प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
तीखे गोल मुख की शलाका को उनपर दबा कर अक्षर कुरेदते थे. फिर पत्रों पर कज्जल फिरा
देने से अक्षर काले बन जाते थे. कम लंबाई के पत्रों के मध्य में एक, और अधिक लंबाईवालों के
मध्य से कुछ अंतर पर दाहिनी और बांई ओर एक एक, छिद्र किया जाता था. पुस्तकों के नीचे
और ऊपर उसी अंदाज़ के सूराखवाली लकड़ी की पाटियां रहती थीं. इन सूराखों में डोरी डाली
जाने से एक माप की एक या अधिक पुस्तकें एकत्र बंध सकती थीं. पढ़ने के समय डोरी को
ढीला करने से प्रत्येक पन्ना दोनों ओर से आसानी के साथ उलटाया तथा पढ़ा जा सकता था. सुंदर सस्ते
कागज़ों के प्रचार के साथ ताड़पत्रों का प्रचार कम होता गया और अब तो बंगाल में कोई कोई 'दुर्गा-
पाठ' लिखने में ही उन्हें काम में लेते हैं. भारत के सब से दक्षिणी और दक्षिणपूर्वी हिस्सों की
प्रारंभिक पाठशालाओं में विद्यार्थियों के लिखने में या रामेश्वर, जगदीश आदि के मंदिरों में जमा
कराये हुए रुपयों की रसीदें देने आदि में ताड़पत्र अब भी काम में आते हैं. दक्षिण की अधिक
उष्ण हवा में ताड़पत्र के पुस्तक उतने अधिक समय तक रह नहीं सकते जितने कि नेपाल आदि
शीत देशों में रह सकते हैं.
अब तक मिले हुए स्याही से लिखे ताड़पत्र के पुस्तकों में सब से पुराना एक नाटक का
कुछ त्रुटित अंश है जो ई. स. की दूसरी शताब्दी के आस पास का है १. मि. मॅकार्टने के काशगर से भेजे
हुए ताड़पत्रों के टुकड़े ई. स. की चौथी शताब्दी के हैं २. जापान के होरियूज़ि के मठ में रक्खे हुए
'प्रज्ञापारमिताहृदयसूत्र' तथा 'उष्णीषविजयधारणी' नामक बौद्ध पुस्तक ३, जो मध्य भारत से वहां पहुंचे
थे, ई. स. की ६ठी शताब्दी के आस पास के लिखे हुए हैं. नेपाल के ताड़पत्र के पुस्तक्संग्रह
में ई. स. की ७वीं शताब्दी का लिखा हुआ 'स्कंदपुराण' ४, कैंब्रिज के संग्रह में हर्ष संवत् २५२
(ई. स. ८५६) का लिखा हुआ 'परमेश्वरतंत्र' ५ और नेपाल के संग्रह में नेवार सं. २८ (ई. स.
६०६-७) ६ का लिखा हुआ 'लंकावतार' नामक पुस्तक हैं. ई. स. की ११ वीं शताब्दी और उसके पीछे के
तो अनेक ताड़पत्र के पुस्तक गुजरात, राजपूताना, नेपाल आदि के एवं यूरोप के कई पुस्तक्संग्रहों
में रक्खे हुए हैं. दक्षिणी शैली के अर्थात् लोहे की तीक्ष्ण अग्रभागवाली शलाका से दबा कर
बनाये हुए अक्षरवाले पुस्तक ई. स. की १५ वीं शताब्दी से पहिले के अब तक नहीं मिले जिसका
कारण दक्षिण की उष्ण हवा से उनका शीघ्र नष्ट होना ही है.
भूर्जपत्र (भोजपत्र).
भूर्जपत्र (भोजपत्र) — 'भूर्ज' नामक वृक्ष की, जो हिमालय प्रदेश में बहुतायत से होता है,
भीतरी छाल है. सुलभता तथा नाममात्र के मूल्य से बहुत मिलने के कारण प्राचीन काल में
वह पुस्तक, पत्र आदि के लिखने के काम में बहुत आता था. अलबेरूनी लिखता है कि 'मध्य
और उत्तरी भारत के लोग 'तूज़' (भूर्ज) वृक्ष की छाल पर लिखते हैं. उसको 'भूर्ज' कहते
हैं. वे उसके प्रायः एक गज़ लंबे और एक बालिश्त चौड़े पत्रे लेते हैं और उनको भिन्न भिन्न
प्रकार से तय्यार करते हैं. उनको मज़बूत और चिकना बनाने के लिये वे उनपर तेल लगाते हैं
और [घोट कर] चिकना करते हैं, फिर उनपर लिखते हैं*.' भूर्जपत्र लंबे चौड़े निकल आते हैं
जिनको काट कर लेखक अपनी इच्छानुसार भिन्न भिन्न लंबाई चौड़ाई के पत्रे बनाते और
१. देखो, ऊपर पृ. २, टिप्पण २. २. ज. प. सो. बंगा; जि. ६६, पृ. २१८; प्लेट ७, संख्या १, टुकड़े ६ (a से i तक).
३. ऐं. ऑ. (आर्यन सीरीज); प्लेट १-४.
४. ह; कँ. पा; अंग्रेजी भूमिका, पृ. ५२, और अंत का प्लेट. ५. ह; कँ. पा; अंग्रेजी भूमिका, पृ. ५२.
६. ह; कँ. पा; पृ. १४०. * सा; अ. इं; जि. १, पृ. १७१.
१४४ प्राचीनलिपिरुमाला.
उनपर स्याही से लिखते थे. ताड़पत्रों का अनुकरण कर भूर्जपत्र की पुस्तकों के प्रत्येक पत्रे का मध्य
का हिस्सा खाली छोड़ा जा कर उसमें छेद किया जाता था. पुस्तक के ऊपर और नीचे रक्खी जाने-
वाली लकड़ी की पार्टियों में भी उसी अंदाज़ से छेद रहता था. इस प्रकार सब पत्रों के छेदों में
डोरी पोई जाकर पार्टियों पर लपेट ली जाती थी. मुगलों के समय से कश्मीरवाले भूर्जपत्र के
पुस्तकों पर वर्तमान किताबों की नांईं चमड़े की जिल्दें भी बांधने लगे. सस्ते और सुंदर कागज़ों
के प्रचार के साथ भूर्जपत्र पर पुस्तकें लिखने की प्रथा कम होती गई और अब तो केवल
हिंदुओं में तावीज़ों के लिये यंत्र लिखने के काम में उसका प्रचार रहा है जिससे हरेक बड़े शहर में
पंसारियों आदि की दुकानों पर वह मिल जाता है.
भूर्जपत्र पर लिखी हुई पुस्तकें विशेष कर कश्मीर में मिलती हैं और कुछ उड़ीसा आदि में.
हिंदुस्तान में पूना आदि के तथा यूरोप के कई प्राचीन हस्तलिखित पुस्तकसंग्रहों में भूर्जपत्र पर
लिखी हुई पुस्तकें सुरक्षित हैं जो बहुधा कश्मीर से ही ली गई हैं. भूर्जपत्र पर लिखी हुई सब
से पुरानी पुस्तक, जो अब तक मिली है, खोतान से मिला हुआ खरोष्ठी लिपि के 'धंमपद' (प्राकृत)
का कुछ अंश है. वह ई. स. की दूसरी या तीसरी शताब्दी का लिखा हुआ होना चाहिये. 'संयुक्ता-
गमसूत्र' (संस्कृत) ई. स. की चौथी शताब्दी का लिखा हुआ मिला है१०. मि. बावर के पुस्तक
ई. स. की छठी शताब्दी के आस-पास के और बख्शाली का अंकगणित ई. स. की ८ वीं शताब्दी के
आस पास का लिखा हुआ प्रतीत होता है. ये पुस्तक स्तूपों के भीतर रहने या पत्थरों के बीच
गड़े रहने से ही इतने दीर्घकाल तक बचने पाये हैं परंतु खुले रहनेवाले भूर्जपत्र के पुस्तक ई. स. की
१५ वीं शताब्दी के पूर्व के नहीं मिलते जिसका कारण यही है कि भूर्जपत्र, ताड़पत्र या कागज़
जितना टिकाउ नहीं होता.
कागज़.
यह माना जाता है कि पहिले पहिल चीनवालों ने ई. स. १०५९ में कागज़ बनाया, परंतु उससे
४३२ वर्ष पूर्व अर्थात् ई. स. पूर्व ३२७ में, निआर्कस, जो सिकंदर बादशाह के साथ हिंदुस्तान में
आया था, अपने व्यक्तिगत अनुभव से लिखता है कि 'हिंदुस्तान के लोग रुई को कूट कर लिखने
के लिये कागज़ बनाते हैं२०. इससे स्पष्ट है कि ई. स. पूर्व की चौथी शताब्दी में भी यहांवाले रुई
या चीथड़ों से कागज़ बनाते थे, परंतु हाथ से बने हुए कागज़ सस्ते और सुलभ नहीं हो सकते. यहां
पर ताड़पत्र और भूर्जपत्र (भोजपत्र) की बहुतायत होने और नाममात्र के मूल्य से उनके बहुत मिल
जाने से कागज़ों का प्रचार कम ही होना संभव है. यूरोप के बने हुए सस्ते और सुंदर
कागज़ों के प्रचार के पहिले भी इस देश में चीथड़ों से कागज़ बनाने के कई कारखाने थे और अब
भी हैं परंतु यहां के बने कागज़ चिकने न होने से पुस्तक लिखने की पक्की स्याही उनमें और
पार फैल जाती थी. इस लिये उनपर गेहूं या चावल के आटे की पतली लेई लगा कर उनको सुखा
देते थे जिससे वे कड़े पड़ जाते थे. फिर शंख आदि से घोटने से वे चिकने और कोमल हो जाते
१० देखो, ऊपर पृष्ठ २, टिप्पण २.
२० बा; ए. इं; पृ. २२६.
- इस विषय में मैक्समुलर लिखता है कि 'निआर्कस् भारतवासियों का रुई से कागज़ बनाने की कला का जानना
प्रकट करता है' (देखो, ऊपर पृ. ३, टि. ७), और बूलर निआर्कस के कथन का आशय अच्छी तरह कूट कर तय्यार किये
हुए रुई के कपड़ों के 'पट' से होना मानता है (बू; इं. पे; पृ. ६८) जो भ्रमपूरित है क्योंकि 'पट' अब तक बनते हैं और वे
सर्वथा कूट कर नहीं बनाये जाते (उनका विवेचन आगे किया जायगा). निआर्कस् का अभिप्राय कागज़ों से ही है.
लेखनसामग्री. १४५
थे तभी उनपर पुस्तक लिखे जाते थे. जैन लेखकों ने कागज़ की पुस्तकें लिखने में ताड़पत्र पर
लिखी हुई पुस्तकों का अनुकरण किया है, क्यों कि उनकी लिखी हुई पुरानी पुस्तकों में ताड़पत्रों की
पुस्तकों की नांई प्रत्येक पत्ते का मध्य का हिस्सा, जहां डोरी डाली जाती थी, बहुधा खाली छोड़ा
हुआ मिलता है जिसमें कहीं हिंगलू का वृत्त और चतुर्मुख वापी आदि के रंगीन या खाली चित्र
मिलते हैं. इतना ही नहीं, ई. स. की १४ वीं शताब्दी की लिखी हुई पुस्तकों१ में प्रत्येक पत्ते
और ऊपर नीचे की पाटियों तक में छेद किये हुए भी देखने में आये हैं यद्यपि उन छेदों की कोई
आवश्यकता न थी.
भारतवर्ष के जलवायु में कागज बहुत अधिक काल तक नहीं रह सकता. काग़ज पर लिखी
हुई पुस्तकों में, जो अब तक इस देश में मिली हैं, सब से पुरानी ई. स. १२२३-२४ की बतलाई जाती है२,
परंतु मध्य एशिया में यारकंद नगर से ६० मील दक्षिण 'कुगियर' स्थान से ज़मीन में गड़े हुए
भारतीय गुप्त लिपि के ४ पुस्तक मि. वेबर को मिले जो ई. स. की पांचवीं शताब्दी३ के आस पास
के होने चाहिये. इसी तरह मध्य एशिया के काशगर आदि से जो जो पुराने संस्कृत पुस्तक४
मिले हैं वे भी उतने ही पुराने प्रतीत होते हैं.
रूई का कपड़ा.
रूई का कपड़ा जिसको 'पट' कहते हैं प्राचीन काल से लिखने के काम में कुछ कुछ आता
था और अब तक भी आता है. उसे भी कागजों की तरह पहिले आटे की पतली लेई लगा कर
सुखाते हैं, फिर शंख आदि से घोट कर चिकना बनाते हैं तब वह लिखने के काम में आता है.
जैनों के मंदिरों की प्रतिष्ठा के समय अथवा उत्सवों पर रंगीन चावल आदि अन्नों से जो भिन्न
भिन्न मंडल बनाये जाते हैं उनके पटों पर बने हुए रंगीन नक्शों का संग्रह जैन मंदिरों या उपासरों
में पुस्तकों के साथ जगह जगह मिलता है५. ब्राह्मणों के यहां 'सर्वतोभद्र,' 'लिंगतोभद्र' आदि
१. अजमेर के सेठ कल्याणमल ढड्ढा के यहां हस्तलिखित प्राचीन जैन एवं अन्य पुस्तकों का बड़ा संग्रह है. उसमें
ज्योतिषसंबंधी पुस्तकों तथा विषयों के संग्रह का २६२ पत्रों का एक पुस्तक है जिसके पत्रांक प्राचीन और नवीन शैली दोनों
तरह से दिये हुए हैं. उसके प्रारंभ में दो पत्रों में उक्त संग्रह की पत्रांकसहित विषयसूची भी लगी हुई है जो वि. सं. १४२६
(ई. स. १३७२) में उक्त संग्रह के लेखक श्रीलोकहिताचार्य ने ही तैयार की थी. उक्त पुस्तक के प्रत्येक पत्रे के मध्य के खाली
छोड़े हुए हिस्से में बने हुए हिंगलू के वृत्त में सूराख बना हुआ है और ऊपर नीचे की पाटियों में भी. वहीं के २३५ पत्रों के
एक दूसरे पुस्तक में, जिसमें भिन्न भिन्न पुस्तकों का संग्रह है और जो १४ वीं शताब्दी के आस पास का लिखा हुआ प्रतीत
होता है (संवत् नहीं दिया), इसी तरह सूराख बने हुए हैं.
