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प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

भारतीय संवत्. १७५
राज्य का उदय हुआ जिसके अस्त होने के पीछे वहांवालों ने गुप्त संवत् का ही नाम 'वलभी
संवत्'१ रक्खा.
अल्बेरूनी लिखता है कि 'वलभीपुर के राजा वलभ२ के नाम से उसका संवत् वलभी संवत्
कहलाया. यह संवत् शक संवत् के २४१ वर्ष पीछे शुरू हुआ है. शक संवत् में से ६ का घन और
५ का वर्ग ( २१६+ २५=२४१ ) घटाने से वलभी संवत् रह जाता है. गुप्तकाल के विषय में लोगों
का कथन है कि गुप्त लोग दुष्ट [और] पराक्रमी थे और उनके नष्ट होने पर भी लोग उनका संवत्
लिखते रहे. अनुमान होता है कि वलभ उन (गुप्तों) में से अंतिम था क्यों कि वलभी संवत् की
नांई गुप्त संवत् का प्रारंभ भी शक काल से २४१ वर्ष पीछे होता है. श्रीहर्ष संवत् १४८८, विक्रम
संवत् १०८८, शककाल ९५३ और वलभी तथा गुप्तकाल ७१२ ये सब परस्पर समान हैं'३. इससे
विक्रम संवत् और गुप्तकाल का अंतर (१०८८-७१२=) ३७६ आता है अर्थात् गुप्त संवत् में ३७६ मिलाने
से चैत्रादि विक्रम संवत्, २४१ मिलाने से शक संवत् और ३१६-२० मिलाने से ई. स. आता है.
गुजरात के चौलुक्य अर्जुनदेव के समय के वेरावल (काठियावाड़ में) के एक शिलालेख में
रसूल महंमद संवत् (हिजरी सन्) ६६२, विक्रम संवत् १३२०, वलभी संवत् ९४५ और सिंह संवत्
१५१ आषाढ़ कृष्णा १३ रविवार लिखा है४. इस लेख के अनुसार विक्रम संवत् और वलभी (गुप्त)
संवत् के बीच का अंतर ( १३२०-९४५ = ) ३७५ आता है परंतु यह लेख काठियावाड़ का होने के
कारण इसका विक्रम संवत् १३२० कार्तिकादि५ है जो चैत्रादि १३२१ होता है जिससे चैत्रादि
विक्रम संवत् और गुप्त ( वलभी ) संवत् का अंतर ३७६ ही आता है जैसा कि ऊपर लिखा गया है.
चैत्रादि पूर्णिमांत विक्रम संवत् और गुप्त ( वलभी ) संवत् का अंतर सर्वदा ३७६ वर्ष का और
कार्तिकादि अमांत विक्रम संवत् और गुप्त ( वलभी ) संवत् का अंतर चैत्रशुक्ला १ से आश्विन
कृष्णा अमावास्या तक ३७५ वर्ष का और कार्तिक शुक्ला १ से फाल्गुन कृष्णा अमावास्या तक
३७६ वर्ष का रहता है.
गुप्त संवत् का प्रारंभ चैत्र शुक्ला १ से और महीने पूर्णिमांत हैं. इस संवत् के वर्ष बहुधा
गत लिखे मिलते हैं और जहां वर्तमान लिखा रहता है वहां एक वर्ष अधिक६ रहता है.


१. काठियावाड़ में गुप्त संवत् के स्थान में 'वलभी संवत्' लिखे जाने का पहिला उदाहरण ऊना गांव (जूनागढ़
राज्य में) से मिले हुए कन्नौज के प्रतिहार राजा महेंद्रपाल के चालुक्यवंशी सामंत बलवर्मन् के वलभी संवत् ५७४ (ई. स.
८६४) माघ शुद्ध ६ के दानपत्र में मिलता है (एं. इं; जि. ६, पृ. ६).
२. अल्बेरूनी ने 'वलभी संवत्' को वलभीपुर के राजा वलभ का चलाया हुआ माना है और उक्त राजा को गुप्त वंश
का अंतिम राजा बतलाया है परंतु ये दोनों कथन ठीक नहीं हैं क्योंकि उक्त संवत् के साथ जुड़ा हुआ 'वलभी' नाम उक्त
नगर का सूचक है न कि वहां के राजा का, और न गुप्त वंश का अंतिम राजा वलभ था. संभव है कि गुप्त संवत् के प्रारंभ से
७०० से अधिक वर्ष पीछे के लेखक अल्बेरूनी को 'वलभी संवत्' कहलाने का ठीक ठीक हाल मालूम न होने के कारण
उसने ऐसा लिख दिया हो अथवा उसको लोगों ने ऐसा ही कहा हो.
३. सा; अ. इं; जि. २, पृ. ७. फ़्ली; गु. इं; भूमिका, पृ. ३०-३१.
४. रसुलमहमदसवत् ६६२ तथा श्रीनृप[वि]क्रमसं १३२० तथा श्रीमद्वलभिसं ९४५ तथा श्रीसिंहसं १५१ वर्षे आषाढवदि १३ रखौ
( इं. ऐं; जि. ११, पृ. २४२ ).
५. वेरावल के उक्त लेख के विक्रम संवत् को कार्तिकादि मानने का यह भी कारण है कि उसमें लिखा हुआ हिजरी
सन् ६६२ चैत्रादि विक्रम संवत् १३२० मार्गशीर्ष शुक्ला २ को प्रारंभ हुआ था, अतएव हि. स. ६६२ में जो आषाढ़ मास आया
वह चैत्रादि वि. सं. १३२१ ( कार्तिकादि १३२०) का ही था.
६. खेड़ा से मिले हुए वलभी के राजा धरसेन (चौथे) के गुप्त संवत् ३३० के दानपत्र में उक्त संवत् में मार्गशिर मास
अधिक होना लिखा है ( सं. ३०० ३० द्विमागीशिरशु २. इं. ऐं. जि. १५, पृ. ३४० ). गत गुप्त संवत् ३३० गत विक्रम
संवत् ( ३३०+३७६= ) ७०६ के मुताबिक होता है. गत विक्रम संवत् ७०६ में कोई अधिक मास नहीं था परंतु वि. स. ७०५
में मध्यम मान से मार्गशिर मास अधिक आता है इस लिये उक्त ताम्रपत्र का गुप्त संवत् ३३० वर्तमान ( ३२९ गत ) होना
चाहिये.

१९१८ के पत्र में"!
Look at the second digit of 1918: it looks identical to the digit in line 18!
And 1918 is obviously ১৯১৮ / १९१८ (April 2, 1918)!
So that digit IS ९ (nine)!
Wait, why did I think it was ६? Because in this font, ९ is shaped like a reverse curve or modern 9: a curve, loop at top, or curved like 9!
Wait, in line 30, it is "ई. स. १९१८" (1918)!
Wait, what about line 15: "ई. स. ६६३"?
Wait! In line 15, is it "६६३" or "६६३"? The first two digits are ६, ६! They are shaped like ६.
In line 30: "१९१८" -> first digit is १, second is ९, third is १, fourth is ८!
So that second digit is ९!
And in line 18: "८७ और ९१ के" -> the digit in ९१ is identical to the ९ in १९१८!
So it is definitely ९१ (91)!
Wait, what about line 19: "ई. स. ६६३ ६ के"?
Wait, is line 15 "ई. स. ६६३" or "ई. स. ६६३"?
Wait, Indra-bhattaraka died in

भारतीय संवत्. १७७
ऐसा पाया नहीं जाता. इस लिये उपर्युक्त ई. स. ६६३ की घटना गांगेय संवत् ८७ से कुछ पूर्व
की होनी चाहिये. यदि ऊपर के दोनों अनुमान ठीक हों तो गांगेय संवत् का प्रारंभ ई. स.
(६६३-८७ =) ५७६ से कुछ पूर्व अर्थात् ई. स. ५७० के आस पास होना चाहिये, परंतु जब तक
अन्य प्रमाणों से इस संवत् के प्रारंभ का ठीक निर्णय न हो तब तक हमारा अनुमान किया हुआ
इस संवत् के प्रारंभ का यह सन् भी अनिश्चित ही समझना चाहिये.
गांगेय संवत्वाले दानपत्रों में सबसे पहिला गांगेय संवत् ८७ का और सबसे पिछला
३५१ का है. यह संवत् ३५० वर्ष से कुछ अधिक समय तक प्रचलित रह कर अस्त हो गया.
१२- हर्ष संवत्.
यह संवत् थानेश्वर के बैसवंशी राजा हर्ष (श्रीहर्ष, हर्षवर्द्धन, शीलादित्य) के राज्यसिंहासन
पर बैठने के समय से चला हुआ माना जाता है परंतु किसी लेख में इस संवत् के साथ हर्ष का नाम
जुड़ा हुआ अब तक नहीं मिला. स्वयं राजा हर्ष के दोनों दानपत्रों में भी केवल 'संवत्' ही लिखा है १.
अलबेरूनी लिखता है कि 'मैने कश्मीर के एक पंचांग में पढ़ा है कि श्रीहर्ष विक्रमादित्य से
६६४ वर्ष पीछे हुआ २. यदि अलबेरूनी के इस कथन का अर्थ ऐसा समझा जावे कि विक्रम संवत्
६६४ से हर्ष संवत् का प्रारंभ हुआ है तो हर्ष संवत् में ६६३ जोड़ने से विक्रम संवत् तथा ६०६-७
जोड़ने से ईसवी सन् होगा.
नेपाल के राजा अंशुवर्मन् के लेख में संवत् ३४ प्रथम पौष शुक्ला २ लिखा है ३. संभव है कि
उक्त लेख का संवत् हर्ष संवत् हो. केंब्रिज के प्रोफेसर ऐडम्स और विएना के डॉक्टर थाम ने हर्ष संवत्
० = ई. स. ६०६ (वि. सं. ६६३) मान कर गणित किया तो 'ब्रह्मसिद्धांत' के अनुसार ई. स. ६४०
अर्थात् वि. सं. ६६७ में पौष मास अधिक आता है ४. इससे भी वि. सं. और हर्ष संवत् के बीच का
अंतर (६६७-३४=) ६६३ तथा ई. स. और हर्ष संवत् का अंतर ६०६ आता है जैसा कि ऊपर बतलाया
गया है. यह संवत् बहुधा संयुक्त प्रदेश तथा नेपाल में करीब ३०० वर्ष प्रचलित रह कर अस्त हो गया.
अलबेरूनी ने विक्रम संवत् १०८८ के मुताबिक जिस श्रीहर्ष संवत् १४८८ का होना लिखा है
(देखो, ऊपर पृ. १७५) वह इस हर्ष संवत् से भिन्न होना चाहिये परंतु उसका प्रचलित होना किसी
शिलालेख, दानपत्र या पुस्तक से पाया नहीं जाता.
का एक होना अब तक कहीं लिखा नहीं मिला. दूसरी आपत्ति यह है कि उक्त दानपत्र में लिखे हुए राज्यवर्ष २० वें को
डॉ. फ्लीट ने उक्त सामंत का राज्यवर्ष मानकर उसके राज्य (शासन) का प्रारंभ शक संवत् (५३२-२०=) ५१२ अर्थात्
ई. स. ५६० से होना स्थिर कर वहीं से गांगेय संवत् का प्रारंभ मान लिया है, परंतु रेवती द्वीप मंगलीश्वर ने ही विजय
किया था (गौ; सो. प्रा. इ; पृ. २३) इस लिये उक्त दानपत्र का राज्यवर्ष उक्त सामंत का नहीं किंतु उसके स्वामी मंग-
लीश्वर का ही होना चाहिये जैसा कि डॉ० सर रामकृष्ण गोपाल भंडारकर का मानना है. तीसरी बात यह है कि उक्त
सामंत का कोंकण से गंजाम ज़िले में जाकर नवीन राज्य स्थापित करना मानने के लिये भी कोई प्रमाण नहीं मिलता. ऐसी
दशा में डॉ. फ्लीट का गांगेय संवत्संबंधी कथन स्वीकार नहीं किया जा सकता.
१. बांसखेड़ा से मिले हुए राजा हर्ष के दान पत्र में 'संवत् २० २ (=२२) कात्ति[क]वदि १' (एं. इं; जि ४, पृ. २११)
और मधुवन से मिले हुए दानपत्र में 'संवत् २० ५ (=२५) मार्गशीर्षवदि ६' (एं. इं; जि. १, पृ. ७२) लिखा है.
२. सा; अ. इं; जि. २, पृ. ५.
३. संवत् ३० ४ (=३४) प्रथमपौषशुक्लद्वितीयायाम् (की; लि. इं. नों. इं; पृ. ७३, लेखसंख्या ५३०).
४. इं. ऐं; जि. १५, पृ. ३३८.

