प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 79, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ें५० प्राचीनलिपिमाला.
है. 'द' का मध्य भाग कहीं कहीं गोलाईदार नहीं किंतु समकोणवाला है. 'घ' को कहीं कहीं उलटा
भी लिखा है१. 'ज' के मध्य की दाहिनी तरफ़ की आडी लकीर को कुछ अधिक लंबा कर 'जा' बनाने
से 'ज' और 'जा' में भ्रम होने की संभावना रहती थी जिसको स्पष्ट करने के लिये ही लेखक ने 'ज' के
मध्य की लकीर के अंत में बिंदी बनाकर फिर 'आ' की मात्रा का चिह्न लगाया है. जिन अक्षरों का ऊपर
का भाग खडी लकीरवाला है उनके साथ 'ई' की मात्रा गिरनार के लेख की 'इ' की मात्रा के समान लगाई
है परंतु कुछ नीचे की तरफ़ से, जिससे 'ई' की मात्रा का रूप बन जाता है (देखो, 'पिं' और 'ली' में
'इ' और 'ई' की मात्राओं का भेद). अनुस्वार का चिह्न कहीं अक्षर के ऊपर परंतु विशेष कर आगे ही
धरा है (देखो, 'पिं' और 'भ्युं' )
खालसी के चटान के लेख की लिपि भद्दी है और त्वरा से लिखी हुई प्रतीत होती है जिससे अक्षर
सर्वत्र सम नहीं मिलते और स्वरों की मात्राओं में कहीं कहीं अंतर पड़ गया है (देखो, 'ता', 'शा', 'तु', 'खे',
'गे' और 'ले'). एक स्थान में 'ए' का रूप 'ठ' से मिल गया है. 'घ' और 'ल' का नीचे का भाग कहीं
कहीं गोल नहीं किंतु समकोणवाला बना दिया है (देखो, 'घ', और 'ल' का दूसरा रूप). 'छ' के
ऊपरी भाग में ∨ आकृति का सिर बना दिया है जिससे अनुमान होता है कि उस समय किसी किसी
लिपि में अक्षरों के सिर भी बनते हों, जिसका कुछ आभास भट्टिपोलु के लेखों में स्वरों की मात्रारहित
व्यंजनों में होता है. 'छ' का नीचे का भाग कलम को उठाये बिना ही (चलती कलम से) लिखा है. ऐसे
ही 'ज' को भी कहीं कहीं लिखा है जिससे बीच की आडी लकीर के स्थान में ग्रंथि हो गई है. अशोक
के लेखों में केवल एक यही लेख ऐसा है कि जिसमें 'श' और 'ष' के रूप मिलते हैं.
जोगड़ के लेख में 'ओ' उलटा लिखा है और एक स्थान में 'स' को चलती कलम से लिख दिया है
जिससे मध्य में गांठ बन गई है (जोगड के लेख के इस 'स' को गिरनार, सवालक स्तंभ और खालसी
के लेखों के 'स' से मिलाकर देखो).
सिद्धापुर के लेख में कहीं कहीं 'अ', 'फ', 'म' और 'र' की आकृतियां कुछ विलक्षण बनी हैं.
रधिआ के लेख में 'ड' के नीचे बिंदी बनाई है.
गिरनार के लेख और अशोक के अन्य लेखों के अक्षरों में कहां कहां अंतर है यह लिपिपत्र
दूसरे में दिये हुए अक्षरों को लिपिपत्र पहिले के अक्षरों से मिलाने से स्पष्ट हो जायगा. प्रत्येक अक्षर
की भिन्नता का विवेचन करने की आवश्यकता नहीं.
लिपिपत्र दूसरे की मूल पंक्तियों२ का नागरी अक्षरांतर―
देवानं पिये पियदसि लाज हेवं आहा सडुवीसति वस
अभिसितेन मे इयं धंमलिपि लिखापिता हिदतपालते
दुसंप्पटिपादये अंनत अगाया धंमकामताया अगाय
पलीखाया अगाय सुसूसाया अगेन भयेना अगेन उसा-
हेना एस चु खो मम अनुसथिया धंमापेखा धंमकां-
मता चा सुवे सुवे वढिता वढीसति चेवा पुलिसा पि
च मे उकसा चा गेवया चा मझिमा चा अनुविधियंती
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१. देखो ऊपर पृ. २७ का टिप्पण ६. २. ये मूल पंक्तियां देहली के सवालक स्तंभ के लेख से हैं.