२. गुजरात, काठियावाड़, कच्छ, सिंध और खानदेश के खानगी पुस्तकसंग्रहों की सूचियां, बूलर संगृहीत, भाग १,
पृ. २३८; पुस्तकसंख्या १४७.
३. देखो, ऊपर पृ. २, टि. ४.
४. ज. ए. सो. बंगा; जि. ६६, पृ. २१३-२६०. इन पुस्तकों में से जो मध्य एशिया की गुप्तकाल की लिपि में हैं वे तो
मध्य एशिया के ही लिखे हुए हैं, परंतु कितने एक जो भारतीय गुप्त लिपि के हैं (सेट ७, संख्या ३ के a, b, c, e, f टुकड़े;
संख्या ५-८, ११. सेट १३, १५, १६) उनका भारतवर्ष से ही वहां पहुंचना संभव है जैसे कि होर्युज़ी के मठ के ताड़पत्र के
और मि० बावर के भोजपत्र के पुस्तक यहीं से गये हुए हैं. बूलर आदि कितने एक यूरोपियन विद्वानों ने यूरोप की नांई
भारतवर्ष में भी काग़ज़ों का प्रचार मुसलमानों ने किया ऐसा अनुमान कर मध्य एशिया से मिले हुए भारतीय गुप्त लिपि
के पुस्तकों में से एक का भी यहां से वहां पहुंचना संदेहरहित नहीं माना परंतु थोड़े समय पूर्व डॉ० सर् ऑरल स्टाइन
को चीनी तुर्कस्तान से चींथड़ों के बने हुए ई. स. की दूसरी शताब्दी के जो काग़ज़ मिले उनके आधार पर डा० बार्नेट ने
लिखा है कि 'यह संभव है कि मुगलों (? मुसलमानों) के आने से बहुत पहिले हिंदुस्तान में काग़ज़ का प्रचार होगा परंतु
उसका उपयोग कम होता था (बा; ऐं. ई; पृ. २२६-३०).
५. अजमेर के बीसपंथी आम्नाय के बड़े धड़े के दिगंबर जैन मंदिर में २० से अधिक पट रक्खे हुए हैं, जिनपर ढाई
द्वीप, तीन लोक, तेरह द्वीप, जंबू द्वीप आदि के विवरणसहित रंगीन चित्र हैं. उनमें से कितने एक पुराने और कुछ नये हैं.
१४६ प्राचीनलिपिमाला.
मंडलों के पट पर बने हुए रंगीन नक्शे तथा 'मातृकास्थापन', 'ग्रहस्थापन' के सादे नक्शे मिलते हैं
जिनके प्रत्येक कोष्ठ में स्थापित किये जानेवाले देवता आदि का नाम स्याही से यथास्थान लिखा
रहता है. राजपूताने में 'भडली' या 'गुरडे' लोग कपड़े के लंबे लंबे खरड़ों पर लिखे हुए पंचांग
रखते हैं जिनमें देवताओं, अवतारों आदि के रंगीन चित्र भी होते हैं. वे गांवों और खेतों
में फिर कर वहां के लोगों को पंचांग सुना कर और उनके साथ के रंगीन चित्रों का हाल कह कर
अपनी जीविका चलाते हैं. दक्षिण में माईसोर आदि की तरफ के व्यापारी लोग कपड़े पर इमली
की गुठली की लेई लगा कर पीछे उसको काला करते हैं और उससे अपने हिसाब की 'बही' बनाते हैं
जिसको 'कडितम्' कहते हैं और उसपर खड़िया से लिखते हैं. ऐसे दो तीन सौ वर्ष तक के
पुराने सैंकड़ों कड़िते शृंगेरी के मठ में मिले हैं, जिनमें मठ के हिसाब, शिलालेखों और ताम्र-
पत्तों आदि की नकलें, तथा गुरुपरंपरा आदि बातें लिखी हुई हैं. पाटण (अणहिलवाड़ा) के एक
जैन पुस्तकमंडार में श्रीप्रभसूरिरचित 'धर्मविधि' नामक पुस्तक, उदयसिंह की टीका सहित,
१३ इंच लंबे और ५ इंच चौड़े कपड़े के ६३ पत्रों पर लिखा हुआ विद्यमान है१. कपड़े के पत्रे
बना कर उनपर पुस्तक लिखे जाने का केवल यही एक उदाहरण मिला है.
लकड़ी का पाटा और पाटी.
भारतवर्ष में पत्थर की स्लेटों के प्रचार के पहिले प्राचीन काल से ही विद्यार्थी लोग पाटों पर
लिखना सीखते थे. ये पाटे लकड़ी के होते थे और चारों कोनों पर चार पाये उसी लकड़ी में से
निकाले हुए होते थे. पाटों पर मुलतानी मिट्टी या खड़िया पोत कर सुखा देते थे. फिर उनपर
ईंटों की सुरखी बिछा कर तीखे गोल मुख की लकड़ी की कलम से, जिसको राजपूताने में 'बरतना'
या 'बरथा' (वर्त्तक) कहते हैं, लिखते थे. अब पाटों के स्थान में स्लेटों का प्रचार हो गया है तो
भी कितने ही ग्रामीण पाठशालाओं के विद्यार्थी अब तक पाटों पर ही 'पहाड़े', 'हिसाब' आदि
लिखते हैं. ज्योतिषी लोग अब तक बहुधा जन्मपत्र और वर्षफल आदि का गणित ३ पाटों पर करने
के बाद कागजों पर उतारते हैं. बच्चों की जन्मकुंडलियां तथा विवाह के समय लग्नकुंडलियां
प्रथम पाटे पर गुलाल बिछा कर उसपर ही बनाई जाती हैं. फिर वे कागज़ पर लिखी जाकर
यजमानों को दी जाती हैं.
लकड़ी की बनी हुई पतली पाटी (फलक) पर भी प्राचीन काल में विद्यार्थी लिखते थे. बौद्धों
की जातक कथाओं में विद्यार्थियों के फलक का उल्लेख मिलता है ४. अब भी उसपर मुलतानी
मिट्टी या खड़िया पोतने बाद स्याही से लिखते हैं. अब तक राजपूताना आदि के बहुत से दुका-
नदार बिक्री या रोकड़ का हिसाब पहिले ऐसी पाटियों पर लिख लेते हैं, फिर अवकाश के समय
उसे बहियों में दर्ज करते हैं. विद्यार्थियों को सुंदर अक्षर लिखना सिखलाने के लिये ऐसी पाटियों
को बहुधा एक तरफ़ लाल और दूसरी ओर काली रंगवाते हैं. फिर सुंदर अक्षर लिखनेवाले से उन-
पर हरताल से वर्णमाला, बारहखड़ी (द्वादशाक्षरी) आदि लिखवा कर उनपर रोगन फिरा देते हैं
सब से छोटा १ फुट ५ १/२ इंच लंबा और उतना ही चौड़ा, और सबसे बड़ा १५ १/२ फुट लंबा और ५ फुट ७ १/२ इंच चौड़ा है.
कितने ही अन्य स्थानों में भी ऐसे अनेक पट देखने में आये हैं.
१. माइसोर राज्य की आर्किआलॉजिकल सर्वे की रिपोर्ट, ई. स. १६१६, पृ. १८.
२. पी. पीटर्सन की बंबई इहाते के संस्कृत पुस्तकों की खोज की पांचवीं रिपोर्ट, पृ. ११३.
३. इस प्रकार गणित करने की चाल को ज्योतिष शास्त्र के ग्रंथों में 'धूलीकर्म' कहा है.
४. देखो, ऊपर पृ. ३, और उसी पृष्ठ का टिप्पण २.
लेखनसामग्री. १४७
जिससे उनपर के हरताल के अक्षर पक्के हो जाते हैं. फिर विद्यार्थी लोग खड़िया को पानी में
घोल कर नड (बरू) की कलम से उनपर लिखने का अभ्यास करते हैं जिसको 'पाटी घोटना'
कहते हैं. इस तरह कुछ समय तक उनपर लिखने से विद्यार्थियों के अक्षर सुंदर बनने लग जाते हैं.
प्राचीन पुस्तकों की नक़ल करनेवाले अर्थात् पुस्तकलेखक लकड़ी की सादी या रंगीन पाटी
पर, ऊपर से करीब ४ इंच छोड़ कर, डोरी लपेटते हैं और उसमें चार पांच इंच लंबी पतली लकड़ी
लगा देते हैं, जिससे मूल प्रति का पन्ना दबा रहता है. उस पाटी को घुटनों पर रख ज़मीन पर बैठ
कर पुस्तकों की नक़ल करते हैं.
रेशमी कपड़ा.
रेशमी कपड़ा भी सूती कपड़े की नांईं प्राचीन काल में लिखने के काम में लाया जाता था
परंतु उसके बहुत महंगे होने के कारण उसका उपयोग बहुत कम ही होता होगा. अलबेरुनी लिखता
है कि 'मैंने यह सुना कि रेशम पर लिखी हुई काबुल के शाहियावंशी हिंदू राजाओं की वंशावली
नगरकोट के क़िले में विद्यमान है. मैं उसे देखने को बहुत उत्सुक था परंतु कई कारणों से वह
न बन सका''. डॉ. बूलर ने जेसलमेर के 'बृहत् ज्ञानकोष' नामक जैन पुस्तकभंडार में रेशम की
एक पट्टी पर स्याही से लिखी हुई जैन सूत्रों की सूची देखी थी२.
चमड़ा.
यूरोप तथा अरब आदि एशिया के देशों में प्राचीन काल में लेखनसामग्री की सुलभता न
होने से वहां क लोग जानवरों के चमड़ों को साफ़ कर उनपर भी लिखते थे परंतु भारतवर्ष में ताड़पत्र,
भोजपत्र आदि प्राकृतिक लेखनसामग्री की प्रचुरता तथा सुलभता एवं जैनों में चर्मपात्र, तथा वैदिक
काल के पीछे के ब्राह्मणों के मृगचर्म के अतिरिक्त और चमड़ा, अपवित्र माना जाने के कारण लिखने
में उसका उपयोग शायद ही होता हो. तो भी कुछ उदाहरण ऐसे मिल आते हैं जिनसे पाया जाता
है कि चमड़ा भी लिखने के काम में कुछ कुछ आता होगा. बौद्ध ग्रंथों में चमड़ा लेखनसामग्री में गिनाया
गया है३. सुबंधु ने अपनी 'वासवदत्ता' में अंधकारयुक्त आकाश में रहे हुए तारों को स्याही से काले
किये हुए चमड़े पर चंद्रमा रूपी खड़िया के टुकड़े से बनाये हुए शून्यबिंदुओं (बिंदियों) की उपमा दी
है४. जेसलमेर के 'बृहत् ज्ञानकोष' नामक जैन पुस्तकभंडार में बिना लिखे हुए एक चर्मपत्र का
हस्तलिखित पुस्तकों के साथ मिलना डॉ. बूलर बतलाता है५.
पत्थर.
ताड़पत्र, भूर्जपत्र (भोजपत्र) या काग़ज़ पर लिखा हुआ लेख बहुत काल तक बचा नहीं रहता इस
लिये जिस घटना की यादगार चिरस्थायी करना होता उसको लोग पत्थर पर खुदवाते थे और अब
भी खुदवाते हैं. ऐसे लेख चट्टान, स्तंभ, शिला, मूर्तियों के आसन या पीठ, पत्थर के पात्रों या उन-
१. सं; अ. इं; जि. २, पृ ११. २. बूं; इं पे; पृ ६३. ३. कच्चायन की भूमिका, पृ. २७. बूं; इं. पे; पृ. ६५.
४. विश्वं गणयतो विधातुः शशिकठिनीखण्डेन तमोमषीश्यामेऽजिन इव नभसि संसारस्यातिशून्यत्वाच्छून्यबिन्दव इव (वासव-
दत्ता; हॉल का संस्करण, पृ. १८२).
५. बूं; इं. पे; पृ. ६५.
१४८ प्राचीनलिपिमाला.
के ढकनों पर खुदे हुए मिलते हैं. पत्थर पर खुदे हुए लेखों को 'शिलालेख,' और जिनमें
राजाओं आदि का प्रशंसायुक्त वर्णन होता है उनको 'प्रशस्ति' कहते हैं. जिस आधार पर लेख
खुदवाना होता वह यदि समान और चिकना न हो तो पहिले टांकियों से छील कर उसे समान बनाते
फिर पत्थर आदि से घोटकर वह चिकना बनाया जाता था १. जिस आशय का लेख लिखना होता
उसकी रचना कोई कवि, विद्वान्, राजकीय अधिकारी २ या अन्य पुरुष करता. फिर सुंदर अक्षर
लिखनेवाला लेखक ३ एक एक अथवा दो दो पंक्तियां स्याही से पत्थर पर लिखता और उनको कारी-
गर (सूत्रधार) खोदता जाता था. इस प्रकार क्रमशः सारा पत्थर खोदा जाता ४. इस प्रकार
से तैयार किये जाते हुए शिलालेख मैंने स्वयं देखे हैं. लिखने के पूर्व पंक्तियां सीधी लाने के लिये यदि
पत्थर अधिक लंबा होता तो सूत की पतली डोरी को गेरू में भिगो कर उससे पंक्तियों के
निशान बनाते, जैसे कि लकड़ी के लट्ठे को चीर कर तख्ते निकालनेवाले खाती लोग लट्ठे पर बनाते .