१७८ प्राचीनलिपिमाला.
१३-भाटिक (भट्टिक) संवत्.
भाटिक (भट्टिकं) संवत् जैसलमेर के दो शिलालेखों में मिला है. भट्टि या भटिक (भाटी)
नामक राजा जैसलमेर के राजाओं का प्रसिद्ध पूर्वज था जिसके नाम से उसके वंशज भाटी कहलाये.
यह संवत् राजा भटिक (भाटी) का चलाया हुआ होना चाहिये१. जैसलमेर के लक्ष्मीनारायण के
मंदिर के शिलालेख में, जो वहां के राजा वैरिसिंह के समय का है, वि. सं. १४६४ और भाटिक संवत्
८१३ लिखा है२ जिससे वि. सं. और भाटिक संवत् का अंतर (१४६४-८१३=) ६८१ आता है. वहीं
के महादेव के मंदिर के लेख में, जो रावल भीमसिंह के समय का है, वि. सं. १६७३, शक संवत्
१५३८ और भाटिक संवत् ६६३ मार्गशीर्ष मास लिखा है३. इस हिसाब से वि. सं. और भाटिक
संवत् के बीच का अंतर (१६७३-६६३=) ६८० आता है. इन दोनों लेखों से पाया जाता है
कि भाटिक संवत् में ६८०-८१ मिलाने से विक्रम संवत् और ६२३-२४ मिलाने से ई. स.
आता है.
अभी तक जैसलमेर राज्य के प्राचीन लेखों की खोज बिलकुल नहीं हुई जिससे यह पाया
नहीं जाता कि कब से कब तक इस संवत् का प्रचार रहा.
१४-कोल्लम् (कोलंव) संवत्.
इस संवत् को संस्कृत लेखों में कोल्लंभ४ संवत् (वर्ष) और तमिळ में 'कोल्लम् आंडु'
(कोल्लम्=पश्चिमी, और आंडु=वर्ष) अर्थात् पश्चिमी [भारत का] संवत् लिखा है. यह संवत्
किसने और किस घटना की यादगार में चलाया इस विषय में कुछ भी लिखा हुआ नहीं मिलता.
इसके वर्षों को कभी 'कोल्लम् वर्ष' और कभी 'कोल्लम के उद्भव से वर्ष' लिखते हैं, जिससे
अनुमान होता है कि भारत के पश्चिमी तट पर के मलबार प्रदेश के कोल्लम् (किलोन, त्रावनकोर राज्य
१. चारण रामनाथ रत्नू ने अपने 'इतिहास राजस्थान' में भाटीजी (भट्टिक. भाटी) का समय वि. सं. ३३६-३५२
दिया है (पृ. २३२) जो सर्वथा मानने योग्य नहीं है. ऐसे ही भाटीजी और देवराज के बीच के राजाओं की नामावली एवं
देवराज का समय वि. सं. ६०४ से १०३० लिखा है (पृ. २३८) वह भी ठीक नहीं है, क्यों कि जोधपुर से मिले हुए प्रति-
हार बाउक के वि. सं. ८६४ के लेख से पाया जाता है कि भट्टिक (भाटी) देवराज को बाउक के पांचवें पूर्वपुरुष
शीलुक ने परास्त किया था (की; लि. इं. नों. इं; पृ. ४७, लेखसंख्या ३३०). बाउक वि. सं. ८६४ में विद्यमान था.
यदि बाउक से शीलुक तक (शीलुक, झोट, भिल्लादित्य, कक और बाउक) प्रत्येक राजा का राजत्वकाल औसत हिसाब
से २० वर्ष माना जावे तो शीलुक का वि. सं. ८१४ के आस पास विद्यमान होना स्थिर होता है और उसी समय
भट्टिक (भाटी) देवराज भी विद्यमान होना चाहिये. देवराज का ७ वां पूर्वपुरुष भट्टिक (भाटी) था (भाटी, मंगलराव,
मजमराव, केहर, तनो या तनुजी, विजयराज और देवराज-मेजर अर्रस्किन का जैसलमेर का गज़ेटिअर, पृ. ६-१०, और
टेबल संख्या ५). यदि इन राजाओं का राज्यसमय भी औसत हिसाब से २० वर्ष माना जावे तो भट्टिक (भाटी) की
गद्दीनशीनी का समय वि. सं. ६८० के करीब आ जाता है. इस लिये भाटिक (भट्टिक) संवत् को राजा भट्टिक का
चलाया हुआ मानने में कोई बाधा नहीं है, चाहे वह उक्त राजा के राज्याभिषेक से चला हो वा उस राजा ने अपने समय
की किसी अन्य घटना की यादगार में चलाया हो.
२. संवत् श्रीविक्रमार्कसमयातीतसंवत् १४६४ वर्षे भाटिके संवत् ८१३ प्रवर्तमाने महामांगल्य........चंद्रे (प्रो. श्रीधर आर.
भंडारकर की संस्कृत पुस्तकों की तलाश की ई. स. १९०४-५ और १९०५-६ की रिपोर्ट, पृ. ६५).
३. स्वस्ति श्रीनृपविक्रमादिता (त्य) समयातात (तीत) संवत् १६७३ रामाश्र्वभूपतौ वर्षे शाके १५३८ वसुरामशरैके प्रवृत्तमन (र्तमाने)
भाटिक ६६३ मार्ग (र्गि) शिर....(उपर्युक्त रिपोर्ट, पृ. ६८).
४. श्रीमत्कोलंभवर्षे भवति गुणखणिश्रेणिश्रादित्यवर्मा वञ्चीपालो (इं. पँ; जि. २, पृ. ३६०).
CC-0.Dwivedi Lok Hitkari Pustakalaya, Ghaziabad. Digitzed by eGangotri

भारतीय संवत्. १७६
में) नामक प्राचीन नगर से १, जिसको संस्कृत लेखक 'कोलंबपत्तन २' लिखते हैं, संबंध रखनेवाली
किसी घटना से यह संवत् चला हो ३. मलबार के लोग इस को 'परशुराम को संवत्' कहते हैं तथा
१००० वर्ष का चक्र, अर्थात् १००० वर्ष पूरे होने पर वर्ष फिर १ से प्रारंभ होना, मानते हैं और वर्तमान
चक्र को चौथा चक्र बतलाते हैं परंतु ई. स. १८२५ में इस संवत् या चक्र के १००० वर्ष पूरे हो जाने
पर फिर उन्होंने १ से वर्ष लिखना शुरू नहीं किया किंतु १००० से आगे लिखते चले जा रहे हैं जिससे
१. कोल्लम् (किलोन) एक प्राचीन नगर और बंदरगाह है. दक्षिणी भारत के पश्चिमी तट पर का व्योपार का
प्रसिद्ध स्थान होने के कारण पहिले मिसर, यूरप, अरब, चीन आदि के व्योपारी वहां माल खरीदने को आया करते थे.
ई. स. की ७वीं शताब्दी के नेस्टोरिअन पादरी जेसुजयस ने किलान का उल्लेख किया है. ई. स. ८५१ के अरब लेखक ने
'कोल्लम-मल्ल' नाम से इसका उल्लेख किया है (इंपीरिअल गज़ेटियर ऑफ़ इंडिया, जि. २१, पृ. २२).
२. बंबई गज़ेटिअर, जि. १, भाग १, पृ. १८२, टिप्पण १.
३. बर्नल लिखता है कि 'इस संवत् का ई. स. ८२४ के सेप्टेंबर से प्रारंभ हुआ है. ऐसा माना जाता है कि यह
कोल्लम (किलोन) की स्थापना की यादगार में चला है' (ब; सा. इं; पे; पृ. ७३), परंतु कोल्लम् शहर ई. स. ८२४ से
बहुत पुराना है और ई. स. की ७ वीं शताब्दी का लेखक उसका उल्लेख करता है (देखो, इसी पृष्ठ का टिप्पण १) इस
लिये ई. स. ८२४ में उसका बसाया जाना और उसकी यादगार में इस संवत् का चलाया जाना माना नहीं जा सकता.
ट्रावनकोर राज्य के आर्किआलॉजिकल सर्वे के सुपरिंटेंडेंट टी. ए. गोपीनाथ राव का अनुमान है कि ई. स. ८२५ में
मरुवान् सपीर ईशो नामक ईसाई व्यौपारी दूसरे ईसाइयों के साथ कोल्लम् में आया हो और उसकी यादगार में वहां के
राजा ने यह संवत् चलाया हो...... [ उस समय ] सारा मलबार देश वस्तुतः एक ही राजा के अधीन था और यदि उसने
आज्ञा दी हो कि मरुवान् सपीर ईशो के जहाज़ से कोल्लम् में उतरने के दिन से लोग अब [ नया ] संवत् गिना करें
तो सारे मलेनाडु (मलबार) के, जिसका वह शासक था, लोगों ने अवश्य उसे शिरोधार्य किया होगा' (ट्रा. आ. सी;
जि. २, पृ. ७६, ७८-७६; और ता० ८ फरवरी ई. स. १६१८ के पत्र के साथ गोपीनाथ राव का मेरे पास भेजा हुआ कोल्लम् संवत्
का वृत्तान्त). गोपीनाथ राव का यह कथन भी ठीक नहीं कहा जा सकता. उक्त कथन का सारा दारमदार कोट्टयं के
ईसाइयों के पास से मिले हुए वट्टेळुत्तु लिपि के ताम्रलेख हैं जिनसे पाया जाता है कि मरुवान् सपीर ईशो ने कोल्लम्
में तिरिस्सापळ्ळि (ईसाइयों का गिरजा) बनाया और [मलबार के राजा] स्थाणुरवि के राज्यसमय उसकी तरफ़ के
वहां के शासक अय्यंडिगळ् तिरुवडि ने राजमंत्री विजयराघवदेवर आदि की सलाह से उस गिरजे को कुछ भूमि दी
और उसकी सहायता के लिये वहां के कुछ कुटुंब भी उसके अधीन कर कुछ अधिकार भी दिये. उक्त ताम्रलेखों में
कोई संवत् नहीं है केवल राजा के राज्यवर्ष हैं. गोपीनाथ राव ने उनकी लिपि को ई. स. ८६० और ८७० के बीच की
अनुमान कर उसीपर से ई. स. ८२५ में मरुवान् सपीर ईशो के कोल्लम् में आने, स्थाणुरवि के समय उसकी अवस्था
७० या ७५ वर्ष की होने और उसके कोल्लम् आने की यादगार में मलबार के राजा के कोल्लम् संवत् चलाने की
कल्पना कर डाली परंतु न तो ई. स. ८२५ में मरुवान् सपीर ईशो के कोल्लम् में आने का प्रमाण है और न ई. स. ८६०
और ८७० के बीच स्थाणुरवि के विद्यमान होने का कोई सबूत है. तिल्लस्थानम् के लेख में स्थाणुरवि और राज-
केसरीवर्मन् के नाम हैं परंतु राजकेसरीवर्मन् को उक्त नाम का पहिला चोलवंशी राजा मानने के लिये भी कोई
प्रमाण नहीं है. चोलवंश में उस नाम के कई राजा हुए हैं. किसी लेख या ताम्रपत्र में कोई निश्चित संवत् न होने
की दशा में उसकी लिपि के आधार पर उसका कोई निश्चित समय मान लेना सर्वथा भ्रम ही है क्यों कि उसमें पचीस
पचास ही नहीं किंतु सौ दो सौ या उससे भी अधिक वर्षों की भूल होना बहुत संभव है. जैसे कि कोट्टयम् से ही
मिले हुए वट्टेळुत्तु और मलयाळम् लिपि के वीरराघव के दानपत्र को बर्नल ने ई. स. ७७४ का अनुमान किया था परंतु
तामिळ आदि दक्षिण की भाषाओं और वहां की प्राचीन लिपियों के प्रसिद्ध विद्वान् राय बहादुर वी. वेंकय्या ने उसी ताम्र-
पत्र का समय सप्रमाण ई. स. की १४ वीं शताब्दी बतलाया है (एं. इं; जि. ४, पृ. २६२). कोई ऐसा भी कहते हैं कि मलबार
के राजा चेरुमान् पेरुमाल ने अपना देश छोड़ कर मक्के को प्रस्थान किया तब से यह संवत् चला हो. 'तुहफ़तुलमुजाहिद्दीन'
नामक पुस्तक का कर्त्ता उसका हिजरी सन् २०० (ई. स. ८१५-१६) में मुसलमान होना बतलाता है. अरब के किनारे के
ज़फ़हार नामक स्थान में एक क़ब्र है जिसकोमलबार के अबदुर्रहमान सामिरी की क़ब्र बतलाते हैं और ऐसा भी कहते हैं
कि उसपर के लेख में चेरुमान् का हिजरी सन् २०२ में वहां पहुंचना और २१६ में मरना लिखा है (इं. पं; जि. ११, पृ. ११६
ड; क्रॉ. इं; पृ. ५४), परंतु मलबार गज़ेटिअर का कर्त्ता मि. इवेल लिखता है कि उक्त लेख का होना कभी प्रमाणित नहीं
हुआ (मलबार गज़ेटिअर, पृ. ४१). मलबार में तो यह प्रसिद्धि है कि चेरुमान् बौद्ध हो गया था (गोपीनाथ राव का
भेजा हुआ कोल्लम् संवत् का वृत्तांत), इस लिये चेरुमान् के मुसलमान हो जाने की बात पर विश्वास नहीं होता और यदि
ऐसा हुआ हो तो भी उस घटना से इस संवत् का चलना माना नहीं जा सकता क्यों कि कोई हिंदू राजा मुसलमान हो जावे
तो उसकी प्रजा और उसके कुटुंबी उसे बहुत ही घृणा की दृष्टि से देखेंगे और उसकी यादगार स्थिर रखने की कभी चेष्टा न

