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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 222, कुल 318 में से

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पृष्ठ 222

भारतीय संवत् १६३
कृष्णा १ से नहीं किंतु उससे सात महीने बाद मेष संक्रांति (सौर वैशाख) से होता है और महीने सौर हैं
जिससे उनमें पक्ष और तिथि की गणना नहीं है. जिस दिन संक्रांति का प्रवेश होता है उसके दूसरे दिन
को पहिला दिन मानते हैं. इस सन् में ५६३-६४ जोड़ने से ई. स. और ६५०-१ जोड़ने से वि. सं. बनता है.
३२-मगि सन्.
मगि सन् बहुधा बंगाली सन् के समान ही है. अंतर केवल इतना ही है कि इसका प्रारंभ
बंगाली सन् से ४५ वर्ष पीछे माना जाता है. इस लिये इसमें ६३८-३६ जोड़ने से ई. स. और ६६५-
६६ जोड़ने से वि. सं. बनता है. इसका प्रचार बंगाल के चिटागांग ज़िले में है. अनुमान होता है
कि वहांवालों ने बंगाल में फसली सन् का प्रचार होने से ४५ वर्ष पीछे उसको अपनाया हो. इस
सन् के 'मगि' कहलाने का ठीक कारण तो ज्ञात नहीं हुआ परंतु ऐसा माना जाता है कि आरा-
कान के राजा ने ई. स. की ६ वीं शताब्दी में चिटागांग ज़िला विजय किया था और ई. स. १६६६ में
मुग़लों के राज्य में वह मिलाया गया तब तक वहां पर अराकानियों अर्थात् मगों का अधिकार किसी
प्रकार बना रहा था. संभव है कि मगों के नाम से यह मगि सन् कहलाया हो १.
३३-इलाही सन्.
बादशाह अकबर के धर्मसंबंधी विचार पलटने पर उसने 'दीन-इ-इलाही' नाम का नया धर्म
चलाने का उद्योग किया जिसके पीछे उसने 'इलाही सन्' चलाया. अब्दुल कादिर बदायूनी, जो
अकबर के दरबार के विद्वानों में से एक था, अपनी 'मुंतख़बुत्तवारीख' में लिखता है कि 'बादशाह
अकबर ने हिजरी सन् को मिटा कर तारीख़-इ-इलाही नाम का नया सन् चलाया जिसका पहिला वर्ष
बादशाह की गद्दीनशीनी का वर्ष था २.' वास्तव में यह सन् बादशाह अकबर के राज्यवर्ष २६ वें
अर्थात् हिजरी सन् ६६२ (ई. स. १५८४) से चला परंतु पूर्व के वर्षों का हिसाब लगा कर इसका
प्रारंभ अकबर की गद्दी नशीनी के वर्ष से मान लिया गया है. अकबर की गद्दीनशीनी तारीख़ २
रबीउस्सानी हिजरी सन् ६६३ (ई. स. १५५६ तारीख १४ फरवरी=वि. सं. १६१२ फाल्गुन कृष्णा ४)
को हुई थी परंतु उसी दिन से इसका प्रारंभ माना नहीं गया किंतु उससे २५ दिन पीछे तारीख़ २८ रबी-
उस्सानी हि. स. ६६३ (ई. स. १५५६ तारीख ११ मार्च=वि. सं. १६१२ चैत्र कृष्णा अमावास्या) से,
जिस दिन कि ईरानियों के वर्ष का पहिला महीना फरवरदीन लगा, माना गया है. इस सन् के
वर्ष सौर हैं और महीनों ३ तथा दिनों ४ (तारीखों) के नाम ईरानी ही हैं. इस में दिनों (तारीखों)
की संख्या नहीं किंतु १ से ३२ तक के दिनों के नियत नाम ही लिखे जाते थे.
१. ए. ब्रि; जि. १३, पृ. ५००; ११ वां संस्करण. २. क; इं; ई; पृ. ८४.
३. इलाही सन् के १२ महीनों के नाम ये हैं-१ फरवरदीन; २ उर्दिवहिश्त; ३ खूर्दाद; ४ तीर; ५ अमरदाद; ६ शहरेवर;
७ मेहर; ८ आबां (आबान्); ६ आज़र (आदर); १० दे; ११ बहमन; १२ अस्फ़ंदियारमह्. ये नाम ईरानियों के यज्दजर्द सन् के
ही लिये गये हैं.
४. ईरानियों का वर्ष सौर वर्ष है. उसमें तीस तीस दिन के १२ महीने हैं और १२ वें महीने में ५ दिन गाथा
(अहुनवद्, ओश्तवद्, स्पेंतोमद्, वहूक्ष्प्रथ और वहिश्तोयश्त) के मिलाकर ३६५ दिन का वर्ष माना जाता है और १२० वर्ष
में १ अधिक मास महीनों के क्रम से जोड़ा जाता है जिसको 'कबीसा' कहते हैं, परंतु इलाही सन् के महीने कुछ २६ दिन के,
कुछ ३० के, कुछ ३१ के और एक ३२ दिन का भी माना जाता था और वर्ष ३६५ दिन का होता था एवं चौथे वर्ष १
दिन और जोड़ दिया जाता था. महीनों के दिनों की संख्या किस हिसाब से लगाई जाती थी इसका ठीक हाल मालूम
नहीं हो सका. १ से ३२ तक के दिनों के नाम ये हैं-
१ अहुर्मुज्द; २ बहमन; ३ उर्दिवहिश्त; ४ शहरेवर्; ५ स्पंदारमद्; ६ खुर्दाद; ७ मुरदाद (अमरदाद); ८ देपादूर; ६
आज़र (आदर); १० आवां (आवान्); ११ खुरशेद्; १२ माह (महोर); १३ तीर; १४ गोश; १५ देपमेहर; १६ मेहर;
१७ सरोश; १८ रशनह; १६ फरवरदीन; २० बेहराम; २१ राम; २२ गोवाद; २३ देपदीन; २४ दीन; २५ अद् (अशीश्वंग);
२६ आस्ताद; २७ आस्मान्; २८ ज़मिआद; २६ मेहरेस्पंद; ३० अनेरां; ३१ रोज़; ३२ शब. इनमें से ३० तक के नाम तो
ईरानियों के दिनों (तारीखों) के ही हैं और अंतिम दो नये रक्खे गये हैं.