हैं, और पत्थर कम लंबाई का होता तो गज़ या लकड़ी की पट्टी रख कर उसके सहारे टांकी आदि
से लकीर का निशान बना लेते. मंदिर, बावडी आदि की भींतों में लगाये जानेवाले लेख पत्थर
की छोटी बड़ी पट्टियों (शिलाओं) पर खुदवाये जाकर बहुधा ताकों में, जो पहिले बना लिये जाते
थे, लगाये जाते थे. ऐसे लेखों के चारों ओर पुस्तकों के पत्रों की नांई हाशिआ छोड़ा जाता था.
कभी कभी खोदे जानेवाले स्थान के चारों ओर लकीरें ५ खुदी हुईं मिलती हैं. कभी वह स्थान
पाव इंच से एक इंच या उससे भी अधिक खोद कर हाशिये से नीचा ६ किया हुआ मिलता है.
अधिक सावधानी से खुदवाये हुए लेखों में कभी पत्थर की चटक उड़ गई तो उसमें पत्थर के रंग की
मिश्रधातु भर कर उस स्थान को समान बनाते थे और यदि अक्षर का कोई अंश चटक के साथ
उड़ जाता तो उसको पीछा उस धातु पर खोद लेते थे ७. बहुधा शिलालेखों के प्रारंभ में
और कभी अंत में कोई मंगल सूचक सांकेतिक चिह्न ८, शब्द ९ या किसी देवता के प्रणामसूचक
१. यह हाल सावधानी के साथ तय्यार किये हुए लेखों का है. कई लेख खरदरे पत्थरों पर बेपरवाही के साथ खोदे
हुए भी मिलते हैं.
२. जिन शिलालेखों में राजा की तरफ़ की किसी आज्ञा आदि का उल्लेख होता उन्हें राजकर्मचारी ही तय्यार करते थे.
३. लेखक बहुधा ब्राह्मण, कायस्थ, जैन साधु या सूत्रधार (सिलावट) लोग होते थे.
४. हिंदुओं के शिलालेखों के अक्षर पत्थर के भीतर खांदे जाते हैं परंतु मुसल्मानों के अरबी या फ़ारसी के लेखों के अक्षर
उभडे हुए होते हैं और पत्थर का वह अंश जहां पर अक्षर नहीं होता टांकियों से तोड़कर उड़ा दिया जाता है. कोई कोई हिंदू मुसल्-
मानों का अनुकरण कर उभड़े हुए अक्षरवाले लेख भी बनाने लग गये परंतु ऐसे लेख बहुत ही कम मिलते हैं. अब तक ऐसे केवल दो
ही लेख मेरे देखने में आये हैं. एक तो मथुरा के म्यूज़िअम में और दूसरा बाड़ी(धौलपुर राज्य में) में. ये दोनों मुसल्मानों के समय के हैं.
५. अशोक के गिरनार के लेख की १४ धर्माज्ञाओं में से प्रत्येक के चारों ओर लकीरें खुदी हुई हैं. वि. सं. १३७३
(ई. स. १३१६) के लाडनू (जोधपुर राज्य में) से मिले हुए लेख (जो राजपूताना म्यूज़िअम, अजमेर, में रक्खा हुआ है)
के चारों ओर लकीरें हैं (पें. इं; जि. १२, पृ. २४ के पास का प्लेट)
६. वसंतगढ़ (सिरोही राज्य में) से मिले हुए परमार राजा पूर्णपाल के समय के वि. सं. १०६६ (ई. स. १०४२) के लेख का, जो
राजपूताना म्यूज़िअम में रक्खा हुआ है, खुदा हुआ अंश हाशिये से करीब पाव इंच नीचा है और वहीं रक्खे हुए अर्थूणा (बांसवाड़ा
राज्य में) के दो शिलालेखों का खुदा हुआ अंश प्रायः एक इंच नीचा है. उनमें से एक (खंडित) परमार राजा चामुंडराज के समय
का वि. सं. ११५७ (ई. स. ११०१) का और दूसरा परमार राजा विजयराज के समय का वि. सं. ११६६ (ई. स. १११०) का है.
७. राजपूताना म्यूज़िअम (अजमेर) में अजमेर के चौहान राजा विग्रहराज (बीसलदेव) रचित 'हरकेलिनाटक',
की तथा सोमेश्वर पंडितरचित 'ललितविग्रहराजनाटक' की दो दो शिलाएं रक्खी हुई हैं. इन चारों शिलाओं में कई जगह
धातु भरी हुई है और कहीं उसपर अक्षर का अंश भी खुदा हुआ है.
८. चिह्नों में स्वस्तिक (आ. स. स. ई; जि. १, प्लेट ६६; आ. स. वे. इं; जि. ४, सेट ४६, लेख संख्या ५, ६, ७, ८, ११,
१३, १४ आदि), चक्र (धर्मचक्र) पर रहा हुआ त्रिशूल (त्रिरत्न; आ. स. वे. इं; जि. ४, सेट ४६, लेख संख्या ८, १०, १५ आदि),
'ओं' का सांकेतिक चिह्न (देखो, लिपिपत्र १६, २१, २३ आदि के साथ दी हुई मूल पंक्तियों के आरंभ में) तथा कई अन्य
चिह्न मिलते हैं जिनका आशय ठीक ठीक ज्ञात नहीं हुआ (आ. स. वे. इं; जि ४, सेट ४४, भाजा का लेख ७; प्लेट ४५, कूडा
के लेख १, ६, १६; सेट ४६, कुड (के लेख २०, २२, २७, २६).
९. शब्दों में 'सिद्धम्' (पें. इं; जि. १२, पृ. ३२० के पास का सेट. लिपिपत्र ७, ८, ११, १२, १५ आदि के साथ दी हुई
शब्द १ मिलते हैं. वर्तमान लेखनशैली के अनुसार उनमें पदच्छेद अर्थात् प्रत्येक शब्द का अलग
अलग लिखना नहीं मिलता परंतु पंक्ति की पंक्ति बिना स्थान छोड़े लिखी जाती थी. कभी कभी
शब्द अलग अलग भी लिखे मिलते हैं २ परंतु किसी नियम से नहीं. विराम के चिह्नों के लिये
केवल एक और दो खड़ी लकीरों (दंड) का बहुधा प्रयोग होता था ३. श्लोकार्ध बतलाने अथवा
शब्दों या वाक्यों को अलग करने के लिये एक, और श्लोकांत या विषय की समाप्ति के लिये दो खड़ी
लकीरें बहुधा बनाई जाती थीं ४. कहीं कहीं प्रत्येक पंक्ति में आधा या एक श्लोक ही लिखा हुआ
मिलता ५ है और कभी कविताबद्ध लेखों में श्लोकांक भी पाये जाते हैं ६. कभी अंत में अथवा एक
विषय की समाप्ति पर कमल ७, फूल ८, वृत्त ९ या कोई अन्य चिह्न १० भी खोदा जाता था. लेखक जब
मूलपंक्तियों के प्रारंभ में), 'स्वस्ति' (लिपिपत्र १७ की मूलपंक्तियों के प्रारंभ में 'ओँ' के सांकेतिक चिह्न के बाद), 'हरिः ओम्
स्वस्ति श्रीः' (ऍ. ई; जि. ३, पृ. १४ के पास का सेट) आदि.
१. 'ओँ (सांकेतिक चिह्न से) नमः शिवाय' (लिपिपत्र २१ की मूल पंक्तियों के प्रारंभ में), 'ओँ (सांकेतिक चिह्न से)
नमो विष्णवे' (लिपिपत्र २३ की मूल पंक्तियों के प्रारंभ में), 'नमो अरहतो वर्धमानस्य' (लिपिपत्र ५ की मूल पंक्तियों के
प्रारंभ में), 'ओँ (सांकेतिक चिह्न से) ओं नमो वीतरागाय' (राजपूताना म्यूज़िअम में रक्खे हुए परमार राजा विजय-
राज के समय के वि. सं. ११६६ के शिलालेख के प्रारंभ में), 'ओँ (सांकेतिक चिह्न से) नमो बुद्धाय' (ऍ. ई; जि. १२,
पृ. २८ के पास का सेट), 'ओं नमो रत्नत्रयाय' (शेरगढ का लेख; इं. पँ; जि. १४, पृ. ४५) आदि. लेखों के अंत में कभी कभी
'श्रीः', 'शुभं भवतु', 'श्रीरस्तु' आदि शब्द मिलते हैं और कभी कभी '॥ छ ॥' लिखा हुआ मिलता है. यह 'छ' प्राचीन 'थ'
अक्षर का रूपांतर प्रतीत होता है जो वास्तव में धर्मचक्र या सूर्य का सूचक होना चाहिये.
२. अशोक के देहली (इं. पँ; जि. १३, पृ. ३०६ से ३१० के बीच के सेट; जि. १६, पृ. १२२ और १२४ के बीच के सेट),
रधिया, मथिया, रामपुरवा (ऍ. ई; जि. २, पृ. २४८ से २५२ के बीच के सेट), पंदेरिया, निग्लिवा (ऍ. ई; जि ५, पृ. ४ के
पास का सेट) और सारनाथ (ऍ. ई; जि. ८, पृ. १६८ के पास का सेट) के स्तंभों के लेखों; खालसी के चट्टान की १ से ६
तक की धर्मज्ञाओं (ऍ. ई; जि. २, पृ. ४५० और ४५६ के बीच के दो सेट), एवं कितने एक अन्य लेखों में (आ. स. वे. इं; जि.
४, सेट ५२, लेखसंख्या ५, १०, १८, १६; सेट ५३, लेखसंख्या १३, १४; सेट ५४, लेखसंख्या ११; सेट ५६, लेखसंख्या ४; ऍ.
ई; जि. ८, पृ. १७६ के पास का सेट, लेख e) शब्दों या समासवाले शब्दों के बीच स्थान छोड़ा हुआ मिलता है.
३. इन विरामचिह्नसूचक लकीरों के लिये कोई निश्चित नियम नहीं था. कहीं बिना आवश्यकता के लगाई जाती थीं
और कहीं आवश्यकता होने पर भी छोड़ दी जाती थीं. कहीं लेख की प्रत्येक पंक्ति के प्रारंभ में (वेरावल से मिले हुए वलभी
संवत् ९२७ के लेख में प्रत्येक पंक्ति के प्रारंभ में दो दो खड़ी लकीरें हैं; ऍ. ई; जि. ३, पृ. ३०६ के पास का सेट) और कहीं
अंत में भी (अजमेर म्यूज़िअम में रक्खी हुई चौहानों के किसी ऐतिहासिक काव्य की शिलाओं में से पहिली शिला की बहुधा
प्रत्येक पंक्ति के अंत में एक या दो खड़ी लकीरें हैं) ऐसी लकीरें बिना आवश्यकता के मिलती हैं.
४. इन विरामसूचक लकीरों में भी अक्षरों की नांई सुंदरता लाने का यत्न करना पाया जाता है. कहीं खड़ी लकीर के
स्थान में अर्धवृत्त, कहीं उनके ऊपर के भाग में गोलाई या सिर की सी आड़ी लकीर और कहीं मध्य में आड़ी लकीर लगी
हुई मिलती है.
५. मौखरी अनंतवर्मन् के नागार्जुनी गुफा के लेख की प्रत्येक पंक्ति में आधा (फ्ली; गु. इं; सेट ३१ A) और अजंटा
की गुफा के एक लेख (आ. स. वे. इं; जि. ४, सेट ५६, लेखसंख्या ४) तथा गुलवाड़ा के पास की गुफा के घटोत्कच के लेख
(आ. स. वे. इं; जि. ४, सेट ६०) में एक एक श्लोक ही खुदा है.
६. समुद्रगुप्त के अलाहाबाद के अशोक के लेखवाले स्तंभ पर खुदे हुए लेख के श्लोकबद्व अंश में (फ्ली; गु. इं; सेट १)
तथा ग्वालियर से मिले हुए प्रतिहार राजा भोजदेव के शिलालेख (आ. स. ई; ई. स. १९०३-४, प्लेट ७२) में श्लोकांक दिये हैं.
७. जोधपुर से मिले हुए प्रतिहार राजा बाउक के लेख में, जो राजपूताना म्यूज़िअम (अजमेर) में रक्खा हुआ है,
संवत् के पूर्व कमल खुदा है.
८. चाहमान विग्रहराज के हर्षनाथ के लेख की ३३ वीं पंक्ति में विषय की समाप्ति पर फूल खुदा है (ऍ. ई; जि. २,
पृ. १२० के पास का सेट).
९. परताबगढ़ (राजपूताने में) से मिले हुए कन्नौज के प्रतिहार राजा महेंद्रपाल (दूसरे) के समय के वि. सं. १००३
(ई. स. ९४६) के शिलालेख में, जो राजपूताना म्यूज़िअम् (अजमेर) में रक्खा हुआ है, १४ वीं और ३० वीं पंक्तियों में
वृत्त (O) बने हुए हैं.
१०. वसंतगढ़ (सिरोही राज्य में) से मिले हुए परमार राजा पूर्णपाल के समय के वि. सं. १०६६ (ई. स. १०४२)
के शिलालेख के अंत में, तथा ऊपर दो जगह भिन्न भिन्न प्रकार के चिह्न बने हुए हैं. कितने एक लेखों के ऊपर के खाली
हिस्सों में शिवलिंग, नंदी, वत्ससहित गौ, सूर्य या चंद्र आदि के चित्र भी खुदे मिलते हैं.
