प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
पृष्ठ 179, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंकिसी अक्षर या शब्द को भूल से छोड़ जाता तो वह अक्षर या शब्द या तो पंक्ति के ऊपर या नीचे
अथवा हाशिये पर लिखा जाता था और कभी वह अक्षर या शब्द किस स्थान पर चाहिये था यह
बतलाने के लिये ^ या $\times$ चिह्न भी मिलता है जिसको 'काकपद' या 'हंसपद' कहते हैं१. भूल से
अधिक लिखा हुआ अक्षर, शब्द, मात्रा या अनुस्वार आदि या तो टांकी से उड़ा दिया जाता या उस
पर छोटी छोटी खड़ी या तिरछी लकीर या लकीरें२ बना कर उसे काट दिया जाता था. कई लेखों के
अंत में उनके लगाये जाने या उनसे संबंध रखनेवाले स्थानों के बनने का संवत्, ऋतु, मास, दिन,
पक्ष, तिथि आदि३ एवं उनके रचयिता, लेखक और खोदनेवालों के नाम भी दिये हुए मिलते हैं४.
मंदिर आदि की दीवारों के ताकों में लगाये जानेवाले लेख बहुधा एक ही छोटी या बड़ी शिला पर
खुदे हुए होते हैं परंतु कभी पांच तक पर भी खुदे हुए मिलते हैं५. ये लेख प्राकृत, संस्कृत, कनड़ी,
तेलुगु, तामिळ, प्राचीन हिंदी आदि भाषाओं में हैं.
पुस्तकें भी चिरस्थायी रखने के लिये कभी कभी चट्टान या शिलाओं पर खुदवाई जाती थीं६.
१. बुद्धगया से मिले हुए अशोकचल्ल के लक्ष्मणसेन संवत् ५१ के लेख की पहिली पंक्ति में 'तथागतो ह्यवदत्' में
'तो' लिखना रह गया जिसको पंक्ति के ऊपर लिखा है और नीचे ^ चिह्न बनाया है (एं. इं; जि. १२, पृ. २८ के पास का 'प्लेट').
वि. सं. १२०७ की महावन की प्रशस्ति की ८ वीं पंक्ति में 'तस्याभूत्तनयो नयोन्नतमतिः' में दूसरा 'नयो' लिखना रह गया
जिसको पंक्ति के नीचे लिखा है. उसी प्रशस्ति की ११ वीं पंक्ति में [८ वें] श्लोक का चतुर्थ चरण लिखना रह गया, जो बाईं
ओर के हाशिये पर लिखा गया है और जहां वह चाहिये था उस स्थान पर पंक्ति के ऊपर () चिह्न किया है. ऐसे ही
उसी प्रशस्ति की २० वीं पंक्ति में [ १७ वां ] श्लोक रह गया वह भी बाईं ओर के हाशिये पर लिखा है और जहां वह चाहिये
था वहां पंक्ति के ऊपर $\times$ चिह्न किया है और वही चिह्न हाशिये पर (अंत में) दिया है (एं. इं; जि. २, पृ. २७६ के
पास का प्लेट).
२. बिल्हारी के लेख की पहिली पंक्ति [श्लोक १] में पहिले '० तोरगपतिः प्रस्फार ०' खुदा था परंतु पीछे से '० पीतः'
का विसर्ग टांकी से उड़ा दिया है तो भी नीचे की बिंदी का कुछ अंश दीखता है (एं. इं; जि. १, पृ. २५४ के पास का प्लेट).
उसी लेख की पांचवीं पंक्ति [श्लोक ६] में 'लीलोल्लालितशार्व्वपर्व्वतपते ०' खुदा था परंतु पीछे से 'शार्व्व' के 'शा' के साथ
लगी हुई 'आ' की मात्रा की सूचक खड़ी लकीर को तिरछी लकीर से काट दिया है. कणस्वा के लेख की १६ वीं पंक्ति में 'यति-
हीनंमथशव्दहीनं' खुदा था परंतु पीछे से 'मथं' के दोनों अक्षरों के ऊपर पांच छोटी खड़ी लकीरें बना कर उन्हें
काट दिया है (इं. ऐं; जि. १६, पृ. ५८ के पास का प्लेट).