१८० प्राचीनलिपिमला.
इस संवत् को १००० वर्ष का चक्र मान नहीं सकते. वीर रवि रविवर्मन् के त्रिवेंद्रम् से मिले हुए
शिलालेख में कलियुग संवत् ४७०२ (वर्तमान=गत ४७०१) और कोल्लम् संवत् ७१६ दोनों लिखे हुए हैं
जिससे भी यही पाया जाता है कि गत कलियुग संवत् और कोल्लम् संवत् के बीच का अंतर
(४७०१-७१६ = ) ३९८५ है.
डॉ. कीलहॉर्न ने कोल्लम् संवत्वाले कई शिलालेखों में दिये हुए संवत्, संक्रांति, वार आदि
को गणित से जांच कर कोल्लम् संवत् में ८२४-२५ मिलाने से ई. स. होना निश्चय किया है
(ई. ऐँ; जि. २५, पृ. ५४) और दीवान बहादुर एल. डी. स्वामिकन्नु पिल्ले ने ई. स. में से ८२५
घटाने से कोल्लम् संवत् का बनना माना है (इंडियन क्रॉनॉलॉजी, पृ. ४३).
यह संवत् मलबार से कन्याकुमारी तक और तिन्नवेल्लि ज़िले में अब तक प्रचलित है.
उत्तरी मलबार में इसका प्रारंभ कन्या संक्रांति (सौर आश्विन) से और दक्षिणी मलबार तथा
तिन्नवेल्लि ज़िले में सिंह संक्रांति (सौर भाद्रपद) से होता है. इसका वर्ष सौर है और मलबार
में महीनों के नाम संक्रांतियों के नाम ही हैं; परंतु तिन्नवेल्लि ज़िले में उनके नाम चैत्रादि महीनों
के लौकिक रूप से हैं (चैत्र को 'चित्तिरै' या 'चित्तिरै' कहते हैं). वहां का सौर चैत्र मलबार-
वालों का 'मेष' है. इस संवत् के वर्ष बहुधा वर्तमान ही लिखे जाते हैं. इस संवत्वाला सब से पुराना
लेख कोल्लम् संवत् १४६² का मिला है.
१५-नेवार (नेपाल) संवत्.
डॉ. भगवानलाल इंद्रजी को नेपाल से जो वंशावली मिली उससे पाया जाता है कि
दूसरे ठाकुरी वंश के राजा अभयमल्ल के पुत्र जयदेवमल्ल³ ने नेवार संवत् चलाया. उसने कांति-
पुर और ललितपट्टन पर राज्य किया और उसके छोटे भाई आनंदमल्ल ने भक्तपुर (भाटगांव)
बसाया और वह वहीं रहा. इन दोनों भाइयों के समय कर्णाटकवंश को स्थापित करनेवाले नान्य-
देव ने दक्षिण से आकर नेपाल संवत् ६ या शक संवत् ८११ श्रावण शुदि ७ को समग्र देश (नेपाल)
करेंगे. कोई कोई ऐसा भी मानते हैं कि शंकराचार्य के स्वर्गवास से यह संवत् चला है (गोपीनाथ राव का भेजा हुआ
कोल्लम् संवत् का वृत्तांत). यदि शंकराचार्य का जन्म ई. स. ७८८ (विक्रम संवत् ८४५ = कलियुग संवत् ३८८६*) में और
देहांत ३२ वर्ष की अवस्था में (केरलौत्पत्ति के अनुसार) माना जावे तो उनका देहांत ई. स. (७८८+३२= ) ८२० में होना
स्थिर होता है. यह समय कोल्लम् संवत् के प्रारंभ के निकट आ जाता है परंतु ऐसा मानने के लिये मलबारवालों की
जनश्रुति के सिवाय कोई अन्य प्रमाण नहीं है. ऐसी दशा में यही कह सकते हैं कि यह संवत् किसने किस घटना की याद-
गार में चलाया यह अब तक अनिश्चित ही है.
१. दा. आ. सी; जि. २, पृ. २८. २. ऐं. इं; जि. ६, पृ. २३४.
३. डॉ. भगवानलाल इंद्रजी को मिली हुई नेपाल की वंशावली में जयदेवमल्ल का नेवार (नेपाल) संवत् चलाना
लिखा है परंतु जनरल कनिंगहाम लिखता है कि राजा राघवदेव ने ई. स. ८८० में नेपाल में यह संवत् प्रचलित किया (क;
ई; पृ. ७४). राघवदेव का नाम डॉ. भगवानलाल इंद्रजी की वंशावली तथा नेपाल के इतिहास के अंग्रेजी पुस्तकों में नहीं
मिलता परंतु नेपाल के राजा जयस्थितिमल्ल (ई. स. १३८०-१३६४) के समय की लिखी हुई वंशावली की पुस्तक में जो प्रो.
सेसिल बेंडाल को नेपाल से मिला, उक्त राजा का नाम मिलता है और नेपाल से मिले हुए हस्तलिखित संस्कृत पुस्तकों
के अंत में मिलनेवाले वहां के राजाओं के नाम और संवतों को देखते हुए राघवदेव का यह संवत् चलाना अधिक

  • शंकराचार्यप्रादुर्भावस्तु विक्रमार्कसमयादतीते पंचचत्वारिंशदधिकाष्टशतीमिते संवत्सरे केरलदेशे कालपीग्रामे....। तथा च संप्रदायविद
    आहुः । निधिनागेभवह्न्यब्दे विभवे मासि माधवे । शुक्रे तिथौ दशम्यां तु शंकरायोदयः स्मृतः ॥ इति ३८८६ । .... तथा च शंकरमंदारसौरभे
    नीलकंठभट्टा अपि एवमाहुः । प्रासूत तिष्यशरदाम् अतियातवत्याम् एकादशाधिकशतो ननवद्युतःसहस्र्याम् । ३८८६ । (यज्ञेश्वर शास्त्री का
    'आर्यविद्यासुधाकर' पृ. २२६, २२७).

भारतीय संवत्. १८१
विजय कर दोनों मल्लों ( जयदेवमल्ल और आनंदमल्ल ) को तिरहुत की तरफ़ निकाल दिया१.
इस कथन के अनुसार शक संवत् और नेवार संवत् के बीच का अंतर ( ८११-९= ) ८०२ और
विक्रम संवत् तथा नेवार संवत् के बीच का अंतर ( ९४६-९= ) ९३७ आता है.
नेपाल से मिले हुए दामोदर भट्ट रचित 'नवरत्नम्' नामक पुस्तक के अंत में शक संवत्
१६०७ मार्गशिर वदि अष्टमी, मघा नक्षत्र, सोमवार और नेपाल संवत् ८०६ लिखा है२. इसके
अनुसार शक संवत् और नेपाल संवत् के बीच का अंतर ( १६०७-८०६= ) ८०१ आता है.
डॉ. कीलहॉर्न ने नेपाल के शिलालेखों और पुस्तकों में इस संवत् के साथ दिये हुए मास,
पक्ष, तिथि, वार, नक्षत्र आदि को गणित से जांच कर ई. स. ८७९ तारीख २० अक्टोबर अर्थात् चैत्रादि
वि. सं. ९३६ कार्तिक शुक्ला १ से इस संवत् का प्रारंभ होना निश्चय किया है३. इससे गत नेपाल
संवत् में ८७८-७९ जोड़ने से ई. स

१८२ प्राचीनलिपिमला.
वर्तमान चालुक्य विक्रम संवत् का अंतर ११३२ तथा ई. स. और वर्तमान चालुक्य विक्रम संवत्
का अंतर १०७५-७६ आता है अर्थात् वर्तमान चालुक्य विक्रम संवत् में १०७५-७६ मिलाने से
ई. स. बनता है.
कुर्तंकोटि से मिले हुए लेख में चालुक्य विक्रमवर्ष ७ दुंदुभि संवत्सर पौष शुक्ला ३ रवि वार
उत्तरायण संक्रांति और व्यतीपात लिखा है१. दक्षिणी बार्हस्पत्य गणना के अनुसार दुंदुभि संवत्सर
शक-सं. १००४ था; इससे भी गत शक संवत् और वर्तमान चालुक्य विक्रम संवत् का अंतर (१००४-
७ = ) ९९७ आता है जैसा कि ऊपर बतलाया गया है.
इस संवत् का प्रारंभ चैत्रशुक्ला १ से माना जाता है. यह संवत् अनुमान १०० वर्ष चल-
कर अस्त हो गया. इसका सब से पिछला लेख चालुक्य विक्रम संवत् ९४ का मिला है.

१७—सिंह संवत्.
यह संवत् किसने चलाया यह अब तक निश्चित रूप से मालूम नहीं हुआ. कर्नल जेम्स
टॉड ने इसका नाम 'शिवसिंह संवत्' लिखा है और इसको दीव बेट (काठियावाड़ के दक्षिण में)
के गोहिलों का चलाया हुआ बतलाया है२. इससे तो इस संवत् का प्रवर्तक गोहिल शिवसिंह
मानना पड़ता है. भावनगर के भूतपूर्व दीवान विजयशंकर गौरीशंकर ओझा ने लिखा है कि
'श्रीसिंह का नाम पोरबंदर के एक लेख में मिल आता है जिसमें उसको सौराष्ट्र का मंडलेश्वर
लिखा है, परंतु पीछे से उसने अधिक प्रबल हो कर विक्रम संवत् ११७० (ई. स. १११४) से अपने
नाम का संवत चलाया हो ऐसा मालूम होता है'३; परंतु पोरबंदर का वह लेख अब तक प्रसिद्धि में
नहीं आया जिससे मंडलेश्वर सिंह के विषय में कुछ भी कहा नहीं जा सकता.
डॉ. भगवानलाल इंद्रजी का कथन है कि 'संभवतः ई. स. १११३-१११४ (वि. सं.
११६९-७०) में [ चौलुक्य ] जयसिंह (सिद्धराज) ने सोरठ (दक्षिणी काठियावाड़) के
[राजा] खेंगार को विजय कर अपने विजय की यादगार में यह संवत् चलाया हो'४. परंतु यह
कथन भी स्वीकार नहीं किया जा सकता क्यों कि प्रथम तो ई. स. १११३-१४ में ही जयसिंह के
खेंगार को विजय करने का कोई प्रमाण नहीं है. दूसरी आपत्ति यह है कि यदि जयसिंह ने यह
संवत् चलाया होता तो इसका नाम 'जयसिंह संवत' होना चाहिये था न कि सिंह संवत
क्यों कि संवतों के साथ उनके प्रवर्तकों के पूरे नाम ही जुड़े रहते हैं. तीसरी बात यह है कि यदि
यह संवत् जयसिंह ने चलाया होता तो इसकी प्रवृत्ति के पीछे के उसके एवं उसके वंशजों के शिला-
लेखों तथा दानपत्रों में मुख्य संवत् यही होना चाहिये था परंतु ऐसा न होना यही बतलाता है कि
यह संवत् जयसिंह का चलाया हुआ नहीं है. काठियावाड़ से बाहर इस संवत् का कहीं प्रचार
न ५ होना भी यही साबित करता है कि यह संवत् काठियावाड़ के सिंह नाम के किसी राजा ने

