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सर्वकोश
प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)

The Paleography of India by G.H. Ojha

रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

पृष्ठ 182, कुल 318 में से

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पृष्ठ 182

लेखनसामग्री. १५३
हुए किसी किसी दानपत्र के अक्षर इतने पतले हैं कि वे पहिले स्याही से लिखे गये हों ऐसा प्रतीत
नहीं होता. संभव है कि तांबे के पत्नों पर पहिले मुलतानी मिट्टी या ऐसा ही कोई और पदार्थ पोतने
के बाद दक्षिणी शैली के ताड़पत्नों की नांई उनपर तीखे गोल मुंह की लोहे की कलम से लेखक ने
अक्षर बनाये हों जिनको खोदनेवाले कारीगर ने किसी तीक्ष्ण औज़ार से खोदा हो. उत्तरी हिंदुस्तान
से मिलनेवाले दानपत्र बहुधा एक या दो पत्नों पर ही खुदे मिलते हैं परंतु दक्षिण से मिलनेवाले
अधिक पत्नों पर भी खुदे हुए मिलते हैं, जैसे कि विजयनगर के वेंकटपतिदेव महाराज का मदुरा
से मिला हुआ शक सं. १५०८ (ई. स. १५८६) का दानपत्र ६ पत्नों १ पर और हॉलैंड देश की लेडन
युनिवर्सिटी (विश्वविद्यालय) के म्यूजिअम में रक्खा हुआ राजेंद्रचोल के २३ वें राज्यवर्ष का दान-
पत्र २१ पत्नों २ पर खुदा हुआ है. दो से अधिक और ६ से कम पत्नों पर खुदे हुए तो कई एक
मिल चुके हैं. कभी कभी ऐसे ताम्रपत्नों की एक तरफ के बाईं ओर के हाशिये पर या ऊपर पत्रांक
भी खुदे मिलते हैं. जो दानपत्र दो या अधिक पत्नों पर खुदे रहते हैं उनका पहिला और अंत का
पन्ना बहुधा एक ही ओर अर्थात् भीतर की तरफ से खुदा रहता है. ऐसे दानपत्नों के प्रत्येक पन्ने
में यदि पंक्तियां कम लंबाई की हों तो एक, और अधिक लंबाई की हों तो दो, छेद होते हैं जिनमें
तांबे की कड़ियां डाली जाती हैं जिनसे सब पत्र एकत्र रहते हैं. कभी कभी ताम्रपत्नों को एकत्र
रखनेवाली कड़ी की संधि पर तांबे का लोंदा लगा कर उसपर राजमुद्रा लगाई जाती थी ३, जिसके साथ
के लेख के अक्षर उभड़े हुए मिलते हैं. कभी कभी एक ही पत्ते पर खुदे हुए दानपत्र की बाईं ओर
राजमुद्रा, जो अलग ढाली जा कर बनाई जाती थी, जुड़ी हुई मिलती है. ४ कभी कभी राजमुद्रा
पन्ने पर ५ ही खोदी जाती थी, जिसके साथ कोई लेख नहीं होता. कितने एक ताम्रपत्नों के अंत
में राजाओं के हस्ताक्षर खुदे हुए रहते हैं जिनसे उनके लेखनकला के ज्ञान का भी पता लगता
है. ताम्रपत्र छोटे बड़े भिन्न भिन्न लंबाई चौड़ाई के पतले या मोटे पत्नों ६ पर खुदवाये जाते थे जो
तांबे के पाट को कूट कूट कर बनाये जाते थे. कई ताम्रपत्नों पर हथोड़ों की चोटों के निशान पाये
जाते हैं. अब जो ताम्रपत्र बनते हैं वे तांबे की चद्दरों को काट कर उनपर ही खुदवाये जाने हैं.
ताम्रपत्र खोदने में यदि कोई अशुद्धि हो जाती तो उस स्थान को कूट कर बराबर कर देते और फिर
उसपर शुद्ध अक्षर खोद देते. ताम्रपत्नों पर भी शिलालेखों की तरह कुछ कुछ हाशिया छोड़ा जाता
और कभी कभी किनारें ऊंची उठाई जाती थीं. दानपत्नों के अतिरिक्त कभी कोई राजाज्ञा ७ अथवा
स्तूप, मठ आदि बनाये जाने के लेख ८ तथा ब्राह्मणों और जैनों के विविध यंत्र ९ भी तांबे के त्रिकोण,

१. ऐं. इं; जि. १२, पृ. १५९—८५.
२. डॉ० बर्जेस संपादित 'तामिल ऐंड संस्कृत इन्स्क्रिप्शन्र्स,' पृ. २०६-१६.
३. राजमुद्रा में राज्यचिह्न, किसी जानवर या देवता का सूचक होता है; भिन्न भिन्न वंशों के राज्यचिह्न भिन्न
भिन्न मिलते हैं जैसे कि वलभी के राजाओं का नंदी, परमारों का गरुड, दक्षिण के चालुक्यों का वराह, सेनवंशियों का
सदाशिव आदि.
४. राजपूताना म्यूज़िअम् में रक्खे हुए प्रतिहार राजा भोजदेव के वि. सं. ९०० (ई. स. ८४३) के दानपत्र की बड़ी
राजमुद्रा अलग बनाई जाकर ताम्रपत्र की बाईं ओर झाल कर जोड़ी है. प्रतिहार महेन्द्रपाल (प्रथम) और विनायकपाल
के दानपत्नों की मुद्रायें भी इसी तरह जुड़ी हुई होनी चाहियें (ई. पं; जि. १५, पृ. ११२ और १४० के पास के सेट. इन सेटों
में मुद्रा की प्रतिकृति नहीं दी परंतु बाईं ओर जहां वह जुड़ी थी वह स्थान खाली पाया जाता है).
५. मालवे के परमारों के दानपत्नों में राजमुद्रा बहुधा दूसरे पत्रे के बाईं ओर के नीचे के कोण पर लगी होती है.
६. राजपूताना म्यूज़िअम् (अजमेर) में रक्खे हुए दानपत्नों में से सब से छोटा ४ १/२ इंच लंबा और ३ इंच चौड़ा है और
तोल में १२ तोले है. सब से बड़ा प्रतिहार राजा भोजदेव का दौलतपुरे (जोधपुर राज्य में) से मिला हुआ मुद्रासहित २ फुट
५ १/२ इंच लंबा और १ फुट ४ इंच चौड़ा तथा तोल में १६ १/४ सेर (३६ १/२ पौंड) के करीब है: ये दोनों एक एक पत्ने पर ही खुदे हैं.
७. सोहगौरा के ताम्रलेख में राजकीय आज्ञा है (ए. सो. बंगा. के प्रोसीडिंग्स ई. स. १८६४, प्लेट १).
८. तक्षाशिला के ताम्रलेख में क्षत्रप पतिक के बनाये बौद्ध स्तूप एवं मठ का उल्लेख है (ऐं. इं; जि. ४, पृ. ५५-५६).
९. राजकोट के सुप्रसिद्ध स्वर्गीय वैद्य बाबा मेहता के घर की देवपूजा में तांबे के कई एक छोटे बड़े यंत्र मेरे देखने