किसी अक्षर या शब्द को भूल से छोड़ जाता तो वह अक्षर या शब्द या तो पंक्ति के ऊपर या नीचे
अथवा हाशिये पर लिखा जाता था और कभी वह अक्षर या शब्द किस स्थान पर चाहिये था यह
बतलाने के लिये ^ या $\times$ चिह्न भी मिलता है जिसको 'काकपद' या 'हंसपद' कहते हैं१. भूल से
अधिक लिखा हुआ अक्षर, शब्द, मात्रा या अनुस्वार आदि या तो टांकी से उड़ा दिया जाता या उस
पर छोटी छोटी खड़ी या तिरछी लकीर या लकीरें२ बना कर उसे काट दिया जाता था. कई लेखों के
अंत में उनके लगाये जाने या उनसे संबंध रखनेवाले स्थानों के बनने का संवत्, ऋतु, मास, दिन,
पक्ष, तिथि आदि३ एवं उनके रचयिता, लेखक और खोदनेवालों के नाम भी दिये हुए मिलते हैं४.
मंदिर आदि की दीवारों के ताकों में लगाये जानेवाले लेख बहुधा एक ही छोटी या बड़ी शिला पर
खुदे हुए होते हैं परंतु कभी पांच तक पर भी खुदे हुए मिलते हैं५. ये लेख प्राकृत, संस्कृत, कनड़ी,
तेलुगु, तामिळ, प्राचीन हिंदी आदि भाषाओं में हैं.
पुस्तकें भी चिरस्थायी रखने के लिये कभी कभी चट्टान या शिलाओं पर खुदवाई जाती थीं६.
१. बुद्धगया से मिले हुए अशोकचल्ल के लक्ष्मणसेन संवत् ५१ के लेख की पहिली पंक्ति में 'तथागतो ह्यवदत्' में
'तो' लिखना रह गया जिसको पंक्ति के ऊपर लिखा है और नीचे ^ चिह्न बनाया है (एं. इं; जि. १२, पृ. २८ के पास का 'प्लेट').
वि. सं. १२०७ की महावन की प्रशस्ति की ८ वीं पंक्ति में 'तस्याभूत्तनयो नयोन्नतमतिः' में दूसरा 'नयो' लिखना रह गया
जिसको पंक्ति के नीचे लिखा है. उसी प्रशस्ति की ११ वीं पंक्ति में [८ वें] श्लोक का चतुर्थ चरण लिखना रह गया, जो बाईं
ओर के हाशिये पर लिखा गया है और जहां वह चाहिये था उस स्थान पर पंक्ति के ऊपर () चिह्न किया है. ऐसे ही
उसी प्रशस्ति की २० वीं पंक्ति में [ १७ वां ] श्लोक रह गया वह भी बाईं ओर के हाशिये पर लिखा है और जहां वह चाहिये
था वहां पंक्ति के ऊपर $\times$ चिह्न किया है और वही चिह्न हाशिये पर (अंत में) दिया है (एं. इं; जि. २, पृ. २७६ के
पास का प्लेट).
२. बिल्हारी के लेख की पहिली पंक्ति [श्लोक १] में पहिले '० तोरगपतिः प्रस्फार ०' खुदा था परंतु पीछे से '० पीतः'
का विसर्ग टांकी से उड़ा दिया है तो भी नीचे की बिंदी का कुछ अंश दीखता है (एं. इं; जि. १, पृ. २५४ के पास का प्लेट).
उसी लेख की पांचवीं पंक्ति [श्लोक ६] में 'लीलोल्लालितशार्व्वपर्व्वतपते ०' खुदा था परंतु पीछे से 'शार्व्व' के 'शा' के साथ
लगी हुई 'आ' की मात्रा की सूचक खड़ी लकीर को तिरछी लकीर से काट दिया है. कणस्वा के लेख की १६ वीं पंक्ति में 'यति-
हीनंमथशव्दहीनं' खुदा था परंतु पीछे से 'मथं' के दोनों अक्षरों के ऊपर पांच छोटी खड़ी लकीरें बना कर उन्हें
काट दिया है (इं. ऐं; जि. १६, पृ. ५८ के पास का प्लेट).
३. कहीं पुराने लेखों में संवत् के साथ ऋतु और दिन ('कनिष्कस्य सं ४ हे १ दि १'—एं. इं; जि. १, पृ. ३८१); कहीं
ऋतु, मास और दिन ('सवत्सरे पचविशे हेमंतमसे त्रितिये दिवसं वीशे'—एं. इं; जि. १, पृ. ३८४); कहीं मास, पक्ष और
तिथि (रुद्रदाम्नो वर्षे द्विसप्ततितमे ७० २ मार्गशीर्षवहुलप्रति......—एं. इं; जि. ८, पृ. ४२) मिलते हैं. कहीं संवत् के स्थान
में राज्यवर्ष (सन जुलूस) भी मिलते हैं. चौथी शताब्दी के पीछे के लेखों में बहुधा संवत, मास, पक्ष, तिथि आदि मिलते हैं.
४. अर्थूणा (बांसवाड़ा राज्य में) के मंडलेसर के मंदिर में लगे हुए परमार चामुंडराज के वि. सं. ११३६ फाल्गुन
सुदि ७ शुक्र वार के कविताबद्ध बड़े लेख में उसका रचयिता चंद्र, लेखक वाल्भ्यजाति का कायस्थ आसराज और खोद-
नेवाला चामुंडक होना लिखा है.
५. कुंभलगढ़ (मेवाड़ में) के कुंभस्वामी (मामादेव) के मंदिर में लगा हुआ महाराणा कुंभकर्ण का लेख बड़ी बड़ी
पांच शिलाओं पर खुदा हुआ था जिनमें से ४ के टुकड़े मिल गये हैं.
६. प्राग्वाट (पोरवाड़) श्रेष्ठी (सेठ) लोलाक (लोलिंग) ने वीजोल्यां (मेवाड़ में) के निकट के जैन मंदिर के पास
के एक चट्टान पर 'उन्नतशिखरपुराण' नामक दिगंवर जैन पुस्तक वि. सं. १२२६ (ई. स ११७०) में खुदवाया जो अब
तक विद्यमान है. बीजोल्यां के विद्यानुरागी स्वर्गीय राव कृष्णसिंह ने उसपर तथा उसके पास के दूसरे चट्टान पर
खुदे हुए उक्त जैन मंदिर के संबंध के ही विशाल लेखपर भी (जो उसी संवत् का है और जिसमें चाहमान से लगाकर
सोमेश्वर तक की सांभर और अजमेर के चौहानों की पूरी वंशावली और लोलाक के वंश का वर्णन है) मेरे आग्रह से
पक्के मकान बनवा कर उनकी रक्षा का सुप्रबंध कर दिया है. चौहान राजा विग्रहराज (वीसलदेव) के बनाये हुए
'हरकेलिनाटक' की दो शिला, सोमेश्वर कविरचित 'ललितविग्रहराजनाटक' की दो शिला तथा चौहानों के किसी
ऐतिहासिक काव्य की पहिली शिला, ये पांचों अजमेर के ढाई दिन के झोंपड़े से (जो प्रारंभ में वीसलदेव की बनाई हुई
पाठशाला थी) मिली हैं और इस समय अजमेर के राजपूताना म्यूज़िअम में रक्खी हुई हैं. मालवे के प्रसिद्ध विद्वान्
राजा भोजरचित 'कूर्मशतक' नामक दो प्राकृत काव्य (एं. इं; जि. ८, पृ. २४३–६०) और राजकवि मदनरचित 'पारि-
जातमंजरी(विजयश्री) नाटिका'—एं. इं; जि. ८, पृ. १०१–१७, ये तीनों पुस्तक धार (मालवे में) में कमल मौला नामक
्ज़, ई. स. १८९६, पृ. १००-१०३. डे; बु. इं; पृ. १२२ के पास का प्लेट. Wait, what isडे; बु. इं;? Ah, डे; बु. इं;orबु; बु. इं;? Let's check: Wait: डे; बु. इं;-> No! It'sडू; बु. इं;orबु; बु. इं;? Wait, "Buddhist India" by Rhys Davids? Rhys Davids' *Buddhist India*! In Hindi: री; डे; बु. इं;? No, look at the characters: डे; बु. इं;-> wait, beforeडे, there's .then space, thenडे; बु. इं;orरी. डे.? Wait! Look at the letter before बु. इं;: १००-१०३.then space, thenरी.orडे.? It has an 'e' matra on a consonant: looks like डे;orरी;? Wait, बु. इं;is definitely *Buddhist India*! Rhys Davids = रीस डेविड्स. Could it beरि. डे.? Let's look closely: १००-१०३.thenरि.? No, it's डे; बु. इं;` or
१५२ प्राचीनलिपिमाला.
के लेखवाला एक सुवर्ण का पत्रा १ जनरल कनिंगहाम को मिला था. बर्मा के प्रोम ज़िले के
ह्ल्डवा नामक गांव के पास से दो सोने के पत्रे २ खुदे हुए मिले हैं. उनमें से प्रत्येक के प्रारंभ
में 'ये धर्महेतुप्रभवा०' श्लोक और उसके पीछे पाली भाषा का गद्य है. उनकी लिपि ई. स. की
चौथी या पांचवीं शताब्दी के आस पास की है और उसमें कई अक्षर दक्षिणी शैली के हैं.
चांदी.
सुवर्ण की नांई कभी कभी चांदी के पत्रों पर भी लेख खुदवाये जाते थे. ऐसा एक पन्ना
भट्टिप्रोलु के स्तूप से ३ और दूसरा तत्तशिला ४ से मिला है. जैन मंदिरों में चांदी के गट्टे ५ और यंत्र ५
मिलते हैं.
तांबा.
लेखन सामग्री के संबंध में धातुओं में तांबा सब से अधिक काम में आता था. राजाओं तथा
सामंतों की तरफ़ से मंदिर, मठ, ब्राह्मण, साधु आदि को दान में दिये हुए गांव, खेत, कुए आदि
की सनदें तांबे पर प्राचीन काल से ही खुदवा कर दी जाती थीं और अब तक दी जाती हैं जिनको
'दानपत्र', 'ताम्रपत्र', 'ताम्रशासन' या 'शासनपत्र' कहते हैं. दानपत्रों की रचना अमात्य (मंत्री),
सांधिविग्रहिक ६, बलाधिकृत (सेनापति) या अक्षपटलिक ७ आदि अधिकारियों में से कोई स्वयं
करता या किसी विद्वान् से कराता था. कहीं उस काम के लिये एक अधिकारी ८ भी रहता था.
फिर उसको सुंदर अक्षर लिखनेवाला लेखक तांबे के पत्रे पर स्याही से लिखता और सुनार, ठठेरा,
लुहार या कोई शिल्पी उसे खोदता था. कभी कभी ताम्रलेख रेखारूप में नहीं किंतु बिंदियों ९ से
खुदे हुए भी मिलते हैं. जिस पुरुष की मारफ़त भूमिदान की सनद तय्यार करने की राजाज्ञा पहुं-
चती उसको 'दूतक १०' कहते थे. दूतक का नाम बहुधा दानपत्रों में लिखा रहता है. दक्षिण से मिले
१. क; आ. स. रि; जि. २, पृ. १३० और प्लेट ५६.
२. ए. इं; जि. ५, पृ. १०१ और उसी के पास का प्लेट.
३. बु; इं; पे; पृ. ६५.
४. ज. रॉ. ए. सो; ई. स. १९१४, पृ. ६७५-७६ और ई. स. १९१५, पृ. १६२ के सामने का प्लेट.
५. जैन मंदिर में मूर्तियों के साथ पूजन में रक्खे हुए चांदी के गट्टे गोल आकृति के होते हैं जिनपर 'नमोकार मंत्र'
(नमो अरिहंताणं०) आठ दल के कमल और मध्य के वृत्त, इन नव स्थानों में मिल कर पूरा खुदा हुआ होने से उसको
'नवपदजी का गट्टा' कहते हैं. ऐसे ही चांदी के गट्टों पर यंत्र भी खुदे रहते हैं. अजमेर में श्वेताम्बर संप्रदाय के मूंतां के
मंदिर में चांदी के ४ नवपद के गट्टे और करीब एक फुट लंबे और उतने ही चौड़े चांदी के पत्रे पर 'ऋषिमंडलयंत्र' खुदा
है. वहीं के बड़े मंदिर (श्वेतांबरी) में 'ह्रीं बीज' तथा 'सिद्धचक्र' यंत्रों के गट्टे भी रक्खे हुए हैं.
६. 'सांधिविग्रहिक' उस राजमंत्री को कहते थे जिसको 'संधि' (सुलह) और 'विग्रह' (युद्ध) का अधि-
कार होता था.
७. 'अक्षपटलिक' राज्य के उस अधिकारी को कहते थे जिसके अधीन हिसाबसंबंधी काम रहता था परंतु
कभी इस शब्द का प्रयोग राज्य के दफ़्तर के अध्यक्ष के लिये भी होता था. अतएव संभव है कि दफ़्तर और हिसाब दोनों ही
कहीं कहीं एक ही अधिकारी के अधीन रहते हों.
८. कश्मीर के राजा ताम्रपत्र तय्यार करने के लिये 'पट्टोपाध्याय' नामक अधिकारी रखते थे. यह अधिकारी अक्ष-
पटलिक के अधीन रहता था (कल्हणकृत राजतरंगिणी, तरंग ४, श्लो. ३६७-६८).
९. देखो, ऊपर पृ. १००, टिप्पण ३.
१०. दूतक कभी कभी राजकुमार, राजा का भाई, कोई राज्याधिकारी आदि होते थे. कभी राजा स्वयं आज्ञा देता
था. राजपूताने में ई. स. की १४ वीं शताब्दी के आस पास से ताम्रपत्र राजस्थानी हिंदी में लिखे जाने लगे तो भी दूतक
का नाम रहता था (प्रत दुप).