१. इं. ऐं.; जि. २२, पृ. १०६. २. इं. ऐं.; जि. ६, पृ. ६७-८.
३. कर्नल जेम्स टॉड का 'ट्रेव्हल्स इन् वेस्टर्न इंडिया', पृ. ५०६ और टिप्पण †.
४. 'भावनगर प्राचीन शोध संग्रह,' भाग १, पृ. ४-५ (गुजराती) ; अंग्रेज़ी अनुवाद, पृ. २-३.
५. बंब. गै.; जि. १, भाग १, पृ. १७६.
६. गुजरात के चौलुक्य (सोलंकी) राजा भीमदेव के दानपत्र में, जिसमें कच्छ मंडल (कच्छ राज्य) के सहस्रचाण
गांव की कुछ भूमि दान करने का उल्लेख है, केवल 'संवत् ९३' लिखा है जिसको उसके संपादक डॉ. फ़्लीट ने सिंह संवत्
अनुमान कर उक्त दानपत्र को विक्रम संवत् १२६२ या १२६३ का माना और चौलुक्य भीमदेव (दूसरे) का, जिसने वि. सं.
१२३५ से १२९८ तक राज्य किया था, ठहरा दिया (इं. ऐं.; जि. १८, पृ. १०८-६); परंतु ऐसा करने में उक्त विद्वान् ने धोखा खाया
है क्योंकि न तो वह दानपत्र भीमदेव (दूसरे) का है और न उसका संवत ९३ सिंह संवत् है जैसा कि माना गया है. वास्तव
में वह दानपत्र चौलुक्य (सोलंकी) भीमदेव (पहिले) का है और उसका संवत् वि. सं. १०६३ है परंतु शताब्दियों के अंक

भारतीय संवत्. १८३
चलाया होगा जिसका नाम इसके साथ जुड़ा हुआ है और जैसा कि विजयशंकर गौरीशंकर ओझा
का अनुमान है.
मांगरोल की सोढडी वाव (बावडी) के लेख में विक्रम संवत् १२०२ और सिंह संवत् ३२
आश्विन वदि १३ सोम वार लिखा है' जिससे विक्रम संवत् और सिंह संवत् के बीच का अंतर
१२०२-३२ = ) ११७० आता है. इस हिसाब से ई. स. में से १११३-१४ घटाने से सिंह संवत् होगा.
चौतुक्य राजा भीमदेव (दूसरे) के दानपत्र में वि. सं. १२६६ और सिंह संवत् ६६ मार्गशिर
शुदि १४ गुरु वार लिखा है. इससे भी वि. सं. और सिंह संवत् के बीच का अंतर (१२६६-६६= )
११७० आता है जैसा कि ऊपर बतलाया गया है.
चौलुक्य अर्जुनदेव के समय के उपर्युक्त वेरावल के ४ संवत्‌वाले शिलालेख में वि. सं.
१३२० और सिंह संवत् १५१ आषाढ कृष्णा १३ लिखा है. उक्त लेख का विक्रम संवत् १३२०


(१०) छोड़ कर केवल ऊपर के ही अंक लिखे गये हैं. ऐसा मानने का कारण यह है कि उक्त दानपत्र के छपने से १२ वर्ष पहिले
डॉ. बूलर ने चौलुक्य भीमदेव (पहिले) का वि. सं. १०८६ कार्तिक शुदि १५ का दानपत्र प्रसिद्ध किया (एं. इं; जि. ६,
पृ. १६३-४) जिसमें उसका लेखक कायस्थ कांचन का पुत्र वटेश्वर और दूतक महासांधिविग्रहिक चंडशर्मा होना लिखा है.
डॉ. फ़्लीट के प्रसिद्ध किये हुए संवत् ६३वाले दानपत्र का लेखक भी वही कायस्थ कांचन का पुत्र वटेश्वर और दूतक वही
महासांधिविग्रहिक चंडशर्मा है इस लिये ये दोनों दानपत्र एक ही राजा के हैं यह निश्चित है. ऐसी दशा में डॉ. फ़्लीटवाले
दानपत्र का संवत् ६३ विक्रम संवत् १०६३ ही है न कि १२६२ या १२६३. शिलालेख और दानपत्रों के संवतों में कभी कभी
शताब्दियों के अंकों को छोड़ कर केवल ऊपर के ही अंक दिये हुए मिलते हैं जो विद्वानों को चक्कर में डाल देते हैं.
देवदत्त रामकृष्ण भंडारकर ने कोटा राज्य के अटू नामक स्थान से मिले हुए महाराजाधिराज जयसिंह के लेख में
'संवत् १४' खुदा हुआ होने से लिखा है कि 'यदि यह जयसिंह चौलुक्य सिद्धराज जयसिंह है और संवत् १४ उसका
चलाया हुआ संवत् [अर्थात् सिंह संवत्, जिसको जयसिंह का चलाया हुआ मान लिया है] है तो उस [लेख] का समय
ई. स. ११२८ [वि. सं. ११८५] आता है. उक्त लेख का जयसिंह कोई दूसरा जयसिंह हो सकता है परंतु वह उक्त नाम के
चौलुक्य राजा से पहिले का नहीं हो सकता क्यों कि अक्षरों पर से उक्त लेख का [ई. स. की] १२वीं शताब्दी से पहिले का
होना पाया नहीं जाता' (प्रो. रि. आ. स. वे. इं; ई. स. १९०३-४, पृ. ४८). अटू के लेख का संवत् भी सिंह संवत् १४ नहीं
किंतु वि. सं. १३१४ होना चाहिये जिसमें भी शताब्दियों के अंक छोड़ दिये गये हैं. वह लेख या तो मालवे के महाराजाधिराज
जयसिंह दूसरे (जयतुंगिदेव) का, जिसके समय का राहटगढ़ का लेख वि. सं. १३१२ भाद्रपद शुदि ७ (की; लि. इं. नां.
इं; पृ. २२, लेखसंख्या २२३) का मिला है, या उसके छोटे भाई जयवर्मन् का, जिसका दानपत्र वि. सं. १३१७ का मिला है
(ऍ. इं; जि. ६, पृ १२०-२३), होना चाहिये. कोटा और झालावाड़ के इलाके पहिले मालवे के परमारों के अधीन थे,
जिनके लेख ई. स. की ११वीं से १३वीं शताब्दी के वहां पर मिलते हैं. ऐसे ही उक्त विद्वान् ने जोधपुर राज्य के सेवाड़ी गांव
से मिले हुए कटुराज के समय के एक लेख का संवत् ३१ पढ़ा है और उसको सिंह संवत् मान कर विक्रम संवत् १२०० में
कटुराज का नाडोल का राजा होना माना है तथा उक्त कटुराज को चाहमान (चौहान) अश्वराज (आशाराज) का पुत्र
कटुकराज बतलाया है (ऍ. इं; जि. ११, पृ. ३४, ६६). वह लेख बहुत बिगड़ी हुई दशा में है इस लिये उसके शुद्ध पढ़े जाने के
विषय में हमें शंका ही है. यदि उसका संवत् वास्तव में ३१ हो तो भी वह सिंह संवत् नहीं किंतु वि. सं. १२३१ होना चाहिये,
क्यों कि नाडोल के चौहान के लेखों में कहीं सिंह संवत् नहीं है. अश्वराज के पुत्र कटुकराज के सेवाड़ी के दूसरे लेख में
वि. सं. ११९२ (ऍ. इं; जि. ११, पृ. ३१-३२) ही लिखा है और वि. सं. ११८६ से १२०२ तक के कई शिलालेख चौहान
राजा रायपाल के समय के नाडोल और नारलाई से मिले हैं (ऍ. इं; जि. ११, पृ. ३४-४३.) जिनसे पाया जाता है कि वि. सं.
११८६ से १२०२ तक नाडोल का राजा रायपाल था न कि कटुराज. ऐसी दशा में सिंह संवत् ३१ (वि. सं. १२००) में
कटुराज का नाडोल का राजा होना संभव नहीं हो सकता. काठियावाड़ से संबंध न रखनेवाले लेखों में सिंह संवत्
मानने की चेष्टा करने के केवल उपर्युक्त तीन ही उदाहरण अब तक मिले हैं जिनमें से एक में भी सिंह संवत् नहीं किंतु
शताब्दियों के अंकसहित वि. सं. के ही वर्ष हैं.


१ श्रीमद्विक्रमसंवत् १२०२ तथा श्रीसिंहसंवत् ३२ आश्विनवदि १३ सोमे (भावनगर प्राचीन शोध संग्रह, भाग १, पृ. ७).
२ श्रीविक्रमसंवत् १२६६ वर्षे श्रीसिंहसंवत् ६६ वर्षे लौकि मार्ग शुदि १४ गुरा० (इं. पँ; जि. १८, पृ. १১২).
३. देखो, ऊपर पृ. १७५ और उसीका टिप्पण ४.

१८४ प्राचीनलिपिरमाला.
कार्त्तिकादि¹ है इस लिये चैत्रादि और आषाढादि १३२१ होगा जिससे विक्रम संवत् और सिंह संवत्
के बीच का अंतर (१३२१-१५१= ) ११७० ही आता है.
इस संवत्‌वाले थोड़े से शिलालेख काठियावाड़ से ही मिले हैं और चौलुक्य भीमदेव
(दूसरे) के उपर्युक्त वि. सं. १२६६ के दानपत्र में विक्रम संवत् के साथ सिंह संवत् दिया है
जिसका कारण यही है कि वह दानपत्र काठियावाड़ में दान की हुई भूमि के संबंध का है. इस
संवत् का प्रारंभ आषाढ़ शुक्ला १ (अमांत) से है और इसका सब से पिछला लेख सिंह संवत् १५१
का मिला है.

१८-लक्ष्मणसेन संवत्.
यह संवत् बंगाल के सेनवंशी राजा बल्लालसेन के पुत्र लक्ष्मणसेन के राज्याभिषेक (जन्म)²
से चला हुआ माना जाता है.

