प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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इस सन् में १५५५-५६ मिलाने से ई. स. और १६१२ मिलाने से विक्रम संवत् बनता है.
यह सन् अक्बर और जहांगीर के समय तक चलता रहा परंतु शाहजहां ने गद्दी बैठते ही (ई. स.
१६२८) इस सन् को मिटा दिया. यह सन् केवल ७२ के करीब ही प्रचलित रहा और अक्बर तथा
जहांगीर के समय की लिखावटों, सिक्कों तथा इतिहास के पुस्तकों में लिखा मिलता है.
३४-ईसवी सन्.
ईसवी सन् ईसाई धर्म के प्रवर्तक ईसा मसीह (जीसम् क्राइस्ट) के जन्म के वर्ष से¹ चला
हुआ माना जाता है और ईसा मसीह के नाम से इसको ईसवी सन् कहते हैं. ई. स. की पांचवीं
शताब्दी तक तो इस सन् का प्रादुर्भाव भी नहीं हुआ था. ई. स. ५२७ के आसपास रोम नगर (इटली
में) के रहनेवाले डायोनिसिअस् एक्सिगुअस् नामक विद्वान् पादरी ने मज़हबी सन् चलाने के विचार
से हिसाब लगा कर १८४ वें ओलिंपियड्² के चौथे वर्ष अर्थात् रोम नगर की स्थापना³ से ७५४ वें वर्ष
में ईसा मसीह का जन्म होना स्थिर किया और वहां से लगा कर अपने समय तक के वर्षों की संख्या
नियत कर ईसाइयों में इस सन् का प्रचार करने का उपयोग किया. ई. स. की छठी शताब्दी में
इटली में, आठवीं में इंग्लैंड में, आठवीं तथा नवीं शताब्दी में फ्रान्स, बेल्जिअम्, जर्मनी और
स्विट्ज़रलैंड में और ई. स. १००० के आस पास तक यूरोप के समस्त ईसाई देशों में इसका प्रचार
हो गया, जहां की काल गणना पहिले भिन्न भिन्न प्रकार से थी. अब तो बहुधा सारे भूमंडल में
इसका, कहीं कम कहीं ज्यादा, प्रचार है. सन् के अंकों को छोड़ कर बाकी सब बातों में यह रोमन
लोगों का ही वर्ष है. रोमन लोगों का पंचांग पहिले जुलिअस सीज़र ने स्थिर और ठीक किया था⁴.
१. ईसा मसीह का जन्म किस वर्ष में हुआ यह अनिश्चित है. इस सन् के उत्पादक डायोनिसिअस एक्सिगुअस्
ने ईसा का जन्म रोम नगर की स्थापना से ७५४ वें वर्ष (वि. सं. ५७) में होना मान कर इस संवत् के गत वर्ष स्थिर किये
परंतु अब बहुत से विद्वानों का मानना यह है कि ईसा का जन्म ई. स. पूर्व ८ से ४ के बीच हुआ था न कि ई. स. १ में
(दी न्यू एन्साइक्लोपीडिआ; ऍच. सी. ओ' नील संपादित; पृ. ८७०).
२. ग्रीस (यूनान) देश में ज़ेअस (=जुपिटर = इंद्र) आदि देवताओं के मंदिरों के लिये पवित्र माने जानेवाले ओलिं-
पस् पर्वत के आगे के मैदान में प्राचीन काल से ही प्रति चौथे वर्ष शारीरिक बल की परीक्षा के दंगल हुआ करते थे
जिनको 'ओलिंपिक गेम्स्' कहते थे. इसपर से एक दंगल से दूसरे दंगल के बीच के ४ वर्षों की संज्ञा 'ओलिंपियड्'
हुई. पहिले उस देश में कालगणना के लिये कोई सन् (संवत्) प्रचलित न था इस लिये ई. स. पूर्व २६४ के आसपास
सिसिली नामक द्वीप के रहनेवाले टिमेइअस् नामक विद्वान् ने हिसाब लगा कर जिस ऑलिंपियड् में कोरोइबस् पैदल दौड़
में जीत पाया था उसको पहिला ओलिंपियड् मान कर ग्रीकों में कालगणना की नींव डाली. यह पहिला ओलिंपियड् ई. स.
पूर्व ७७६ में होना माना गया.
३. ग्रीकों की नांई रोमन लोगों में भी प्राचीन काल में कालगणना के लिये कोई सन् प्रचलित न था इस लिये पीछे
से रोम नगर की स्थापना के वर्ष से सन् कायम किया गया, परंतु जिस समय यह सन् स्थिर किया गया उस समय रोम
नगर को बसे कई शताब्दियां बीत चुकी थीं इस लिये वहां के इतिहास के भिन्न भिन्न पुस्तकों में रोम की स्थापना से जो
सन् लिखा गया है उसका प्रारंभ एकसा नहीं मिलता. रोमन इतिहास का सब से प्राचीन लेखक फैबिअस पिक्टर (ई.
स. पूर्व २२०) ई. स. पूर्व ७४७ से; पोलिविअस् (ई. स. पूर्व २०४-१२२) ७५० से; पॉसिअस् कैटो (ई. स. पूर्व २३४-
१४६) ७५१ से; वॉरिअस् फ्लैकस् ७५२ से और टेरेंटिअस् वैर्रो (ई. स. पूर्व ११६-२७) ई. स. पूर्व ७५३ से इस सन् का
प्रारंभ मानता है. वर्तमान इतिहास लेखक वैर्रो का अनुकरण करते हैं.
४. प्रारंभ में रोमन लोगों का वर्ष ३०४ दिन का था जिसमें मार्च से डिसेंबर तक के १० महीने थे. जुलाई के
स्थानापन्न मास का नाम 'क्विंक्टिलिस' और ऑगस्ट के स्थानापन्न का नाम 'सेक्स्टिलिस' था. फिर नुमा पॉम्पिलि-
अस् (ई. स. पूर्व ७१५-६७२) राजा ने वर्ष के प्रारंभ में जैन्युअरी (जनवरी) और अंत में फेब्रुअरी (फरवरी) मास
बढ़ा कर १२ चांद्र मास अर्थात् ३५५ दिन का वर्ष बनाया. ई. स. पूर्व ४५२ से चांद्र वर्ष के स्थान पर सौर वर्ष माना जाने
लगा जो ३५५ दिन का ही होता था परंतु प्रति दूसरे वर्ष (एकांतर से) क्रमशः २२ और २३ दिन बढ़ाते थे,
जिससे ४ वर्ष के १४६५ दिन और १ वर्ष के ३६६ १/४ दिन होने लगे. उनका यह वर्ष वास्तविक सौर वर्ष से करीब