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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 219, कुल 318 में से

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पृष्ठ 219

१६० प्राचीनलिपिसमाला.
जाता है. ऐसे १२ चांद्र मास का एक चांद्र वर्ष कहलाता है. चांद्र वर्ष ३५४ दिन, २२ घड़ी, १ पल
और २४ विपल के करीब होता है१. हिंदुओं के पंचांगों में मास, पक्ष, तिथि आदि चांद्र मान से ही
हैं. चांद्र वर्ष सौर वर्ष से १० दिन, ५३ घड़ी, ३० पल और ६ विपल छोटा होता है. सौर मान
और चांद्र मान में करीब ३२ महीनों में १ महीने का अंतर पड़ जाता है. हिंदुओं के यहां
शुद्ध चांद्र वर्ष नहीं किंतु चांद्रसौर है और चांद्र मासों तथा ऋतुओं का संबंध बना रखने तथा
चांद्र को सौर मान से मिलाने के लिये ही जिस चांद्र मास में कोई संक्रांति न हो उसको अधिक (मल)
मांस और जिस चांद्र मास में दो संक्रांति हों उसको क्षय मास मानने की रीति निकाली है. हिंदूमात्र के
श्राद्ध, व्रत आदि धर्म कार्य तिथियों के हिसाब से ही होते हैं इस लिये बंगाल आदि में जहां जहां सौर
वर्ष का प्रचार है वहां भी धर्मकार्यों के लिये चांद्र मान की तिथियों आदि का व्यवहार करना ही पड़ता है.
इसीसे वहां के पंचांगों में सौर दिनों के साथ चांद्र मास, पक्ष, तिथियां आदि भी लिखी रहती हैं.
२६-हिजरी सन्.
हिजरी सन् का प्रारंभ मुसलमान धर्म के प्रवर्तक पैगंबर मुहम्मद साहब के मक्के से भाग कर
मदीने को कूच करने के दिन से माना जाता है. अरबी में 'हिजर' धातु का अर्थ 'अलग होना',
'छोड़ना' आदि है इसी लिये इस सन् को हिजरी सन् कहते हैं. प्रारंभ से ही इस सन् का प्रचार
नहीं हुआ किंतु मुसलमान होनेवालों में पहिले पैगंबर के कामों के नामों से वर्ष बतलाये जाते थे जैसे कि
पहिले वर्ष को 'यर्जन' अर्थात् 'आज्ञा' (मक्के से मदीना जाने की) का वर्ष, दूसरे को हुक्म का वर्ष
(उस वर्ष में मुसलमान न होनेवालों से लड़ने का हुक्म होना माना जाता है) आदि. ख़लीफा
उमर (ई. स. ६३४ से ६४४ तक) के समय यमन के हाकिम अबूमुसा अशअरी ने खलीफा को
अर्जी भेजी कि दरगाह से (श्रीमन् के यहां से) शाबान् महीने की लिखी हुई लिखावटें आई हैं परंतु
उनसे यह मालूम नहीं होता कि कौनसा (किस वर्ष का) शाबान है? इस पर ख़लीफा ने कोई
सन् नियत करने के लिये विद्वानों की संमति ली और अंत में यह निश्चय हुआ कि पैगंबर के मक्का
छोड़ने के समय से (अर्थात् तारीख १५ जुलाई ई. स. ६२२=वि. सं ६७९ श्रावण शुक्ला २ की
शाम से) इस सन् का प्रारंभ माना जावे२. यह निश्चय हि. स. १७ में होना माना जाता है३.
हिजरी सन् का वर्ष शुद्ध चांद्र वर्ष है. इसके प्रत्येक मास का प्रारंभ चंद्रदर्शन (हिंदुओं के प्रत्येक
मास की शुक्ला २) से होता है और दूसरे चंद्रदर्शन तक मास माना जाता है. प्रत्येक तारीख सायंकाल
से प्रारंभ हो कर दूसरे दिन के सायंकाल तक मानी जाती है. इसके १२ महीनों के नाम ये हैं-
१ मुहर्रम, २ सफ़र, ३ रबीउल् अव्वल, ४ रबीउल् आखिर या रबी उस् सानी, ५ जमादिउल्
अव्वल, ६ जमादिउल् आखिर या जमादि उस्सानी, ७ रजब, ८ शाबान, ६ रमज़ान, १० शव्वाल, ११
ज़िल्काद और १२ ज़िलहिज्ज. चांद्र मास २६ दिन, ३१ घड़ी, ५० पल और ७ विपल के करीब होने
से चांद्र वर्ष सौर वर्ष से १० दिन, ५३ घड़ी, ३० पल और ६ विपल के करीब कम होता है. तारीख १५
जुलाई ई. स. १६२२ (वि. सं. १६७६ श्रावण कृष्णा ६) की शाम को इस सन् को प्रारंभ हुए
१३०० सौर वर्ष होंगे. उस समय हिजरी सन् १३४० तारीख २० ज़िल्काद का प्रारंभ होगा अत एव
१३०० सौर वर्षों में ३६ चांद्र वर्ष, १० महीने और १६ दिन बढ़ गये. इस हिसाब से १०० सौर
वर्ष में ३ चांद्र वर्ष २४ दिन और ६ घड़ी बढ़ जाती हैं. ऐसी दशा में ईसवी सन् (या विक्रम
संवत्) और हिजरी सन् का कोई निश्चित अंतर नहीं रहता. उसका निश्चय गणित से ही होता है.
१ सूर्यसिद्धांत के अनुसार. २ नवलकिशोर प्रेस (लखनऊ) की छपी हुई 'आईन अकबरी' दफ़्तर १, पृ. ३३७.
३ 'ग़यासुललुगात' में 'अजायबउल्बुल्दान' के हवाले से हिजरी सन् १७ में यह निर्णय होना लिखा है (नवलकिशोर
प्रेस का छपा, 'ग़यासुललुगात', पृ. ३२४).