१. देखो, ऊपर पृ. १७५ और उसी का टिप्पण ५.
२. ई. स. ११९८-६६ के आसपास (ई. पै., जि. १६, पृ. ७) देहली के गुलाम सुलतान कुतुबुद्दीन ऐबक के समय
बख्तियार खिलजी ने नदिया पर चढ़ाई कर उसे ले लिया और वहां का राजा लक्ष्मणसेन भाग गया. इस चढ़ाई का
वृत्तांत मिनहाज उस्सिराज (जन्म ई. स. ११९३-देहांत ई. स १२६५ के पीछे) ने 'तबकात-इ-नासिरी' नामक इतिहास के
पुस्तक में इस तरह लिखा है कि 'राय लखमणिया (लक्ष्मणसेन) गर्भ में था उस वक्त उसका पिता मर गया था.
उसकी माता का देहांत प्रसववेदना से हुआ और लखमणिया जन्मते ही गद्दी पर बिठलाया गया. उसने ८० वर्ष राज्य
किया' (तबकात-इ-नासिरी का अंग्रेज़ी अनुवाद; मेजर रावार्टी का किया हुआ; पृ. ५५४). लक्ष्मणसेन संवत् का प्रारंभ
ई. स. १११६ में हुआ जैसा कि आगे लिखा गया है, इस लिये बख्तियार खिलजी की लक्ष्मणसेन पर की नदिया की चढ़ाई
लक्ष्मणसेन संवत् (११८६-१११६=) ८० में हुई, जब कि लक्ष्मणसेन की उम्र ८० वर्ष की थी और उतने ही वर्ष उसको राज्य
करते हुए थे.
'लघुभारत' नामक संस्कृत पुस्तक में लिखा है कि परंपरागत जनश्रुति से यह प्रवाद सुनने में आता है कि बल्लाल
(बल्लालसेन, लक्ष्मणसेन का पिता) मिथिला की चढ़ाई में मर गया. जब ऐसा संवाद फैला उसी समय विक्रमपुर में लक्ष्मण
का जन्म हुआ' (प्रवादः श्रूयते चात्र पारम्परीयावार्त्तया। मिथिले युद्धयात्रायां वल्लालोभून्मृतत्वनिः ॥ तदानीं विक्रमपुरे लक्ष्मणो जातवानसौ।
लघुभारत, खण्ड २; ज. ए. सो. बंगा; ई. स. १८६६). यह कथन मिनहाज की सुनी हुई बात से मिलता जुलता ही है
परंतु इससे पाया जाता है कि लक्ष्मणसेन का जन्म हुआ उस समय बल्लालसेन के मिथिला में मर जाने की खाली अफ़वाह
ही उड़ी थी. संभव है कि इस अफ़वाह के उड़ने से विक्रमपुर में लक्ष्मणसेन गद्दी पर बिठला दिया गया हो और उसके
जन्म की खबर पाने पर बल्लालसेन ने मिथिला में रहते समय पुत्रजन्म की खुशी में यह संवत् चलाया हो. बल्लाल-
सेन ने शक संवत् १०६१ (ई. स. ११६६) में 'दानसागर' नामक ग्रंथ रचा (निखिलचक्रतिलकश्रीमद्वल्लालसेनेन । पूर्णे शशि-
नवदशमिते शकवर्षे दानसागरो रचितः ॥ दानसागर; ज. ए. सो. बंगा; ई. स. १८६६, भाग १, पृ. २३). डॉ. राजेंद्रलाल
मित्र ने बंगाल के सेनवंशी राजाओं के समय का निर्णय करने में दानसागर की सहायता ली और उसकी रचना का
श्लोक भी टिप्पण में उद्धृत किया (पूर्णे शशिनवदशमिते शकाब्दे-ज. ए. सो. बंगा; ई. स. १८६५, पृ. १३७) परंतु उसका
अनुवाद करने में गलती की और शक संवत् १०६१ के स्थानपर १०१६ (ई. स. १०६७) लिख कर बल्लालसेन का समय
ई. स. १०५६ से ११०६ तक मान लिया जो ठीक नहीं है.
बल्लालसेनरचित 'अद्भुतसागर' नामक बड़े ग्रंथ के प्रारंभ की भूमिका में लिखा है कि 'गौडेंद्र (बल्लालसेन) ने शक
संवत् १०६० (ई. स. ११६८) में 'अद्भुतसागर' का प्रारंभ किया परंतु उसके समाप्त होने के पूर्व ही उसने अपने पुत्र (लक्ष्मणसेन)
को राज्यसिंहासन पर बिठलाया और अपने ग्रंथ को पूर्ण करने का भार उस पर डाला. फिर गंगा में अपने दान के जल के प्रवाह
से यमुना का संगम बना कर अपनी स्त्री सहित स्वर्ग को गया (अर्थात् डूब मरा) और लक्ष्मणसेन के उद्योग
से 'अद्भुतसागर' पूर्ण हुआ' (शाके खनवखेन्द्वब्दे आरेभेऽद्भुतसागरं । गौड़ेन्द्रकुञ्जरालांनस्तम्भाहुर्र्महीपतिः ॥ ग्रन्थेऽस्मिन्नसमाप्त एव
तनयं साम्राज्यलक्ष्माहदीक्षापर्वेणि दीक्षगान्निजकृते निष्पत्तिमभ्यर्थ्य सः । नानादानचिताम्बुसंचलनतः सूर्यात्मजासंगमं गङ्गायां विरचय्य निर्ज-
रपुरं भार्य्यानुयातो गतः ॥ श्रीमल्लक्ष्मणसेनभूपतिरतिश्लाघ्यो यदुद्योगतो निष्पन्नोऽद्भुतसागरः कृतिरसौ बल्लालभूमीभुजः। अद्भुतसागर).
यदि लक्ष्मणसेन के जन्मसमय (ई. स. १११६ में) बल्लालसेन की अवस्था २० वर्ष की मानें तो अद्भुतसागर के प्रारंभ के

अबुलफ़ज़ल ने 'अकबरनामे' में, तारीख इलाही के प्रसंग में लिखा है कि 'बंग (बंगाल) में
लछमनसेन (लक्ष्मणसेन) के राज्य के प्रारंभ से संवत् गिना जाता है. उस समय से अब तक
४६५ वर्ष हुए हैं. गुजरात और दक्षिण में शालिवाहन का संवत् है जिसके इस समय १५०६ और
मालवा तथा देहली आदि में विक्रम का संवत् चलता है जिसके १६४१ वर्ष व्यतीत हुए १ हैं'.
इससे शक संवत् और लक्ष्मणसेन संवत् के बीच का अंतर (१५०६-४६५ = ) १०४१ आता है.
डॉ. राजेंद्रलाल मित्र को मिले हुए 'स्मृतितत्त्वामृत' नामक हस्तलिखित पुस्तक के अंत में
'ल. सं. ५०५ शाके १५४६' लिखा है २. इससे भी शक संवत् और लक्ष्मणसेन संवत् के बीच का
अंतर (१५४६-५०५ = ) १०४१ आता है जैसा कि अबुलफ़ज़ल ने लिखा है.
नेपाल से मिले हुए 'नरपतिजयचर्या टीका' (स्वरोदयदीपिका) नामक हस्तलिखित पुस्तक के
अंत में शाके १५३६ ल सं ४६४ लिखा है ३. यदि यह शक संव

१८६ प्राचीनलिपिमाला!
चलाथा. वह बहुत दिन तक चलता रहा और अब सिर्फ मिथिला में कहीं कहीं लिखा जाता है.'
ई. स. १७१८ में डॉ. राजेंद्रलाल मित्र ने लिखा कि 'तिरहुत के पंडित इसका प्रारंभ माघ
शुक्ला १ से मानते हैं. इसका प्रारंभ ई. स. ११०६ के जनवरी (वि. सं. ११६२ = श. सं. १०२७) से
होना चाहिये'².
इन पिछले तीनों अवतरणों के अनुसार शक संवत् और लक्ष्मणसेन संवत् के बीच का अंतर
१०२८ या उसके करीब आता है. मिथिला देश के पंचांगों में विक्रम, शक और लक्ष्मणसेन संवत्
तीनों लिखे जाते हैं परंतु उनमें शक संवत् और लक्ष्मणसेन संवत् के बीच का अंतर एकसा नहीं
मिलता किंतु लक्ष्मणसेन संवत् १ शक संवत् १०२६-२७, १०२७-२८, १०२६-३० और १०३०-३१
के मुताबिक आता है³.
डॉ. कीलहॉर्न ने एक शिलालेख और पांच हस्तलिखित पुस्तकों में लक्ष्मणसेन संवत् के साथ
दिये हुए मास, पक्ष, तिथि और वार को गणित से जांच कर देखा तो मालूम हुआ कि गत शक
संवत् १०२८ मार्गशिर सुदि १ (ई. स. ११०६ तारीख २६ अक्टोबर) को इस संवत् का पहिला दिन
अर्थात् प्रारंभ मान कर गणित किया जावे तो उन ६ में से ५ तिथियों के वार ठीक मिलते हैं⁴ परंतु
गत शक संवत् १०४१ अमांत कार्तिक शुक्ला १ (ई. स. १११६ तारीख ७ अक्टोबर) को इस संवत् का
पहिला दिन मान कर गणित किया जावे तो छहों तिथियों के वार मिल जाते हैं⁵. ऐसी दशा में
अबुलफ़ज़ल का कथन ही ठीक है. इस हिसाब से लक्ष्मणसेन संवत् में १०४०-४१ जोड़ने से गत
शक संवत्, ११७५-७६ जोड़ने से गत चैत्रादि विक्रम संवत् और १११८-१६ जोड़ने से ईसवी सन् होगा.
यह संवत् पहिले बंगाल, बिहार और मिथिला में प्रचलित था और अब मिथिला में इसका
कुछ कुछ प्रचार है, जहां इसका प्रारंभ माघ शुक्ला १ से माना जाता है.
१६-पुडुवैप्पु संवत्.
ई. स. १३४१ में कोचीन के उत्तर में एक टापू (१३ मील लंबा और १ मील चौड़ा) समुद्र में
से निकल आया, जिसे 'बौपीन' कहते हैं, उसकी यादगार में वहां पर एक नया संवत् चला जिस-
को पुडुवैप्पु (पुडु=नई; वेपु=आबादी; मलयाळम् भाषा में) कहते हैं⁶. कोचीन राज्य और डच ईस्ट
इंडिया कंपनी के बीच जो संधि हुई वह तांबे के ५ पत्रों पर खुदी हुई मिली है जिसमें पुडुवेप्पु संवत्
३२२; १४ मीनम् (मीन संक्रांति का १४ वां दिन = ई. स. १६६३ तारीख २२ मार्च) लिखा है⁶.
यह संवत् कोचीन राज्य में कुछ कुछ चलता रहा परंतु अब उसका प्रचार पाया नहीं जाता.
२०-राज्याभिषेक संवत्.
राज्याभिषेक संवत्, जिसको दक्षिणी लोग 'राज्याभिषेक शक' या 'राजशक' कहते हैं,
मराठा राज्य के संस्थापक प्रसिद्ध शिवाजी के राज्याभिषेक के दिन अर्थात् गत शक संवत् १५६६
(गत चैत्रादि वि. सं. १७३१) आनंद संवत्सर ज्येष्ठ शुक्ला १३ (तारीख ६ जून ई. स. १६७४) से
१. ज. प; सो. बंगा; जि. ४७, भाग १, पृ. ३६८. २. क; इं. ई; पृ. ७६.
३. इं. पँ.; जि. १६, पृ. ५. ४. इं. पँ.; जि. १६, पृ. ६. ५. द्रा. आ. सी; जि. १, पृ. २८-२६.
६. द्रा. आ. सी; जि. १, पृ. २६.