लेखनसामग्री. १५३
हुए किसी किसी दानपत्र के अक्षर इतने पतले हैं कि वे पहिले स्याही से लिखे गये हों ऐसा प्रतीत
नहीं होता. संभव है कि तांबे के पत्नों पर पहिले मुलतानी मिट्टी या ऐसा ही कोई और पदार्थ पोतने
के बाद दक्षिणी शैली के ताड़पत्नों की नांई उनपर तीखे गोल मुंह की लोहे की कलम से लेखक ने
अक्षर बनाये हों जिनको खोदनेवाले कारीगर ने किसी तीक्ष्ण औज़ार से खोदा हो. उत्तरी हिंदुस्तान
से मिलनेवाले दानपत्र बहुधा एक या दो पत्नों पर ही खुदे मिलते हैं परंतु दक्षिण से मिलनेवाले
अधिक पत्नों पर भी खुदे हुए मिलते हैं, जैसे कि विजयनगर के वेंकटपतिदेव महाराज का मदुरा
से मिला हुआ शक सं. १५०८ (ई. स. १५८६) का दानपत्र ६ पत्नों १ पर और हॉलैंड देश की लेडन
युनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय) के म्यूजिअम में रक्खा हुआ राजेंद्रचोल के २३ वें राज्यवर्ष का दान-
पत्र २१ पत्नों २ पर खुदा हुआ है. दो से अधिक और ६ से कम पत्नों पर खुदे हुए तो कई एक
मिल चुके हैं. कभी कभी ऐसे ताम्रपत्नों की एक तरफ के बाईं ओर के हाशिये पर या ऊपर पत्रांक
भी खुदे मिलते हैं. जो दानपत्र दो या अधिक पत्नों पर खुदे रहते हैं उनका पहिला और अंत का
पन्ना बहुधा एक ही ओर अर्थात् भीतर की तरफ से खुदा रहता है. ऐसे दानपत्नों के प्रत्येक पन्ने
में यदि पंक्तियां कम लंबाई की हों तो एक, और अधिक लंबाई की हों तो दो, छेद होते हैं जिनमें
तांबे की कड़ियां डाली जाती हैं जिनसे सब पत्र एकत्र रहते हैं. कभी कभी ताम्रपत्नों को एकत्र
रखनेवाली कड़ी की संधि पर तांबे का लोंदा लगा कर उसपर राजमुद्रा लगाई जाती थी ३, जिसके साथ
के लेख के अक्षर उभड़े हुए मिलते हैं. कभी कभी एक ही पत्ते पर खुदे हुए दानपत्र की बाईं ओर
राजमुद्रा, जो अलग ढाली जा कर बनाई जाती थी, जुड़ी हुई मिलती है. ४ कभी कभी राजमुद्रा
पन्ने पर ५ ही खोदी जाती थी, जिसके साथ कोई लेख नहीं होता. कितने एक ताम्रपत्नों के अंत
में राजाओं के हस्ताक्षर खुदे हुए रहते हैं जिनसे उनके लेखनकला के ज्ञान का भी पता लगता
है. ताम्रपत्र छोटे बड़े भिन्न भिन्न लंबाई चौड़ाई के पतले या मोटे पत्नों ६ पर खुदवाये जाते थे जो
तांबे के पाट को कूट कूट कर बनाये जाते थे. कई ताम्रपत्नों पर हथोड़ों की चोटों के निशान पाये
जाते हैं. अब जो ताम्रपत्र बनते हैं वे तांबे की चद्दरों को काट कर उनपर ही खुदवाये जाने हैं.
ताम्रपत्र खोदने में यदि कोई अशुद्धि हो जाती तो उस स्थान को कूट कर बराबर कर देते और फिर
उसपर शुद्ध अक्षर खोद देते. ताम्रपत्नों पर भी शिलालेखों की तरह कुछ कुछ हाशिया छोड़ा जाता
और कभी कभी किनारें ऊंची उठाई जाती थीं. दानपत्नों के अतिरिक्त कभी कोई राजाज्ञा ७ अथवा
स्तूप, मठ आदि बनाये जाने के लेख ८ तथा ब्राह्मणों और जैनों के विविध यंत्र ९ भी तांबे के त्रिकोण,
१. ऐं. इं; जि. १२, पृ. १५९—८५.
२. डॉ० बर्जेस संपादित 'तामिल ऐंड संस्कृत इन्स्क्रिप्शन्र्स,' पृ. २०६-१६.
३. राजमुद्रा में राज्यचिह्न, किसी जानवर या देवता का सूचक होता है; भिन्न भिन्न वंशों के राज्यचिह्न भिन्न
भिन्न मिलते हैं जैसे कि वलभी के राजाओं का नंदी, परमारों का गरुड, दक्षिण के चालुक्यों का वराह, सेनवंशियों का
सदाशिव आदि.
४. राजपूताना म्यूज़िअम् में रक्खे हुए प्रतिहार राजा भोजदेव के वि. सं. ९०० (ई. स. ८४३) के दानपत्र की बड़ी
राजमुद्रा अलग बनाई जाकर ताम्रपत्र की बाईं ओर झाल कर जोड़ी है. प्रतिहार महेन्द्रपाल (प्रथम) और विनायकपाल
के दानपत्नों की मुद्रायें भी इसी तरह जुड़ी हुई होनी चाहियें (ई. पं; जि. १५, पृ. ११२ और १४० के पास के सेट. इन सेटों
में मुद्रा की प्रतिकृति नहीं दी परंतु बाईं ओर जहां वह जुड़ी थी वह स्थान खाली पाया जाता है).
५. मालवे के परमारों के दानपत्नों में राजमुद्रा बहुधा दूसरे पत्रे के बाईं ओर के नीचे के कोण पर लगी होती है.
६. राजपूताना म्यूज़िअम् (अजमेर) में रक्खे हुए दानपत्नों में से सब से छोटा ४ १/२ इंच लंबा और ३ इंच चौड़ा है और
तोल में १२ तोले है. सब से बड़ा प्रतिहार राजा भोजदेव का दौलतपुरे (जोधपुर राज्य में) से मिला हुआ मुद्रासहित २ फुट
५ १/२ इंच लंबा और १ फुट ४ इंच चौड़ा तथा तोल में १६ १/४ सेर (३६ १/२ पौंड) के करीब है: ये दोनों एक एक पत्ने पर ही खुदे हैं.
७. सोहगौरा के ताम्रलेख में राजकीय आज्ञा है (ए. सो. बंगा. के प्रोसीडिंग्स ई. स. १८६४, प्लेट १).
८. तक्षाशिला के ताम्रलेख में क्षत्रप पतिक के बनाये बौद्ध स्तूप एवं मठ का उल्लेख है (ऐं. इं; जि. ४, पृ. ५५-५६).
९. राजकोट के सुप्रसिद्ध स्वर्गीय वैद्य बाबा मेहता के घर की देवपूजा में तांबे के कई एक छोटे बड़े यंत्र मेरे देखने
१५४ प्राचीनलिपिमाला०
गोल या चतुरस्र पत्तों पर खुदे हुए मिलते हैं. तांबे आदि के बरतनों पर उनके मालिकों के नाम खुदवाये
जाने की प्रथा भी प्राचीन है. कभी कभी तांबे के पत्रों पर पुस्तकें १ भी खुदवाई जाती थीं.
पीतल.
जैन मंदिरों में पीतल की बनी हुई बड़ी बड़ी कई मूर्तियां मिलती हैं जिनके आसनों २ पर
और छोटी मूर्तियों की पीठ पर लेख खुदे रहते हैं. ऐसे लेखोंवाली १००० से अधिक जैन मूर्तियां
मेरे देखने में आई हैं जिनपर के लेख ई. स. की ७ वीं से १६ वीं शताब्दि तक के हैं. जैन मंदिरों में
पीतल के गोल गट्टे रक्खे हुए मिलते हैं जिनपर 'नमोकार' मंत्र और यंत्र खुदे रहते हैं.
कांसा.
कई मंदिरों में लटकते हुए कांसे के घंटों पर भी उनके भेट करनेवालों के नाम और भेट
करने का संवत् आदि खुदा हुआ मिलता है.
लोहा.
लोहे पर भी लेख खोदे जाने के कुछ उदाहरण मिल आते हैं. देहली (मिहरोली) के
कुतुब मीनार के पास के लोह के स्तंभ पर राजा चंद्र का लेख खुदा है जो ई. स. की ५ वीं शताब्दी
का है. आबू पर अचलेश्वर के मंदिर में खड़े हुए लोहे के विशाल त्रिशूल पर वि. सं. १४६८
फाल्गुन सुदि १५ का लेख खुदा हुआ है. चित्तौड़ आदि कई स्थानों में लोहे की तोपों पर भी
लेख खुदे हुए मिलते हैं. सोने, चांदी, तांबे और सीसे के सिक्कों के ठप्पे लोहे के ही बनते थे
और उनपर अक्षर उलटे खोदे जाते थे.
काली स्याही.
कागज़ पर लिखने की काली स्याही (मसी) दो तरह की होती है पक्की और कच्ची. पक्की स्याही से
पुस्तकें लिखी जाती हैं और कच्ची स्याही से व्यापारी लोग अपनी बही आदि लिखते हैं. पक्की स्याही बनाने
में आये. मंगल का त्रिकोण यंत्र कई लोगों के यहां मिलता है. अजमेर के संभवनाथ के जैन (श्वेताम्बर) मंदिर में छोटी
ढाल जैसा बड़ा एक गोल यंत्र रक्खा हुआ है, जिसको 'वीसस्थानक' का यंत्र कहते हैं.
१ त्रिपती (मद्रास इहाते में) में तांबे के पत्रों पर खुदे हुए तेलुगु पुस्तक मिले हैं (बी; सा. इं. पे; पृ. ८६). हुए-
न्संग के लेख से पाया जाता है कि 'राजा कनिष्क ने प्रसिद्ध विद्वान् पार्श्व की प्रेरणा से कश्मीर में बौद्धसंघ एकत्रित किया
जिसने सूत्रपिटक पर 'उपदेशशास्त्र', विनयपिटक पर 'विनयविभाषाशास्त्र' और अभिधर्मपिटक पर 'अभिधर्मविभाषा-
शास्त्र' नामक लाख लाख श्लोकों की टीकाएं तय्यार कीं. कनिष्क ने इन तीनों टीकाओं को ताम्रफलकों पर खुदवाया और
उनको पत्थर की पेटियों में रख कर उनपर स्तूप बनवाया' (बी; बु. रे. वे. व; जि. १, पृ. १५४. हुएन्त्संग की भारतीय यात्रा
पर थॉमस वॉटर्स का पुस्तक, जि. १, पृ. २७१). ऐसी भी प्रसिद्धि है कि सायण के वेदभाष्य भी तांबे के पत्रों पर खुदवाये
गये थे (मॅक्समूलर संपादित ऋग्वेद, जि. १, पृ. XVII).
२ आबू पर अचलगढ़ के जैन मंदिर में पीतल की बनी हुई ४ विशाल और ८ कुछ छोटी मूर्तियें स्थापित हैं जिनके
आसनों पर ई. स. की १५ वीं और १६ वीं शताब्दी के लेख खुदे हुए हैं. अन्यत्र भी ऐसी मूर्तियां देखने में आती हैं परंतु
इतनी एक साथ नहीं.
लेखनसामग्री. १५५
के लिये पीपल की लाख को, जो अन्य वृक्षों की लाख से उत्तम समझी जाती है, पीस कर मिट्टी
की हांडिया में रक्खे हुए जल में डाल कर उसे आग पर चढ़ाते हैं. फिर उसमें सुहागा और लोध पीस
कर डालते हैं. उबलते उबलते जब लाख का रस पानी में यहां तक मिल जाता है कि काग़ज़ पर उससे
गहरी लाल लकीर बनने लगती है तब उसे उतार कर छान लेते हैं. उसको अलता ( अलक्तक )
कहते हैं. फिर तिलों के तेल के दीपक के कज्जल को महीन कपड़े की पोटली में रख कर अलते में
उसे फिराते जाते हैं जब तक कि उससे सुंदर काले अक्षर बनने न लग जावें. फिर उसको दवात
( मसीभाजन ) में भर लेते हैं. राजपूताने के पुस्तकलेखक अब भी इसी तरह पक्की स्याही बनाते
हैं. संभव है कि ताड़पत्र के पुस्तक भी पहिले ऐसी ही स्याही से लिखे जाते हों.
कच्ची स्याही कज्जल, कत्था, बीजाबोर और गोंद को मिला कर बनाई जाती है परंतु पत्रे
पर जल गिरने से स्याही फैल जाती है और चौमासे में पत्रे परस्पर चिपक जाते हैं इस लिये उस-
का उपयोग पुस्तक लिखने में नहीं किया जाता.
भूर्जपत्र ( भोजपत्र ) पर लिखने की स्याही बादाम के छिलकों के कोयलों को गोमूत्र में
उबाल कर बनाई जाती थी१. भूर्जपत्र उष्ण हवा में जल्दी खराब हो जाते हैं परंतु जल में पड़े
रहने से वे बिलकुल नहीं बिगड़ते इस लिये कश्मीरवाले जब मैले भूर्जपत्र के पुस्तकों को साफ़
करना चाहते हैं तब उनको जल में डाल देते हैं जिससे पत्रों एवं अक्षरों पर का मैल निकल
कर वे फिर स्वच्छ हो जाते हैं और न स्याही हलकी पड़ती है और न फैलती है. भूर्जपत्र पर
लिखे हुए पुस्तकों में कहीं अक्षर आदि अस्पष्ट हों तो ऐसा करने से वे भी स्पष्ट दीखने लग जाते हैं२.
काली स्याही से लिखे हुए सब से पुराने अक्षर ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी तक के मिले हैं३.