३. कहीं पुराने लेखों में संवत् के साथ ऋतु और दिन ('कनिष्कस्य सं ४ हे १ दि १'—एं. इं; जि. १, पृ. ३८१); कहीं
ऋतु, मास और दिन ('सवत्सरे पचविशे हेमंतमसे त्रितिये दिवसं वीशे'—एं. इं; जि. १, पृ. ३८४); कहीं मास, पक्ष और
तिथि (रुद्रदाम्नो वर्षे द्विसप्ततितमे ७० २ मार्गशीर्षवहुलप्रति......—एं. इं; जि. ८, पृ. ४२) मिलते हैं. कहीं संवत् के स्थान
में राज्यवर्ष (सन जुलूस) भी मिलते हैं. चौथी शताब्दी के पीछे के लेखों में बहुधा संवत, मास, पक्ष, तिथि आदि मिलते हैं.
४. अर्थूणा (बांसवाड़ा राज्य में) के मंडलेसर के मंदिर में लगे हुए परमार चामुंडराज के वि. सं. ११३६ फाल्गुन
सुदि ७ शुक्र वार के कविताबद्ध बड़े लेख में उसका रचयिता चंद्र, लेखक वाल्भ्यजाति का कायस्थ आसराज और खोद-
नेवाला चामुंडक होना लिखा है.
५. कुंभलगढ़ (मेवाड़ में) के कुंभस्वामी (मामादेव) के मंदिर में लगा हुआ महाराणा कुंभकर्ण का लेख बड़ी बड़ी
पांच शिलाओं पर खुदा हुआ था जिनमें से ४ के टुकड़े मिल गये हैं.
६. प्राग्वाट (पोरवाड़) श्रेष्ठी (सेठ) लोलाक (लोलिंग) ने वीजोल्यां (मेवाड़ में) के निकट के जैन मंदिर के पास
के एक चट्टान पर 'उन्नतशिखरपुराण' नामक दिगंवर जैन पुस्तक वि. सं. १२२६ (ई. स ११७०) में खुदवाया जो अब
तक विद्यमान है. बीजोल्यां के विद्यानुरागी स्वर्गीय राव कृष्णसिंह ने उसपर तथा उसके पास के दूसरे चट्टान पर
खुदे हुए उक्त जैन मंदिर के संबंध के ही विशाल लेखपर भी (जो उसी संवत् का है और जिसमें चाहमान से लगाकर
सोमेश्वर तक की सांभर और अजमेर के चौहानों की पूरी वंशावली और लोलाक के वंश का वर्णन है) मेरे आग्रह से
पक्के मकान बनवा कर उनकी रक्षा का सुप्रबंध कर दिया है. चौहान राजा विग्रहराज (वीसलदेव) के बनाये हुए
'हरकेलिनाटक' की दो शिला, सोमेश्वर कविरचित 'ललितविग्रहराजनाटक' की दो शिला तथा चौहानों के किसी
ऐतिहासिक काव्य की पहिली शिला, ये पांचों अजमेर के ढाई दिन के झोंपड़े से (जो प्रारंभ में वीसलदेव की बनाई हुई
पाठशाला थी) मिली हैं और इस समय अजमेर के राजपूताना म्यूज़िअम में रक्खी हुई हैं. मालवे के प्रसिद्ध विद्वान्
राजा भोजरचित 'कूर्मशतक' नामक दो प्राकृत काव्य (एं. इं; जि. ८, पृ. २४३–६०) और राजकवि मदनरचित 'पारि-
जातमंजरी(विजयश्री) नाटिका'—एं. इं; जि. ८, पृ. १०१–१७, ये तीनों पुस्तक धार (मालवे में) में कमल मौला नामक