दक्षिणी लिपियाँ, अंक-पद्धति, संवत्-गणना, गुप्त-कूटलिपि व लिपिमाला उपसंहार

भारतीय संवत्. १८७
चला था. इसका वर्ष ज्येष्ठ शुक्ला १३ से पलटता था और वर्तमान ही लिखा जाता था. इसका
प्रचार मराठों के राज्य में रहा परंतु अब यह लिखा नहीं जाता.
२१—बार्हस्पत्य संवत्सर ( १२ वर्ष का ).
यह बार्हस्पत्य संवत्सर १२ वर्ष का चक्र है और इसका संबंध बृहस्पति की गति से है.
इसके वर्षों के नाम कार्तिकादि १२ महीनों के अनुसार हैं परंतु कभी कभी महीनों के नाम के पहिले
‘महा’ लगाया जाता है जैसे कि 'महाचैत', 'महावैशाख' आदि.
सूर्य समीप आने से बृहस्पति अस्त हो कर जब सूर्य उससे आगे निकल जाता है तब
( २५ से ३१ दिन के बाद ) जिस नक्षत्र पर फिर वह (बृहस्पति) उदय होता है उस नक्षत्र के अनुसार
संवत्सर (वर्ष) का नाम नीचे लिखे क्रम से रक्खा जाता है—
कृत्तिका या रोहिणी पर उदय हो तो महाकार्तिक (कार्तिक); मृगशिर या आर्द्रा पर
महामार्गशीर्ष (मार्गशीर्ष); पुनर्वसु या पुष्य पर महापौष; अश्लेषा या मघा पर महामाघ;
पूर्वाफाल्गुनी, उत्तराफाल्गुनी या हस्त पर महाफाल्गुन; चित्रा या स्वाति पर महाचैत्र; विशाखा या
अनुराधा पर महावैशाख; ज्येष्ठा या मूल पर महाज्येष्ठ; पूर्वाषाढा या उत्तराषाढा पर महाआषाढ;
श्रवण या धनिष्ठा पर महाश्रावण; शतभिषा, पूर्वाभाद्रपदा या उत्तराभाद्रपदा पर महाभाद्रपद और
रेवती, अश्विनी या भरणी पर उदय हो तो महाआश्वयुज (आश्विन) संवत्सर कहलाता है¹. इस चक्र
में १२ वर्षों में एक संवत्सर क्षय² हो जाता हैं. प्राचीन शिलालेख और दानपत्रों में बार्हस्पत्य
संवत्सर दिये हुए मिलते हैं,³ जो सब ई. स. की ७ वीं शताब्दी के पूर्व के हैं. उसके पीछे इस
का प्रचार सामान्य व्यवहार से उठ गया और केवल पंचांगों में वर्ष का नाम⁴ बतलाने में ही रह
गया जो अब तक चला जाता है.
२२-बार्हस्पत्य संवत्सर ( ६० वर्ष का ).
यह बार्हस्पत्य संवत्सर ६० वर्ष का चक्र है. इसमें वर्षों की संख्या नहीं किंतु १ से ६० तक
के नियत नाम ही लिखे जाते हैं. मध्यम मान से बृहस्पति के एक राशि पर रहने के समय को
‘बार्हस्पत्य संवत्सर' (वर्ष) कहते हैं⁵ जो ३६१ दिन, २ घड़ी और ५ पल का होता है, और सौर
१. नक्षत्रेण सहोदयमुपगच्छति येन देवपतिमन्त्री । तत्संज्ञं वक्तव्यं वर्ष मासक्रमेणैव ॥ वर्षाणि कार्तिकादीन्याग्नेयाद्द्वयद्वयानुयोगीनि ।
क्रमशस्त्रिभं तु पञ्चममुपान्त्यमन्त्यं च यद्वर्षम् ॥ (वाराही संहिता; अध्याय ८, श्लोक १-२).
२. १२ सौर वर्षों में ११ बार गुरु अस्त होकर फिर उदय होता है इसलिये १२ वर्ष में एक बार्हस्पत्य संवत्सर क्षय हो
जाता है. जैसे कि पं. श्रीधर शिवलाल के वि. सं. १६६५ के पंचांग में 'वर्षनाम पौष' लिखा है परंतु १६६६ के पंचांग में
'वर्षनाम फाल्गुन' लिखा है जिससे माघ (महामाघ) संवत्सर क्षय हो गया.
३. भरतपुर राज्य के कोट नामक गांव से मिले हुए शिलालेख में 'महाचैत्र' संवत्सर (रि. रा. म्यु अ; ई. स. १६१६-
१७, पृ. २), परिव्राजक महाराज हस्तिन् के गुप्त संवत् १६३ (ई. स. ४८२-८३) के दानपत्र में 'महाआश्वयुज' संवत्सर
(त्रिषष्ट्युत्तरेऽब्दशते गुप्तनृपराज्यभुक्तौ महाश्वयुजसंवत्स(त्त्स)रे चैत्रमासशुक्लपक्षद्वितीयायाम्—की; गु. इं; पृ. १०२) और कदंबवंशी
राजा मृगेशवर्मन् के राज्यवर्ष तीसरे के दानपत्र में 'पौष' संवत्सर—श्रीमृगेशवर्म्मा आत्मनः राज्यस्य तृतीये वर्षे पौषे संवत्सरे कार्त्ति-
कमासबहुलपक्षे दशम्यां तिथौ (इं. ऐं; जि. ७, पृ. ३५) आदि.
४. पं. श्रीधर शिवलाल के वि. सं. १६७४ के पंचांग में 'वर्षनाम आश्विन' और १६७५ के पंचांग में 'वर्षनाम कार्तिक'
लिखा है. ये वर्षनाम १२ बरसवाले बार्हस्पत्य संवत्सर के ही हैं.
५. बृहस्पतेर्मध्यमराशिभोगात्संवत्सरं सांहितिका वदन्ति (भास्कराचार्य का 'सिद्धांतशिरोमणि १।३०).
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१८८ प्राचीनलिपिमाला.
वर्ष ३६५ दिन, १५ घड़ी, ३१ पल और ३० विपल का होता है, अतएव बार्हस्पत्य संवत्सर सौर
वर्ष से ४ दिन, १३ घड़ी और २६ पल के करीब छोटा होता है जिससे प्रति ८५ वर्ष में एक संवत्सर
क्षय हो जाता है. इस चक्र के ६० वर्षों के नाम ये हैं—
१ प्रभव, २ विभव, ३ शुक्ल, ४ प्रमोद, ५ प्रजापति, ६ अंगिरा, ७ श्रीमुख, ८ भाव, ९ युवा,
१० धाता, ११ ईश्वर, १२ बहुधान्य, १३ प्रमाथी, १४ विक्रम, १५ वृष, १६ चित्रभानु, १७ सुभानु,
१८ तारण, १९ पार्थिव, २० व्यय, २१ सर्वजित्, २२ सर्वधारी, २३ विरोधी, २४ विकृति, २५ खर,
२६ नंदन, २७ विजय, २८ जय, २९ मन्मथ, ३० दुर्मुख, ३१ हेमलंब, ३२ विलंबी, ३३ विकारी,
३४ शार्वरी, ३५ प्लव, ३६ शुभकृत्, ३७ शोभन, ३८ क्रोधी, ३९ विश्वावसु, ४० पराभव, ४१ प्लवंग,
४

भारतीय संवत्. १८६
उत्तरी हिंदुस्तान के शिलालेखादि में बार्हस्पत्य संवत्सर लिखे जाने के उदाहरण बहुत ही
कम मिलते हैं परंतु दक्षिण में इसका प्रचार अधिकता के साथ मिलता है. लेखादि में इसका
सबसे पहिला उदाहरण दक्षिण के चालुक्य (सोलंकी) राजा मंगलेश (ई. स. ५६१-६१०) के समय
के बादामी (महाकूट) के स्तंभ पर के लेख में मिलता है जिसमें 'सिद्धार्थ' संवत्सर लिखा है १.
२३—ग्रहपरिवृत्ति संवत्सर.
ग्रहपरिवृत्ति संवत्सर ६० वर्ष का चक्र है जिसके ६० वर्ष पूरे होने पर फिर वर्ष १ से लिखना
शुरू करते हैं. इसका प्रचार बहुधा मद्रास इहाते के मदुरा जिले में है. इसका प्रारंभ वर्तमान कलियुग
संवत् ३०७६ (ई. स. पूर्व २४) से होना बतलाते हैं. वर्तमान कलियुग संवत् में ७२ जोड़ कर ६०
का भाग देने से जो बचे वह उक्त चक्र का वर्तमान वर्ष होता है; अथवा वर्तमान शक संवत् में ११
जोड़ कर ६० का भाग देने से जो बचे वह वर्तमान संवत्सर होता है. इसमें सप्तर्षि संवत् की नांई
वर्षों की संख्या ही लिखी जाती है.
२४—सौर वर्ष.
सूर्य के मेष से मीन तक १२ राशियों के भोग के समय को सौर वर्ष कहते हैं. सौर वर्ष बहुधा
३६५ दिन, १५ घड़ी, ३१ पल और ३० विपल का माना जाता है २ (इसमें कुछ कुछ मत भेद भी
है). सौर वर्ष के १२ हिस्से किये जाते हैं जिनको सौर मास कहते हैं. सूर्य के एक राशि से
दूसरी में प्रवेश को संक्रांति (मेष से मीन तक) कहते हैं. हिंदुओं के पंचांगों में मास, पक्ष और तिथि
आदि की गणना तो चांद्र है परंतु संक्रांतियों का हिसाब सौर है. बंगाल, पंजाब आदि उत्तर के
पहाड़ी प्रदेशों तथा दक्षिण के उन हिस्सों में, जहां कोल्लम् संवत् का प्रचार है, बहुधा सौर वर्ष ही
व्यवहार में आता है. कहीं महीनों के नाम संक्रांतियों के नाम ही हैं और कहीं चैत्रादि नामों का
प्रचार है. जहां चैत्रादि का व्यवहार है वहां मेष को वैशाख, वृष को ज्येष्ठ आदि कहते हैं. सौर मान
के मासों में १ से २६, ३०, ३१ या ३२ तक दिनों का ही व्यवहार होता है, तिथियों का नहीं. बंगालवाले
संक्रांति के दूसरे दिन से पहिला दिन गिनते हैं और पंजाब आदि उत्तरी प्रदेशों में यदि संक्रांति का
प्रवेश दिन में हो तो उसी दिन को और रात्रि में हो तो दूसरे दिन को पहिला दिन (जैसे
मेषार्कभुक्तदिन १, मेषगते १, मेषप्रविष्टे १) मानते हैं.
२५—चांद्र वर्ष.
दो चांद्र पक्ष का एक चांद्र मास होता है. उत्तरी हिंदुस्तान में कृष्णा १ से शुक्ला १५ तक
(पूर्णिमांत) और नर्मदा से दक्षिण में शुक्ला १ से अमावास्या तक (अमांत ३) एक चांद्र मास माना
उदाहरण—शक संवत् १८४० में बार्हस्पत्य संवत्सर कौनसा होगा?
१८४०+१२=१८५२, १८५२/६० = ३०, शेष ५२; इसलिये वर्तमान संवत्सर ५२ वां कालयुक्त. गत शक संवत् १८४०=गत
कलियुग संवत् (१८४०+३१७६ = ) ५०१६, ५०१६+१२= ५०२८, ५०२८/६० = ८३, शेष ४८ गत संवत्सर; इस लिये वर्तमान = ४९
वां कालयुक्त संवत्सर.
१. उत्तरोत्तरप्रवर्द्धमानराज्य........वर्षेऽप्रवर्त्तमाने सिद्धार्थे वैशाखपौर्णमास्याम् (ई. पॅ; जि. १६, पृ. १८ के पास का प्लेट).
२. मूल सूर्यसिद्धांत के अनुसार (पंचसिद्धान्तिका).
३. मूल गणना अमांत हो ऐसा प्रतीत होता है. उत्तरी भारतवालों के वर्ष का एवं अधिमास का प्रारंभ शुक्ला १ से
होना तथा अमावास्या के लिये ३० का अंक लिखना यही बतलाता है कि पहिले मास भी वर्ष की तरह शुक्ला १ से प्रारंभ
हो कर अमावस्या को समाप्त होता होगा.
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१६० प्राचीनलिपिसमाला.
जाता है. ऐसे १२ चांद्र मास का एक चांद्र वर्ष कहलाता है. चांद्र वर्ष ३५४ दिन, २२ घड़ी, १ पल
और २४ विपल के करीब होता है१. हिंदुओं के पंचांगों में मास, पक्ष, तिथि आदि चांद्र मान से ही
हैं. चांद्र वर्ष सौर वर्ष से १० दिन, ५३ घड़ी, ३० पल और ६ विपल छोटा होता है. सौर मान
और चांद्र मान में करीब ३२ महीनों में १ महीने का अंतर पड़ जाता है. हिंदुओं के यहां
शुद्ध चांद्र वर्ष नहीं किंतु चांद्रसौर है और चांद्र मासों तथा ऋतुओं का संबंध बना रखने तथा
चांद्र को सौर मान से मिलाने के लिये ही जिस चांद्र मास में कोई संक्रांति न हो उसको अधिक (मल)
मांस और जिस चांद्र मास में दो संक्रांति हों उसको क्षय मास मानने की रीति निकाली है. हिंदूमात्र के
श्राद्ध, व्रत आदि धर्म कार्य तिथियों के हिसाब से ही होते हैं इस लिये बंगाल आदि में जहां जहां सौर
वर्ष का प्रचार है वहां भी धर्मकार्यों के लिये चांद्र मान की तिथियों आदि का व्यवहार करना ही पड़ता है.
इसीसे वहां के पंचांगों में सौर दिनों के साथ चांद्र मास, पक्ष, तिथियां आदि भी लिखी रहती हैं.
२६-हिजरी सन्.
हिजरी सन् का प्रारंभ मुसलमान धर्म के प्रवर्तक पैगंबर मुहम्मद साहब के मक्के से भाग कर
मदीने को कूच करने के दिन से माना जाता है. अरबी में 'हिजर' धातु का अर्थ 'अलग होना',
'छोड़ना' आदि है इसी लिये इस सन् को हिजरी सन् कहते हैं. प्रारंभ से ही इस सन् का प्रचार
नहीं हुआ किंतु मुसलमान होनेवालों में पहिले पैगंबर के कामों के नामों से वर्ष बतलाये जाते थे जैसे कि
पहिले वर्ष को 'यर्जन' अर्थात् 'आज्ञा' (मक्के से मदीना जाने की) का वर्ष, दूसरे को हुक्म का वर्ष
(उस वर्ष में मुसलमान न होनेवालों से लड़ने का हुक्म होना माना जाता है) आदि. ख़लीफा
उमर (ई. स. ६३४ से ६४४ तक) के समय यमन के हाकिम अबूमुसा अशअरी ने खलीफा को
अर्जी भेजी कि दरगाह से (श्रीमन् के यहां से) शाबान् महीने की लिखी हुई लिखावटें आई हैं परंतु
उनसे यह मालूम नहीं होता कि कौनसा (किस वर्ष का) शाबान है? इस पर ख़लीफा ने कोई
सन् नियत करने के लिये विद्वानों की संमति ली और अंत में यह निश्चय हुआ कि पैगंबर के मक्का
छोड़ने के समय से (अर्थात् तारीख १५ जुलाई ई. स. ६२२=वि. सं ६७९ श्रावण शुक्ला २ की
शाम से) इस सन् का प्रारंभ माना जावे२. यह निश्चय हि. स. १७ में होना माना जाता है३.
हिजरी सन् का वर्ष शुद्ध चांद्र वर्ष है. इसके प्रत्येक मास का प्रारंभ चंद्रदर्शन (हिंदुओं के प्रत्येक
मास की शुक्ला २) से होता है और दूसरे चंद्रदर्शन तक मास माना जाता है. प्रत्येक तारीख सायंकाल
से प्रारंभ हो कर दूसरे दिन के सायंकाल तक मानी जाती है. इसके १२ महीनों के नाम ये हैं-
१ मुहर्रम, २ सफ़र, ३ रबीउल् अव्वल, ४ रबीउल् आखिर या रबी उस् सानी, ५ जमादिउल्
अव्वल, ६ जमादिउल् आखिर या जमादि उस्सानी, ७ रजब, ८ शाबान, ६ रमज़ान, १० शव्वाल, ११
ज़िल्काद और १२ ज़िलहिज्ज. चांद्र मास २६ दिन, ३१ घड़ी, ५० पल और ७ विपल के करीब होने
से चांद्र वर्ष सौर वर्ष से १० दिन, ५३ घड़ी, ३० पल और ६ विपल के करीब कम होता है. तारीख १५
जुलाई ई. स. १६२२ (वि. सं. १६७६ श्रावण कृष्णा ६) की शाम को इस सन् को प्रारंभ हुए
१३०० सौर वर्ष होंगे. उस समय हिजरी सन् १३४० तारीख २० ज़िल्काद का प्रारंभ होगा अत एव
१३०० सौर वर्षों में ३६ चांद्र वर्ष, १० महीने और १६ दिन बढ़ गये. इस हिसाब से १०० सौर
वर्ष में ३ चांद्र वर्ष २४ दिन और ६ घड़ी बढ़ जाती हैं. ऐसी दशा में ईसवी सन् (या विक्रम
संवत्) और हिजरी सन् का कोई निश्चित अंतर नहीं रहता. उसका निश्चय गणित से ही होता है.
१ सूर्यसिद्धांत के अनुसार. २ नवलकिशोर प्रेस (लखनऊ) की छपी हुई 'आईन अकबरी' दफ़्तर १, पृ. ३३७.
३ 'ग़यासुललुगात' में 'अजायबउल्बुल्दान' के हवाले से हिजरी सन् १७ में यह निर्णय होना लिखा है (नवलकिशोर
प्रेस का छपा, 'ग़यासुललुगात', पृ. ३२४).

