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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 76, कुल 318 में से

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पृष्ठ 76

ब्राह्मी लिपि. ४७
शताब्दी के पीछे, लेखनशैली में अक्षरों के रूपों में परिवर्त्तन होते होते संयुक्ताक्षर 'क्ष' में 'क्'
और 'ष' के मूल रूप अस्पष्ट होकर उसका एक विलक्षण ही रूप 'क्ष' बन गया तब बौद्धों
ने 'क्ष' को भी वर्णों अर्थात् मातृकाओं (सिद्धमातृकाओं) में स्थान दिया. इसी तरह पीछे से
संयुक्ताक्षर 'ज्ञ' के 'ज्' और 'ञ' के रूप अस्पष्ट होकर उसका एक विलक्षण रूप 'ज्ञ' बन गया
तब उसको भी लोगों ने वर्णों में स्थान दिया. तंत्रग्रंथों में 'क्ष' और 'ज्ञ' की वर्णों अर्थात् मातृका-
ओं में संज्ञा की गई है परंतु ये दोनों सर्वथा वर्ण नहीं किंतु संयुक्तवर्ण हैं और उनके घटक दो दो
अक्षरों के मूलरूप न रहने पर एक ही विलक्षण नया संकेत बन जाने से ही उनकी वर्णों में गणना
हुई है जैसे कि वर्तमान काल में नागरी की वर्णमाला में 'त्र' की भी².
लिपिपत्र पहिला.
यह लिपिपत्र गिरनार पर्वत के पास के चट्टान पर खुदे हुए मौर्यवंशी राजा अशोक के लेख की
अपने हाथ से तय्यार की हुई छापों से बनाया गया है. यह लेख मौर्यराज्य के पश्चिमी विभाग का
होने से वहां की ब्राह्मी लिपि को प्रकट करता है. इसमें स्वरों की मात्राओं के चिह्न इस प्रकार
मिलते हैं-
'आ' की मात्रा एक छोटीसी आड़ी लकीर (-) है जो व्यंजन की दाहिनी तरफ बहुधा अक्षर
के ऊपर की ओर (देखो, खा, रा) परंतु कभी कभी मध्य में भी, (देखो, जा, मा, बा) लगाई जाती
है. 'ज' के साथ 'आ' की मात्रा का योग केवल 'ज' के मध्य की लकीर को कुछ अधिक लंबी कर
के बतलाया है जिससे कभी कभी 'ज' और 'जा' में भ्रम हो जाता है.
'इ' की मात्रा का नियत चिह्न ┘ है जो व्यंजन की दाहिनी ओर ऊपर की तरफ लगता है
(देखो, नि), परंतु कहीं कहीं समकोण के स्थान पर गोलाइदार या तिरछी लकीर भी मिलती है
(देखो, टि, लि).
'ई' की मात्रा का नियत चिह्न ╜ है, जो व्यंजन की दाहिनी ओर ऊपर की तरफ़ जोड़ा
जाता है (देखो, टी, ठी), परंतु कहीं कहीं आड़ी सीधी लकीर को तिरछा कर दिया है, और समकोण के
स्थान में गोलाई मिलती है (देखो, पी, मी); 'धी' बनाने में 'ध' के साथ केवल दो तिरछी लकीरें ही
लगा दी गई हैं.
अशोक के पूर्व के बर्ली गांव के लेख में 'वीराय' के 'वी' ६ अक्षर के साथ 'ई' की मात्रा
का चिह्न ( है, जो अशोक के समय में लुप्त हो चुका था और उसके स्थान में ऊपर लिखा हुआ
नया चिह्न बर्ताव में आने लग गया था (देखो, ऊपर पृष्ठ ३ और वहीं का टिप्पण २).
के अंत में जिस लेखक ने वह पुस्तक लिखी है उसीके हाथ की लिखी हुई उस समय की पूरी वर्णमाला है
जिसमें इन चार वर्णों को स्थान दिया गया है (देखो, लिपिपत्र १६). ऐसे ही हन्नाकोल से मिले हुए ई. स. की
१२ वीं शताब्दी के बौद्ध तांत्रिक शिलालेख में प्रत्येक वर्ण पर अनुस्वार लगा कर पूरी वर्णमाला के बीज बनाए हैं जिनमें
भी ये चारों वर्ण हैं (लिपिपत्र ३५) और उदयादित्य के समय के उज्जैन के शिलालेख के अंत में खुदी हुई पूरी वर्णमाला
में भी ये चारों वर्ण दिये हुए हैं (देखो लिपिपत्र २५).
२. वर्तमान 'त्र' में मूल घटक दोनों अक्षरों में से एक अर्थात् 'र' का चिह्न तो पहिचाना जाता है, परंतु 'त्' का
नहीं, किंतु 'क्ष' और 'ज्ञ' में दोनों ही के मूल अक्षरों का पता नहीं रहा. इतना ही नहीं, 'ज्ञ' में तो वास्तविक उच्चारण
भी नष्ट हो गया. दक्षिणी लोग कोई कोई इसे 'द्न्य' बोलते हैं (देखो बंबई के अंगरेजी पत्र ज्ञानप्रकाश का अंगरेज़ी
अक्षरांतर Dnan Prakash) और उत्तर में 'ज्ञ' का स्पष्ट 'ग्य' उच्चारण है, केवल कुछ संस्कृतज्ञ 'ज्ज्य' के सदृश उच्चारण
करते हैं. ऐसी दशा में जब इन संकेतों से मूल अक्षरों का भान नहीं होता तब उच्चारण और वर्णज्ञान की शुद्धि के लिये
इन्हें 'क्-ष' और 'ज्-ञ' लिखना और छापना ही उचित है.