प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 84, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मी लिपि. ५५
इसी लिपिपत्र के आधारभूत एक लेख में हलंत व्यंजन पहिले पहिल मिलता है, जिसको सिरों की पंक्ति
से नीचे लिखा है. इसके अतिरिक्त हलंत और स्वर व्यंजन में कोई अंतर नहीं है. 'भू' के साथ
की 'ऊ' की मात्रा नागरी की 'ऊ' की मात्रा से मिलती हुई है, 'र्णा' में 'आ' की मात्रा रेफ के साथ
लगाई है. और स्वरों की संधियां बहुधा नहीं की हैं.
लिपिपत्र सातवें की मूल पंक्तियों' का नागरी अक्षरांतर-
सिद्धम् राज्ञः क्षहरातस्य क्षत्रपस्य नहपानस्य जामा-
त्रा दीनीकपुत्रेण उषवदातेन त्रिगोशतसहस्रदेन न-
द्या(द्यां) बाणासायां सुवर्णदानतीर्थकरेण देवताभ्यः ब्राह्मणे-
भ्यश्च षोडशग्रामदेन अनुवर्षं ब्राह्मणशतसहस्री-
भोजापयित्रा प्रभासे पुण्यतीर्थे ब्राह्मणेभ्यः अष्टभार्याप्रदेन
भरुकच्छे दशपुरे गोवर्धने शोर्पारगे च चतुशालवसध-
प्रतिश्रयप्रदेन आरामतडागउदपानकरेण इबापारदादमण-
तापीकरबेणादाहनुकानावापुण्यतरकरेण एतासां च नदी-
लिपिपत्र आठवां.
यह लिपिपत्र उपर्युक्त अशोक के लेखवाले गिरनार के पास के चट्टान की पिछली तरफ़ खुदे
हुए महाक्षत्रप रुद्रदामन् के लेख की अपने हाथ से तय्यार की हुई छाप से बनाया गया है. यह लेख
शक संवत् ७२ (ई. स. १५०) से कुछ पीछे का है. इस लेख में 'पौ' के साथ जो 'औ' की मात्रा
जुड़ी है वह तो अशोक के लेखों की शैली से ही है और 'यौ' के साथ की मात्रा उसीका परि-
वर्तित रूप है जो पिछले लेखों में भी कुछ परिवर्तन के साथ मिल आता है, परंतु 'नौ' और 'मा'
के साथ जो 'औ' की मात्रा जुड़ी है वह न तो अशोक के लेखों में और न उनसे पिछले किसी लेख
में मिलती है अतएव संभव है कि वह चिह्न अशोक से पूर्व का हो. हलंत व्यंजन इसमें भी
पंक्ति से नीचे लिखा है.
लिपिपत्र आठवें की मूल पंक्तियों का नागरी अक्षरांतर-
परमलक्षणव्यंजनैरुपेतकान्तमूर्तिना स्वयमधिगतमहाक्षत्रप-
नाम्ना नरेंद्रकन्यास्वयंवरानेकमाल्यप्राप्तदाम्ना महाक्षत्रपेण
रुद्रदाम्ना वर्षसहस्राय गोब्रा......त्थं धर्मकीर्तिवृद्ध्यर्थं
च अपीडयित्वा करविष्टिप्रणयक्रियाभिः पौरजानपदं जनं
स्वस्मात्कोषा[त्] महता धनौघेन अनतिमहता च कालेन
त्रिगुणदृढतरविस्तारायामं सेतुं विधा...... सुदर्शनतरं
कारितमिति... स्मिन्नर्थे महाक्षत्रपस्य मतिसचिवकर्मसचिवै-
रमत्यगुणसमुद्युक्तैरप्यति महत्वाद्भेदस्यानुत्साहविमुखमतिभि-
१. ये मूल पंक्तियां ए. इं; जि. ८. प्लेट ४. लेख संख्या १० से हैं.
२. देखो, ऊपर पृ. ३, टिप्पण २.