भारतीय संवत्. १६१
हिंदुस्तान में मुसलमानों का अधिकार होने पर इस सन् का प्रचार इस देश में हुआ और कभी
कभी संस्कृत लेखों में भी यह सन् मिल जाता है१. इसका सब से पहिला उदाहरण महमूद
ग़ज़नवी के महमूदपुर ( लाहोर ) के सिक्कों पर के दूसरी ओर के संस्कृत लेखों में मिलता है२ जो
हिजरी सन् ४१८ और ४१६ ( ई. स. १०२७ और १०२८ ) के हैं.
२७-शाहूर सन्.
शाहूर सन् को 'सूर सन्' और 'अरबी सन्' भी कहते हैं. 'शाहूर सन्' नाम की उत्पत्ति का
ठीक पता नहीं लगता परंतु अनुमान है कि अरबी भाषा में महीने को 'शहर' कहते हैं और उस
का बहुवचन 'शहूर' होता है जिसपर से 'शाहूर' शब्द की उत्पत्ति हुई हो. यह सन् हिजरी सन्
का प्रकारांतर मात्र है. हिजरी सन् के चांद माह इसमें सौर माने गये हैं जिससे इस सन् का वर्ष
सौर वर्ष के बराबर होता है और इसमें मौसिम और महीनों का संबंध बना रहता है. इस सन् में
५६६-६०० मिलाने से ई. स. और ६५६-५१ मिलाने से वि. सं. बनता है इससे पाया जाता है कि
तारीख १ मुहर्रम हिजरी सन् ७४५ ( ई. स. १३४४ तारीख १५ मई=वि. सं. १४०१ ज्येष्ठ शुक्ला २) से,
जब कि सूर्य मृगशिर नक्षत्र पर आया था, इसका प्रारंभ हुआ है. इसका नया वर्ष सूर्य के मृगशिर
नक्षत्र पर आने के ( मृगे रविः ) दिन से बैठता है जिससे इसके वर्ष को 'मृग साल' भी कहते हैं.
इसके महीनों के नाम हिजरी सन् के महीनों के अनुसार ही हैं. यह सन् किसने चलाया इसका
ठीक ठीक पता नहीं चलता परंतु संभव है कि देहली के सुल्तान मुहम्मद तुग़लक़ ( ई. स. १३२५-१३५१ )
ने, जिसने अपनी राजधानी देहली से उठा कर देवगिरि ( दौलताबाद ) में स्थिर करने का उद्योग
किया था, दोनों फ़स्लों ( रबी और ख़रीफ़ ) का हासिल नियत महीनों में लिये जाने के लिये इसे दक्षिण
में चलाया हो३ जैसे कि पीछे से अकबर बादशाह ने अपने राज्य में फ़सली सन् चलाया. इस सन् के वर्ष
अंकों में नहीं किंतु अंक सूचक अरबी शब्दों४ में ही लिखे जाते हैं. मरहठों के राज्य में इस सन् का
प्रचार रहा परंतु अब तो इसका नाममात्र रह गया है और मराठी पंचांगों में ही इसका उल्लेख मिलता है५.
१- देखो, ऊपर पृ. १५५ और उसीका टिप्पण ४.
२- ऐडवर्ड थॉमस रचित 'क्रॉनिकल्स ऑव् दी पठान किंग्स ऑव् देहली', पृ. ४८.
३- ग्रॅट डफ रचित 'हिस्टरी ऑव दी महरॅट्टाज़' जि. १, पृ. ४०, टिप्पण; *; ई. स. १८६३ का संस्करण.
४- इस सन् के वर्ष लिखने में नीचे लिखे अनुसार अंकों के स्थान में उनके सूचक अरबी शब्दों का प्रयोग किया
जाता है. मराठी में अरबी शब्दों के रूप कुछ कुछ बिगड़ गये हैं जो ( ) चिह्न के भीतर जे. टी. मोलेज़वर्थ के मराठी-
अंग्रेज़ी कोश के अनुसार दिये गये हैं. १=अहद् ( अहदे, इददे ); २ = अन्ना ( इसने ); ३ = सलासह ( सल्लौज ); ४=अरबा;
५=खमसा ( खम्मस ); ६=सित्ता ( सिन ?=सित्त ); ७ = सबा ( सब्या ); ८=समानिआ ( सम्मान ); ६=तसआ ( तिस्सा );
१०=अशर; ११=अहद् अशर; १२=अस्ना ( इसने ) अशर; १३=सलासह ( सल्लास ) अशर; १४ अरबा अशर; २०=अशरीन;
३० = सलासीन ( सल्लासीन ); ४०=अरबईन; ५०=खमसीन; ६०=सित्तीन् ( सित्तैन ); ७०=सबीन ( सब्बैन ); ८०=ससानीन्
( सम्नानीन ); ६०=तिसईन ( तिस्सैन ); १००=माया ( मया ); २००=मथ्नतीन ( मयातैन ); ३००=जलाल माया ( सल्लास मया );
४००=अरबा माया; १०००=अलफ् ( अलफ ); १००००=अशर् अलफ़. इन अंक सूचक शब्दों के लिखने में पहिले शब्द से
इकाई, दूसरे से दहाई, तीसरे से सैकड़ा और चौथे से हज़ार बतलाये जाते हैं जैसे कि १३१३ के लिये 'सलासो अशी
सलास माया व अलफ्'.
५- ज्योतिषपरिषद् के नियमानुसार रामचंद्र पांडुरंग शास्त्री मोघे वसईकर के तय्यार किये हुए शक संवत् १८३०
( चैत्रादि वि. सं. १६७५ ) के मराठी पंचांग में वैशाख कृष्णा १३ ( अमांत मूर्त्तिमान ज्येष्ठ कृष्णा १३ ) शुक्रवार को 'मृगार्क'
लिखा है और साथ में फसली सन १३२८ अर्बी सन १३१६ सूरसन 'तिसा अशर सल्लासे मया व अल्लफ' लिखा है
( तिसा = ६; अशर = १०; सल्लासें मया = ३००; व = और; अल्लफ = १०००. ये सब अंक मिलाने से १३१६ होते हैं ).

१६२ प्राचीनलिपिमाला.
२८—फसली सन्.
हिंदुस्तान में मुसल्मानों का राज्य होने पर हिजरी सन् उनका राजकीय सन् हुआ परंतु उसका
वर्ष शुद्ध चांद्र होने के कारण सौर वर्ष से वह करीब ११ दिन छोटा होता है इससे महीनों एवं फसलों का
परस्पर कुछ भी संबंध नहीं रहता. दोनों फसलों (रबी और खरीफ़) का हासिल नियत महीनों में लेने
में सुभीता देख कर बादशाह अकबर ने हिजरी सन् ९७१ (ई. स. १५६३=वि. सं. १६२०) से यह
संन् जारी किया. इसीसे इसको फसली सन् कहते हैं. सन् तो हिजरी (६७१) ही रक्खा गया परंतु
महीने सौर (या चांद्रसौर) माने गये जिससे इसका वर्ष सौर (या चांद्रसौर) वर्ष के बराबर
हो गया. अत एव फसली सन् भी शाहूर सन् की नांई हिजरी सन् का प्रकारांतर मात्र है. पहिले
इस सन् का प्रचार पंजाब और संयुक्त प्रदेश में हुआ और पीछे से जब बंगाल आदि देश अकबर के राज्य में
मिले तब से वहां भी इसका प्रचार हुआ. दक्षिण में इसका प्रचार शाहजहां बादशाह के समय
में हुआ. अब तक यह सन् कुछ कुछ प्रचलित है परंतु भिन्न भिन्न हिस्सों में इसकी गणना में अंतर है.
पंजाब, संयुक्त प्रदेश तथा बंगाल में इसका प्रारंभ आश्विन कृष्णा १ (पूर्णिमांत) से माना
जाता है जिससे इसमें ५६२-६३ मिलाने से ई. स. और ६४६-५० मिलाने से विक्रम संवत् बनता है.
दक्षिण में इसका प्रचार बादशाह शाहजहां के समय हिजरी सन् १०४६ (ई. स. १६३६=वि.
सं. १६६३) से हुआ और वहां इसका प्रारंभ उसी सन् से गिना गया जिससे उत्तरी और दक्षिणी
फसली संनों के बीच करीब सवा दो वर्ष का अंतर पड़ गया. बंबई इहाते में इसका प्रारंभ
शाहूर सन् की नांई सूर्य के मृगशिर नक्षत्र पर आने के दिन से (तारीख ५, ६ या ७ जून से)
माना जाता है और महीनों के नाम मुहर्रम आदि ही हैं. मद्रास इहाते में इस सन् का प्रारंभ
पहिले तो आडि (कर्क) संक्रांति से ही होता रहा परंतु ई. स. १८०० के आसपास से तारीख १३
जुलाई से माना जाने लगा और ई. स. १८५५ से तारीख १ जुलाई से प्रारंभ स्थिर किया गया है.
दक्षिण के फसली सन् में ५९०-६१ जोड़ने से ई. स. और ६४७-४८ जोड़ने से वि. सं. बनता है.

२६—विलायती सन्.
विलायती सन् एक प्रकार से बंगाल के फसली सन् का ही दूसरा नाम है. इसका प्रचार
उड़ीसे तथा बंगाल के कुछ हिस्सों में है. इसके मास और वर्ष सौर हैं और महीनों के नाम
चैत्रादि नामों से हैं. इसका प्रारंभ सौर आश्विन अर्थात् कन्या संक्रांति से होता है और जिस
दिन संक्रांति का प्रवेश होता है उसीको मास का पहिला दिन मानते हैं. इस सन् में ५६२-६३
जोड़ने से ई. स. और ६४६-५० जोड़ने से वि. सं. बनता है.

३०—अमली सन्.
अमली सन् विलायती सन् के समान ही है. इसमें और विलायती सन् में अंतर केवल इतना
ही है कि इसके नये वर्ष का प्रारंभ भाद्रपद शुक्ला १२ से और उसका कन्या संक्रांति से होता है.
इस संवत् का पक्ष के बीच में ही प्रारंभ होने का कारण ऐसा बतलाया जाता है कि उक्त तिथि को
उड़ीसे के राजा इंद्रद्युम्न का जन्म हुआ था. इस सन् का प्रचार उड़ीसे के व्योपारियों में तथा वहां
की कचहरियों में है.

