ शिक्षाकार मानते हैं, तो भी वास्तव में
'ऌ' केवल ह्रस्व ही है.
३. आज कल त्रिमात्रिक स्वर अर्थात् प्लुत के लिये दीर्घ स्वर के आगे ३ का अंक लगाते हैं परंतु यह रीति प्राचीन
नहीं जान पड़ती. दीर्घ स्वरों के लिये जैसे ह्रस्व के आगे २ का अंक नहीं लगाया जाता परंतु ब्राह्मी और वर्तमान नागरी में