१. बूलर की कश्मीर आदि के पुस्तकों की रिपोर्ट, पृ. ३०
२. द्वितीय राजतरंगिणी का कर्ता जोनराज अपने ही एक मुक़द्दमे के विषय में लिखता है कि '[ मेरे दादा ] लोलराज
ने किसी कारण से अपनी दस प्रस्थ भूमि में से एक प्रस्थ भूमि किसी को बेची और अपने नोनराज आदि बालक पुत्रों को
यह कह कर उसी वर्ष वह मर गया. नोनराज आदि को असमर्थ देख कर भूमि ख़रीदनेवाले एक के बदले ज़बर्दस्ती से
दसों प्रस्थ भोगते रहे और उसके लिये उन्होंने यह जाल बना लिया कि विक्रयपत्र (बैनामे) में लिखे हुए 'भूंप्रस्थमेकं
विक्रीतं' में 'म' के पूर्व रेखारूप से लगनेवाली 'ए' की मात्रा* को 'द' और 'म' को 'श' † बना दिया, जिससे विक्र-
यपत्र में 'भूंप्रस्थमेकं' का 'भूंप्रस्थदशकं' हो गया. मैंने यह मामला उस राजा (जैनोल्लाभद्दीन; ज़ैन-उल्-आब्दीन) की
राजसभा में पेश किया तो राजा ने भूर्जपत्र पर लिखे हुए विक्रयपत्र को मंगवा कर पढ़ा और उसे पानी में डाल दिया
तो नये अक्षर घुल गये और पुराने ही रह गये जिससे 'भूंप्रस्थमेकं' ही निकल आया. इस [ न्याय ] से राजा को कीर्ति,
मुझको भूमि, जाल करनेवालों को अङ्गद दंड, प्रजा को सुख और दुष्टों को भय मिला' ( जोनराजकृत राजतरंगिणी, श्लोक
१०२५-३७ ). इससे यह पाया जाता है कि या तो कश्मीरवाले तीन पीढ़ी में ही पक्की स्याही बनाने की विधि भूल गये
थे, या भूर्जपत्र पर की स्याही जितनी पुरानी हो उतने ही अक्षर दृढ़ हो जाते थे या अधिक संभव है कि पंडित लोलराज
की पुस्तक लिखने की स्याही, जिससे विक्रयपत्र लिखा गया था, पक्की थी और दूसरी स्याही, जिससे जाल किया गया,
कच्ची थी.
३. सांची के एक स्तूप में से पत्थर के दो गोल डिब्बे मिले हैं जिनमें सारिपुत्र और महामोगलान की हड्डियां निकली हैं.
एक डिब्बे के ढक्कन पर 'सारिपुतस' खुदा है और भीतर उसके नाम का पहिला अक्षर 'सा' स्याही से लिखा हुआ है. दूसरे
- शारदा ( कश्मीरी ) एवं अन्य प्राचीन लिपियों में पहिले 'ए' की मात्रा का चिह्न छोटी या बड़ी खड़ी लकीर
थी था जो व्यंजन के पहिले लगाया जाता था ( देखो, लिपिपत्र २८ में 'शे'; २६ में 'दे'; ३० में दिये हुए अरिगांव के लेख
के अक्षरों में 'ते').
† कश्मीरी लिपि में 'म' और 'श' में इतना ही अंतर है कि 'म' के ऊपर सिर की लकीर नहीं लगती और 'श'
के लगती है (देखो, लिपिपत्र २१ ). बाक़ी कोई भेद नहीं है.
१५६ प्राचीनलिपिमाला.
रंगीन स्याही.
रंगीन स्याहियों में लाल स्याही मुख्य है. वह दो तरह की होती है. एक तो अलक्ता की और
दूसरी हिंगलू की, जो उसको गोंद के पानी में घोल कर बनाई जाती है. हस्तलिखित वेद के
पुस्तकों में स्वरों के चिह्न, और सब पुस्तकों के पत्रों पर की दाहिनी और बाईं ओर की हाशिये की
दो दो खड़ी लकीरें अलक्ता या हिंगलू से बनी हुई होती हैं. कभी कभी अध्याय की समाप्ति का
अंश, एवं 'भगवानुवाच', 'ऋषिरुवाच' आदि वाक्य तथा विरामसूचक खड़ी लकीरें लाल स्याही
से बनाई जाती हैं. ज्योतिषी लोग जन्मपत्र तथा वर्षफल के लंबे लंबे खरड़ों में खड़े हाशिये, आड़ी
लकीरें तथा भिन्न भिन्न प्रकार की कुंडलियां लाल स्याही से ही बनाते हैं.
सूखे हरे रंग को गोंद के पानी में घोल कर हरी, जंगाल से जंगाली और हरिताल से पीली
स्याही भी लेखक लोग बनाते हैं. कभी कभी पुस्तकों के अध्याय आदि समाप्ति के अंशों में
वे इन रंगीन स्याहियों का उपयोग करते और विशेष कर जैन पुस्तकों में उनसे लिखे हुए अक्षर
मिलते हैं. बहुधा सब पुस्तकलेखक जिन अक्षरों या शब्दों को काटना होता उनपर हरिताल फिरा
देते अथवा स्याही से उनके चारों ओर कुंडल या ऊपर खड़ी लकीरें बना दिया करते थे.
सोने और चांदी की स्याही.
सोने और चांदी के बरकों को गोंद के पानी में घोट कर सुनहरी और रुपहरी स्याहियां बनाई
जाती हैं. इन स्याहियों से लिखने के पहिले पत्रे सफेद हों तो उन्हें काले या लाल रंग से रंग
लेते हैं. फिर कलम से उनपर लिख कर अकीक या कौड़े आदि से घोटते हैं तब अक्षर चमकीले
निकल आते हैं. ऐसी स्याहियों का उपयोग विशेष कर चित्रकार लोग चित्रों में करते हैं तो भी श्रीमंत
लोग प्राचीन काल से उनका उपयोग पुस्तकादि लिखवाने में कराते थे जिसके उदाहरण मिल आते हैं१.
के ढक्कन पर 'महामोगलानस' खुदा है और भीतर 'म' अक्षर स्याही का लिखा हुआ है. सारिपुत्र और महामोगलान दोनों
बुद्धदेव (शाक्य मुनि) के मुख्य शिष्य थे. सारिपुत्र का देहांत बुद्धदेव की मौजूदगी में हो गया था और महामोगलान का बुद्ध
के निर्वाण के बाद हुआ था. यह स्तूप ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी का बना हुआ माना जाता है (कनिंनगहाम का 'भिलसा
टोप्स', पृ. २६४-३०८). यदि ये डिब्बे उक्त स्तूप के बनने के समय नये बनाये जा कर उनमें वे हड्डियां रक्खी गई थीं ऐसा माना
जावे तो ये स्याही से लिखे हुए अक्षर ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी के होने चाहिये परंतु यदि यह माना जावे कि ये डिब्बे
किसी अन्य स्तूप से निकाले जा कर सांची के स्तूप में रक्खे गये थे तो उक्त स्याही के अक्षरों के लिखे जाने का समय ई. स.
पूर्व की पांचवीं शताब्दी होगा.
१ अजमेर के सेठ कल्याणमल ढड्ढा के पुस्तकसंग्रह में बहुत सुंदर अक्षरों में लिखा हुआ 'कल्पसूत्र' है जिसका
पहिला पत्रा सुवर्ण की स्याही से लिखा हुआ है. यह पुस्तक १७ वीं शताब्दी का लिखा हुआ प्रतीत होता है. सुवर्ण
की स्याही से पूरे लिखे हुए दो जैन पुस्तकों का सिरोही राज्य के जैनपुस्तकसंग्रहों में होना विश्वस्त रीति से सुना गया है
परंतु वे मेरे देखने में नहीं आये. वि. सं. १६२२ के करीब मेरे पिता ने उदयपुर के पंडित सदाशिव से एक छोटा पत्रा सोने
की स्याही से और दूसरा चांदी की स्याही से लिखवाया, वे दोनों अब तक विद्यमान हैं और रंगीन कागज़ों पर लिखे हुए
हैं. सोने की स्याही से लिखी हुई फारसी की एक किताब अलवर के राज्यपुस्तकालय में है ऐसा सुना जाता है. देशी ही
फारसी की एक किताब सेठ कल्याणमल ढड्ढा के यहां गिरवी रक्खी हुई है परंतु उसपर मुहर लगी हुई होने के कारण
उसका नाम मालूम नहीं किया जा सका. सेठ कल्याणमल ढड्ढा के यहां कहे हस्तलिखित पुस्तकों के संग्रह की देशी छींट के
पुट्ठे की एक पुरानी किताब है जिसमें 'यंत्रावचूरि' नामक पुस्तक १६ पत्रों (३८ पृष्ठ) पर चांदी की स्याही से बड़ी छींट के
सुंदर अक्षरों में लिखा हुआ है, जिसके प्रत्येक पृष्ठ के चारों तरफ के हाशिये रंगीन लकीरों से बनाये गये हैं. हाशियों पर
जो इबारत लिखी है वही काली स्याही से है बाकी सब चांदी की स्याही से है. चांदी की स्याही से लिखा हुआ हिस्सा
कागज़ को पहिले लाल या काला रंगने के बाद लिखा गया है; पुस्तक में संवत् नहीं है परंतु वह ई. स. की १५ वीं
शताब्दी के आसपास का लिखा हुआ प्रतीत होता है. पत्रे इतने जीर्ण हो गये हैं कि हाथ देने से टूटते हैं. दो दो पृष्ठों के
बीच रेशम के टुकड़े रक्खे हैं वे भी बिलकुल जीर्णशीर्ण हो गये हैं.
लेखनसामग्री. १५७
कलम.
विद्यार्थी लोग प्राचीन काल से ही लकड़ी के पाटों पर लकड़ी की गोल तीखे मुंह की कलम
(वर्णक) से लिखते चले आते हैं. स्याही से पुस्तकें लिखने के लिये नड (वरू) या बांस की
कलमें (लेखनी) काम में आती हैं. अजंटा की गुफाओं में जो रंगों से लेख लिखे गये हैं वे
महीन बालों की कलमों (वर्तिका) से लिखे गये होंगे. दक्षिणी शैली के ताड़पत्रों के अक्षर कुचरने
के लिये लोहे की तीखे गोल मुख की कलम (शलाका) अब तक काम में आती है. कोई कोई
ज्योतिषी जन्मपत्र और वर्षफल के खरड़ों के लंबे हाशिये तथा आड़ी लकीरें बनाने में लोहे की
कलम को अब तक काम में लाते हैं, जिसका ऊपर का भाग गोल और नीचे का स्याही के
परकार जैसा होता है.
परकार.
ज्योतिषी लोग जन्मपत्र और वर्षफल में भिन्न भिन्न प्रकार की कुंडलियां बनाने में लोहे के
बने हुए पुराने ढंग के परकार अब तक काम में लाते हैं. प्राचीन हस्तलिखित पुस्तकों में कभी
कभी विषय की समाप्ति आदि पर स्याही से बने कमल¹ मिलते हैं वे परकारों से ही बनाये हुए हैं.
वे इतने छोटे होते हैं कि उनके लिये जो परकार काम में आये होंगे वे बड़े सूक्ष्म मान के होने
चाहियें.
रेखापाटी.
काग़ज़ों पर लिखे जानेवाले पुस्तकों के पत्रों में पंक्तियां सीधी और समानांतर लाने के
लिये लेखक लोग 'रेखापाटी' काम में लाते हैं. लकड़ी की पतली पाटी पर दोनों ओर डोरा
लपेट कर डोरों की पंक्तियां समानांतर की जाती हैं. फिर एक ओर के सब डोरे एकत्र कर उनके
मध्य में एक पतली तीन चार इंच लंबी लकड़ी डाल कर उसको घुमाते हैं जिससे दूसरी तरफ़
की डोरों की समानांतर पंक्तियां दृढ़ हो जाती हैं और इधर उधर हटती नहीं. कोई कोई, पाटी में
लंबाई की तरफ़ के दोनों किनारों के पास, समानांतर छेद कर उनमें डोरा डालते हैं. इस प्रकार की
पाटी को 'रेखापाटी' कहते हैं. कोई कोई उसे 'समासपाटी' भी कहते हैं. कितने एक जैन
साधुओं के पास बड़ी सुंदर रेखापाटी देखने में आती हैं. वे काग़ज़ के मज़बूत पुट्ठे या कुट्टी की
बनी हुई होती हैं और उनके दोनों ओर भिन्न अंतरवाली डोरों की समानांतर पंक्तियां पाटी के साथ
रोग़न से चिपकी हुई होती हैं जो कभी हिल ही नहीं सकती. रेखापाटी पर काग़ज़ रख प्रत्येक पंक्ति पर
अंगुली दबा कर चलाने से काग़ज़ की लंबाई में डोरों के निशान पड़ जाते हैं. इस प्रकार एक तरफ़
निशान हो जाने के बाद काग़ज़ को उलटा कर पहिले के निशानों के मध्य में उसी तरह निशान बना
लिये जाते हैं. इससे दो पंक्तियों के बीच का अंतर दो अंशों में विभक्त हो जाता है जिनमें से ऊपर-
वाले में अक्षर लिखे जाते हैं और नीचे का खाली छोड़ दिया जाता है जिससे हस्तलिखित पुस्तकों
की पंक्तियां समानांतर होती हैं. ऐसे ही काग़ज़ की दाहिनी और बाईं ओर जितना हाशिया रख-
ना हो उतना स्थान छोड़ कर एक एक खड़ी लकीर खींच ली जाती है जिसपर पीछे से लाल स्याही
१ मेमॉयर्स ऑफ़ दी एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल, जि. ५, प्लेट ३७ में ताड़पत्र पर लिखे हुए 'पंचरक्षा'
नामक पुस्तक के एक पत्रे की जो प्रतिकृति छपी है उसमें दो कमल बने हुए हैं, एक १२ और दूसरा ६ पंखड़ी का. वे कमल
इतने छोटे और उनकी परिधि की वृत्तरेखाएं इतनी बारीक हैं कि जिस परकार से वे बनाये गये हैं उसकी बड़ी सूक्ष्मता का
अनुमान भली भांति हो सकता है.
१५८ प्राचीनलिपिमाला.