३१—बंगाली सन्.
बंगाली सन् को 'बंगाब्द' भी कहते हैं. यह भी एक प्रकार से बंगाल के फसली सन् का
प्रकारांतर मात्र है. बंगाली सन् और फसली सन् में अंतर इतना ही है कि इसका प्रारंभ आश्विन

भारतीय संवत् १६३
कृष्णा १ से नहीं किंतु उससे सात महीने बाद मेष संक्रांति (सौर वैशाख) से होता है और महीने सौर हैं
जिससे उनमें पक्ष और तिथि की गणना नहीं है. जिस दिन संक्रांति का प्रवेश होता है उसके दूसरे दिन
को पहिला दिन मानते हैं. इस सन् में ५६३-६४ जोड़ने से ई. स. और ६५०-१ जोड़ने से वि. सं. बनता है.
३२-मगि सन्.
मगि सन् बहुधा बंगाली सन् के समान ही है. अंतर केवल इतना ही है कि इसका प्रारंभ
बंगाली सन् से ४५ वर्ष पीछे माना जाता है. इस लिये इसमें ६३८-३६ जोड़ने से ई. स. और ६६५-
६६ जोड़ने से वि. सं. बनता है. इसका प्रचार बंगाल के चिटागांग ज़िले में है. अनुमान होता है
कि वहांवालों ने बंगाल में फसली सन् का प्रचार होने से ४५ वर्ष पीछे उसको अपनाया हो. इस
सन् के 'मगि' कहलाने का ठीक कारण तो ज्ञात नहीं हुआ परंतु ऐसा माना जाता है कि आरा-
कान के राजा ने ई. स. की ६ वीं शताब्दी में चिटागांग ज़िला विजय किया था और ई. स. १६६६ में
मुग़लों के राज्य में वह मिलाया गया तब तक वहां पर अराकानियों अर्थात् मगों का अधिकार किसी
प्रकार बना रहा था. संभव है कि मगों के नाम से यह मगि सन् कहलाया हो १.
३३-इलाही सन्.
बादशाह अकबर के धर्मसंबंधी विचार पलटने पर उसने 'दीन-इ-इलाही' नाम का नया धर्म
चलाने का उद्योग किया जिसके पीछे उसने 'इलाही सन्' चलाया. अब्दुल कादिर बदायूनी, जो
अकबर के दरबार के विद्वानों में से एक था, अपनी 'मुंतख़बुत्तवारीख' में लिखता है कि 'बादशाह
अकबर ने हिजरी सन् को मिटा कर तारीख़-इ-इलाही नाम का नया सन् चलाया जिसका पहिला वर्ष
बादशाह की गद्दीनशीनी का वर्ष था २.' वास्तव में यह सन् बादशाह अकबर के राज्यवर्ष २६ वें
अर्थात् हिजरी सन् ६६२ (ई. स. १५८४) से चला परंतु पूर्व के वर्षों का हिसाब लगा कर इसका
प्रारंभ अकबर की गद्दी नशीनी के वर्ष से मान लिया गया है. अकबर की गद्दीनशीनी तारीख़ २
रबीउस्सानी हिजरी सन् ६६३ (ई. स. १५५६ तारीख १४ फरवरी=वि. सं. १६१२ फाल्गुन कृष्णा ४)
को हुई थी परंतु उसी दिन से इसका प्रारंभ माना नहीं गया किंतु उससे २५ दिन पीछे तारीख़ २८ रबी-
उस्सानी हि. स. ६६३ (ई. स. १५५६ तारीख ११ मार्च=वि. सं. १६१२ चैत्र कृष्णा अमावास्या) से,
जिस दिन कि ईरानियों के वर्ष का पहिला महीना फरवरदीन लगा, माना गया है. इस सन् के
वर्ष सौर हैं और महीनों ३ तथा दिनों ४ (तारीखों) के नाम ईरानी ही हैं. इस में दिनों (तारीखों)
की संख्या नहीं किंतु १ से ३२ तक के दिनों के नियत नाम ही लिखे जाते थे.
१. ए. ब्रि; जि. १३, पृ. ५००; ११ वां संस्करण. २. क; इं; ई; पृ. ८४.
३. इलाही सन् के १२ महीनों के नाम ये हैं-१ फरवरदीन; २ उर्दिवहिश्त; ३ खूर्दाद; ४ तीर; ५ अमरदाद; ६ शहरेवर;
७ मेहर; ८ आबां (आबान्); ६ आज़र (आदर); १० दे; ११ बहमन; १२ अस्फ़ंदियारमह्. ये नाम ईरानियों के यज्दजर्द सन् के
ही लिये गये हैं.
४. ईरानियों का वर्ष सौर वर्ष है. उसमें तीस तीस दिन के १२ महीने हैं और १२ वें महीने में ५ दिन गाथा
(अहुनवद्, ओश्तवद्, स्पेंतोमद्, वहूक्ष्प्रथ और वहिश्तोयश्त) के मिलाकर ३६५ दिन का वर्ष माना जाता है और १२० वर्ष
में १ अधिक मास महीनों के क्रम से जोड़ा जाता है जिसको 'कबीसा' कहते हैं, परंतु इलाही सन् के महीने कुछ २६ दिन के,
कुछ ३० के, कुछ ३१ के और एक ३२ दिन का भी माना जाता था और वर्ष ३६५ दिन का होता था एवं चौथे वर्ष १
दिन और जोड़ दिया जाता था. महीनों के दिनों की संख्या किस हिसाब से लगाई जाती थी इसका ठीक हाल मालूम
नहीं हो सका. १ से ३२ तक के दिनों के नाम ये हैं-
१ अहुर्मुज्द; २ बहमन; ३ उर्दिवहिश्त; ४ शहरेवर्; ५ स्पंदारमद्; ६ खुर्दाद; ७ मुरदाद (अमरदाद); ८ देपादूर; ६
आज़र (आदर); १० आवां (आवान्); ११ खुरशेद्; १२ माह (महोर); १३ तीर; १४ गोश; १५ देपमेहर; १६ मेहर;
१७ सरोश; १८ रशनह; १६ फरवरदीन; २० बेहराम; २१ राम; २२ गोवाद; २३ देपदीन; २४ दीन; २५ अद् (अशीश्वंग);
२६ आस्ताद; २७ आस्मान्; २८ ज़मिआद; २६ मेहरेस्पंद; ३० अनेरां; ३१ रोज़; ३२ शब. इनमें से ३० तक के नाम तो
ईरानियों के दिनों (तारीखों) के ही हैं और अंतिम दो नये रक्खे गये हैं.

१६४ प्राचीनलिपिमाला.
इस सन् में १५५५-५६ मिलाने से ई. स. और १६१२ मिलाने से विक्रम संवत् बनता है.
यह सन् अक्बर और जहांगीर के समय तक चलता रहा परंतु शाहजहां ने गद्दी बैठते ही (ई. स.
१६२८) इस सन् को मिटा दिया. यह सन् केवल ७२ के करीब ही प्रचलित रहा और अक्बर तथा
जहांगीर के समय की लिखावटों, सिक्कों तथा इतिहास के पुस्तकों में लिखा मिलता है.
३४-ईसवी सन्.
ईसवी सन् ईसाई धर्म के प्रवर्तक ईसा मसीह (जीसम् क्राइस्ट) के जन्म के वर्ष से¹ चला
हुआ माना जाता है और ईसा मसीह के नाम से इसको ईसवी सन् कहते हैं. ई. स. की पांचवीं
शताब्दी तक तो इस सन् का प्रादुर्भाव भी नहीं हुआ था. ई. स. ५२७ के आसपास रोम नगर (इटली
में) के रहनेवाले डायोनिसिअस् एक्सिगुअस् नामक विद्वान् पादरी ने मज़हबी सन् चलाने के विचार
से हिसाब लगा कर १८४ वें ओलिंपियड्² के चौथे वर्ष अर्थात् रोम नगर की स्थापना³ से ७५४ वें वर्ष
में ईसा मसीह का जन्म होना स्थिर किया और वहां से लगा कर अपने समय तक के वर्षों की संख्या
नियत कर ईसाइयों में इस सन् का प्रचार करने का उपयोग किया. ई. स. की छठी शताब्दी में
इटली में, आठवीं में इंग्लैंड में, आठवीं तथा नवीं शताब्दी में फ्रान्स, बेल्जिअम्, जर्मनी और
स्विट्ज़रलैंड में और ई. स. १००० के आस पास तक यूरोप के समस्त ईसाई देशों में इसका प्रचार
हो गया, जहां की काल गणना पहिले भिन्न भिन्न प्रकार से थी. अब तो बहुधा सारे भूमंडल में
इसका, कहीं कम कहीं ज्यादा, प्रचार है. सन् के अंकों को छोड़ कर बाकी सब बातों में यह रोमन
लोगों का ही वर्ष है. रोमन लोगों का पंचांग पहिले जुलिअस सीज़र ने स्थिर और ठीक किया था⁴.
१. ईसा मसीह का जन्म किस वर्ष में हुआ यह अनिश्चित है. इस सन् के उत्पादक डायोनिसिअस एक्सिगुअस्
ने ईसा का जन्म रोम नगर की स्थापना से ७५४ वें वर्ष (वि. सं. ५७) में होना मान कर इस संवत् के गत वर्ष स्थिर किये
परंतु अब बहुत से विद्वानों का मानना यह है कि ईसा का जन्म ई. स. पूर्व ८ से ४ के बीच हुआ था न कि ई. स. १ में
(दी न्यू एन्साइक्लोपीडिआ; ऍच. सी. ओ' नील संपादित; पृ. ८७०).
२. ग्रीस (यूनान) देश में ज़ेअस (=जुपिटर = इंद्र) आदि देवताओं के मंदिरों के लिये पवित्र माने जानेवाले ओलिं-
पस् पर्वत के आगे के मैदान में प्राचीन काल से ही प्रति चौथे वर्ष शारीरिक बल की परीक्षा के दंगल हुआ करते थे
जिनको 'ओलिंपिक गेम्स्' कहते थे. इसपर से एक दंगल से दूसरे दंगल के बीच के ४ वर्षों की संज्ञा 'ओलिंपियड्'
हुई. पहिले उस देश में कालगणना के लिये कोई सन् (संवत्) प्रचलित न था इस लिये ई. स. पूर्व २६४ के आसपास
सिसिली नामक द्वीप के रहनेवाले टिमेइअस् नामक विद्वान् ने हिसाब लगा कर जिस ऑलिंपियड् में कोरोइबस् पैदल दौड़
में जीत पाया था उसको पहिला ओलिंपियड् मान कर ग्रीकों में कालगणना की नींव डाली. यह पहिला ओलिंपियड् ई. स.
पूर्व ७७६ में होना माना गया.
३. ग्रीकों की नांई रोमन लोगों में भी प्राचीन काल में कालगणना के लिये कोई सन् प्रचलित न था इस लिये पीछे
से रोम नगर की स्थापना के वर्ष से सन् कायम किया गया, परंतु जिस समय यह सन् स्थिर किया गया उस समय रोम
नगर को बसे कई शताब्दियां बीत चुकी थीं इस लिये वहां के इतिहास के भिन्न भिन्न पुस्तकों में रोम की स्थापना से जो
सन् लिखा गया है उसका प्रारंभ एकसा नहीं मिलता. रोमन इतिहास का सब से प्राचीन लेखक फैबिअस पिक्टर (ई.
स. पूर्व २२०) ई. स. पूर्व ७४७ से; पोलिविअस् (ई. स. पूर्व २०४-१२२) ७५० से; पॉसिअस् कैटो (ई. स. पूर्व २३४-
१४६) ७५१ से; वॉरिअस् फ्लैकस् ७५२ से और टेरेंटिअस् वैर्रो (ई. स. पूर्व ११६-२७) ई. स. पूर्व ७५३ से इस सन् का
प्रारंभ मानता है. वर्तमान इतिहास लेखक वैर्रो का अनुकरण करते हैं.
४. प्रारंभ में रोमन लोगों का वर्ष ३०४ दिन का था जिसमें मार्च से डिसेंबर तक के १० महीने थे. जुलाई के
स्थानापन्न मास का नाम 'क्विंक्टिलिस' और ऑगस्ट के स्थानापन्न का नाम 'सेक्स्टिलिस' था. फिर नुमा पॉम्पिलि-
अस् (ई. स. पूर्व ७१५-६७२) राजा ने वर्ष के प्रारंभ में जैन्युअरी (जनवरी) और अंत में फेब्रुअरी (फरवरी) मास
बढ़ा कर १२ चांद्र मास अर्थात् ३५५ दिन का वर्ष बनाया. ई. स. पूर्व ४५२ से चांद्र वर्ष के स्थान पर सौर वर्ष माना जाने
लगा जो ३५५ दिन का ही होता था परंतु प्रति दूसरे वर्ष (एकांतर से) क्रमशः २२ और २३ दिन बढ़ाते थे,
जिससे ४ वर्ष के १४६५ दिन और १ वर्ष के ३६६ १/४ दिन होने लगे. उनका यह वर्ष वास्तविक सौर वर्ष से करीब