प्राचीन भारतीय लिपिमाला (महामहोपाध्याय गौरीशंकर हीराचन्द ओझा - लिपि-विज्ञान व कूट-पठन)
The Paleography of India by G.H. Ojha
रायबहादुर पण्डित गौरीशंकर हीराचन्द ओझा द्वारा
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रंगीन स्याही.
रंगीन स्याहियों में लाल स्याही मुख्य है. वह दो तरह की होती है. एक तो अलक्ता की और
दूसरी हिंगलू की, जो उसको गोंद के पानी में घोल कर बनाई जाती है. हस्तलिखित वेद के
पुस्तकों में स्वरों के चिह्न, और सब पुस्तकों के पत्रों पर की दाहिनी और बाईं ओर की हाशिये की
दो दो खड़ी लकीरें अलक्ता या हिंगलू से बनी हुई होती हैं. कभी कभी अध्याय की समाप्ति का
अंश, एवं 'भगवानुवाच', 'ऋषिरुवाच' आदि वाक्य तथा विरामसूचक खड़ी लकीरें लाल स्याही
से बनाई जाती हैं. ज्योतिषी लोग जन्मपत्र तथा वर्षफल के लंबे लंबे खरड़ों में खड़े हाशिये, आड़ी
लकीरें तथा भिन्न भिन्न प्रकार की कुंडलियां लाल स्याही से ही बनाते हैं.
सूखे हरे रंग को गोंद के पानी में घोल कर हरी, जंगाल से जंगाली और हरिताल से पीली
स्याही भी लेखक लोग बनाते हैं. कभी कभी पुस्तकों के अध्याय आदि समाप्ति के अंशों में
वे इन रंगीन स्याहियों का उपयोग करते और विशेष कर जैन पुस्तकों में उनसे लिखे हुए अक्षर
मिलते हैं. बहुधा सब पुस्तकलेखक जिन अक्षरों या शब्दों को काटना होता उनपर हरिताल फिरा
देते अथवा स्याही से उनके चारों ओर कुंडल या ऊपर खड़ी लकीरें बना दिया करते थे.
सोने और चांदी की स्याही.
सोने और चांदी के बरकों को गोंद के पानी में घोट कर सुनहरी और रुपहरी स्याहियां बनाई
जाती हैं. इन स्याहियों से लिखने के पहिले पत्रे सफेद हों तो उन्हें काले या लाल रंग से रंग
लेते हैं. फिर कलम से उनपर लिख कर अकीक या कौड़े आदि से घोटते हैं तब अक्षर चमकीले
निकल आते हैं. ऐसी स्याहियों का उपयोग विशेष कर चित्रकार लोग चित्रों में करते हैं तो भी श्रीमंत
लोग प्राचीन काल से उनका उपयोग पुस्तकादि लिखवाने में कराते थे जिसके उदाहरण मिल आते हैं१.
के ढक्कन पर 'महामोगलानस' खुदा है और भीतर 'म' अक्षर स्याही का लिखा हुआ है. सारिपुत्र और महामोगलान दोनों
बुद्धदेव (शाक्य मुनि) के मुख्य शिष्य थे. सारिपुत्र का देहांत बुद्धदेव की मौजूदगी में हो गया था और महामोगलान का बुद्ध
के निर्वाण के बाद हुआ था. यह स्तूप ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी का बना हुआ माना जाता है (कनिंनगहाम का 'भिलसा
टोप्स', पृ. २६४-३०८). यदि ये डिब्बे उक्त स्तूप के बनने के समय नये बनाये जा कर उनमें वे हड्डियां रक्खी गई थीं ऐसा माना
जावे तो ये स्याही से लिखे हुए अक्षर ई. स. पूर्व की तीसरी शताब्दी के होने चाहिये परंतु यदि यह माना जावे कि ये डिब्बे
किसी अन्य स्तूप से निकाले जा कर सांची के स्तूप में रक्खे गये थे तो उक्त स्याही के अक्षरों के लिखे जाने का समय ई. स.
पूर्व की पांचवीं शताब्दी होगा.
१ अजमेर के सेठ कल्याणमल ढड्ढा के पुस्तकसंग्रह में बहुत सुंदर अक्षरों में लिखा हुआ 'कल्पसूत्र' है जिसका
पहिला पत्रा सुवर्ण की स्याही से लिखा हुआ है. यह पुस्तक १७ वीं शताब्दी का लिखा हुआ प्रतीत होता है. सुवर्ण
की स्याही से पूरे लिखे हुए दो जैन पुस्तकों का सिरोही राज्य के जैनपुस्तकसंग्रहों में होना विश्वस्त रीति से सुना गया है
परंतु वे मेरे देखने में नहीं आये. वि. सं. १६२२ के करीब मेरे पिता ने उदयपुर के पंडित सदाशिव से एक छोटा पत्रा सोने
की स्याही से और दूसरा चांदी की स्याही से लिखवाया, वे दोनों अब तक विद्यमान हैं और रंगीन कागज़ों पर लिखे हुए
हैं. सोने की स्याही से लिखी हुई फारसी की एक किताब अलवर के राज्यपुस्तकालय में है ऐसा सुना जाता है. देशी ही
फारसी की एक किताब सेठ कल्याणमल ढड्ढा के यहां गिरवी रक्खी हुई है परंतु उसपर मुहर लगी हुई होने के कारण
उसका नाम मालूम नहीं किया जा सका. सेठ कल्याणमल ढड्ढा के यहां कहे हस्तलिखित पुस्तकों के संग्रह की देशी छींट के
पुट्ठे की एक पुरानी किताब है जिसमें 'यंत्रावचूरि' नामक पुस्तक १६ पत्रों (३८ पृष्ठ) पर चांदी की स्याही से बड़ी छींट के
सुंदर अक्षरों में लिखा हुआ है, जिसके प्रत्येक पृष्ठ के चारों तरफ के हाशिये रंगीन लकीरों से बनाये गये हैं. हाशियों पर
जो इबारत लिखी है वही काली स्याही से है बाकी सब चांदी की स्याही से है. चांदी की स्याही से लिखा हुआ हिस्सा
कागज़ को पहिले लाल या काला रंगने के बाद लिखा गया है; पुस्तक में संवत् नहीं है परंतु वह ई. स. की १५ वीं
शताब्दी के आसपास का लिखा हुआ प्रतीत होता है. पत्रे इतने जीर्ण हो गये हैं कि हाथ देने से टूटते हैं. दो दो पृष्ठों के
बीच रेशम के टुकड़े रक्खे हैं वे भी बिलकुल जीर्णशीर्ण हो गये हैं.