से हाशिये की दो दो लकीरें बनाई जाती हैं. ताड़पत्रों पर लिखी हुई पुस्तकों में पंक्तियां सीधी
लाने के लिये पहिले उनपर काली या रंगीन स्याही की बहुत बारीक लकीरें१ खींच ली जाती थीं
अथवा लोहे की बारीक तीखे गोल मुंह की कलम से उनके निशान कर लिये जाते थे. भूर्जपत्रों पर भी
ऐसा ही करते होंगे.
कांबी ( रूल ).
इस समय स्याही की लकीरें खींचने के लिये गोल रूल का प्रचार हो गया है परंतु पहिले
उसके लिये लकड़ी की गज़ (कंबा) जैसी चपटी पट्टी काम में आती थी जिसके ऊपर और नीचे का
एक तरफ़ का किनारा बाहर निकला हुआ रहता था. उसके सहारे लकीरें खींची जाती थीं. ऐसी
पट्टी को राजपूताने के लेखक 'कांबी' (कंबा) कहते हैं. वह रूल की अपेक्षा अच्छी होती है क्यों
कि रूल पर जब स्याही लग जाती है तब यदि उसे पोंछ न लिया जावे तो घूमता हुआ रूल नीचे के
कागज़ को बिगाड़ देता है परंतु कांबी का वह अंश जिसके साथ कलम सटी रहती है बाहर निकला
हुआ होने से कागज़ को स्पर्श ही नहीं करता जिससे उसपर लगी हुई स्याही का दाग़ कागज़ पर
कभी नहीं लगता. पुस्तकलेखक तथा ज्योतिषी लोग लकीरें खींचने के लिये पुरानी शैली से अब
तक कांबी काम में लाते हैं.
१ ताड़पत्रों पर पंक्तियां सीधी और समानांतर लाने के लिये खींची हुई लकीरों के लिये देखो, मेमॉयर्स ऑफ़ दी
एशियाटिक सोसाइटी ऑफ़ बंगाल, जि. ५, प्लेट ३६.
परिशिष्ट.
भारतीय संवत् १.
भारतवर्ष के भिन्न भिन्न विभागों में समय समय पर भिन्न भिन्न संवत् चलते रहे जिनके प्रारंभ
आदि का हाल जानना प्राचीन शोध के अभ्यासियों के लिये आवश्यक है, इस लिये उनका संक्षेप
से विवेचन किया जाता है.
१- सप्तर्षि २ संवत्.
सप्तर्षि संवत् को लौकिककाल, लौकिक संवत् ३, शास्त्र संवत् ४, पहाड़ी संवत् ५ या कच्चा
संवत् ६ भी कहते हैं. यह संवत् २७०० वर्ष का कल्पित चक्र है जिसके विषय में यह मान लिया
गया है कि सप्तर्षि नाम के सात तारे अश्विनी से रेवती पर्यंत २७ नक्षत्रों में से प्रत्येक पर
क्रमशः सौ सौ वर्ष तक रहते हैं ७. २७०० वर्ष में एक चक्र पूरा हो कर दूसरे चक्र का
प्रारंभ होता है. जहां जहां यह संवत् प्रचलित रहा या है वहां नक्षत्र का नाम नहीं
लिखा जाता, केवल १ से १०० तक के वर्ष लिखे जाते हैं. १०० वर्ष पूरे होने पर शताब्द्दी का
अंक छोड़ कर फिर एक से प्रारंभ करते हैं. कश्मीर के पंचांग ८ तथा कितने एक पुस्तकों ९ में
कभी कभी प्रारंभ से भी वर्ष लिखे हुए मिलते हैं. कश्मीरवाले इस संवत् का प्रारंभ कलियुग
१. 'संवत्' शब्द 'संवत्सर' शब्द का संक्षिप्त रूप है जिसका अर्थ 'वर्ष' है. कभी कभी इसके और भी संक्षिप्त
रूप 'संव', 'सं,' या 'स्व' और 'स' (प्राकृत लेखों में) मिलते हैं. संवत् शब्द को कोई कोई विक्रम संवत् का ही सूचक
मानते हैं परंतु वास्तव में ऐसा नहीं है. यह शब्द केवल 'वर्ष' का सूचक होने से विक्रम संवत्, गुप्त संवत् आदि प्रत्येक
संवत् के लिये आता है और कभी कभी इसके पूर्व उक्त संवतों के नाम भी (विक्रम संवत्, वलभी संवत् आदि) लिखे
मिलते हैं. इसके स्थान में वर्ष, अब्द, काल, शक आदि इसी अर्थवाले शब्दों का भी प्रयोग होता है.
२. सप्तर्षि नामक ७ तारों की कल्पित गति के साथ इसका संबंध माना गया है जिससे इसको 'सप्तर्षि संवत्'
कहते हैं.
३. कश्मीर आदि में शताब्दियों के अंकों को छोड़ कर ऊपर के वर्षों के अंक लिखने का लोगों में प्रचार होने के
कारण इसको 'लौकिक संवत्' या 'लौकिक काल' कहते हैं.
४. विद्वानों के शास्त्रसंबंधी ग्रंथों तथा ज्योतिःशास्त्र के पंचांगों में इसके लिखने का प्रचार होने से ही इसको
शास्त्र संवत् कहते हैं.
५. कश्मीर और पंजाब के पहाड़ी प्रदेश में प्रचलित होने से इसको पहाड़ी संवत् कहते हैं.
६. इस संवत् के लिखने में शताब्दियों को छोड़ कर ऊपर के ही वर्ष लिखे जाने से इसे कच्चा संवत् कहते हैं.
७. एकैकस्मिन्नृक्षे शतं शतं ते (मुनयः) चरन्ति वर्षाणाम् (वाराही संहिता, अध्याय १३, श्लोक ४). सप्तर्षीणां तु यौ
पूर्वी दृश्येते उदितौ दिवि । तयोस्तु मध्ये नक्षत्रं दृश्यते तत्समं निशि ॥ तेनैत ऋषयो युक्तास्तिष्ठन्त्यब्दशतं नृणाम् (भागवत, स्कंध १२,
अध्याय २, श्लोक २७-२८. विष्णुपुराण, अंश ४, अध्याय २४, श्लोक ५३-५४). पुराण और ज्योतिष के संहिताग्रंथों में
सप्तर्षियों की इस प्रकार की गति लिखी है वह कल्पित है. 'सिद्धांततत्वविवेक' का कर्त्ता कमलाकर भट्ट भी ऐसी गति को
स्वीकार नहीं करता (अद्यापि कैरपि नरैर्गतिराश्चर्यैर्द्दृष्टा न यात्र कथिता किल संहितासु । तत्काव्यमेव हि पुराणवदत्र तज्ज्ञास्तेनैव तत्व-
विषयं गदितुं प्रवृत्ताः ॥ (सिद्धांततत्वविवेक, भग्रहयुत्यधिकार, श्लोक ३२).
८. श्रीसप्तर्षिचारानुमतेन संवत् ४९६६ तथा च संवत् ६६ चैत्रसुति १ श्रीशाकाः १७१५ करणागताब्दा(ब्दाः) १०२८ दिनगणाः
४१२०१० श्रीविक्रमादित्यसंवत् १८५० कल्पगताब्दा(ब्दाः) १९७२९४८८६४ शेषाब्दा(ब्दाः) २३४७०५११३६....कलौ गतवर्षाणि
४८९४ शेषवर्षाणि ४२७१०६ (विक्रम संवत् १८५० का पंचांग, इं. ऐ.; जि. २०, पृ. १५०).
९. सप्तर्षिः(र्षि)संवत् ४६५१ आ[१]श्व[यु]जकृष्णसप्तमी मंगलं(ल)वासरं(रे) (हस्तलिखित 'ध्वन्यालोक'; इं. ऐ.; जि. २०,
पृ. १५१).
| १६० | प्राचीनलिपिमला. |
|---|
के २५ वर्ष पूरे होने पर १ (२६ वें वर्ष से) मानने हैं परंतु पुराण तथा ज्योतिष के ग्रंथों में इस
का प्रचार कलियुग के पहिले से होना माना गया है २.
(अ). 'राजतरंगिणी' में कल्हण पंडित लिखता है कि 'इस समय लौकिक [संवत्] के
२४ वें (वर्तमान) वर्ष में शक संवत् के १०७० वर्ष बीत चुके हैं' ३. इस हिसाब से वर्तमान ४
लौकिक संवत् और गत शक संवत् के बीच का अंतर (१०७०-२४=) १०४६=४६ है. अर्थात्
शताब्दी के अंकराहित सप्तर्षि संवत् में ४६ जोड़ने से शताब्दीरहित शक (गत), ८१ जोड़ने से
चैत्रादि विक्रम (गत), २५ जोड़ने से कलियुग (गत) और २४ या २५ जोड़ने से ई. स. (वर्तमान)
आता है.
(आ). चंबा से मिले हुए एक लेख में विक्रम संवत् (गत) १७१७, शक संवत् १५८२
(गत) और शास्त्र संवत् ३६ वैशाख वति (वदि) ५ १३ बुधवार ६ लिखा है. इससे भी वर्तमान
शास्त्र संवत् और [गत] विक्रम संवत् (१७१७-३६=१६८१=८१) तथा शक संवत् (१५८२-३६=
१५४६=४६) के बीच का अंतर ऊपर लिखे अनुसार ही आता है.
(इ). पूना के दक्षिण कॉलेज के पुस्तकालय में शारदा (कश्मीरी) लिपि का 'काशि-
कावृत्ति' पुस्तक है जिसमें गत विक्रम संवत् १७१७ और सप्तर्षि संवत् ३६ पौष वति (वदि)
१. कालेर्गतेः सायकनेत्र(२५)वर्षैः सप्तर्षिवर्यास्त्रिदिवं प्रयाताः । लोके हि संवत्सरपत्रिकायां सप्तर्षिमानं प्रवदन्ति सन्तः ॥ (डॉ.
वूलर की कश्मीर की रिपोर्ट; पृ. ६०).
२. क; इं; ई; पृ. ४.
३. लौकिकाब्दे चतुर्विंशे शककालस्य सांप्रतम् । सप्तत्याभ्यधिकं यातं सहस्रं परिवत्सराः (राजतरंगिणी, तरंग १, श्लोक ५२).
४. सप्तर्षि संवत् के वर्ष वर्तमान और कलियुग, विक्रम तथा शक संवतों के वर्ष पंचांगों में गत लिखे रहते हैं.
ता० १२ एप्रिल ई. स. १९१८ को जो चैत्रादि विक्रम संवत् १९७५ और शक संवत् १८४० प्रवेश हुआ उसको लोग वर्तमान
मानते हैं. परंतु ज्योतिष के हिसाब से वह गत है, न कि वर्तमान. मद्रास इहाते के दक्षिणी विभाग में अबतक शक संवत्
के वर्तमान वर्ष लिखे जाते हैं तो वहां का वर्ष बंबई इहाते तथा उत्तरी भारतवर्ष के पंचांगों के शक संवत् से एक वर्ष आगे
रहता है.
५. 'शुदि' (सुदि) और 'बदि' या 'वदि' का अर्थ शुक्लपक्ष और बहुल (कृष्ण) पक्ष माना जाता है परंतु वास्तव
में इन शब्दों का अर्थ 'शुक्लपक्ष का दिन' और 'बहुल (कृष्ण) पक्ष का दिन' है. ये स्वयं शब्द नहीं हैं किंतु दो दो शब्दों
के संक्षिप्त रूपों के संकेत मात्र हैं जिनको मिला कर लिखने से ही उनकी शब्दों में गणना हो गई है. प्राचीन लेखों में
संवत्सर (संवत्), ऋतु, पक्ष और दिन या तिथि ये सब कभी कभी संक्षेप से भी लिखे जाते थे. जैसे संवत्सर के संक्षिप्त
रूप संवत्, संव, सं आदि मिलते हैं (देखो, ऊपर पृ. १४६, टि. १) वैसे ही ग्रीष्मः (प्राकृत में गिम्हाण) का संक्षिप्त रूप 'ग्री', या
'गृ' और 'गि' (प्राकृत लेखों में); 'वर्षाः' का 'व'; 'हेमन्तः' का 'हे'; 'बहुलपक्ष' या 'बहुल' (कृष्ण) का 'ब';
'शुक्लपक्ष' या 'शुक्ल' का 'शु'; 'दिवसे' का 'दि' और 'तिथि' का 'ति' मिलता है. 'बहुल' और 'दिवसे' के संक्षिप्त
रूप 'ब' और 'दि' को मिला कर लिखने से 'बदि' और उससे 'वदि' (वबयोरैक्यम्) शब्द बन गया, ऐसे ही 'शुक्ल'
के 'शु' और 'दिवसे' के 'दि' को मिला कर लिखने से 'शुदि' और उससे 'सुदि' ('श' के स्थान में 'स' लिखने से)
बन गया. कश्मीरवाले 'दिवस' के स्थान में 'तिथि' शब्द का प्रयोग करते रहे जिससे उनके यहां बहुधा 'शुति' और
'वति' शब्द मिलते हैं. देहली के अशोक के स्तंभ पर अजमेर के चौहान राजा वीसलदेव (विग्रहराज) के तीन लेख
खुदे हुए हैं जिनमें से दो संवत् १२२० वैशाख शुदि १५ के हैं. उन दोनों में 'शुति' खुदा है (संवत् १२२० वैशाखशुति १५.
ई. पं; जि. १६, पृ. २१७-१८). व्याकरण के पिछले आचार्यों ने 'शुदि' और 'बदि' (वदि) शब्दों की उत्पत्ति न जान कर ही
उनकी अव्ययों में गणना कर दी है. 'शुदि' या 'शुति' और 'बदि' या 'वति' (वति) के पीछे 'तिथि' शब्द (श्रावणशुदि
पंचम्यां तिथौ) लिखना भी अशुद्ध है क्योंकि 'शुदि' और 'बदि' में तिथिसूचक 'दिवस' शब्द मौजूद है. केवल उप-
र्युक्त शब्दों के ही संक्षिप्त रूप लेखादि में मिलते हैं ऐसा ही नहीं किंतु अनेक दूसरे शब्दों के भी संक्षिप्त रूप मिलते हैं, जैसे
कि 'ठक्कुर' का 'ठ०' 'महन्तम' का 'महं०', श्रेष्ठिन' का 'श्रे०', 'ज्ञातीय' या 'ज्ञाति' का 'ज्ञा०', 'उत' (पुत्र का प्राकृत
रूप) का 'उ०' (इं. पं; जि. ८, पृ. २१६-२२) आदि अनेक. ऐसे संक्षिप्त रूपों के साथ कहीं कुंडल (०) लगाया मिलता है
और कहीं नहीं भी.
