प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 220, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंभारतीय संवत्. १६१
हिंदुस्तान में मुसलमानों का अधिकार होने पर इस सन् का प्रचार इस देश में हुआ और कभी
कभी संस्कृत लेखों में भी यह सन् मिल जाता है१. इसका सब से पहिला उदाहरण महमूद
ग़ज़नवी के महमूदपुर ( लाहोर ) के सिक्कों पर के दूसरी ओर के संस्कृत लेखों में मिलता है२ जो
हिजरी सन् ४१८ और ४१६ ( ई. स. १०२७ और १०२८ ) के हैं.
२७-शाहूर सन्.
शाहूर सन् को 'सूर सन्' और 'अरबी सन्' भी कहते हैं. 'शाहूर सन्' नाम की उत्पत्ति का
ठीक पता नहीं लगता परंतु अनुमान है कि अरबी भाषा में महीने को 'शहर' कहते हैं और उस
का बहुवचन 'शहूर' होता है जिसपर से 'शाहूर' शब्द की उत्पत्ति हुई हो. यह सन् हिजरी सन्
का प्रकारांतर मात्र है. हिजरी सन् के चांद माह इसमें सौर माने गये हैं जिससे इस सन् का वर्ष
सौर वर्ष के बराबर होता है और इसमें मौसिम और महीनों का संबंध बना रहता है. इस सन् में
५६६-६०० मिलाने से ई. स. और ६५६-५१ मिलाने से वि. सं. बनता है इससे पाया जाता है कि
तारीख १ मुहर्रम हिजरी सन् ७४५ ( ई. स. १३४४ तारीख १५ मई=वि. सं. १४०१ ज्येष्ठ शुक्ला २) से,
जब कि सूर्य मृगशिर नक्षत्र पर आया था, इसका प्रारंभ हुआ है. इसका नया वर्ष सूर्य के मृगशिर
नक्षत्र पर आने के ( मृगे रविः ) दिन से बैठता है जिससे इसके वर्ष को 'मृग साल' भी कहते हैं.
इसके महीनों के नाम हिजरी सन् के महीनों के अनुसार ही हैं. यह सन् किसने चलाया इसका
ठीक ठीक पता नहीं चलता परंतु संभव है कि देहली के सुल्तान मुहम्मद तुग़लक़ ( ई. स. १३२५-१३५१ )
ने, जिसने अपनी राजधानी देहली से उठा कर देवगिरि ( दौलताबाद ) में स्थिर करने का उद्योग
किया था, दोनों फ़स्लों ( रबी और ख़रीफ़ ) का हासिल नियत महीनों में लिये जाने के लिये इसे दक्षिण
में चलाया हो३ जैसे कि पीछे से अकबर बादशाह ने अपने राज्य में फ़सली सन् चलाया. इस सन् के वर्ष
अंकों में नहीं किंतु अंक सूचक अरबी शब्दों४ में ही लिखे जाते हैं. मरहठों के राज्य में इस सन् का
प्रचार रहा परंतु अब तो इसका नाममात्र रह गया है और मराठी पंचांगों में ही इसका उल्लेख मिलता है५.
१- देखो, ऊपर पृ. १५५ और उसीका टिप्पण ४.
२- ऐडवर्ड थॉमस रचित 'क्रॉनिकल्स ऑव् दी पठान किंग्स ऑव् देहली', पृ. ४८.
३- ग्रॅट डफ रचित 'हिस्टरी ऑव दी महरॅट्टाज़' जि. १, पृ. ४०, टिप्पण; *; ई. स. १८६३ का संस्करण.
४- इस सन् के वर्ष लिखने में नीचे लिखे अनुसार अंकों के स्थान में उनके सूचक अरबी शब्दों का प्रयोग किया
जाता है. मराठी में अरबी शब्दों के रूप कुछ कुछ बिगड़ गये हैं जो ( ) चिह्न के भीतर जे. टी. मोलेज़वर्थ के मराठी-
अंग्रेज़ी कोश के अनुसार दिये गये हैं. १=अहद् ( अहदे, इददे ); २ = अन्ना ( इसने ); ३ = सलासह ( सल्लौज ); ४=अरबा;
५=खमसा ( खम्मस ); ६=सित्ता ( सिन ?=सित्त ); ७ = सबा ( सब्या ); ८=समानिआ ( सम्मान ); ६=तसआ ( तिस्सा );
१०=अशर; ११=अहद् अशर; १२=अस्ना ( इसने ) अशर; १३=सलासह ( सल्लास ) अशर; १४ अरबा अशर; २०=अशरीन;
३० = सलासीन ( सल्लासीन ); ४०=अरबईन; ५०=खमसीन; ६०=सित्तीन् ( सित्तैन ); ७०=सबीन ( सब्बैन ); ८०=ससानीन्
( सम्नानीन ); ६०=तिसईन ( तिस्सैन ); १००=माया ( मया ); २००=मथ्नतीन ( मयातैन ); ३००=जलाल माया ( सल्लास मया );
४००=अरबा माया; १०००=अलफ् ( अलफ ); १००००=अशर् अलफ़. इन अंक सूचक शब्दों के लिखने में पहिले शब्द से
इकाई, दूसरे से दहाई, तीसरे से सैकड़ा और चौथे से हज़ार बतलाये जाते हैं जैसे कि १३१३ के लिये 'सलासो अशी
सलास माया व अलफ्'.
५- ज्योतिषपरिषद् के नियमानुसार रामचंद्र पांडुरंग शास्त्री मोघे वसईकर के तय्यार किये हुए शक संवत् १८३०
( चैत्रादि वि. सं. १६७५ ) के मराठी पंचांग में वैशाख कृष्णा १३ ( अमांत मूर्त्तिमान ज्येष्ठ कृष्णा १३ ) शुक्रवार को 'मृगार्क'
लिखा है और साथ में फसली सन १३२८ अर्बी सन १३१६ सूरसन 'तिसा अशर सल्लासे मया व अल्लफ' लिखा है
( तिसा = ६; अशर = १०; सल्लासें मया = ३००; व = और; अल्लफ = १०००. ये सब अंक मिलाने से १३१६ होते हैं ).