६. श्रीमन्नृपतिविक्रमादित्यसंवत्सरे १७१७ श्रीशालिवाहनशके १५८२ श्रीशास्त्रसंवत्सरे ३६ वैशाष(ख)वदि त्रयोदश्यां दु(बु)धवासरे
मेषेर्कसंक्रान्तौ (इं. पं; जि. २०, पृ. १५२ ).
भारतीय संवत् . १६१
३ रवि वार और तिष्य ( पुष्य ) नक्षत्र लिखा है. १ इससे भी सप्तर्षि और विक्रम संवत् के बीच का
अंतर ऊपर लिखे अनुसार ( १७१७-३६ = १६८१ = ८१ ) ही आता है.
सप्तर्षि संवत् का प्रारंभ चैत्र शुक्ला १ से होता है और इसके महीने पूर्णिमांत हैं. इस
संवत् के वर्ष बहुधा वर्तमान २ ही लिखे जाते हैं. प्राचीन काल में इस संवत् का प्रचार कश्मीर
और पंजाब में था परंतु अब कश्मीर तथा उसके आस पास के पहाड़ी इलाकों में ही, विशेष कर
ज्योतिषियों में, रह गया है.
२-कलियुग ३ संवत्.
कलियुग संवत् को भारतयुद्ध संवत् और युधिष्ठिर संवत् भी कहते हैं. इस संवत् का विशेष
उपयोग ज्योतिष के ग्रंथों तथा पंचांगों में होता है तो भी शिलालेखादि में भी कभी कभी इसमें
दिये हुए वर्ष मिलते हैं ४. इसका प्रारंभ ई. स. पूर्व ३१०२ तारीख १८ फरवरी के प्रातःकाल से
माना जाता है. चैत्रादि विक्रम संवत् १९७२ ( गत ) और शक संवत् १८४० ( गत ) के पंचांग में गत
कलि ५०१६ लिखा है. इस हिसाब से चैत्रादि गत विक्रम संवत् में ( ५०१६-१९७२ = ) ३०४४,
गत शक संवत् में ( ५०१६-१८४० = ) ३१७६, और ई. स. में ३१०१ जोड़ने से गत कलियुग संवत्
आता है.
दक्षिण के चालुक्यवंशी राजा पुलकेशि ( दूसरे ) के समय के, एहोले की पहाड़ी पर के
जैन मंदिर के शिलालेख में भारतयुद्ध से ३७३५ और शक राजाओं ( शक संवत् ) के ५५६ वर्ष
बीतने पर उक्त मंदिर का बनना बतलाया है ५. उक्त लेख के अनुसार भारत के युद्ध ( भारत-
युद्ध संवत् ) और शक संवत् के बीच का अंतर ( ३७३५-५५६ = ) ३१७९ वर्ष आता है. ठीक यही
अंतर कलियुग संवत् और शक संवत् के बीच होना ऊपर बतलाया गया है, अतएव उक्त लेख के
अनुसार कलियुग संवत् और भारतयुद्ध संवत् एक ही हैं. भारत के युद्ध में विजयपाने से राजा युधि-
ष्ठिर को राज्य मिला था जिससे इस संवत् को युधिष्ठर संवत् ६ भी कहते हैं. पुराणों में कलियुग का
१. श्रीनृपविक्रमादित्यराज्यस्य गताब्दाः १७१७ श्रीसप्तर्षिमते संवत् ३६ पौ [व]ति ३ रवौ तिष्यनक्षत्रे ( इं. ऍ; जि. २०, पृ. १५२ ).
२. कभी कभी गत वर्ष भी लिखे मिलते हैं, जैसे कि कय्यटरचित 'देवीशतक' की टीका के अंत में यह श्लोक है-
वसुमुनिगगनोदधिसमकाले याते कलेस्तथा लोके ।
द्वापञ्चाशे वर्षे रचितेयं भीमगुप्तनृपे ॥ ( इं. ऍ; जि. २०, पृ. १५४ ).
यहां पर गत कलियुग संवत् ४०७८ और लौकिक संवत् ५२ दिया है जो गत है ('याते' दोनों के साथ लगता है)
क्योंकि वर्तमान ५३ में ही गत कलियुग संवत् ४०७८ आता है. परंतु ऐसे उदाहरण बहुत कम मिलते हैं.
३. हिंदुओं की कालगणना के अनुसार कलियुग एक महायुग का १० वां अंश मात्र है. महायुग में ४ युग माने जाते हैं
जिनको कृत, त्रेता, द्वापर और कलि कहते हैं. कलियुग ४३२००० वर्ष का, द्वापर उससे दुगुना अर्थात् ८६४००० वर्ष का,
त्रेता तिगुना अर्थात् १२९६००० वर्ष का और कृत चौगुना अर्थात् १७२८००० वर्ष का माना जाता है. इस प्रकार एक
महायुग, जिसको चतुर्युगी भी कहते हैं, कलियुग से १० गुना अर्थात् ४३२०००० वर्ष का माना जाता है. ऐसे ७१ महायुग
का एक मन्वंतर कहलाता है. १४ मन्वंतर और ६ महायुग अर्थात् १००० महायुग (=४३२००००००० वर्ष ) को एक कल्प
या ब्रह्मा का दिन कहते हैं और उतने ही वर्षों की रात्री भी मानी गई है.
४. अष्टाचत्वारिंशदधिकत्रिशतो [त्त] रेषु चतुःसहस्रेषु कलियुगसंवत्सरेषु परावृत्तेषु सत्सु । स्वराज्यानुभवकाले पंचमे साधारणसंवत्सरे
( गोवा के कदंबवंशी राजा शिवचित्त [ षष्ठदेव दूसरे ] के समय के दानपत्र से. इं. ऍ; जि. १४, पृ. २९० ).
५. त्रिंशत्सु त्रिसहस्रेषु भारतादाहवादितः [ । ] सप्ताब्दशतयुक्तेषु श(ग)तेष्वब्देषु पंचसु [ ॥ ] पंचाशत्सु कलौ काले षट्सु पंचशतासु
च [ । ] समासु समतीतासु शकानामापि भूभुजाम् ( ऍ. ई.; जि. ६, पृ. ७ ).
६. डॉ० कीलहॉर्न संगृहीत दक्षिण के लेखों की सूची, पृ. १६२, लेखसंख्या १०१७.
१६२ प्राचीनलिपियाला.
प्रारंभ कृष्ण के स्वर्गारोहण १ से अर्थात् भारत के युद्ध के पीछे माना है परंतु उसको पिछले विद्वानों
ने स्वीकार नहीं किया. वराहमिहिर लिखता है कि युधिष्ठिर के राज्यसमय सप्तर्षि मघा नक्षत्र पर
थे और उस राजा का शककाल ( संवत् ) २५२६ वर्ष रहा २ अर्थात् उसके संवत् के २५२६ वर्ष बीतने
पर शक संवत् चला. इससे महाभारत के युद्ध का द्वापर के अंत में नहीं किंतु कलियुग संवत् के
(३१७६-२५२६=) ६५३ वर्ष व्यतीत होने पर होना मानना पड़ता है. कल्हण पंडित कश्मीर के
राजाओं के राज्यसमय के विषय में लिखते हुए कहता है कि 'द्वापर के अंत में भारत [ युद्ध ] हुआ
इस दंतकथा से विमोहित हो कर कितने एक [विद्वानों] ने इन राजाओं का राज्यकाल गलत मान
लिया है.......जब कलि के ६५३ वर्ष व्यतीत हुए तब कुरुपांडव हुए ३' अर्थात् भारत का युद्ध हुआ.
यह कथन वराहमिहिर के उपर्युक्त कथन के अनुसार ही है.
पुराणों में परीक्षित के जन्म ४ ( महाभारत के युद्ध) से लगा कर महापद्म (नंद) के राज्या-
भिषेक तक १०५० ५ वर्ष होना भी लिखा मिलता है. महापद्म (नंद) के वंश का राज्य १०० वर्ष
तक रहा जिसके पीछे मौर्य चंद्रगुप्त ने राज्य पाया. चंद्रगुप्त का राज्याभिषेक ई. स. पूर्व ३२१ के
आसपास होना निश्चित है अतएव पुराणों के उपर्युक्त कथनानुसार भारत युद्ध का ई. स. पूर्व
(३२१+१००+१०५०=) १४७१ के आस पास होना मानना पड़ता है. पुराणों में दी हुई भारत के
युद्ध से लगा कर महापद्म (नंद) तक की वंशावलियों में मिलनेवाली राजाओं की संख्या ६ देखते
हुए भी यह समय ठीक प्रतीत होता है.
१. यदैव भगवद्विष्णोरंशो यातो दिवं द्विज । वसुदेवकुलोद्भूतस्तदैव कलिरागतः (विष्णु पुराण, अंश ४, अध्याय २४, श्लोक ५५).
विष्णुर्भगवतो भानुः कृष्णाख्योऽसौ दिवं गतः । तदा विशत्कलिर्लोकं पाप यद्रमते जनः (भागवत, स्कंध १२, अध्याय २, श्लोक २६.)
महाभारत से पाया जाता है कि पांडवों ने विजयी होने के बाद १५ वर्ष तक तो राजा (धृतराष्ट्र) की आज्ञा के अनुसार
सब कार्य किया. फिर भीम के वाग्बाण से खिन्न हो कर राजा विरक्त हुआ तब युधिष्ठिर स्वतंत्र राजा बना. फिर ३६ वें वर्ष
कृष्ण और यादवों के स्वर्गवास की खबर आई तब परीक्षित को राज्यसिंहासन पर बिठाला कर पांडवों ने द्रोपदी सहित
महाप्रस्थान किया' (इं. पं; जि. ४०, पृ. १६३-६४). इस हिसाब से तो कृष्ण का स्वर्गारोहण, पांडवों का महाप्रस्थान, एवं
पुराणों का कलियुग का प्रारंभ भारतयुद्ध से (१५+३६=) ५१ वर्ष बाद होना चाहिये.
२. आसन्मघासु मुनयः शासति पृथ्वीं युधिष्ठिरे नृपतौ । षड्विकपञ्चद्वियुतः शककालस्तस्य राज्यस्य (वाराही संहिता, सप्त-
र्षिचार, श्लोक ३).
३. भारतं द्वापरान्तेऽभूद्वार्तयेति विमोहिताः । केचिदेतां मृषा तेषां कालसङ्ख्यां प्रचक्रिरे ॥ ४८ ॥....॥ शतेषु षट्सु सार्द्धेषु त्र्यधि-
केषु च भूतले । कलेर्गतेषु वर्षाणामभवन्कुरुपांडवाः ॥ ५१ ॥ (राजतरंगिणी, तरंग १).
४. भारत का युद्ध हुआ उस समय परीक्षित गर्भ में था इसलिये उसका जन्म भारत के युद्ध की समाप्ति से कुछ ही
महीनों बाद हुआ होगा.
५. महापद्माभिषेकात्तु यावज्जन्म परीक्षितः । एवं वर्षसहस्रं तु ज्ञेयं पंचाशदुत्तरं (मत्स्यपुराण, अध्याय २७३, श्लोक ३६. वायु-
पुराण, अ. ६६, श्लो. ४१५. ब्रह्मांडपुराण, मध्यम भाग, उपोद्घात पाद ३, अ. ७४, श्लो. २२७). यावत्परीक्षितो जन्म यावन्नंदाभिषे-
चनम् । एतद्वर्षसहस्रं तु ज्ञेयं पंचदशोत्तरं (विष्णुपुराण, अंश ४, अ. २४, श्लो. ३२). आरभ्य भवतो जन्म यावन्नंदाभिषेचनम् । एतद्वर्ष-
सहस्रं तु शतं पंचदशोत्तरम् (भागवत, स्कंध १२, अ. २, श्लो. २६). इस प्रकार परीक्षित के जन्म से लगा कर महापद्म (नंद)
के राज्याभिषेक तक के वर्षों की संख्या मत्स्य, वायु और ब्रह्मांडपुराण में १०५०, विष्णु में १०१५ और भागवत में १११५ दी है.
अधिकतर पुराणों में १०५० ही है जिसको हमने स्वीकार किया है.
६. चंद्रवंशी अजमीढ के पुत्र ऋक्ष का वंशज और जरासंध का पुत्र सहदेव भारत के युद्ध में मारा गया. फिर उसका
पुत्र (या उत्तराधिकारी) सोमाधि (सोमापि) गिरिव्रज का राजा हुआ जिसके पीछे २१ और राजा हुए. ये २२* राजा
बार्हद्रथवंशी कहलाये. इस वंश के अंतिम राजा रिपुंजय को मार कर उसके मंत्री शौनक (पुलिक) ने अपने पुत्र प्रद्योत को
राजा बनाया. प्रद्योत के वंश में ५ राजा हुए जिनके पीछे शिशुनाग वंश के १० राजा हुए. जिनमें से १०वें राजा महानंदी का
- ब्रह्मांडपुराण में बार्हद्रथवंशी राजाओं की संख्या २२ और मत्स्य तथा वायु में ३२ दी है. विष्णु और भागवत में
संख्या नहीं दी. किसी पुराण में २२ से अधिक राजाओं की नामावली नहीं मिलती इसीसे हमने बार्हद्रथवंशी राजाओं की
संख्या २२ मानी है.